Lecture 13 – काव्य प्रयोजन


Friday 25 Nov 2011, 09.30 – 11.00 

इस बार आपको काव्य प्रयोजन सिखाया गया.

बाद में इस विषय पर विस्तार से लिखूँगा..

अभी के लिए कक्षा के लेक्चर पर ही ध्यान दीजिए और साथ ही सभी से अपेक्षा है कि अपनी तैयारी जारी रखें.

यह विषय पूरा कर दिया गया.

याद रखने वाली बात है कि काव्य प्रयोजन किस उद्देश्य से काव्य लिखा जाता है – यश , स्वात:सुखाय, समाज-कल्याण, आत्म-संतुष्टि, सामाजिक प्रीति, ज्ञान-वर्द्धन आदि…

यह भी याद रखिए कि युग के बदलने के साथ साथ, समाज में परिवर्तन के आने से, काव्य के प्रयोजनों में भी बदलाव आता है.. परंतु यह अंतत: मानवीयता पर ही केंद्रित है.

शेष बाद में.

 

Lecture 12 – काव्य हेतु (Contd)


Friday 18 Nov 2011, 09.30 – 11.00 a.m

dear students,

following the class work i gave you all last time on वह तोड़ती पत्थर, today i continued with my work on काव्य हेतु.

राशेखर के मतों की विशेष चर्चा आज  की कक्षा में हुई जहाँ वे सहजा प्रतिभा और उत्पाद्या प्रतिभा पर प्रकार डालते हैं. साथ ही, प्रतिभा के भेद बताते हुए, सासस्वत कवि, आभ्यासिक और औपदेशिक कवि की बात भी करते हैं.

कारयित्री प्रतिभा (भावक के कल्याण के लिए प्रतिभा) और भावयित्री प्रतिभा (कवि के कल्याण संबंधी प्रतिभा) भी उतने ही महत्वपूर्ण है.

शेष आपको अगले सप्ताह समझाया जाएगा…

कृपया अपना handout देखिए.

Lecture 11 – “वह तोड़ती पत्थर” – Classwork & व्याख्या


Friday 11 Nov 2011, 09.30 – 11.30

नमस्कार.

आज की तिथि अद्भुत है… 11.11.11, 11.11.11 am,…. शतक में एक बार आने वाली इस तिथि से सभी को सुख पहुँचे और यदि इसके पीछे कोई खास बात है, तो आग्रह है नियति से, भाग्य से (भले ही, इसपर मैं कुछ अधिक विश्वास नहीं रखता!!) काव्य-हेतु का अनिवार्य तत्व -“प्रतिभा” {जिसे संस्कृत के आचार्यों ने पूर्व-जन्म संस्कार माना है, जन्मजात जो है…} आप सभी के भीतर “बिजली की कौंध” की तरह अवतरित हों… और आप भी श्रेष्ठ काव्य-सृजन करने में सक्षम हों, जो समाजोपयोगी हों…

बहरहाल, सभी को एक काम दिया गया था पिछली बार… एक स्वरचित मौलिक कविता लिखकर उसे इस ब्लॉग पर पोस्ट करना था. अनेकों ने यह काम किया. बधाई. जो 2-3 लोग पोस्ट नहीं कर पाए, उनसे यह कहना है कि भविष्य में ऐसा न हों कृपया. कुछ लोगों  की स्थिति समझी जा सकती है, जिनके पास  कम्प्यूटर नहीं, फिर भी अनिष्ठा जैसे लोगों ने मुझे अपना काम दिखाया, इसे मैं यूँ ही स्वीकार करता हूँ… लेकिन अगली बार से कृपया MGI computer lab का प्रयोग करें..

आज के लिए, सभी को निराला कृत “वह तोड़ती पत्थर” कविता की एक-एक प्रति दी गई.

