BA Yr 2 FT – Lecture 2 & Lecture 3: Background

Tuesday 27 Sept 2011, BA (Hons) Hindi Yr 2, Mauritian Hindi Literature, 8am to 11am.

दूसरी कक्षा में सभी का स्वागत है. आज का लेक्चर दो हिस्सों में विभाजित रहा.

पहले में, मॉरीशस के संदर्भ में कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ आपके सामने रखी गईं. ऐतिहासिक घटनाओं को 1834 से लेकर आज तक प्रस्तुत की गईं. महात्मा गांधी के मॉरीशस आगमन तथा उनके द्वारा दिए गए 3 प्रमुख संदेश, फिर मणिलाल डॉक्टर को यहाँ भेजे जाना और उनके द्वारा भारतीय आप्रवासियों की यातनाओं को मंच प्रदान करने हेतु “हिंदुस्तानी” समाचार पत्र का प्रकाशन.

इसके बाद, 1910 के बाद अनेक धार्मिक संस्थाओं के उदय से धर्म व भाषा का प्रचार होने लगता है जिसके कारण लोगों की जागृति इस ओर बढ़ने लगती है. साथ ही पत्रकारिता के विकास में “दुर्गा” हस्तलिखित साहित्यिक पत्रिका के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता.

कुछ slides के नोट्स प्रस्तुत हैं: –

  • दास-प्रथा – अफ्रिका के अनेक देशों से दासों का खरीदा जाना
  • शक्कर कोठी में मज़दूरी करवाना – असफलता
  • William Wilberforce का संघर्ष (House of Lords में)
  • दलाल, शक्कर कोठी के मालिक, सरदार
  • 40+ दिनों की समुद्री यात्रा, बासी भात, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का अभाव, शवों को समुद्र में फेंकना
  • 1901 में गाँधी जी का आगमन & तेहर बाग़ में उनका संदेश:
      • भारतीय मज़दूरों के बच्चों को शिक्षित कराना
      • अपनी संतानों को राजनीति में प्रवेश दिलाना
      • संगठन का सुदृढ़ीकरण
  • 1909: मणिलाल डाक्टर का आगमन & हिंदुस्तानी समाचार पत्र का प्रकाशन
  • 1912 > अनेक सभाओं की स्थापना + धर्म प्रचार (हिंदी के माध्यम से)
  • पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन
  • 1935-36: ‘दुर्गा’ हस्तलिखित पत्रिका
  • धार्मिक प्रचार – हिंदी का प्रचार
  • प्रेमचंद, प्रसाद, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, मोहन राकेश का प्रभाव
  • शक्कर कोठी के मालिकों का विरोध

दूसरे भाग में मॉरीशस के हिंदी कहानी-साहित्य के उद्भव और विकास पर प्रकाश डाला गया. इसके साथ साथ, कहानी-साहित्य का काल विभाजन इस प्रकार से किया गया:

  • प्रारम्भिक काल या प्रेरणा काल  (1913 ई से 1935)
  • मध्यकाल या संघर्ष काल       (1935 ई से 1968)
  • आधुनिक काल या स्वातंत्र्योत्तर काल (1968 ई से अब तक)

हर काल की कहानियों की मुख्य प्रवृत्तियों का भी विश्लेषण किया गया. पत्रकारिता के  योगदान में कुछ विचार ऐसे हैं – 1909 में ‘हिन्दुस्तानी’ , आर्यवीर (1929) ,ओरियण्टल गज़ट’ (1912), मॉरीशस इंडियन टाइम्स’ (1920) ‘मॉरीशस मित्र’ (1924), ‘सनातन धर्मांक’ (1933) आदि ।  इन पत्रिकाओं का उद्देश्य जनता तक धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं के प्रति जागरूकता बनाए रखना था, फलस्वरूप,  मॉरीशस के गद्य साहित्य का प्रचार बढ़ा ही नहीं बल्कि इन पत्र-पत्रिकाओं के उदय एवं विस्तार से गद्य लेखन की दिशा में नई स्फूर्ति आई ।

लेखन पर प्रभाव:

  • भारतीय रचनाकारों की प्रेरणा
  • तत्कालीन सामाजिक स्थितियाँ
  • प्रो. रामप्रकाश और राष्ट्रीय प्रशिक्षण विद्यालय
  • राजनैतिक मंच पर परिवर्तन
  1.  वासुदेव विष्णुदयाल
  2.  रामनारायण रॉय
  3. शिवसागर रामगुलाम

