MA Yr 1 – Class 4: आधुनिकता और समकालीनता (1857 के संदर्भ में)

MA Hindi, Monday 26 Sept 2011, 16.00 – 17.30

Module: Freedom Movement & Hindi Poetry

 

आज का लेक्चर : आधुनिकता और समकालीनता (1857 के स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में) की अवधारणाओं पर आधारित था.

कुछ slides प्रस्तुत हैं:-

 

  • 26 फरवरी – बरहामपुर में पहली सिपाही विद्रोह की घटना
    • 8 अप्रैल: बैरकपुर में मंगलपांडे को फांसी
  • अगला विद्रोह: 10 मई – मेरठ
  • अगले दिन दिल्ली में
  • आधुनिकता और समकालीनता
    • समाज के ढाँचे में परिवर्तन
    • समाज को लौकिक दृष्टि से देखे जाना
    • अपने समाज, लोक, सुख-दुःख से जुड़े रहना (1857 के विद्रोह का परिणाम)
    • नवजागरण की भावना (राष्ट्रीय स्तर पर)
  • नवजागरण:
    • राजा राममोहन राय & केशवचंद्र सेन:
    • अंध परंपराओं को तोड़ कर स्वस्थ समाज
    • समकालीनता का दूसरा अर्थ: अंग्रेज़ी सभ्यता को अपना कर उनकी आदतों की नकल
    • देश-प्रेम
    • समाज सुधार
    • विधवा विवाह समर्थन
    • स्त्री शिक्षा समर्थन
  • डॉ बच्चन सिंह: “समसामयिकता का संबंध काल से है तो आधुनिकता का संवेदना , शैली और रूप से”
  • आधुनिकता:
    • मूल्यों में  परिवर्तन
    • राष्ट्रीय आंदोलन + साहित्य
    • साहित्यिक चेतना
    • साहित्यिक ध्येय, मूल्य, संवेदना
    • पुनर्जागरण: भारतीयता + पश्चीमीकरण की टकराहाट
    • भारतीय प्राचीन संस्कृति का गुणगान
    • मिथकों का प्रयोग
    • स्त्री समाज सुधार की भावना समाज + साहित्य में
    • अनेक सामाजिक संस्थाओं का निर्माण
    • आर्य समाज, ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफीकल सोसाइटी
    • {राष्ट्रीयता का स्वर + व्यक्ति स्वातन्त्र्य}
    • पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन
    • जन-आंदोलन

आज के लिए इतना ही, अगली कक्षा की प्रतीक्षा में ..

नमस्कार

 

 

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

9 Responses to MA Yr 1 – Class 4: आधुनिकता और समकालीनता (1857 के संदर्भ में)

  1. teesna etwaru says:

    नवजागरण
    सन १८५७ का स्वतन्त्रता-संग्राम के अंतर्गत हिन्दू-मुसलमान एकजुट होकर अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद के विरुद्ध लड़े थे.अंग्रेज़ों के आतंक से इस संग्राम में उनके अत्याचारों का ब्योरा देना उतना ही कठिन था जितना भक्त कवियों का मुसलमानी अत्याचार का उल्लेख करना. फिर भी उनकी रचनाओं में हिंदी भाषा-भाषी प्रदेश का जुझारूपन दिखाई पड़ता हैं।
    इस प्रदेश में निर्गुणवादी संतों की एक लम्बी परंपरा रही हैं जिसमें हिन्दु मुसलमानों के भेद भाव को imaTanao का भरपूर प्रयास किया ।
    भारतेंदु ने कबीर व दादू आदि का आदरपुरवक उल्लेख किया हैं । इस परंपरा के फलस्वरूप भी उन्होंने दोनों सम्प्रदायों की एकता पर बल दिया । इसके अतिरिक्त उनके सामने सम्पूर्ण भारतवर्ष था न कि भारतवर्ष का कोई एक अंचल। वे ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है’ के संबंध में चिंतित थे ।
    उनहोंने लिखा है ” भाई हिन्दुओ ! तुम भी मतमताम्तर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रेम करो बढ़ाओ। इस महामंत्र का जप करो।
    जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी जाति का क्यों न हो वह हिन्दु की सहायता करो। बंगाली, पंजाबी, मद्रासी,वैदिक,
    ब्राह्मण, मुस्लमान सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिससे तुम्हारे यहाँ बढ़े , तुम्हारा रुपया तुम्हारे ही
    देश में रहे, वह करो ।देखो, जैसे हज़ार धारा होकर गंगा समुद्र में मिलती है , वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हज़ार तरह
    से इम्ग्लैद, फ्रांसिस,जर्मनी ,अमरीका को जाति है।”