अभी तक काव्य संबंधी इस मॉड्यूल के ज़रिए जितना कुछ सीखा है, उनके आधार पर इस कविता की आलोचना आपको कक्षा में ही करनी थी. यह गतिविधि आपके व्यावहारिक ज्ञान के लिए अनिवार्य थी. मेरा लक्ष्य यह नहीं कि आप केवल सिद्धांत रटकर परीक्षा पास कर लें (3 Idiots के चुतुर की तरह) बल्कि प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहार में जो (तभी ज्ञान सार्थक बनता है). यह आजीवन आपके साथ रहे, कल यदि मैं रहूँ अथवा नहीं, काव्यहेतु की भाषा में यह “उपादान ज्ञान” आपके साथ हमेशा रहे. वह “निमित्त कारण” बनकर समाप्त न हों….

साहित्य की  आलोचना अनेक दृष्टिकोणों से होती है. इस कविता में आप लोगों ने पाया कि निराला ने एक गरीब महिला के यथार्थ को हमारे सामने रखा.. तो कुछ लोगों  को लगा कि इलाहबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर वाली इस महिला के पास अदम्य साहस, धैर्य व शक्ति है… जो भी हो, यह एक प्रगतिशील कवि , निराला की अद्भुत कविता है जिसका गहन विश्लेषण कक्षा में हुआ. शब्द-चयन, शैली, बिम्ब, प्रतीक विधान, आदि को निराला ने यथार्थ वाले संदर्भ के साथ ही जोड़ा है.

The complete poem is as follows: -

तोड़ती पत्थर

वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर -
वह तोड़ती पत्थर।

नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार बार प्रहार -
सामने तरु मालिका अट्टलिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिंदी छा गई
प्राय: हुई दोपहर -
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा, मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्न तार,
देख कर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से,
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहम सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा -
“मैं तोड़ती पत्थर।”

Lecture 10 – काव्य हेतु (contd)


Friday 04 Oct 2011, 09.30 – 11.00

नमस्कार साथियो.

आज की कक्षा पिछली कक्षा पर एक पुनरावृत्ति के साथ आरंभ की गई. मुझे इस बात का गर्व और प्रसन्नता है कि ब्लॉग के माध्यम से आपके शिक्षण में प्रवाहमयता आ रही है. साथ ही इसके माध्यम से आप अपनी तैयारी भी करने में सक्षम हो रहे हैं. यूँ ही सक्रिय रहें, इसमें आप लोगों का ही लाभ है.

इस बार हमने काव्य हेतु के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाले. मैंने अनेक उदाहरणों के माध्यम से आपको सझाया कि किस  प्रकार से काव्य-रचना में प्रतिभा की अनिवार्यता होती है. कवि अपने पूर्व-जन्म के संस्कारों के आधार पर काव्य-सृजन करने में सफल होता है. इसे अनेक विचारकों ने एक शक्ति के रूप में देखा तो पाश्चात्य विद्वान प्रतिभा को कल्पनाशीलता के रूप में देखते हैं, याद रहें पश्चिम में जन्म-पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है इसीलिए प्रतिभा को पूर्व-जन्म के संस्कार के रूप में इसे परिभाषित नहीं किए.

साथ में मैंने यह भी बताया कि Dr Brian Weiss, जो एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक है, और जिन्होंने Many Lives, Many Masters, Same Soul Many Lives आदि पुस्तकें लिखी हैं,उनका मानना है कि पूर्व-जन्म नि:संदेह एक यथार्थ है. शेष आप इंटरनेट से सामग्री प्राप्त कर सकते हैं. पुनर्जन्म पर अनेक साइट है जैसे विकिपेडिया से:http://en.wikipedia.org/wiki/Rebirth_(Buddhism)

बाकी, मैंने आपसे कहा था कि काव्य हेतु पर नोट्स बाद में भेजूँगा.

Work for next week: 

1. to write a poem, any topic of your choice, based on the basic concepts of poetry writing and features of hindi poetry before our next class & Post it on the blog. This is part of your assignment.

2. I shall distribute a poem “वह तोड़ती पत्थर” by निराला where you will be required to analyse in class next time.

धन्यवाद और गंगा-स्नान पर्व की मंगलकामनाएँ आपको और आपके परिवार को भी.

 

 

 

 

BA Yr 1 FT: Lecture 9 – काव्य-हेतु (started)


Friday 28 Oct 2011, 10.15-11.50, BA Yr 1 FT, Literary Theory & Forms of Literature

दोस्तो, आप लोगों को ऑनलाइन सक्रिय होने में मुझे लगता है कि मैं असफल होता जा रहा हूँ..