प्रथम कहानी : इन्दो (1933, सनातन धर्मांक)

  • आरंभिक कहानियों की प्रवृत्तियाँ :-
  1.  वर्ण्य विषय में परिपक्वता का अभाव
  2. धार्मिकता का अत्यधिक प्रभाव
  3.  उपदेशात्मक कहानियाँ
  4. शैली में वैविध्य की कमी

दुर्गा पत्रिका की कहानियाँ : –

  • सभी हस्तलिखित कहानियाँ आदर्शवादी + उस युग का लेखक सामाजिक यथार्थ से अछूता नहीं रहा।
  • भारतीय समाज की व्यथा कथा कहानियों की मूल संवेदना बनी।
  • प्रवासी भारतीय अंक की 3 कहानियों एक भारतीय कुली की दुखद गाथा, मेरी दादी और आहुतियाँ में भारतीय आप्रवासी नारी के क्रन्दन का मार्मिक चित्रण है।

मध्यकाल की कहानियाँ: –

1964-1967 के बीच प्रकाशन में रही काँग्रेस पत्रिका में कई नवोदित कहानीकारों की रचनाएँ छपीं, उनमें रामदेव धुरंधर, मुनीश्वरलाल चिंतामणि, बीरसेन जगासिंह आदि थे।  उल्लेख्य है, कि चिंतामणि की कई रचनाएँ इस पत्रिका में छपती रहीं, उनमें वसंत की बेटी’, निर्धन साहित्यकार, समाज के मोती, मॉरीशस भूषण’ आदि थे।  कहानियों का केन्द्र वर्तमान श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति थी।

स्वातंत्र्योत्तर कहानियों में प्रवासी जीवन:

  • उनके संघर्ष के मूल में जो दृढ़ता दिखाई देती है उसे डॉ. गोयंका इन शब्दों में बयान करते हैं (अनत, 1993):-

उनकी इस अदम्य जिजीविषा और भयंकर परिस्थितियों में जीवित रहने की दृढ़ता के मूल में इनका भाषा, धर्म और संस्कृति-प्रेम था और रामायण, रामचरितमानस, महाभारत, गीता, हनुमान-चालीसा, आल्हा जैसी पुस्तकें थी, जो इनके सुख-दुख में, दासता और विवशता में, पर्व और त्योहारों में इनका साथ देती थी और ये भोजपुरी एवं हिन्दी भाषा से अपनी एक भारतीय दुनिया बनाए रखते थे।                                      

NB: KINDLY NOTHE THAT WE ARE MEETING ON MONDAY 3RD OCTOBER 2011 @ 12PM FOR AN ADDITIONAL CLASS. PLEASE COME PREPARED AS THERE WILL PRESENTATION ON क्षुद्रताएँ & some basic explanation on चक्कर कहानी.

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

17 Responses to BA Yr 2 FT – Lecture 2 & Lecture 3: Background

  1. Nishta Pooniah says:

    वैसे तो मुझे इतिहास से उतना लगाव था,बचपन से लेकर आज तक मैं इस विषय से भागती थी,लेकिन मैं महात्मा गाँधी सन्स्थान के प्रध्यापक,गुरुजी विनय को धयवाद देना चह्ती हूँ क्योंकि इस विषय पर जो जानकारियाँ दी हैं,उन सबसे मैं प्रेरित हुई हूँ और मोरीशस के इतिहास एवं उसके साहित्य पर कुछ जानने क अव्सर प्राप्त हुआ।

    इसके अलावा मैं यह भी कहना चहती हूँ कि अन्य साहित्य के बारे में तो सभी परिचित है,लेकिन मोरीशस के साहित्य के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.यह एक अच्छी बात नहीं है.मोरीशस के निवासी हैं हम,इसीलिए हमें अपनी सन्स्कृती एवं साहित्य के बारे में जानना चाहिए।

    महात्मा गाँधी जैसे बड़े हस्ति हमारे देश पधारे और उन्होंने अपने शिष्य मणिलाल डॉक्टर को हम बच्चों को शिक्षा प्रदान किया,राजनीति में उत्साह दिलाया और आत्म-निर्भर होने को कहा.अगर वे लोग मोरीशस नहीं आते तो शायद आज हम उन लड़कियों के समान बन जाते जो केवल घर के चार दिवारी में बन्द होती हैं या तो चार-पाँच बच्चों की माँ कहलातीं।