  2. नमस्ते गुरुजी
    पिछ्ली कक्षा में यह स्पष्ट हुआ कि सामान्य रुप से यदि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर पढ़ा जाए तो पता चलता है कि बाह्य रुप से यह एक असफल स्वतंत्रता संग्राम है परन्तु यह संग्राम मानसिक, भावात्मक तथा संवेदात्मक रुप से लोगों की चतेना को जागॄत करने में सफल रहा । 1857 के बाद ही राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक स्तर पर धीरे धीरे व्यक्ति स्वातंत्र्य की भावना उत्पन्न होने लगी । आधुनिकता पर बात करते हुए ’देश प्रेम’ की परिभाषा का प्रश्न आपे सामने रखा । मैं सोचती हूं कि देश प्रेम’ का अर्थ है अपने देश के हर एक एक चीज़ से प्यार करना ।

  3. sikha panchoo says:

    नमस्ते गुरु जी , माफी चाहती हू की इस प्रकार नोट भेज रही हू ,दुर्गा पुजा के कारण अधिक समय नहीं मिल र्हा है, आशा है कि आप मुझे समझ पाऐंगे.कुछ नोट की खोज की है: सुब्रह्मण्यिम भारती का ’पांचाली शपदम‘ अर्थात् पांचाली की शपथ एक खंड काव्य है जिसमें उन्होंने भारत देश का मानवीकरण द्रौपदी के रूप में किया है। टी.वी. कल्याण सुंदरम् का नाम भी इसी श्रेणी में उल्लेख करने योग्य है।
    कन्नड साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि राष्ट्रीयता और राष्ट्र प्रेम यहाँ के साहित्य का अविभाज्य अंग रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उसके संदर्भ बदलते चले गए लेकिन राष्ट्रीयता की व्याख्या नहीं बदली। कन्नड के आदि कवि पंप का पद ’आरंकुसमिटटोड नेनवुदेन्न मनं वनवासी देशमम्‘ उनके इस प्रदेश के प्रति और साहित्य में राष्ट्रीयता के पुट के प्रति प्रेम और जागरूकता का उज्ज्वल प्रतीक है। राधवांक ने किसी न किसी संदर्भ का उपयोग करके कर्नाटक की तुंगभद्र नदी और पंपा क्षेत्र की महिमा का गायन किया है। आंडय्या कवि ने कर्नाटक प्रदेश का शलाध्नीय वर्णन किया है। कनकदास ने मोहन तरंगिणी में विजयनगर की समृद्धि का वर्णन किया है। कर्नाटक में तो कुछ शिलालेखों पर भी वहाँ के साहित्य में राष्ट्रीयता के दर्शन होते हैं।
    पंजाबी साहित्य केवल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत नहीं है, बल्कि यहाँ भारतीय दर्शन और अध्यात्म की भी परंपरा रही है। आर्य समाज ने पंजाब के जीवन में समाज सुधार की लहर पैदा की और पंजाब के क्रांतिकारियों ने लाला लाजपतराय, भगवतसिंह और सुखदेव बनकर राष्ट्रीयता की लहर को परवान चढाया। कौन होगा जो पंजाबी के इस गीत को भूल जाए।
    ’पगडी संभाल ओ जट्टा पंगडी संभाल ओए-
    हिंद है मंदर तेरा तू इस दा पुजारी ओए‘
    देश की कौनसी भाषा और कौनसा साहित्य होगा जिसमें राष्ट्रीयता के आविष्कार की गाथा नहीं कहीं गई हो। साहित्य में गद्य हो या पद्य समान रूप से राष्ट्रीयता के स्वर उनमें सुनाई पडते हैं। भारत में भजन-कीर्तन से लगाकर संस्कृति, देश प्रेम और मातृभूमि की गौरव गाथा हर युग और हर सदी में पढने को मिलती है। भारत चूँकि प्रकृति प्रेम से ओतप्रोत देश रहा है। उसकी कृषि और वन्य जीवन तथा पर्वतों की गुफाओं में साधना आराधना नित्य का क्रम रहा है इसलिये उक्त साहित्य काव्य के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। भारत की कोई भाषा और बोली इससे अछूती नहीं रही है। केवल उदाहरण मात्र ही कुछ जानकारी प्रस्तुत की गई है।