आपका सहयोग मिल ही नहीं रहा..

खैर, मैं अपना काम व ब्लॉगिंग उन लोगों के लिए जारी रख रहा हूँ जो इसमें रुचि लेते हुए अपनी शिक्षा वाली प्रक्रिया में प्रतिबद्ध है..

इस बार काफी लोग कक्षा में उपस्थित थे, हमने काव्य हेतु पर काम शुरु किया.. please refer to your handouts …

काव्य हेतु का अर्थ समझाते हुए, काव्य के मूल 4 तत्वों को समझाया गया: -

  1. रागात्मक तत्व / भाव तत्व – The Element of Emotion
  2. बुद्धि तत्व / विचार तत्व – The Element of Intellect
  3. भाषा-शैली तत्व – The Element of Expression
  4. कल्पना तत्व – The Element of Imagination
आपको यह भी समझाया गया कि कार्यों के साथ प्राय: 2 प्रकार के कारण होते हैं: -
  1. उपादान कारण (कार्य के साथ नित्य संबंध रखने वाले कारण, मिट्टी और घड़े का संबंध)
  2. निमित्त कारण (कार्य के साथ अनित्य संबंध रखने वाले कारण, घड़े और कुम्भकार का संबंध)
आगे, यह बताया गया कि संस्कृत आचार्यों ने 3 मूल कारण बताए है, काव्य-सृजन के लिए: -
  1. प्रतिभा (शक्ति)
  2. व्युत्पत्ति
  3. अभ्यास
इनमें से “प्रतिभा” काव्य का उपादान कारण है जबकि “व्युत्पत्ति” और “अभ्यास” निमित्त कारण है.
प्रतिभा 
प्रतिभा को आचार्यों ने ‘दीप्ति’, ‘प्रकाश’, ‘शक्ति’ आदि नामों से संबोधित किया है. “प्रतिभा कवि-मानस में काव्योपयोगी शब्दार्थ का ‘प्रकाश’ या ‘स्फुरण’ है.”
प्रतिभा को इन रूपों में देखी जा सकती हैं: -
  • कवि की उर्वर कल्पना
  • सूक्ष्म सौंदर्यानुभूति
  • संवेदनशीलता
  • शब्द और अर्थ की सूक्ष्म परख
  • सहज और स्वत: अभिव्यंजनशीलता
  • उन्मेष, विकास …
शेष अगली कक्षा में…  Please do come prepared .. thanks.

Happy Divali


मंगलकामनाएँ तो हज़ार मिली होंगी

जीवन भर

शुभचिंतक तो अनेक होंगे आपके

उम्र भर

आज अपने सभी साथियों को

दीपावली की शुभकामनाएँ दे रहा हूँ..

आप सभी सपरिवार खुश रहें..

ईश्वर करें कि आपके परिवार में हर प्रकार के दीप जले..

विनय

BA Yr 1 FT: Lecture 8 – काव्य हेतु (पृष्ठभूमि)


Friday 21 Oct 2011, 09.30-11.00, BA Yr 1, Literary Theory & Forms of Literature

Dear friends,

hope many of you have really enjoyed the excursion    trip yesterday. We, indeed had memorable moments at  Rochester Falls as well as St Felix seaside especially  dancing with the lovely dadis…

well, i understand many of you have not been able to  make it to attend class today. Some were present, so i  had to conduct the class.

 

आज काव्य लक्षण संबंधी मूल विचारों को समेटा गया + काव्य हेतु के संदर्भ में कुछ प्रारंभिक चर्चा की गई.

उपर वाले चित्र को अच्छी तरह से देखें. रोचेस्टर फ़ॉल्स का चित्र है. इस झरने का संबंध काव्य लक्षण के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है? काव्य के लक्षणों में आपने पाया कि यह सृजन के क्षेत्र का है, इसमें मौलिकता व नूतनता है. कवि के अंतर्मन से भाव जब निसृत होते है तो वे कविता का रूप धारण करते हैं. ठीक वैसे ही जैसे इस झरने से उपर से पानी जिस वेग के साथ प्रवाहित हो रहा है, वैसी ही काव्य-सृजन की अवस्था में कवि के हृदय से भाव उच्छृंखलित होते हैं. इसे हलचल की स्थिति भी माना जा सकता है.