    उनका हमारे देश में आना ही अपने-आप में बहुत बड़ी बात है,मनो जैसे कि यह एक वरदान है.इसके अलावा हमें उन सभी स्थानीय लेखकों के बारे में जानते हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा सफ़ल्ता प्राप्त की हैं और उन सभी समस्यकों के प्रति हमें अवगत कराते हैं।

    आज मैं बहुत खुश हूँ कि मुझे इन सभी स्थानीय लेखकों के बारे जानकारियाँ प्राप्त हुईं और उनके बारे में और जानने का प्रयास करूँगी.धन्यवाद।

    निष्ठा।

  2. bundhoo.goshena says:

    सर्वप्रथम मैं गुरुजी विनय को धन्यवाद करना चाहती हूँ कि इस ब्लोग के ज़रिए छात्रों को यह सुअवसर प्राप्त हुआ कि अपने अपने विचार व्यक्त कर पाये जो मौखिक रूप से इतना नही हो पाता है। सब से पहले मनुष्य को इतिहास इसलिए पढ़ना चाहिये क्योंकि इसके ज़रिये वह अपने देश वासियों के बीते हुए अनुभवों एवं कार्यों के सुसंगत तथ्यों का ज्ञान हासिल करके उनका दार्शनिक व्याख्या कर सके।जैसे की हम जानते हैं कि मॉरिशस एक स्वतन्त्र देश नही था,बहुत संघर्ष के बाद आज मॉरिशस उन्नति के शेखर तक पहुँच पाये हैं और अगर आज लोग अपने अस्तित्व और हक की सही पह्चान कर पाये है तो इसका श्रय महात्मा गांधीजी को मुख्य रूप से जाता है। वे क्रान्तिकारी तथा अहिंसावादी थे, आप्रवासियों पर शोषण होते देखकर उन्होंने मणिलाल डाक्टरजी को यहाँ भेजा और उन लोगों का होसला बढ़ाया ।दूसरी ओर उन्होंने पत्र पत्रिका द्वारा आवाज़ उठाये और शिक्षा की महत्वता के बारे में लोगों को जाग्रित किए और राजनीति की और लोगों का ध्यान केन्द्रित किए।मणिलाल डाक्टर के अलावा विलियम विल्बफ़ोस ने भी एक ओर दास उन्मूलन के लिए संघर्ष किये और मोह्न राकेश जैसे महान कवि हुए जिन्होंने लोगों को लिखने के लिए प्रोत्साहित किए। बहुत से क्रान्तिवादी पुरुष रहे उस समय जिन्होंने अन्याय के प्रति आवाज़ उठाए और इनमे सफ़ल भी हुए। समाज में भाई चारा ,समानता एवं स्वतन्त्र्ता की भावना हो यही सभी लोगों का लक्ष्य था।

  3. RUGHOONUNDUN ROOMILA says:

    सभी को नमस्ते, सर्व प्रथम मैं गुरूजी विनय को धन्यवाद करना चाह्ती हूँ क्योंकि इस हिन्दी ब्लोक के माध्यम से हम अपने विचारों की आदान-प्रदान कर सकते हैं. मोरीश्स हिंदी साहित्य के कक्षा में हमें बहुत कुछ सिखने को मिला है. हमेशा दुसरे देश विशेषकर भारत के सहित्य के बारे में समझाते आ रहे है. कभी भी हम ने मोरीशस की साहित्य से उतना परिचित नहीं किया जितना कि आज इस कक्षा के माध्यम किया है. बचपन से लेकर आज तक केवल संक्षेपन में ही इस विषय के बारे में जाना है. लेकिन अब इस ’मोज्यूल’ के माध्यम हम अपने देश के बारे में विस्तार से समझाया जाएगा. हमें अपने पुर्वजों एवं संस्कॄत के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त होंगे जो अवश्य हम अपने दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकेंगे. हमें महात्मा गांधी, मणिलाल डाक्टर जी, चाचा रामगुलाम एवं और भी महा पुरुषों को भूलना नहीं चाहिए क्योंकि उन लोगों ने हमारे देश को स्वतंत्रता करने के लिए जीतोर मेहनत किए ताकि आज हमें एक सुविधाजनक जीवन बिता सके. धन्यवाद.
    रुमिला…

  4. ratna ramchurn says:

    मोरिशसीय हिंदी साहित्य की कक्षा अत्यन्त ही रोचक रही. देश के इतिहास पर हमारा सामान्य ज्ञान तो बढ़ा ही, इसके साथ-साथ स्थानीय लेखकों के बारे मे भी हमे अधिक जानकरी मिली. हम हमेशा से यही समझते आ रहे हैं कि इतिहास मात्र वर्ष एवं नामों का अध्ययन हैं, किन्तु अब हमारा ब्रम दूर होता जा रहा हैं. इसके अलावा मुझे यह जानने का सुअवसर मिला कि साहित्य मात्र कहानियां पढ़ना व पात्रों का चित्रण करने तक ही सीमित नहीं. इतिहास एवं साहित्य कदम से कदम मिलाकर चलते हैं. समाज किस प्रकार विकसित हुआ, मोरिशसीय साहित्य का निर्माण किस प्रकार हुआ इन समस्त बातों पर विस्तार पूर्वक हमें समझाया गया.

    मुझे जो बात अधिक प्रिय लगी वो थी उस पक्षी का उस समय कक्षा में आना जब गुरूजी हमारे पूर्वजों की असुरक्षा भाव पर प्रकाश डाल रहे थे. वह पक्षी इस रूप में प्रतीकात्मक रही कि उसकी व्याकुलता पूर्वजों की व्याकुलता एवं दुःख से मेल खाती हैं तथा उस पक्षी के माध्यम से पता चलता हैं कि हमारे पूर्वज का दम भी इसी प्रकार यहाँ पर आने से घुटा होगा.

    उन लोगों के परिश्रम से प्रेरित होकर हमें आगे बढ़ना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों को इतिहास के प्रति आकृष्ट करना चाहिए. इतिहास के माध्यम से ही हमारे पूर्वज और उनका देश के उन्नति में योगदान जीवित रहता हैं.
    आशा करती हूँ कि आने वाली कक्षाओं में हम इसी प्रकार आगे बढ़ें और कक्षा को अधिक रोचक बनाते चलें. धन्यवाद.

  5. Nishta Pooniah says:

    मोरीशस के स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी सर शिवसागर रामगुलाम हिंद महासागर क्षेत्र के महान नेता एवं राजनीतिज्ञ थे | यह स्वाभाविक ही था कि उनके स्वतंत्रता संघर्ष तथा स्वतंत्रता के पश्चात् मोरीशस को कल्याणकारी राज्य बनाने के प्रयत्नों का प्रभाव हमारे मोरीशस के हिंदी साहित्य पर पड़ता | ये प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से साहित्य की सभी विधाओं पर देखा जा सकता है – कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध आदि | किन्तु इसमें दो मत नहीं कि रामगुलाम के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं विचारधारा का सबसे अधिक प्रभाव कविता पर पड़ा | डॉ. ब्रजेन्द्र भगत ‘मधुकर’ ने चाचा रामगुलाम पर सैकड़ों कविताएँ रची हैं | वे चाचा के भक्त एवं आत्मीय थे | स्वतंत्रता आन्दोलन के दिनों में मधुकर रामगुलाम के राजनीतिक जुटावों में उपस्थित होकर अपनी कविताओं को गाकर सुनाते थे | कवी ने उनको निकट से देखा और समझा है | अपनी ‘मधुवाणी’ पुस्तक में ‘स्वीकारो श्रद्धांजलि ‘ अर्पित करते हुए उनके मानवीय गुणों का उदघाटन किया है | यथा –

    “मोरीशस का भाग्य विधाता,

    विरोधियों को गले लगाता |

    निराश्रितों का आश्रयदाता जग,

    सारा गौरव गुण गाता ||

    स्वतंत्रता की समर भुनी में,

    जित लिया संग्राम |

    बना दिया इस देश को,

    चाचा स्वर्गपुरी सुरधाम ||”

    वास्तव में रामगुलाम सच्चे अर्थों में ‘निराश्रितों के आश्रयदाता’ थे और इस देश को ‘स्वर्गपुरी’ बनाने में जीवन पर्यन्त प्रयास करते रहे | यह सर्वविदित है कि चाचा रामगुलाम की सरकार ने वृद्धों, विधवाओं, बीमारों, मछुओं, बेकारों आदि के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था की थी |
    जनार्दन कालीचरण ने अपनी कविता के माध्यम से चाचा के संघर्षमय जीवन पर प्रकाश डाला है | निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं –

    “दिन-दुखी जनों का दर्द बाँटकर,

    उनको साथी बनाया था |

    चैन-आराम का महल छोड़कर,

    संघर्ष को गले लगाया था ||”

    कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम में गीता के ‘भक्त’, ‘स्थितप्रज्ञ’ तथा ‘गुणातीत’ जैसे गुणों को देखा है | इस सन्दर्भ में सोमदत्त बखोरी की ये पंक्तियाँ देखी –

    “जो भी है मिलता वे लेते सभी |

    फूलों की माला अरु फटकार भी ||

    जो देना है, सो दे दो मिट अभी |

    न ऐसा मिलेगा फिर कोई कभी ||”

    मधुकर ने रामगुलाम को ‘गीता गान सुनाने वाला’ कहा है | इसका तात्पर्य यही है कि चाचा गीत के उपदेशों को जीने वालों में थे | कवी के ही शब्दों में –

    “कभी न पीछे हटाने वाला |

    सत्य न्याय पर मिटने वाला |

    जीवन दान दिलाने वाला,

    गीता गान सुनाने वाला ||”

    मोरीशस के शीर्षस्थ कथाकार अभिमन्यु अनत ने चाचा रामगुलाम के समय के मोरीशस का चित्रण अपने उपन्यासों तथा कहानियों में किया है | यह शोध का विषय हो सकता है | स्वतंत्रता के पश्चात् वाला मोरीशस आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याओं से जूझने वाला मोरीशस था |

    महेश रामजियावन तथा अस्तानंद सदासिंह जैसे नाटककारों ने अपने नाटकों में रामगुलाम के शासनकाल की विसंगतियों पर प्रकाश डाला है |

    ‘और पसीना बहता रहा’ उपन्यास में अभिमन्यु अनत ने मज़दूर नेता पं. हरिप्रसाद रामनारायण के कार्यों तथा सेवाओं का उल्लेख किया है |

    वास्तव में चाचा के उदार दृष्टिकोण के कारण न केवल रामनारायण बल्कि सुखदेव विष्णुदयाल, रज़ाक मुहम्मद, पं. जगदम्बी जैसे नेता भी उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके | इसीलिए जब देश की आज़ादी का प्रश्न उठा तब ये लोग रामगुलाम को अपना सहयोग देने में पीछे न रहे |

    स्थानीय लेखकों एवं कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है | इसीलिए उनकी रचनाओं में जहाँ सभी संस्कृतियों तथा धर्मों के प्रति आदर भाव रखने वाले रामगुलाम का चित्रण हुआ है, वहां मोरीशस को स्वतंत्रता दिलाने वाले देश भक्त रामगुलाम के भी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं | ‘बेलरिव’ की झोंपड़ी से लेकर ‘रेज्वी’ महल तक का रास्ता तय करने वाले राष्ट्रपिता रामगुलाम के महान कार्यों को साहित्यकार भला कैसे भूल सकते हैं ?

    अंत में ऍन मिलकर सोमदत्त बखोरी के शब्दों में त्यागमूर्ति सर शिवसागर रामगुलाम को श्रद्धांजलि अर्पित करें –

    “ऊँचा किया नाम अपना

    और अपने देश का,

    ऊँचा किया नाम पूर्वजों का

    और उनके देश का |

    इतिहास में अंकित होगा

    स्वर्णाक्षर में सत्य अनोखा-

    पूरी करके लम्बी यात्रा

    कुली-पुत्र बना राष्ट्र-पिता |”

    निष्ठा।

  6. trishila says:

    नमस्ते…गुरुजि विनय को धन्यवाद इस ब्लोग के लिये…जो क्लास मे होता है कबि हम क्लास मे खुल्कर नहि बोल पाते पर इस ब्लोग के माध्यम से हम अप्ने विचार व्यक्त कर पा रहे है.पुर्व क्लास मे दुर्गा काहनि के विशय मे पता चला कि वह प्रथम कहानि है..सहित्य एक भन्दार है और हमे इस्कि गेहरायि तक जान है.मध्यकाल एक सन्घर्श काल रहा है.इस कल मेइन हि अनेक आन्दोलन आरन्भ हुये..तभि मज़्दुर अप्ने अधिकरो हेतु सन्घर्श कर्ते है.उस समय लेखन एक सचक्त हथ्यार था.प्रेर्ना जगाने हेतु..इस काल कि कहानि उप्देशात्मक रहि…त्रिशिला

  7. Padmajaa Domun says:

    इतिहास के साथ-साथ मोरिश्सीय साहित्य के इतिहास पर भी ज्यान प्राप्त हुआ और यह केहना गलत नहीं होगा कि दोनों एक ही रास्ते के दो किनारे हैं.