    राष्ट्रीयता का सिरमौर कहा जाने वाले साहित्य बंगला है। बंगाल ने सांस्कृतिक ह्रास और राष्ट्रीयता के अपमान के जो दृश्य देखे थे उसकी पीडा उसके साहित्य में भली प्रकार झलकती है। राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद जहाँ बंगाल की विरासत है, वहीं उसका साहित्य संघर्ष, देशप्रेम और क्रांति का संगम है। १८६७ में ’जातीय‘ (राष्ट्रीय) मेले के श्री गणेश नाम से जिस आयोजन का शुभारंभ हुआ था वह वास्तव में श्री राज नारायण बसु के इस मंतव्य से ही प्रेरित प्रभावित था कि शिक्षित बंगालियों में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए एक संगठन की स्थापना की जानी चाहिए। इस मेले में गाए गए प्रथम गीत के प्रणेता भारतीय सिविल सर्विस सर्वप्रथम भारतीय सदस्य श्री सत्येन्द्रनाथ ठाकुर थे। उस गीत में सभी भारतीयों से यह अनुरोध किया गया था कि वे मिलकर एक स्वर में भारत का गुणगान करे। महाराष्ट्र में गणपति उत्सव का श्री गणेश आगे चलकर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोकमान्य तिलक ने दिया। ब्रह्म समाज (१७७४-१८३३) अपना प्रभाव स्थापित कर चुका था जिसका मुख्य ध्येय जरजर भारत की धूल झाड कर उसे फिर से राष्ट्रीयता के प्रवाह में शामिल होने के लिए सजग करना था। बंगाल में जागरूकता के कारण १२वीं, १३वीं शताब्दी से कविता, नाटक और उपन्यास के रूप में राष्ट्रीयता का साहित्य में आविष्कार होता रहा। इसी श्ाृंखला में आगे चलकर श्री बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने ’आनंदमठ‘ नामक अपने जग विख्यात उपन्यास में राष्ट्रवाद का भव्य चित्र प्रस्तुत करने का कीर्तिमान स्थापित किया। धर्म और राष्ट्रीयता का ऐसा सुंदर समागम किसी अन्य जगह देखने को नहीं मिलता। हिन्दू राष्ट्रवाद ने बंगला साहित्य में प्रविष्ट होकर व्यक्ति स्वातंय का पल्लवन किया। इसमें स्वामी विवेकानंद और श्री अरविंद के अध्यात्म की छाप स्पष्ट दिखलाई पडने लगी। श्री रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी तथा श्री ब्राह्म बांधव का राष्ट्रवादी चिंतन, सुधारवाद की प्रेरणा से प्रेरित है। राष्ट्रीयता की बात कहने वालों में सर्वश्री ईश्वरचंद्र गुप्त, कालीप्रसाद सिन्हा, नलिनचंद्र सेन, हेमचंद्र बंदयोपाध्याय, रंगलाल बंदोपाध्याय आदि अग्रगण्य रहे। दीनबंधु मिश्रा ने अपने नाट्य नीलदर्पण में यूरोपियन खेतिहरों द्वारा किये जा रहे अत्याचार तथा दमन का यथार्थ चित्रण किया। रेवरेंड लोंग ने इसका अंग्रेजी रूपांतरण छापकर यूरोपियन अधिकारियों में तहलका मचा दिया। इसके नतीजे में रेवरेंड को एक मास का कारावास भुगतना पडा। इस घटना ने राष्ट्रवादी लोगों के हौसले बुलंद किये। नतीजे में बंगला राष्ट्रवाद तेजी से विकसित होने लगा। हिन्दू पेट्रियट और अमृत बाजार पत्रिका का प्रकाशन इसका नतीजा था। इस समय के राष्ट्रवादी साहित्य में ’सोनार बंगला‘ शब्द की गूँज सुनाई पडी। दैनिक वंदे मातरम् और दैनिक युगांतर ने यूरोपियन संस्कृति के आवरण को नष्ट कर बंगालियों को भारत के विशुद्ध राष्ट्रवाद के दर्शन करवाए। जातीय मेले की तरह श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। १९०५ में उनकी प्रसिद्ध कविता मातृभूमि वंदना का प्रकाशन हुआ।