अब आपने देखा होगा कि पानी में झाग इसलिए उत्पन्न होते है क्योंकि इसकी प्रवाहमय स्थिति में अनेक स्तरों पर पत्थर है, उनसे टकराने से ही पानी का शांतमय अवस्था भंग हो जाती है. इन पत्थरों को काव्यात्मक प्रक्रिया में अनेक नाम दिए जा सकते हैं- कवि के अनुभवों से भावों की टकराहट, अथवा सामाजिक व्यवस्थाओं की जटिलताओं की वजह से उत्पन्न कवि के मन में हलचल. इस तरह के अनेक बिम्ब आप जोड़ सकते हैं. ये स्थितियाँ काव्य-लेखन के लिए अनिवार्य अवस्थाएँ हैं.

इसके पश्चात आप देख सकते हैं कि पानी शांत हो जाता है (वही जगह जहाँ हम तैर रहे थे!). इसे आप काव्य-लेखन की अंतिम अवस्था मान सकते हैं जहाँ पर कवि ने किसी गर्भवती महिला के समान प्रसव वेदना से तड़पने के बाद बच्चे को जन्म दे देती है, इसी तरह से कविता को जन्म देता है कवि, तब आनंद व खुशी की इस अवस्था में शांति और संतुष्टि का आभास जब कवि को होता है तो उसे मैंने इस शांत पानी के साथ जोड़कर रखा. शेष आप लोग समझें.

दूसरे हिस्से में, मैंने काव्य हेतु के संदर्भ में यह बताया कि काव्य के सृजन के कारणों को ही काव्य हेतु कहा जाता है. इसमें 3 प्रमुख बातें हैं-प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास. कृपया और तैयारी के साथ आएँ…

काव्य हेतु पर कुछ नोट्स प्रस्तुत हैं:-

काव्य हेतु 

प्रयोजनउद्देश्यकोकहते है, अर्थात, किन-किन बातों कोलक्ष्यमेंरखकर कवि अपनेकार्यमें युक्त होता है। प्रेरणा प्रयोजन का आंतरिकरूपहोता है।हेतुकाअभिप्रायउन साधनोंसेहोता है जो कवि कीकाव्य-रचना मेंसहायकरहती है।

 

मम्मट के अनुसार: -

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्

काव्यज्ञशिक्षया~भ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ।।

i.e.  काव्य उद्भव के हेतु: -

 

1)      शक्ति(कवित्व का बीज-रूप संस्कार) जिसके बिनाकाव्य-रचना होनहींसकती &यदिहोती तो हास्यास्पद हो जाती है।

2)       लोक, शास्त्र,काव्यआदिके निरीक्षण &ज्ञानसेउत्पन्नयोग्यताऔर

3)      काव्यजानने वाले काशिक्षाद्वाराप्राप्त अभ्यास

 

  • शक्ति/प्रतिभा = नैसर्गिकी / जन्मसिद्ध       ‘काव्यप्रकाश’ के अनुसार
  • शेषदो = अर्जित

 

दण्डी के अनुसार: –

नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहु निर्मलम्

अमन्दश्चा~भियोगो~स्या: कारणं काव्यसंपद: ।।

 

दण्डी ने नैसर्गिकी प्रतिभा,बहुतअध्ययन & श्रवणआदितथाउसकाबहुतउपयोगतीनोंकोकाव्य-सम्पत्ति काकारणमाना है।शक्तिको बहुत दुर्लभ माना है, उससेभीआगे, व्युत्पति (लोक & शास्त्र केज्ञानकीआश्रितऔरऔचित्य के विचार) तथाविवेककोऔर भीदुर्लभ माना है।

 

रुद्रट :

  1. सहजा (मुखय) – मनुष्यके साथ उत्पन्न होती है।
  2. उत्पाद्या – अध्ययन, अभ्यास, सत्संग सेप्राप्त होती है।

 

