BA Yr 1 FT – Class 4

 

BA Yr 1 Hindi,

Wed 28 Sept 2011, 12h00 – 13h30.

Module: Literary Theory & Forms of Literature

 

Dear Students,

my apologies for coming slightly late as I had to urgently attend the Rose Hill court        today. Yet, I happened to share what I had to today in the class.

आज की कक्षा दो हिस्सों में रही.  पहला भाग: आधुनिक काल की मूल प्रवृत्तियाँ समझाना था जिसके अंतर्गत    मध्यकालीनता से इसकी तुलना करते हुए आपको कुछ विशेष संदर्भ दिए गए. संदर्भ साहित्यिक ही रहे मूलत: –  जैसे कि धर्मवीर भारती (कनु प्रिया) की आधुनिक सोच (राधा द्वारा कृष्ण के कार्यों पर सवाल!), महावीर प्रसाद  द्विवेदी (उर्मिला) द्वारा दमित मध्यकालीन महिलाओं के आधुनिक रूप, हरिऔध (प्रियप्रवास) में राधा के  आधुनिक चिंतन, मैथिलीशरण गुप्त (यशोधरा) की महिला पौराणिक व मिथकीय पात्रों का पितृ-सत्तात्मक  समाज व पुरुष-प्रधान समाज को चुनौती देना  … आदि ये सब आधुनिकता-बोध के द्योतक है.

एक और बात, जहाँ मध्यकालीनता में आस्था की प्रमुखता रही, वहीं आधुनिक काल में तर्क ने जगह ले ली,  ईश्वर के स्थान पर मनुष्य और उसकी समस्याएँ बन गईं साहित्यिक विषयवस्तु की प्रवृत्तियाँ, धर्म का पल्ला  कमज़ोर होने लगा तो राजनीति द्वारा आधुनिक मानव संचालित होने लगता है – ये सब साहित्य में  प्रतिबिम्बित होते हैं. इन्हीं विषयों को आधुनिक रचनाकारों ने अधिक महत्व दी है.

नए भाव बोध और नए जीवन मूल्य वाले इस वातावरण में साहित्यिक संवेदनाएँ भी समाज और यथार्थ के अधिक करीब होने लगे हैं. इनसे रचनाकार अछूता न रहा. साथ ही, ध्यान दीजिए कि पत्रकारिता ने भी इस नई सोच तथा नई दृष्टि को पनपने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

the second part of today’s lecture was based on Literary Theories and why studying them is important? It also focused to some extent on the historical aspects of Sanskrit acharyas who came up with theories about काव्यशास्त्र. please note that due to shortage of time, I could not complete this part, yet sending you some brief notes, so that you cna understand it. This part is purely historical and you can still search for details on the net.

भारतीय काव्यशास्त्र के सिद्धांतों का आरंभ भरत मुनि द्वारा रचित “नाट्यशास्त्र” से होता है. अनेक आचार्य आए और हर एक ने अपने सिद्धांत की स्थापना की. किसी रस को काव्य की आत्मा घोषित किया तो किसी न अलंकार को. इस प्रकार से मूलत: 5 वर्ग के आचार्य मिलते हैं जिनके सिद्धांत इस प्रकार हैं: –

                                1)  अलंकार सिद्धांत
                                2)  रीति सिद्धांत
                                3)  ध्वनि सिद्धांत
                                4)  वक्रोक्ति सिद्धांत
                                5)  रस सिद्धांत
भरत मुनि रसवादी आचार्य थे और वे  रस सिद्धांत के प्रतिष्ठापक /प्रतिपादक रहे. भरत मुनि के बाद, 3 अलंकारवादी आचार्य हुए जो इस प्रकार हैं: –

             •भामह – काव्यालंकार
             •दण्दी – काव्यादर्श
             •उद्भट – काव्यालंकार-सार-संग्रह
फिर, वामन – रीति सिद्धांत के आचार्यन & आनंदवर्धन – ध्वन्यालोक, हुए.
•ध्वनिवाद जैसे आंतरिक तत्व का प्रवर्तक + काव्यशास्त्र को नई दिशा
इससे पहले, प्रतिष्ठित हो चुके थे: रस सिद्धांत (आंतरिक), अलंकार सिद्धांत & रीति सिद्धांत {दोनों बाह्यपरक)
ध्वनि सिद्धांत (नितांत आंतरिक तत्व) + सभी सिद्धांतों का सम्मिश्रण
200 वर्षों तक इस सिद्धांत का विरोध BUT
11th Century आचार्य मम्मट (काव्यप्रकाश) इसका प्रतिपादन करते हैं
•ध्वनि-विरोधियों का खण्डन
ध्वनि सिद्धांत के 2 परवर्ती आचार्य रहे: –
1.विश्वनाथ (साहित्य-दर्पण) – यद्यपि रसवादी परंतु रस को ध्वनि का अंग मानना
2. जगन्नाथ (रसगंगाधर) – ध्वनिवादी आचार्य
इन सब के अलावा,  साहित्य की भी एक हल्की परिभाषा अगली कक्षा में दी जाएगी,
मनुष्य के अनुभव + ज्ञान का वह रूप जो लिपिबद्ध होकर हमारे सामने आता है, सुरक्षित रहता है.
श्रव्य
दृश्य
लिखित
रस
साहित्य के रूप भी देखें:
विज्ञान
             •तर्क + प्रयोग
दर्शन
            •तर्क + उपदेशात्मकता, रहस्योत्घातन
शास्त्र
            •मनुष्य-जीवन संबंधी / उपयोगी नियम + सिद्धांत (समाज शास्त्र)
इतिहास
            •वस्तु, व्यक्ति, जाति के व्यतीत वृतांत – प्रमाण
काव्य
          कल्पन
          अनुभूति
          अभिव्यक्ति
           साधन / साध्य (शब्द)
           सृजन , रचनात्मकता
           छंद, लय, संगीतात्मकता, सौंदर्यवृद्धि, प्रवाह ..
NB: PLEASE COME PREPARED ON काव्य लक्षण NEXT TIME, i.e., ON FRIDAY AS FROM 9H30.
तब तक के लिए,
खुश  रहें..
आशा है कि कल सभी लोग “श्रम दान” के लिए calebasse में स्थित Human Servcie Trust के आश्रम में 10 बजे पहुँच रहे हैं.. आपकी प्रतीक्षा में तथा आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में.. सादर,
विनय
FOR REFERENCES, YOU CAN HAVE A LOOK AT THE FOLLOWING SITES:
Thanks.