    इसका अर्थ यह हुआ कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक नैसर्गिक देन है जिससे कोई देश और समाज अलग नहीं रह सकता। राष्ट्रीयता को समझने के लिए साहित्य का मंथन आवश्यक है। साहित्य में हित शब्द जुडा हुआ है। जो इस बात का द्योतक है कि बिना हित के राष्ट्रीयता का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि साहित्य जैसी शक्तिशाली विधा राष्ट्रीयता की चर्चा करे तब इस बात की खोज आवश्यक है कि राष्ट्रीयता का साहित्य में उद्भव किस प्रकार हुआ। आज विश्व की हर गतिविधि साहित्य के माध्यम से ही नापी तौली जाती है इसलिये राष्ट्रीयता से जुडे साहित्य पर हमें एक पैनी दृष्टि डालनी होगी।
    nationalism might also be portrayed as collective identities towardimagined communities which are not naturally expressed in language, race orreligion but rather socially constructed by the very individuals that belong to a givennation.[6]

  4. karishma bundhun says:

    सादर प्रणाम गुरुजी, मैं क्षमा माँगती हूँ क्योंकि कुछ दिनों से बीमार हूँ और मेरा काम कुछ हद तक अधुरा रह गया था,और मैं इस कक्षा में नहीं थी केवल ब्लोग पर पढ्कर कुछ लिख रही हूँ .

    भारत छोड़ो आंदोलन
    अगस्‍त 1942 में गांधी जी ने ”भारत छोड़ो आंदोलन” की शुरूआत की तथा भारत छोड़ कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर करने के लिए एक सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन ”करो या मरो” आरंभ करने का निर्णय लिया। इस आंदोलन के बाद रेलवे स्‍टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों और अन्‍य स्‍थानों तथा उप निवेश राज के संस्‍थानों पर बड़े स्‍तर पर हिंसा शुरू हो गई। इसमें तोड़ फोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने हिंसा की इन गतिविधियों के लिए गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया और कहा कि यह कांग्रेस की नीति का एक जानबूझ कर किया गया कृत्‍य है। जबकि सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, कांग्रेस पर प्रतिबंद लगा दिया गया और आंदोलन को दबाने के लिए सेना को बुला लिया गया।

    इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए और ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया।

    द्वितीय विश्‍व युद्ध सितम्‍बर 1939 में शुरू हुआ और भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत की ओर से ब्रिटिश राज के गर्वनर जनरल ने युद्ध की घोषणा कर दी। सुभाष चंद्र बोस ने जापान की सहायता से ब्रिटिश सेनाओं के साथ संघर्ष किया और अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों को ब्रिटिश राज के कब्‍जे से मुक्‍त करा लिया तथा वे भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर भी प्रवेश कर गए। किन्‍तु 1945 में जापान ने पराजय पाने के बाद नेता जी एक सुरक्षित स्‍थान पर आने के लिए हवाई जहाज से चले परन्‍तु एक दुर्घटनावश उनके हवाई जहाज के साथ एक हादसा हुआ और उनकी मृत्‍यु हो गई।

    “”तुम मुझे खून दो और मैं तुम्‍हें आजादी दूंगा” – उनके द्वारा दिया गया सर्वाधिक लोकप्रिय नारा था, जिसमें उन्‍होंने भारत के लोगों को आजादी के इस संघर्ष में भाग लेने का आमंत्रण दिया।

    साथ ही साथ,भारत वासियों के मन में जागरण लाने के लिये काफिं भारत सेनानियों तथा लेखकों ने अपना योगदान दिया है ताकि देश आज़ाद हो और साथ ही साथ भारत वासियों पाश्चत्य संस्कृति की नकल न करें . सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविता तथा अपनी विरता के बल पर भारत के लिये बहुत कुछ किया है और उन्होंने पुरुष की तरह भारत की आज़ादी में अपना योगदान दिया है.

    .

  5. karishma bundhun says:

    सादर प्रणाम गुरुजी, गत सप्ताह आपने गांधी जी और भारत के स्वतंत्रता के बारे में हमें परिचित कराया है. गांधी जी एक ऐसे प्रभावशाली स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने भारत देश की स्वतंत्रता के लिए कई बार जेल भी गये . उन्होंने भारत देश के लिए भी कई आंदोलनों में भाग भी लिये. गांधी जी ने विनाशकारी युद्धों को बंद करने का जो तरीका दुनिया को बताया- वह सत्याग्राह है. पशिचम के दार्शिनिकों के बताये हुए तरीके और गांधी जी के बताये हुए तरीके में अंतर यह है कि गांधी जी का अहिंसात्मक सत्याग्राह मनुष्य-मनुष्य के बीच के ईर्ष्या -द्वेष और उसकी खुद्गरज़ी को नज़र आंदाज़ नहीं करता.