राजशेखर

प्रतिभा वह तत्व है जो काव्योपयोगी शब्दग्राम, अर्थसमूह, अलंकारतंत्र, उक्तिअमार्ग तथा अन्यान्य काव्योपजीवियों को अंतरात्मा में प्रतिभासित करता है। प्रतिभाशील कवि दृश्य और अदृश्य का सरलता से बोध कर लेता है। वह एक विलक्षण अंतर्दृष्टि से अलंकृत होता है और भूत, भविष्य एवं वर्तमान के गर्भ में छिपे हुए तथ्यों का साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है। वह मनीषी परिभू एवं स्वयंभू होता है।

1)      भावयित्री प्रतिभा

2)     कारयित्रीप्रतिभा–   (क) सहजा

(ख) आहार्या

(ग) औपदेशिकी

 

—————–

काव्य हेतु

BA (Hons) in Hindi - Yr I

काव्य हेतु

  • हेतु: काव्य-सृजन का कारण
  1. काव्य-हेतु: 1) प्रतिभा   2) व्युत्त्पति  3) अभ्यास
  • दंडी – नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहु निर्मलम्
  • रुद्रट –  1) सहजा (मुख्य) : मनुष्य के साथ उत्पन्न (जन्मजात)

2) उत्पाद्या : अध्ययन, अभ्यास, सत्संग से प्राप्त

  • राजशेखर - प्रतिभा वह तत्त्व है जो काव्योपयोगी शब्दग्राम, अर्थसमूह, अलंकारतंत्र, उक्तिमार्ग तथा अन्यान्य काव्योपजीवियों को अंतरात्मा में प्रतिभासित करता है।  प्रतिभाशील कवि दृश्य और अदृश्य का सरलता से बोध कर लेता है।  वह एक विलक्षण अंतर्दृश्टि से अलंकृत होता है और भूत, भविष्य और वर्तमान के गर्भ में छिपे हुए तथ्यों का साक्षात्कार कर सकता है।  वह मनीषी परिभू एवं स्वयंभू होता है। 

प्रतिभा के 2 भेद: -

1) भावयित्री प्रतिभा &

2) कारयित्री प्रतिभा [ क) सहजा, ख) आहार्या ग) औपदेशिकी ]

  • मम्मट – 1) प्रतिभा= शक्ति (जन्मजात) : कवित्त्व का बीज-रूप

2) व्युत्त्पति (लोक, शास्त्र, काव्य आदि के निरीक्षण & ज्ञान से उत्पन्न योग्यता)

3) अभ्यास (अर्जित)

  • K.C. Pandey – the power of clear visualisation of the aesthetic image in all its fullness and life is technically called प्रतिभा
  • पाश्चात्य विद्वान:      1) Wordsworth – कल्पना एक मानसिक कौशल है। 

2) विश्वकोश – कल्पना वह मनसिक शक्ति है जो वस्तुओं की अनुपस्थिति में उन्हें मस्तिष्क

          के  समक्ष प्रस्तुत करती है। 

3) मैक्डूगल – कल्पना अप्रत्यक्ष वस्तुओं के सम्बन्ध में चित्रण मनन है।

4) Coleridge – …… prime agent of perception.

  1. B.  व्युत्त्पति : बहुज्ञता, निपुणता, शास्त्रीय-लौकिक ज्ञान, …
  • दंडी: शास्त्र-ज्ञान
  • रुद्रट: छन्द-शास्त्र, व्याकरण & कला का ज्ञान (निपुणता के लिए)
  • मम्मट: शब्दकोश, शास्त्र, जीवन-शास्त्र का ज्ञान, …
  • राजशेखर: बहुज्ञता व्युत्पत्ति: इत्याचार्या (व्याकरण, लोकवृत्त, महाकवियों के काव्य-इतिहास, पुराण, लक्षण-ग्रंथ … से उत्पन्न ज्ञान)
  1. C.  अभ्यास (पूर्व-वासना-जन्य अद्भुत प्रतिभा के न रहने पर भी शास्त्राध्ययन और अभ्यास से वाणी की उपासना करने पर वाणी अवश्य ही अनुग्रह करती है।)

K. Goodary

21 Oct 2011

 

NOTE: KINDLY NOTE THAT WE NEED ADDITIONAL CLASSES TO CATCH UP WITH OUR MODULE MAP. PLEASE DISCUSS IT AMONG YOURSELVES, ESPECIALLY WITH JOINT HONS STUDENTS FOR FREE SLOTS WHERE WE CAN MEET UP. 

