स्वागत


आप सभी हिंदी प्रेमियों का स्वागत.

मॉरीशस के साहित्य, समाज और संस्कृति पर आधारित एक ई-पत्रिका का आरंभ होने वाला है. इस संदर्भ में साथ साथ एक ब्लॉग भी तैयार किया गया है.

आप सभी से आग्रह है कि अपनी रचनाएँ Vinaye Goodary  को vinaye08@gmail.com  पर भेजें…

इसी वर्ष के सितम्बर महीने से इस पत्रिका का शुभारंभ आपके सहयोग से हो रहा है.

अपनी प्रतिक्रियाएँ भी देना न भूलें..

धन्यवाद…

आओ, निज भाषा के लिए कुछ कर दिखाएँ…Image

स्वागत


आप सभी हिंदी प्रेमियों का स्वागत.

मॉरीशस के साहित्य, समाज और संस्कृति पर आधारित एक ई-पत्रिका का आरंभ होने वाला है. इस संदर्भ में साथ साथ एक ब्लॉग भी तैयार किया गया है.

आप सभी से आग्रह है कि अपनी रचनाएँ Vinaye Goodary  को vinaye08@gmail.com  पर भेजें…

इसी वर्ष के सितम्बर महीने से इस पत्रिका का शुभारंभ आपके सहयोग से हो रहा है.

अपनी प्रतिक्रियाएँ भी देना न भूलें..

धन्यवाद…

आओ, निज भाषा के लिए कुछ कर दिखाएँ…Image

Lecture 15 – explanation of मोड़ & presentation ज्वारभाटा


Friday 25 Nov 2011, BA PT Yr 1, Last Lecture

सभी को नमस्कार. इस वर्ष के अंतिम लेक्चर में आपका स्वागत है.

मैंने “मोड़” कहानी का विश्लेषण किया. कुछ महत्वपूर्ण अंशों की भी व्यख्या की..

दूसरे हिस्से में, Kritee  & Pritee ने “ज्वारभाटा” पर अपना प्रस्तुतीकरण दिया. जिसपर बाद में मैंने अपनी टिप्पणी की.

I would like to thank you all for being very cooperative in my class. It has been a  real pleasure working with you for this one semester, I happened to complete the tasks assigned by myself to you all..

also, I hope the use of the blog-system as well as http://www.evidya.org has been fruitful in making your learning more interesting as well as challenging.. hope to get your collaborations in this line next year too..

NOTE: kindly read हम प्रवासी, novel written  by Abhimanyu Unnuth during your holidays so that we can proceed rapidly with our work in the next semester.

Happy holidays..

Take care.

Lecture 13 – काव्य प्रयोजन


Friday 25 Nov 2011, 09.30 – 11.00 

इस बार आपको काव्य प्रयोजन सिखाया गया.

बाद में इस विषय पर विस्तार से लिखूँगा..

अभी के लिए कक्षा के लेक्चर पर ही ध्यान दीजिए और साथ ही सभी से अपेक्षा है कि अपनी तैयारी जारी रखें.

यह विषय पूरा कर दिया गया.

याद रखने वाली बात है कि काव्य प्रयोजन किस उद्देश्य से काव्य लिखा जाता है – यश , स्वात:सुखाय, समाज-कल्याण, आत्म-संतुष्टि, सामाजिक प्रीति, ज्ञान-वर्द्धन आदि…

यह भी याद रखिए कि युग के बदलने के साथ साथ, समाज में परिवर्तन के आने से, काव्य के प्रयोजनों में भी बदलाव आता है.. परंतु यह अंतत: मानवीयता पर ही केंद्रित है.

शेष बाद में.

 

Lecture 9 & Lecture 10 – अनुवाद की प्रकृति (समाप्त)


Thursday 24 Nov 2011, 09.00 – 11.00, BA Yr 3. 

पिछली बार की बात के साथ आज आगे के विचार प्रस्तुत किए गए. आपको याद होगा Muir, Edwin & Muir, Willa (On Translation) की परिभाषा –

“translation is obviously a difficult art; i use that word, for if translation is not an art, it can hardly be called translation. yet, it is a secondary art and at best, can strive for but never reach a final perfection.”