    महात्मा गांधी के नेतृत्व में अनेक पुरुषों और महिलाओं ने अपना जीवन आजादी के संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया इनमें से एक सरोजिनी नायडू थीं। १८७९ में जन्मी सरोजनी नायडू की शिक्षा मद्रास और कैम्ब्रिज में हुयी थी। कम उम्र में ही उन्होंने देशभक्ति की अनेक ऐसी कविताएं लिखीं जिनसे लोगों को आजादी के लिए संघर्ष में भाग लेने की प्रेरणा मिली। उन्होंने एनी बेसेन्ट द्वारा शुरू किए गए होमरुल आंदोलन में हिस्सा लिया। राजनीति में यह उनका पहला कदम था। गोपाल कृष्ण गोखले के आह्‌वान पर वे १९१५ में कांग्रेस में शामिल हो गयीं। लखनऊ सम्मेलन में उन्होंने अपने जोरदार भाषण में स्वराज्य की विचार धारा की जोरदार वकालत की। १९२१ में उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और आगे चल कर देश की आजादी के लिए काम किया। १९२५ में वे कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। १९३० में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया जिसमें वह गांधीजी की प्रमुख सहयोगी रहीं। वह गांधीजी तथा अन्य नेताओं के साथ गिरतार कर लीं गयीं। १९३१ में लंदन में गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए उन्हें गांधीजी के साथ आमंत्रित किया गया। यह सम्मेलन सफल नहीं हुआ। भारत लौटने पर वह फिर आजादी के संघर्ष में सक्रिय रूप से जुट गयीं और जेल गयीं।

    १९४२ में गांधीजी द्वारा शुरू किया गए भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन का कोप भाजन बन कर एक बार फिर जेल गयीं। १९४७ में भारत के आजाद होने पर उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। 1 मार्च १९४७ को उनका निधन हुआ। वह दुनिया की महिलाओं की बहुत बड़ी हितैषी थीं। उन्होंने देश सेवा के लिए सभी वर्गों की महिलाओं को प्रेरणा दी।

  6. samantah says:

    नमस्ते गुरुजी
    पिछ्ली कक्षा में यह देखा गया कि गांधी जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सब से बड़े प्रभावशाली स्वतंत्रता सेनानी रहे ।

    वास्तव में गांधी जी ने अपना अधिकांश समय खादी, सांप्रदायिक एकता, अस्पश्यता निवरण, नशाबंदी जैसे रचनात्मक कार्यों के प्रचार में बिताया जिसमें से एकाध सत्याग्रह क्षेत्र – विशेष पर आधारित रहा जैसे झंडा सत्याग्रह, बोरसद, वायकोम , बारडोली इत्यादि ।

    वायकोम का सत्याग्रह
    भारतीय समाज में छुआछुत की समस्या दिन- प्रतिदिन गंभीर बनती जा रही थी । वायकोम में यह समस्या इस हद तक थी कि मात्र अछूतों के स्पर्श से ही सवर्ण लोग अपवित्र नहीं होते, अपितु उनकी छाया मात्र पड़ने से भी नम्बुदरी ब्राहमण अपवित्र हो जाते थे । जब भी वायकोम गांव से कोई अछूत बाहर निकलता तो जोर से आवाज निकलती “ दूर रहिए माई – बाप “। मुख्य मंदिर गांव के बीच में होने के कारण उस रास्ते से अछूतों को जाने का प्रतिबंध था । त्रावणकोर ( वर्तमान करेल) में भी इसी कुप्रथा का बोलबाला था ।

    इस के विरोध में करेलवासियों ने सत्याग्रह शुरु किया जो चौदह महीनों तक चला । सत्याग्राही भजन – कीर्तन करते, वर्षा के दौरान चर्खा काटते और स्वाध्याय करते । अंत में स्वयं गांधी जी त्रावणकोर आए । वे यह मानने के लिए कदाचित तैयार नहीं थे कि छुआछुत शास्त्रों में सिखाई गई बात है । इस बात को एक भी ब्राह्मण प्रमाणित नहीं कर पाया कि शास्त्रों में एसा लिखा है ।
    गांधी जी वेदों को छोड़ने के लिए तैयार थे किंतु छुआछुत को स्वीकारने के लिए नहीं । गांधी जी के कारण ही १९२६ में वायकोम में अछूतों के लिए मंदिर के दरवाज़े खुले ।

  7. नमस्ते गुरुजी ,
    – पिछले सप्ताह आप ने आधुनिकता और सम्कालीनता पर बातचीत की थी आप ने यह भी बताया था कि स्वतन्त्र्ता प्राप्ति मे इसका मह्त्व