धन्यवाद.

 

 

BA Yr 1: Lecture 7 – काव्य लक्षण (समाप्त)


Friday 14 October 2011, 9.30 – 11.00, BA Yr 1, Literary Theory & Forms of Literature

 

आज कक्षा कुछ अधिक गंभीर रही.

कुछ लोगों ने पिछली बार यह चिंता व्यक्त की कि क्या उन्हें परीक्षा के लिए संस्कृत के सभी उद्धरण कंठस्थ करना है… वैसे तो याद करें तो अच्छी बात है, इसके लिए अतिरिक्त अंक मिलेंगे ही. परंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कि काव्य लक्षण अथवा किसी भी प्रश्न का उत्तर देते हुए, आप अपनी आलोचनात्मक शक्ति का प्रदर्शन करें. तुलनात्मक अध्ययन से, अनेक आचार्यों व विद्वानों के मतों/विचारों का अनुमोदन-खण्डन करने से आपको निस्संदेह अतिरिक्त अंक मिलेंगे.

साथ ही ज्ञान-अर्जन की प्रक्रिया कभी भी निरुद्देश्य नहीं होती, याद रखिए. इसलिए, हालाँकि यह मोड्यूल गंभीर, निरस व कठिन प्रतीत हो सकता है, परंतु इसका अध्ययन जमकर करना है, कम से कम सिद्धांतों के मूल पहलुओं को ठीक से समझने का प्रयास करें. यह इसलिए क्योंकि इसी के आधार पर आप किसी भी साहित्यिक विधा की सही आलोचना, व्याख्या, समीक्षा करने में सफल होंगे.

रही आज  की कक्षा की बात, हमने संस्कृत आचार्यों के मतों के अलावा रीतिकाल के आचार्यों के विचारों को भी आपके सामने रखा. ध्यान दीजिए कि संस्कृत युग में साहित्यिक विधा के रूप में केवल नाटक और काव्य ही थे, इसलिए इन दोनों विधाओं को केद्र में रखकर ही उन्होंने काव्य की परिभाषा पर अपने विचार व्यक्त किए.

रीतिकाल के आचार्य कलात्मक दृष्टि से काफी सुसंपन्न थे, इसलिए आप देखेंगे कि इस काल में कलात्मकता का भरपूर प्रसार मिलता है (साहित्य, चित्रकला, वास्तुकला, नृत्यकला आदि). देव, ठाकुर आदि के विचारों के बाद, आधुनिक काल के विद्वानों के मत प्रस्तुत किए गए.

आधुनिक काल के विद्वान असल में युग की मांग के अनुकूल सहित्य-सृजन करते हैं. यहाँ परिस्थितियाँ बदलने लगती हैं, युग-चेतना में बदलाव आने लगता है, साहित्य का लक्ष्य ही बदलने लगता है. इसलिए काव्य-लक्षण की जगह पर मैंने यहाँ साहित्य के लक्षणों की चर्चा की है जिनका सीधा संबंध आधुनिक रचनाकारों से है. फिर आप देखें कि यहाँ साहित्य/ काव्य में यथार्थ-तत्व प्रमुख बनकर उभरता है. प्रेमचंद जहाँ साहित्य को जीवन की अलोचना  के रूप में मानते है वहाँ प्रसाद प्रेय और श्रेय पर ध्यान केंद्रित करते है. इस संदर्भ में कृपया आप अपने नोट्स देखिए (पुराने ब्लॉग में अपलोड किए हुए). विस्तार से आप समझ सकते हैं.

अंतिम वर्ग के विद्वानों में पाश्चात्य विचारक आते हैं. यहाँ साहित्य के प्रति दृष्टिकोण में हलका सा अंतर आता है. imagination पर अधिक बल देते हुए इस वर्ग के कवि-रचनाकार-विद्वान अरस्तू के मूल सिद्धांत से काफी प्रेरित है. काव्य प्रकृति का अनुकरण करता है … इन विचारकों के अनुसार काव्य-सृजन की प्रक्रिया एक विशेष स्थिति में उभरती है…. contemplated in tranquility …. काव्य-बिम्ब, प्रतीक विधान आदि पर  विशेष बल देते हुए ये विचारक अपनी काव्य-संबंधी विचारधारा प्रस्तुत करते हैं.