यद रखिए कि ऐसी कोई भी कला नहीं जो शिल्प की अपेक्षा करती हो, साथ ही ऐसा कोई शिल्प भी नहीं जो बिना कला के परिपूर्ण हो.

यह भी याद करना अनिवार्य है कि अनुवाद  की प्रकृति के निर्धारण से पहले अनुवाद के प्रकार को पहचानना अनिवार्य है.

भोलानाथ तिवारी की परिभाषा है –

“यदि मूल समाग्री केवल सूचनाओं या तथ्यों से युक्त है या विज्ञान आदि की है, जिसमें सूत्रों की प्रधानता है और अभिव्यक्ति का कोई खास महत्व नहीं है, तो उसके अनुवाद के साथ शिल्पी न्याय कर लेगा, किंतु मान लीजिए कविता का अनुवाद करना है जिसमें भाव तथा जिसका बहुत कुछ सौंदर्य अभिव्यक्ति परा आधृत है, तो उसके लिए अनुवाद-कला अनिवार्यत: आवश्यक होगी, केवल अनुवाद-शिल्प से अनुवाद अपेक्षित बात नहीं बनती.”

अब, श्रीपाद रघुनाथ जोशी (अनुवाद पत्रिका,अंक 52, पृष्ठ 70-71) मानते हैं कि शिल्प मूल के भाव को लक्ष्य भाषा में हू-ब-हू रूपांतरित करता है.. उनके अनुसार इसमें कला की कोई आवश्यकता नहीं है. अनुवादक दोनों भाषाओं के शब्द-भंडार/ संपदा से परिचित होकर यह कार्य आसानी से कर सकता है. वे आगे बताते हैं कि अनूदित पुस्तक पढ़ने पर अनुवाद का यदि कोई आभास न हो, तो समझना चाहिए  कि अनुवाद  सफल हुआ, और इसके पीछे शिल्प का ही हाथ होता है. जबकि मूल भाषा की भावनाएँ, उसकी परंपराएँ –  यदि इन सब  को आप अनुवाद की भाषा में लाते हैं तो वह कला है.

  • अनुवाद विशुद्ध कला भी नहीं है:-

सर्जनात्मक कृति की पुन: सर्जना या ‘प्रति सर्जना’ है – कला. अत: अनुवाद इस दृष्टि से “प्रथम श्रेणी की कला नहीं है.”

डॉ. रणजीत साहा (1990, pp 81) {अनुवाद बोध, संपादक: डॉ गार्गी गुप्ता} अपने लेख “अनुवाद एक सर्जनात्मक कला है.” में लिखते हैं:-

“अनुवाद के प्रयोजन-पक्ष को अनुवादक के शिल्प (भाषा प्रयोग, संरचना-बोध और विन्यास संबंधी अनुषंग) और कला – (लालित्य बोध, अंविति और सांस्कृतिक संप्रेषण)- दोनों के ही समानुपातिक तालमेल की आवश्यकता होती है.”शिल्प” भाषा के स्थूल स्तर पर और “कला” उसके सूक्ष्म स्तर (भाव) पर अपने अपने निकाय को स्प्ष्ट और प्रकट करते हैं. वस्तुनिष्ठता और आत्मनिष्ठता का यह  सामंजस्य ‘शरीर और आत्म’ के चिर-परिचित रूपक द्वारा सहज ही समझा  जा सकता है.”

  • क्या अनुवाद विज्ञान है?

इससे पहले विज्ञान के अर्थ को समझना ज़रूरी है. इसमें तर्क, प्रमाण, निश्चितता आदि आ जाते हैं. चूँकि अनुवाद प्रायोगिक या अनुप्रयुक्त भाषा-विज्ञान से ही सीधा संबंध रखता है, इसलिए यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

“अनुवाद भाषिक-प्रक्रिया का परिणाम या उसकी परिणति है. यह तो ठीक है कि उसकी प्रक्रिया बहुस्तरीय है, जटिल है, वह विज्ञान है, शिल्प और कला तीनों है, लेकिन उसका परिणाम किस पकृति का है?”