    मेरा एक प्रश्न है-मोरिशसीय गद्य और पद्य के इतिहास में कौन से अन्तर हैं?

  8. khushboo says:

    @ratna मुझे भी उसी समय अत्यंत प्रिय लगी जब उस पक्षी ने प्रवेश किया था… जिस ढंग से गुरूजी ने उस पक्षी को माध्यम बनाकर उन पूर्वजों की दशा का वर्णन करने लगे… वह शायद ही किसी अन्य कर पाते. @pooniah
    आज तो लगभग सभी लोग इतिहास से भागते हैं… लेकिन हम साहित्य के छात्र होते हुए इसका प्रचार करना चाहिए… ध्यान रहे, जितने भी महाशय “मॉरिशस में हिंदी साहित्य” को जीवित रखने के लिए महनत तो किये ही लेकिन अब हमारा कर्त्तव्य बनता हैं कि उनके लेख को पढ़े … इससे उन महाशयों को मान दे सकते हैं और उनके अस्तित्व मौरिशासीय साहित्य में अमर होते रहेंगे ….

  9. Deepika says:

    नमस्ते..
    गुरु जी विनय को धन्यवाद

    में बस यह कहना चाहती हूँ की कक्षा रोचक रही, हमें बहुत कुछ इितहास के बारे में सीखने को मिला
    आशा करती हूँ आने वाली कक्षाओं में हम ओर अधिक इस विषय में अध्यन करे
    अब इितहास के प्रित मेरी रूची बढ़ रही है !

    दीपिका

  10. Beeharry Tooshi says:

    नमस्ते गुरुजी…
    सर्वप्रथम इस ब्लोग के लिए आपको धन्यवाद है..इसके माध्यम से हम अपने विचारों को निश्चित रूप से अभिव्यक्त कर पायेंगे….पिछली कक्षा में हम को साहित्य के भिन्न तथ्यों के बारे में ज्ञात हुआ…
    मॉरीशस में हिन्दी साहित्य का विकास पर बल दिया गया…..भारतीय अप्रावासी मज़दूर एवं गाँधीजी के संदेश प्रभावशाली रहे….अर्थात हमारे पूवर्ज़ के मेहनत को ध्यान में रखते हुए हम साहित्य को जीवित रख पाते हैं……..
    धन्यवाद..
    तूशी..

  11. jaishree.boodhun says:

    सभी को मेरा सादर नमन. इतिहास की कक्षा बहूत ही दिलचस्प थी. अपने देश के हिंदी साहित्य की पृष्टभूमि से हम अपरिचित तो नहीं थे लेकिन गुरूजी के समझाने पर हमने इस विषय के बारे में विस्तारपूर्वक जाना व समझा. अब इस विषय को लेकर मन में कोई भी संदेह एवं दुविधा नहीं रही. आशा हैं की अगली कक्षा भी उतनी ही रोचक रहे और हमारे सामान्य ज्ञान की वृद्धि होती रहे. धन्यवाद.

    जयश्री बुधन

  12. Goboodun Kavita says:

    गुरुजी को मेरा सप्रेम नमन। इसके साथ गुरुजी को इस ब्लोग के लिए धन्यवाद। गत मंगलवार को कक्षा अत्यन्त ही रोचक रहा | साहित्य एक ऐसा विषय है जो हमेशा से ही प्रभावशाली रहा है| भारतीय साहित्य के साथ साथ हमें मोरीशसीय साहित्य पढ़ने का भी अवसर प्राप्त हो रहा है | यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
    कक्षा में हमें मोरिशसीय साहित्य के जन्म पर जानकारी प्राप्त हुआ | अर्थात किन स्थितियों में साहित्य रचा गया एवं किस प्रकार से भारतीयों को छल से यहाँ पर लाया गया था| इसी कारण ये लोग हताश हो गए थे| परन्तु गाँधी जी के यहाँ आने पर उनका हौसला फिर से बरक़रार हुई | डॉक्टर मानिलाल के आगमन से समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ तथा इसी के माध्यम से लेखक उभर रहे थे| यहाँ पर लेखन को प्रोत्साहित कंरने हेतु भारत से कवियों आते थे तथा लोगों को प्रेरित करते थे| पत्रिकाओं में धार्मिक विचारों पर अधिक बल दिया जाता था| कक्षा स्वातंत्र्योत्तर कहानियों के उल्लेख करते हुए समाप्त हुई|
    गुरूजी ने हमें उदहारण सहित समझाया और इसी कारण हमें समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई| आशा करते है भविष्य में भी पढाई इसी प्रकार से होगी|
    धन्यवाद…..
    कविता