Note: अपनी ओर से अतिरिक्त शोध कीजिए, अपनी तैयारी अनेक स्रोतों से कीजिए.

कोई प्रश्न अथवा कोई दुविधा हो तो कृपया पूछें.

धन्यवाद,

शुभम्,

विनय

BA Yr 1: Lecture 6 – काव्य लक्षण (शेष)


Friday 07 October 2011, 09.30 – 11.30, BA Yr 1, Literary Theory & Forms of Literature

 

सभी को नमस्कार.

पिछली बार काव्य-लक्षण पर तैयार powerpoint presentation के मूल बिंदु ब्लॉग पर अपलोड कर दिया था. इस बार इसी विषय पर चर्चा आगे बढ़ने वाली थी. परंतु पुन: आपकी ओर से काफ़ी छात्रों की लापरवाही इस रूप में रही कि बिना तैयारी के क्लास में आए. इस प्रकार के रवैये अक्षम्य है. कृपया अगली बार सभी, जी हाँ! सभी लोग पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में आएँ. कोई भी बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा. वैसे भी विषय तो गंभीर है ही इसके अतिरिक्त आपकी ओर से सतत अध्ययन व अनुशासन की अपेक्षा है. आज की नोट पर विचार करें.

काव्य लक्षण के संबंध में संस्कृत आचार्यों के मतों को आपके सामने रखा गया.    इस संदर्भ में कृपया पिछले लेक्चर के नोट्स देखें.

“काव्य शब्दार्थमय है” इस मूल मंत्र पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए भरत मुनि की  काव्य-संबंधी मान्यताएँ रखी गईं. उस काल में नाटकों का प्रचलन था, इसलिए मूलत: सभी संस्कृत आचार्यों ने नाटक को ही केंद्र में रखते हुए काव्य की अवधारणा /परिभाषा सामने रखी.

भामह के “शब्दार्थौ सहितौ काव्यं” का भी विश्लेषण किया गया.

दण्डी, रूद्रट, वामन, कुंतक, विश्वनाथ, आनंदवर्धन, मम्मट, पं जगन्नाथ आदि संस्कृत आचार्यों के मतों की भी व्याख्या की गई.

Note 1: इन आचार्यों द्वारा दी गई काव्य-संबंधी परिभाषाओं का ज्ञान तो अनिवार्य है ही, साथ ही परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए उनका विश्लेषण करना न भूलें. अपने समकालीन समाज व कविताओं की प्रवृत्तियों के परिप्रेक्ष्य में इन अवधारणाओं की सार्थकता, इनकी उपयोगिता आदि का विश्लेषण अनिवार्य है (यदि परीक्षा में अधिक अंक कमाने का लक्ष्य है तो!!). साथ ही न भूलें कि ये परिभाषाएँ हमें साहित्य की आलोचना करने के लिए दृष्टिकोण प्रदान करती हैं. साहत्य की समीक्षा हर साहित्य के छात्र  के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है. इसी क्रम में इस मोड्यूल की भी सार्थकता व प्रासंगिकता सिद्ध  होती है.

Note 2: अगली बार काव्य लक्षण समाप्त किया जाएगा. इसलिए सही मायने में आप सहयोग प्रदान करते हुए तैयारी के साथ कक्षा में आएँ.

Note 3: इंटरनेट पर इस संदर्भ में अनेक सामग्री उपलब्ध हैं, कृपया देखें.

धन्यवाद,

शुभम्,

विनय

BA Yr 1 – Class 5 : काव्य लक्षण


BA Yr 1, Fri 30 Sept 2011, 09.30 – 11.00.

Module: Literary Theory & Forms of Literature

 

 

नमस्कार सभी को,

आज की कक्षा में भारतीय काव्यशास्त्र के विषय में आपको समझाया गया. साथ ही संस्कृत विचारकों के मूल सिद्धांतों की भी चर्चा की गई.