अनुवाद कला है:- यह इस रूप में देखा जा सकता है-स्रोत भाषा में निहित बिम्बों, प्रतीकों, और अभिप्रायों को अपनी भाषा में लालित्यपूर्ण ढंग स लाने की चेष्टा करना. इसे पुन: सर्जन अथवा प्रति सर्जन (trans-creation) कहा जाता है. यहाँ अनुवादक  व्याख्या करता है.

यदि व्यापक रूप से देखा जाए  तो अनुवाद स्वयं में मौलिक अभिव्यक्ति भी है…

अज्ञेय लिखते हैं –

“समस्त अभिव्यक्ति अनुवाद है, क्योंकि वह अव्यक्त (या अदृश्य आदि) को भाषा (रेखा या रंग) में प्रस्तुत करती है. ”

इसके विरोध में Humbolt बताते है कि अनुवाद मौलिक अभिव्यक्ति भी नहीं है क्योंकि –

“सारा अनुवाद-कार्य बस एक असमाधेय समस्या का समाधान खोजने के  लिए किया गया प्रयास मात्र है.” हम वस्तुओं और प्राणियों को देखकर उनके नाम रखते हैं या उनके चित्र बनाते हैं, वह भी अनुवाद है; हमारा नाम हमारा अनुवाद है!

परंतु ऐसे तर्कों से “अनुवाद की प्रकृति” की समस्या का हल नहीं हो सकता है.

 

अनुवाद विज्ञान है , इस तर्क पर दो प्रक्रियाएँ चलती हैं- विकोडीकरण और कोडीकरण, इस कक्षा में विस्तार से समझाया गया.

साथ में कुछ परिभाषाएँ-

“Translation  is far more  than a science. It is also a skill (कौशल) and in the ultimate analysis, fully satisfactory translation is always an art.”

“Interpreting is not everybody’s art.”

“translators are traitors”

अंतिम प्रश्न:

अनुवाद कलात्मक विज्ञान है या वैज्ञानिक कला है???? इस पर मनन करें …

अनुवाद को इस रूप में “कलात्मक रुचि” + “सृजनात्मक क्षमता” चाहिए. काव्यानुवाद vs तथ्यपरक अनुवाद …

 

 

 

 

Lecture 12 – general


Wednesday 23 Nov 2011.

आज की कक्षा में हमने कुछ सामान्य बातें कीं. मॉड्यूल के विषय में, संभावित प्रश्नों के बारे में, आपकी आलोचनात्मक व विश्लेषाणत्मक शक्ति पर आदि ऐसे अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया.

साथ ही, क्लास टेस्ट के स्थान पर एक कार्य आपको दिया गया जिसे अगले बूधवार 30 नवम्बर 2011 तक http://www.evidya.org पर भेज देना है. याद रहे, यह आपके coursework के अंतर्गत आता है. कविताओं की व्याख्या व विश्लेषण करके आपको अपना कार्य पोस्ट करना है.

The following students are allotted the following poems: –

  1. Lochun – प्यारे भारत
  2. Bundhun – ख़ूनी हस्ताक्षर
  3. Mohesh-Jugoo – आर्य
  4. Etwaru – ताशों में ही बचे रहेंगे
  5. Sobhagee – कर्मवीर
  6. Ojoobah – बढ़े चलो
  7. Kowal – सरफ़रोशी की तमन्ना (गीत)
  8. Lalman – यह दीया बुझे नहीं
  9. Ruttun – अरुण यह मधुमय देश हमारा
  10. Mohabeer – चल मरदाने
  11. Panchoo – ध्वजा वंदना
  12. Gutteea – विप्लव गान

NB:  DO NOT FORGET THE DEADLINE FOR POSTING THIS ASSIGNMENT IS WEDNESDAY 30 NOV 2011

Lecture 14 – presentation on मोड़


Wednesday 23 Nov 2011, 14.15 – 16.00, Additional Class

नमस्कार साथियो,

इस अतिरिक्त कक्षा में उपस्थित होने के लिए धन्यवाद.

आज, मैंने, दोस्ती कहानी की व्याख्या की. विश्लेषण भी किया. मॉरीशस सामाजिक यथार्थ में इस कहानी की सार्थकता पर भी चर्चा की गई.

दूसरे भाग में, सुनैना और मेधाविनी द्वारा “मोड़” कहानी पर प्रस्तुतीकरण रहा.

please check http://www.evidya for the powerpoint presentation.