MA Yr 1 – class 3

Monday 19 sept 2011, MA 1, 

Module: Freedom Movement & Hindi Poetry

—–

सभी को नमस्कार.

 

 

 

 

आज की कक्षा भी काफी गंभीर रही. आज का विषय था: आधुनिक काल की पूर्वपीठिका और 1857 का स्वतंत्रता-संग्राम.

आधुनिकता-बोध, मध्यकालीनता का विरोध, अंधविश्वास व रूढ़िवादिता का खण्दन, इन सभी पहलुओं पर चर्चा हुई.

साथ ही कुछ यथार्थपरक स्थितियों को भी सामाजिक यथार्थ के रूप में सामने रखे गए. आज के व्याख्यान के इस हिस्से में सामंतवाद का अंत, ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना (भारत में), पूँजीवाद का विकास, रेल, डाक, पत्रकारिता, स्कूल-कॉलेजों का निर्माण, रजवाड़ों की शिथिलता आदि का खुलासा दिया गया.

 

दूसरे भाग में 1857 का महत्व सिद्ध किया गया. कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी रखे गए जैसे 1857 का विद्रोह क्यों? किन वजहों से? किन परिस्थितियों में? चुनौतियाँ कौन सी थीं सिपाहियों (sepoys) के सामने? इन पर आप कृपया अपने शोध द्वारा ग़ौर कीजिए. ब्रिटीश साम्राज्य की शासन-नीतियों की भी चर्चा की गई. मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, बिहार के कुवँरसिंह आदि के नेतृत्व में इस विद्रोह के कुछ और ही आयाम निकले. मेरठ से निकले कुछ सिपाहियों जिन्होंने अंग्रेज़ अफसरों की हत्या की थी, दिल्ली के बहादूर शाह2 से नेतृत्व सम्भालने की मांग करते है. लखनउ, बिहार, पंजाब, अवध आदि क्षेत्रों में विद्रोह आरम्भ होता है परंतु दक्षिण भारत ब्रिटीश सरकार के वफादार बनकर रहे.

विद्रोह के कारणों में एक तो ब्राह्मण सैनिकों का धर्म-भ्रष्ट (Enfield Riffles के सुवर व बैल की चरबी वाले कार्तूस) और दूसरा, भारतीय मन पर विदेशी आक्रांताओं का सतत दमन, दबाव उनके विरोध  के कारण बने.

आज की कक्षा के लिए इतना ही, शेष आप  इतिहास की पुस्तकों से पढ़े…

तब तक के लिए,

नमस्कार

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

6 Responses to MA Yr 1 – class 3

  1. karishma bundhun says:

    सादर प्रणाम गुरूजी,
    आपके साथ कक्षा करने से हमें कक्षा में आधुनिक काल और साथ ही साथ हमें भारत में ही विद्रोह क्यों हुआ हमें चिंतन करने के लिए प्रह्साहित किया है. आधुनिक काल को समझने के लिए हमें केसे उसकी तुलना मध्यकाल से करना चाहिए.

    हिंदी साहित्य का आधुनिक काल तत्कालीन राजनैतिक गतिविधियों से प्रभावित हुआ। इसको हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ युग माना जा सकता है, जिसमें पद्य के साथ-साथ गद्य, समालोचना, कहानी, नाटक व पत्रकारिता का भी विकास हुआ। इस काल में राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। इसके लिए श्रृंगारी ब्रजभाषा की अपेक्षा खड़ी बोली उपयुक्त समझी गई। समय की प्रगति के साथ गद्य और पद्य दोनों रूपों में खड़ी बोली का पर्याप्त विकास हुआ। भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र तथा बाबू अयोध्या प्रसाद खत्रीने खड़ी बोली के दोनों रूपों को सुधारने में महान प्रयत्न किया।

    हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढ़ा और जीवन में बदलाव आने लगा। ईश्वर के साथ साथ मानव को समान महत्व दिया गया। भावना के साथ साथ विचारों को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ साथ गद्य का भी विकास हुआ और छापेखाने के आते ही साहित्य के संसार में एक नयी क्रांति हुई।

    न्दी गद्य के विकास को विभिन्न सोपानों में विभक्त किया जा सकता है।
    १. भारतेंदु पूर्व युग १८०० ईस्वी से १८५० ईस्वी तक
    २. भारतेंदु युग १८५० ईस्वी से १९०० ईस्वी तक
    ३. द्विवेदी युग १९०० ईस्वी से १९२० ईस्वी तक
    ४. रामचंद्र शुक्ल व प्रेमचंद युग १९२० ईस्वी से १९३६ ईस्वी तक
    ५. अद्यतन युग १९३६ ईस्वी से आजतक

    भारत पर विदेशियों के आक्रमण की परंपरा सुदीर्घ नज़र आती है। अनेक विदेशी प्रजा यहाँ भारतीय प्रजा को परेशान करती रही है। इनमें ब्रितानियों ने समग्र भारतीय प्रजा और शासकों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। भारतीय प्रजा को जब अपनी ग़ुलामी का अहसास हुआ तो उन्होंने यथाशक्ति, यथामति विदेशी हुकूमत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इस आंदोलन की शुरुआत थी 1857 का प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम। 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम के प्रभावी संघर्षों तथा उनकी विफलता के कारणों के बारे में विपुल मात्रा मे ं ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं। किंतु फिर भी, बहुत सी जानकारी, घटनाएँ, प्रसंग या व्यक्तियों के संदर्भ में ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं होती है।