    लोगो की मन्सिक्ता पर बदलाव, उनके व्य्हर मे बदलाव,
    – १८५७ का युद्ध अस्फल था परन्तु लोगो की चेतना जाग्र्त करने मे सफल हुए
    -अनेक सामजिक, धामिक, आन्दोलन आते हे अओर अनेक रुदियो को मिटने क प्र्यास
    -भारतीय स्माज आथिक रुप से थोरा विकास कर पत हे
    -व्यक्ति स्वत्न्त्र्य की बात पर काफी कुछ बताय था
    -भरतीय लोगो के अन्तरमन को यह विद्रोह छु लेती हे तब जाकर भारतीय समाज मे सुधार आत हे
    अग्र्जओ ने तो भारतीय लोगो को इस तरह से कमजोर कर दिया था कि लोग मदिरा पान करते, विदेशी माल खरीदते थे, तब गाधी जी आन्दोल्न चलते हे खादी वस्त्र पह्न्ने का आन्दोलन
    -भारतीय मुल्यो की पुनस्थाप्ना होति हे

    इस सप्ताह आप ने गाधी जी और स्वतन्त्र्ता आन्दोल्न पर चचा गाधी जी ने स्वतन्त्र्ता आन्दोल्न चलाया और आधुनिक भारत के नव निमाण मे इन बहुत बर हाथ हे

    गांधी जी ने अपने अहिंसात्मक मंच को स्वदेशी नीति — में शामिल करने के लिए विस्तार किया जिसमें विदेशी वस्तुओं विशेषकर अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करना था। इससे जुड़ने वाली उनकी वकालत का कहना था कि सभी भारतीय अंग्रेजों द्वारा बनाए वस्त्रों की अपेक्षा हमारे अपने लोगों द्वारा हाथ से बनाई अछूतों के जीवन को सुधारने के लिए गांधी जी द्वारा चलाए गए इस अभियान की शुरूआत थी। गांधी जी ने इन अछूतों को हरिजन का नाम दिया जिन्हें वे भगवान की संतान मानते थे। ८ मई (8 May)१९३३ को गांधी जी ने हरिजन आंदोलन [9] में मदद करने के लिए आत्म शुद्धिकरण का २१ दिन तक चलने वाला उपवास किया। यह नया अभियान दलितों को पसंद नहीं आया तथापि वे एक प्रमुख नेता बने रहे।बीआर अम्बेडकर (B. R. Ambedkar)ने गांधी जी द्वारा हरिजन शब्द का उपयोग करने की निंदा की कि दलित सामाजिक रूप से अपरिपक्व हैं और सुविधासंपन्न जाति वाले भारतीयों ने गांधी जी को पता था कि इस प्रकार के अहिंसा के स्तर को अटूट विश्वास और साहस की जरूरत होगी और इसके लिए उसने महसूस कर लिया था कि यह हर किसी के पास नहीं होता है। इसलिए उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को परामर्श दिया पितृसत्तात्मक भूमिका निभाई है। ई खादी पहनें। गांधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन [5] को सहयोग देने के लिएपुरूषों और महिलाओं को प्रतिदिन खादी के लिए सूत कातने में समय बिताने के लिए कहा