  13. medha says:

    नमस्ते गुरुजी
    हिन्दी साहित्य का इतिहास का अध्ययन करके हमे मोरीशस की ऐतिहासिकता के बारे मे पता चलता हे. हमे पुर्वज़ो के सन्घर्श्मय जीवन का परिचय मिलता हे. साहित्य के छात्र होकर हमे अपने देश के साहित्य को जानना चाहिये.

  14. सभी को मेरा नमस्ते ! परिनीता और चित्रलेख की तोली ने एक अच्छा प्रयास किया हैं। आज के समाज में शुद्र तो नहीं देखने को मिलते परन्तु आधुनिक सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए आज तक जाति प्रथा ज़िन्दा है! लोग पूजा तथा शादी के अवसर पर पंडित द्वरा बताये गये नियम के अनुसार कूल एवं गोत्र का प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं ! जैसे कूल आदी के बिन तो भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकता। इस छोटी कहानी के माध्यम से हम सोचने पर विवश होते है कि सुन्दर स्वर्ग से तुल्य मौरिशस देश में ऐसा भी होता है।

  15. parinita says:

    मॉरीशस में औपचारिक भाषा अंग्रेज़ी और सामान्य प्रयोग की भाषा फ़्रेंच महत्वपूर्ण स्थान रखती है.प्रकाशित रचनाओं के हिसाब से हिन्दी ही सब से महत्वपूर्ण स्थान पर आसीन है. धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में हिन्दी के महत्वपूर्ण स्थान के उपरांत मॉरीशस के भारतवंशी अपने को पूर्णतः भारतीय जीवन शैली में ढाल न सके और ऐसा करने को तैयार था. मॉरीशस में सामान्य हिन्दी की स्थापना एवं विकास करने कि पश्चात निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि बिना अन्य भाषाओं को नुकसान प्रगति कर सकने की क्षमता रखती है.अभी मॉरीशस में हिन्दी के विकास के क्षेत्र की पूर्णतः गवेषणा नहीं हुई है.. एक वाक्य में यह कहना सही होगा कि :
    “अभी दिल्ली दूर है..”

  16. VANDANA DHORAH says:

    कोई कह्ता है कि सरकार दोषी है,कोई कह्ता कि समाज इन सब समस्याओं का मात्र जड़ हैं, तो कोई गरीबी को ही कोसता है, महेश रामजियावन की चक्कर कहानी में भली-भाँति दर्शाया गया कि राजेन शिवचरण अंत में बेहोश हो जाता है, तो साफ़ पता चलता वह ह्ताश और निराश हो जाता है. मरीज़ इसीलिए अस्पताल जाते हैं इसी आशा से कि वे ठीक हो जाए या उनको फिर से जीवन दान मिल जाए. इसीलिए तो डाक्टर को भगवान का रूप माना जाता है. मैं मानती हूँ कि हम को निजी जीवन और कर्तव्य में अंतर लाना चाहिए. अब घर के मामलों को लेकर किसी पर भड़क जाना, क्या यहाँ है?यहाँ भी स्वीकारती हूँ कि लोग बीमार नहीं होते और चले जाते चेक-अप कराने और डाक्टरों नाराज़ होने लगते है परन्तु इसका ये अर्थ नहीं नाराज़गी रोगी पर निकाले

  17. VANDANA DHORAH says:

    दुर्गा पूजा के अवसर पर एक बालक माता दुर्गा को नमन कर रहा था,इसके तुरन्त बाद एक पंडित ने मूर्ति को हल्दी और पानी से धोया यह कह्कर कि यह मूर्ति अपवित्र है.एक पंडित हो कर भी वह नहीं जानता कि जात पात करना पाप है इन्हीं लोगों के कारण से आज समाज विघटित हो रहा है.महात्मा गाँधी,स्वामी दयानन्द,स्वामी रामदेव और ओबामा का सप्ना पूरा न हो सका. मायकल जाक्सोन भी एक ज्वलन्त उदाहरण है

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