    असफ़लता के कारण

    आजादी के लिये 1857 की क्रांति मेंे सभी वर्ग के लोगों ने अपना सहयोग दिया था परन्तु यह क्रांति विफ़ल रही। इतिहासकार इस क्रांति की विफ़लता के निम्न कारण बताते है।

    निश्चित तिथि के पूर्व क्रांति का भड़कना

    यद्यपि कई क्रांतिकारियों ने साहस के साथ दुश्मन के छक्के छुड़ाये लेकिन कुछ दूसरे कारण भी थे जिनके कारण यह क्रांति विफ़ल रही ।

    ब्रिटिश सेना का एक संगठन व एक केन्द्र होता था। एक सेना के हटने पर दूसरी सेना आ जाती थी। जबकि भारतीय सेना मेंे यदि युद्ध मेंे कोई सैनिक मारा जाता तो सैनिक अपनी हार मान लेते थे व कई बार युद्ध बंद कर देते थे। उनमे धैर्य की कमी थी लेकिन ब्रितानियों की सेना मेंे यह नहीं होता था उनका युद्ध जारी रहता था। इस कारण क्रांति विफ़ल रही। फ़िर भी, इन सब के बावजूद 1857 की क्रांति का विवरण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों मेंे लिखा गया है।

    क्रांति का स्थानीय स्वरूप

    क्रांतिकारियों मेंे प्रभावी नेता कीकमी

    निश्चित लक्ष्य का अभाव

    साधन का अभाव

    कैनिंग की उदारता

    जन साधारण का क्रांति के प्रति उदासीन होना

  2. नमस्ते गुरुजी, इस बर आपने कफ़ी गम्भीर बाते बतायी थी पहले पूर्वपिथीका की बत भुत अच्छी तरह से बतयी ,आपने अन्घविश्वासो की चच्रा की थी,फ़िर साम्न्तवादी अव्स्था के आवेश के बारे मे बताया था,
    और आपने sepoys के बारे म्र चचा की थी,तब आपने 1857 का परिवेश के बारे मे बताया जो हमे पता नही था और जान कर पता ल्गा की भारतीयो ने विरोध क्यो किया था

  3. mili aartee lochon says:

    नमस्ते गुरुजी और कक्षा के सभी मित्रों को,

    कक्षा में १८५७ के परिवेश की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला गया था। प्रवृत्तियों को भली भाँति समझने से पूर्व इस प्रश्न पर चर्चा कि १८५७ में यह विद्रोह क्यों? सन 1857 के विद्रोह के विभिन्न राजनैतिक,आर्थिक,धार्मिक,सैनिक तथा सामाजिक कारण बताये जाते हैं। अनेक कारणों की चर्चा की गई जिसमें एक सैनिक विद्रोह था। इससे यह प्रश्न उठा कि सैनिकों में यह विद्रोह क्यों जबकि भारतीय सिपाहियों का एक आर्थिक संतुलन था, उनके बच्चों के लिए अनेक सुवोधाएँ थीं, उनकी एक गर्व-प्रतिष्ठा थी?

    यह विद्रोह एक असुक्षित, अभिंग्य भविष्य के लिए था अर्थात्‌ भारतीय सैनिकों को भले ही अनेक सुविधाएँ प्राप्त थी परन्तु वे दमित थे। साथ ही, यह विद्रोह मनोवैज्ञानिक स्तर पर कालान्तर से पड़े दवाब का विद्रोह था जिसे उभरने के लिए एक ही कारण चाहिए था….वह था Enfield Riffles..|

    इससे सम्बन्धित मैंने कुछ पड़ा है:

    सिपाहियों की आशंका
    सिपाही मूलत: कंपनी की बंगाल सेना मे काम करने वाले भारतीय मूल के सैनिक थे। बाम्बे, मद्रास और बंगाल प्रेसीडेन्सी की अपनी अलग सेना और सेनाप्रमुख होता था। इस सेना में ब्रितानी सेना से ज्यादा सिपाही थे। सन 1857 में इस सेना मे 257,000 सिपाही थे। बाम्बे और मद्रास प्रेसीडेन्सी की सेना मे अलग अलग क्षेत्रो के लोग होने की वजह से ये सेनाएं विभिन्नता से पूर्ण थी और इनमे किसी एक क्षेत्र के लोगो का प्रभुत्व नही था। परन्तु बंगाल प्रेसीडेन्सी की सेना मे भर्ती होने वाले सैनिक मुख्यत: अवध और गन्गा के मैदानी इलाको के भूमिहार राजपूत और ब्राह्मिन थे। कंपनी के प्रारम्भिक वर्षों में बंगाल सेना में जातिगत विशेषाधिकारों और रीतिरिवाजों को महत्व दिया जाता था परन्तु सन 1840 के बाद कलकत्ता में आधुनिकता पसन्द सरकार आने के बाद सिपाहियों में अपनी जाति खोने की आशंका व्याप्त हो गयी [२]। सेना में सिपाहियों को जाति और धर्म से सम्बन्धित चिन्ह पहनने से मना कर दिया गया। सन 1856 मे एक आदेश के अन्तर्गत सभी नये भर्ती सिपाहियों को विदेश मे कुछ समय के लिये काम करना अनिवार्य कर दिया गया। सिपाही धीरे-धीरे सेना के जीवन के विभिन्न पहलुओं से असन्तुष्ट हो चुके थे। सेना का वेतन कम था और अवध और पंजाब जीतने के बाद सिपाहियों का भत्ता भी खत्म कर् दिया गया था। एनफ़ील्ड बंदूक के बारे में फ़ैली अफवाहों ने सिपाहियों की आशन्का को और बडा दिया कि कंपनी उनकी धर्म और जाति परिवर्तन करना चाहती है।