  8. Prabah Sobagee says:

    नमस्ते गुरुजी ।
    गांधी जी के बारे में और उन के आंदोलनों की चर्चा जितना कहा जाए उतना कम है । कुछ खोज द्वारा जो भी थोड़ा मुझे मिला मैं प्रस्तुत कर रही हूँ । अगर कोई गलती है तो अवश्य सुधारें ।
    ८अगस्त १९४२ को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र(All-India Congress Committee session) में , मोहनदास करमचंद गांधी का शुभारंभ किया आंदोलन ‘भारत छोड़ो’ । अगले दिन, गांधी, नेहरू और के कई अन्य नेताओं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उच्छृंखल और गैर-हिंसक प्रदर्शनों देश भर में निम्नलिखित दिनों में जगह ले ली।
    १९४२ के मध्य तक, जापानी सैनिक भारत की सीमाओं के निकट पहूँच रहे थे । युद्ध के अंत से पहले भारत के भविष्य की स्थिति के मुद्दे को हल करने के लिए, चीन(China), संयुक्त राज्य अमेरिका(United States of America) और ब्रिटेन(Britain) से दबाव बढ़ने लगी । मार्च १९४२ में, प्रधानमंत्री महोदय(the Prime Minister) ने स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स(Sir Stafford Cripps) को भेजा , युद्ध के मंत्रिमंडल के एक सदस्य, भारत के लिए ब्रिटिश सरकार ड्राफ्ट घोषणा(British Government’s Draft Declaration) पर चर्चा की। मसौदा युद्ध के बाद भारत डोमिनियन दर्जा (India Dominion status)दिया है, लेकिन अन्यथा ब्रिटिश सरकार अधिनियम १९३५(British Government Act of 1935) की कुछ परिवर्तन स्वीकार किया गया। मसौदा कांग्रेस कार्य समिति(Congress Working Committee) ने इसे अस्वीकार कर दिया जो उन्हें अस्वीकार्य था। क्रिप्स मिशन की विफलता(Cripps Mission failure) के आगे कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार पराया ।
    गांधी ने, क्रिप्स मिशन की विफलता पर , दक्षिण-पूर्व एशिया(South –East Asia) में जापानी की प्रगति और भारत में अंग्रेजों के साथ सामान्य हताशा, लाभ उठाया । वह भारत से एक स्वैच्छिक ब्रिटिश वापसी(voluntary British withdrawal) के लिए मांग किया । २९ से अप्रैल १ मई १९४२, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (All India Congress Committee)इलाहाबाद(Allahabad) में, कार्य समिति के संकल्प(resolution) पर चर्चा करने के लिए इकट्ठे हुए । हालांकि गांधी बैठक से अनुपस्थित था, उसके अंकों(points) की कई संकल्प में भर्ती कराया गया है: उन्हें अहिंसा (non-violence) के लिए अपनी प्रतिबद्धता(commitment) होने का सबसे महत्वपूर्ण है । १४ जुलाई १९४२, कांग्रेस कार्य समिति वर्धा(Wardha) में फिर से मुलाकात की और निर्णय किया कि यह गांधी जन अहिंसक आंदोलन(non-violent mass movement) के प्रभार लेने के लिए अधिकृत होगा । संकल्प, आम तौर पर संदर्भित संकल्प ‘भारत छोड़ो’ के रूप में, अगस्त में, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक द्वारा अनुमोदित किया जाना था, बंबई में ।

    ७ से ८अगस्त १९४२ को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति से मुलाकात की और संकल्प ‘भारत छोड़ो’ को अनुमोदित किया। अनुसमर्थन गांधी के लिए ‘करो या मरो'(“Do or Die”) कहा जाता है। अगले दिन,९ अगस्त १९४२, गांधी, कांग्रेस कार्य समिति और अन्य कांग्रेसी नेताओं के सदस्यों ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत नियमों की रक्षा के तहत गिरफ्तार किया गया था । कार्य समिति, अखिल भारतीय कांग्रेस समिति और चार प्रांतीय कांग्रेस समितियों (four Provincial Congress Committees) के १९०८ के अपराध कानून संशोधन अधिनियम(under the Criminal Law Amendment Act of 1908) के तहत अवैध संघों घोषित किया गया था । सार्वजनिक बैठकों के विधानसभा(assembly of public meetings) भारत नियम की रक्षा के नियम ५६ के अंतर्गत निषिद्ध(probibited under rule 56 of the Defence of India Rules) किया गया है। गांधी और कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारी भारत भर में जन प्रदर्शनों( mass demonstrations) का नेतृत्व किया। में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के मद्देनजर में हजारों मारे गए थे और घायल हुए । कई स्थानों में हड़ताल हुए । जन नज़रबंदियाँ द्वारा ब्रिटिश ने तेज़ी से इन कई प्रदर्शनों के दबा दिया, १००,००० से अधिक लोगों को कैद कर लिया गया ।
    ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन, कुछ भी से भी अधिक, भारतीय जनता ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट हुए । १९४४ के ज्यादातर प्रदर्शनों को हालांकि दबा दिया गया था, १९४४ में अपनी रिहाई(release) पर गांधी अपने प्रतिरोध जारी रखा और २१ दिन के उपवास(21 days fast) द्वारा प्रबल रखा । द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक(by end of Second World War), दुनिया में ब्रिटेन का स्थान काफ़ी बदल गया था और स्वतंत्रता के लिए मांग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था ।

  9. karishma bundhun says:

    MY assignment :
    सादर प्रणाम गुरुजी, यह है मेरा assignment “ आधुनिकता एवं समकलीनता

    हिंदी साहित्य के इतिहास में सन 1857 के बाद को आधुनिक नाम देने विशेष महत्व देता है । आधुनिक शब्द पुराने से नये पर आने के लिए कहा जाता है । हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारत के इतिहास के बदलते हुए स्वरूप से प्रभावित था। स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीयता की भावना का प्रभाव साहित्य में भी आया। भारत में औद्योगीकरण का प्रारंभ होने लगा था। आवागमन के साधनों का विकास हुआ। अंग्रेजी और पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव बढा और जीवन में बदलाव आने लगा।