दूसरे भाग में काव्य लक्षण पर प्रकाश डाला गया. मेरी अपेक्षा यह थी कि आप सभी काव्यलक्षण पर तैयारी करके आते मगर ऐसा नहीं हुआ.. भविष्य में इसका खयाल रखें..

फिलहाल पॉवरपोईंट प्रस्तुति के मुख्य पहलुओं को प्रकाशित कर रहा हूँ..अगली बार आप  तैयारी के साथ आइए,कृपया.

विचारकों के वर्ग

  1. संस्कृत आचार्य
  2. हिन्दी आचार्य
  3. आधुनिक युग के हिन्दी विद्वान
  4. पाश्चात्य विचारक

1. संस्कृत आचार्य

काव्य शब्दार्थमय है। 

भरत मुनि – सुन्दर कोमल पद, गूढ़ शब्दों से रहित, सरल, युक्तियुक्त रस …

भामह -शब्दार्थौ सहितौ काव्यं

दण्डी -चमत्कारपूर्ण अर्थ से युक्त सरस व मनोहर पदावली

रुद्रट – ननु शब्दार्थौ काव्यं

वामन -

  • गुण और अलंकार से सुसंस्कृत शब्दार्थ
  • साहजिक सौंदर्य & कृत्रिम सौंदर्य
  • दोषों का परित्याग

काव्य चमत्कारपूर्ण रचना है। 

˜   कुंतक (वक्रोक्ति आचार्य)

  • काव्य – शब्द और अर्थ का संयोजन
  • कल्पना कौशल से उत्पन्न
  • चमत्कार से युक्त
  • सहृदयों को आनन्द प्रदान करने वाला

विश्वनाथ                     : वाक्यं रसात्मकं काव्यं

आनन्दवर्द्धन           : सहृदयजन्य आनन्द आह्लाद

मम्मट                    : दोष-रहित, गुन-सहित,

अलंकारयुक्त

पंडित जगन्नाथ         : रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द

 

2. हिंदी आचार्य

रीतिकाल के कवि

रीतिकालीन आचार्य – काव्य का आंतरिक + बाहरी पक्ष

आचार्य देव     : ऐसे सार्थक शब्द जिनमें छन्द, भाव, अलंकार व रस हो।

कुलपति : शब्दार्थमय छन्द रचना (कवि की कल्पना शक्ति)

ठाकुर : छन्दबद्धता & रसात्मकता

 

3. आधुनिक युग के हिन्दी विद्वान

आधुनिक युग के हिन्दी विद्वान

महावीरप्रसाद द्विवेदी : यथार्थता, सरलता, भावोद्वेग के गुण (रीतिकालीन विचारकों का विरोध)

आचार्य रामचंद्र शुक्ल : राग तत्त्व की प्रधानता

आनन्द तत्त्व & कल्याण तत्त्व

श्यामसुंदरदास : रस, ज्ञानयुक्त, शास्त्रीय साहित्य का विरोध, काव्य की कलात्मक आह्लादकता

जयशंकर प्रसाद : श्रेयमयी प्रेय रचनात्मक ज्ञानधारा

प्रेमचंद : साहित्य जीवन की आलोचना है।

महादेवी वर्मा: सत्य और सौंदर्य का सामंजस्य

नंददुलारे वाजपेयी: भाव, सौंदर्य, रस

सुमित्रानंदन पंत: कविता परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। 

 

4. पाश्चात्य विचारक

Aristotle

it is an imitation of nature … by means of words.

Wilson

Poetry is the intellect coloured by feelings.

Milton

Poetry should be simple, sensuous and impassioned.

Wordsworth

Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings. It takes its origin from emotions recollected in tranquillity.”

Coleridge

Poetry is the excitement of emotion for the purpose of immediate pleasure through the medium of beauty.

Poetry is the best words in the best order.

Shelly

Poetry is the record of the best and happiest moments of the happiest and best minds.

Mathew Arnold

Poetry is, at bottom, a criticism of life.

Johnson

Poetry is the art of uniting pleasure with truth by calling imagination to the help of reason.

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