    एनफ़ील्ड बंदूक
    विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न 1853 एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि 0.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग मे लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले मे शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक मे गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पडता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पडता था। कारतूस का बाहरी आवरण मे चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी।

    सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस मे लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। यह हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों दोनो की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ़ था। ब्रितानी अफ़सरों ने इसे अफ़वाह बताया और सुझाव दिया कि सिपाही नये कारतूस बनाये जिसमे बकरे या मधुमक्क्खी की चर्बी प्रयोग की जाये। इस सुझाव ने सिपाहियों के बीच फ़ैली इस अफ़वाह को और पुख्ता कर दिया। दूसरा सुझाव यह दिया गया कि सिपाही कारतूस को दांतों से काटने की बजाय हाथों से खोलें। परंतु सिपाहियों ने इसे ये कहते हुए अस्विकार कर दिया कि वे कभी भी नयी कवायद को भूल सकते हैं और दांतों से कारतूस को काट सकते हैं।

    तत्कालीन ब्रितानी सेना प्रमुख (भारत) जार्ज एनसन ने अपने अफ़सरों की सलाह को नकारते हुए इस कवायद और नयी बंदूक से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने से इन्कार कर दिया।

  4. vinaye says:

    नमस्ते गुरुजी ,
    आधुनिक काल की पूर्वपीठिका से संबंधित जितने घटकों पर प्रकाश डाला गया उनके मध्यम से १८५७ के परिवेश को समझने में आसानी हुई विशेष रुप से धार्मिक तथा राजनीतिक परिवेश में हुए विभिन्न परिवर्तनों को । साथ ही साथ १८५७ के विद्रोह का मुख्य कारण भी स्पष्ट हुआ क्योंकि पुस्त्कों में अनेक कारण मिलते हैं परन्तु जिस मुख्य कारण पर आपने प्रकाश डाला इसके बारे में पहले नहीं जानते थे।

  5. Teena Mohesh says:

    आदरणीय गुरुजी तथा सभी सहपाठियों को तीना का अभिवादन. इस तीसरी कक्षा की अगर मुझे comment करना पड़े तो मैं यही कहूँगी कि गुरुजी विनय की कक्षा दिलचस्प एवं शिक्षाप्रद तो है ही लेकिन साथ ही साथ इस कक्षा में हमारी चिंतन शक्ति का आवाहन है. हमारी तीसरी कक्षा एक सशक्त उदाहरण है. १८५७ के विद्रोह से तो हम सभी परिचित है. लेकिन हमारा ध्यान तो उस ओर कभी गया नहीं कि उन सैनिकों ने १८५७ को ही क्यों चुना, यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है. इसलिए हम गुरुजी विनय के प्रति आभारी हैं. अगली कक्षा की प्रतिक्षा में. नमस्ते.

  6. Kowal Hemant says:

    सभी को नमस्ते. मैं आप लोगों के साथ कुछ quotation share कर रहा हूँ..आशा करता हूँ की आप इनका लाभ उठाएंगे..

    मद्रास के सदस्य मी. लौइन के अनुसार :
    ” हमने उन्हें (भारतियों को) जाति ब्रष्ट कर दिया. उनके उतराधिकार के नियमों को रद कर दिया.हमने उनकी विवाह संस्थाओं को बदल दिया हैं. उनके धर्म के पवित्रं रिवाजों की हमने अवहेलना की हैं. उनकी मंदिरों की जायदातों को हमने ज़प्त और अपनी सरकारी लेखों में हमने उनको काफिर कहकर कलंकित किया हैं. ”

    पंडित नेहरू के अनुसार :
    ” एक ग्रामीण उद्योग के बाद दूसरा ग्रामीण उद्योग नष्ट होता गया और भारत ब्रिटेन का आर्थिक उपांग बन गया. ”

    अंग्रेज़ इतिहासकार जॉन शिल्ले लिखते हैं:
    “ग़दर केवल सैनिक विद्रोह था, यह पूर्णतः अन्तराष्ट्रीय स्वार्थी विद्रोह था जिसका न कोई देशीय नेता था और न जिसका सम्पूर्ण भारत की जनता का समर्थन प्राप्त था. ”

    धन्यवाद..

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