    आदिकालीन साहित्य के पर्यवसान के समय जब भक्ति का उदय हुआ तो उस समय के समाज के लिए वह आधुनिक था । आधुनिकता का दूसरा अर्थ समकालीनता भी लगाया गया है । इसी को दूसरे शब्दों में लौकिक दृषिट कहा गया है । सन 1857 के बाद समाज में जो बदलाव आया वह इलौकिक था । अपने लोक से, समाज से , उसके दुख-सुख, मान्यता विचारों से व्यक्ति ने जुड़ने का प्रयास किया । समाज सुधारकों , जैसे राजा राम मोहन राय, केशवचंद्र सेन आदि ने देश में नवजागरण को उभारा है । उन्होंने अंध परम्पराओं को तोड़कर स्वस्थ समाज को आगे लाने का प्रयास किये । इसके साथ ही इस काल के आरंभ में समकालीनता की एक अवधारणा अंग्रेज़ों की नकल करने की भी रही । लोगों में समाज के कुछ वर्ग के लोग ऐसे थे जो अंग्रेज़ी सभ्यता को अपनाकर और अंग्रेज़ों की आदतों की नकल करके अपने को आधुनिक कर रहे थे ।

    आधुनिकता का अर्थ जो समकलीनता लिया गया है उसमें दोनों पक्ष आ जाते हैं । अपने समय की गति को पहचान कर देश-प्रेम , समाज-सुधार , विधवा विवाह समर्थन , स्त्री-शिक्षा समर्थन आदि को अपनाने वाले और नये रंग में रंगकर अंग्रेज़ी सभ्यता की नकल करने वाले । हिंदी साहित्य के सजर्कों ने आधुनिकता को उच्च भावनाओं के रुप में लिया है । भारतेंदु हरिश्चंद्र ने साहित्य द्वारा समाज को तर्क प्रधान बनाने और जोड़ने का जो प्रयास किया वह उदाहरण के योग्य है ।
    आधुनिक हिंदी साहित्य में बदलाव की भूमिका
    आधुनिक काल के आरंभ सन्‌ 1957 ‌ई से भारतीय जन जीवन में जो बदलाव आया तत्कालीन परिस्थितियाँ उसके लिए उत्तरदायी थीं । उस समय अंग्रेज़ी शिक्षाका अध्ययन भी समाजके कुछ गण्यमान व्यक्तियों को दुनिया में आने से अपनेपन , अपने देश,अपने समाज के प्रति जो सम्मान के भाव थे, वे बढ़े । राजा राम मोहन राय जैसे अनेक बुद्धिवादी व्यक्तियों ने और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने भी उसमें योग दिया । प्रेस की सुविधा भारतीय जन-जागरण के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध हुई । साहित्यकारों को इससे लाभ हुआ, समाज-सुधारकों को इससे लाभ हुआ , जनता को इससे लाभ हुआ और जन-आंदोलन को इससे लाभ हुआ ।

    नवीनता की जारुकता हुई , ईसाई मजहब के प्रचार को देखकर, हिंदू और मुसलमानों में अपने धर्म की रक्षा के प्रति बड़ी बलवती होती गयी । समाज-सुधारकों ने समाज और संस्कृति के पुराने गौरव की याद दिलाई । आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफीकल सोसाइटी आदि के प्रयासों से राषट्रीयता तो उभरी ही,व्यक्ति की स्वच्छंदता भी आगे आई । नये परिवेश में ऐतिहासिक मांग के फलस्वरुप , लोघ अपने नये ढंग से ढालने लगे । आधुनिक काल में जिस पुर्नजागारण का उल्लेख किया जाता है ,उसके मुल में वे बदली हुई परिस्थितियाँ ही थीं ।
    अतः,पुर्नजागरण के इस काल में भारतीयकरण की पशिचमीकरण से टकराहट थी । विश्वयुद्ध की विभीषीका , वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा का नवीनीकरण जनजागारण के अनेक पहलू, बदलाव की ये दिशाएँ अनेक हैं । सामूहिक प्रभाव एक अति टकराहट से प्रसूत और ऐसा अहसास है जिसने भारत को पूर्ण स्वतंत्र होने का साहस पैदा किया । इसी प्रकार यह बदलाव बेहद तेज़ी के साथ आया और अनेक चरणों में बदलता चला गया ।

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