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

25 Responses to BA Yr 1 FT – Class 4

  1. कैलाश दावोराज़ says:

    आज की कक्षा मेरे लिए अत्यन्त ही लाभप्रद सिद्ध हुआ है क्यूंकि अनेक नए-नए तथ्य सिखने को मिला है. सर्वप्रथम रीतिकाल में नारी पर नख-शीख वर्णन किया जाता था. यह भी सर्वज्ञात है कि नायिकयों के भेद तिन प्रकार के थे : १) किशोरी अवस्था – जिसमें शर्म का भाव, भोलापन…
    २) पचीस साल अवस्था – जो यथार्थ के प्रति जागरूक थे : प्रेम संबंध…
    ३) प्रौढ़ अवस्था – परिपक्व अवस्था – जो पूरी तरह से जीवन समझने की शक्ति आ जाती हो…
    यह भी एक सर्वमय तथ्य है कि सौन्दर्य का विस्तार कलात्मकता में है – उस युग जहाँ पर शास्त्रीय साहित्य – भ्वानोएँ का निर्माण …

    इसके अतिरिक एक नया quote सिखने को मिला:
    “ अविश्वास हा! अविश्वास ही!
    नारी के प्रति नर का,
    नर के दो सौ दोष क्षमा है,
    स्वामी जो है वह घर का ”
    अथार्त नारी आधुनिक युग में सवाल करती है, नारी पर बदलाव..

    समय का अभाव था, लेकिन इस एक घंटे में मेरे लिए लाभप्रद सिघ हुआ हैं!!!

  2. kriteeka Gungaram says:

    kal li kaksha diljast thi.
    Riti kal ka sab se bara yogdan kalatmakta hain aur yaha kal samajik yathartha nahi.
    Riti kal mein nari ka nak shik varnan kiya jata tha.
    Riti kal mein teen prakar ke nayika hoti thi: (1) jo nayi kishori avastha mein hain,
    aur jismein sharm v lajja ka bhav hain.
    (2)nayika mein sharm thori si ghat jati hain.
    (3)nayika prordh ho jati hain.

    Aadhonikta mein kisi se bhi saval kiya jata hein. Jahan tark hota hain vaha par bolne ka sahas hota hain.
    Aadhounik yug vigyan ka yug hota hain.

  3. कैलाश दावोराज़ says:

    मेरी यह मान्यता है कि समज सेवा ही मनुष्य का परम धर्म है.

  4. दोस्तो,
    आप लोगों को कक्षा रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगी, अत्यंत प्रसन्नता हुई…

    यूँ ही लिखते रहें..

  5. कैलाश दावोराज़ says:

    अगर आप ऐसे ही हमें प्रोत्साहित करेंगे तो निस्संदेह ही हमारा ज्ञान बढ़ेगा.

  6. khus21jaan says:

    सादर नमन गुरुजी,
    कल जो भी सिखा उससे हमें नयी सीख मिली हैं..साहित्य और समाज के सम्बंध के बारे में जानने का सूअवसर प्राप्त हुआ. खासकर वह तीन प्रकार की नायिका की बाद मुझे बहुत भायी जिसमें प्रथम जो होती है वह नयी किशोरी अवस्था मैं है,जिनमें शर्म लज्जा का भाव बहुत है. दुसरी जो 25 वर्श की हो, और जिस्में थोरी शर्म भाव घत जाता है…तीसरी जिसमें लज्जा भाव बिल्कुल नहीं होती.
    फिर मैंने सिखा की रीतिकाल का सबसे बरा योगदान कलात्मकता में है, और ज्यादातर मुझे अहेलिया औरयशोध्ररा की कहनियॉ ज्यादा पसन्द आयी.
    मुख्य तत्व( आधुनिक काल में): नारी को उस वक़्त बोलने का अधिकार नहीं था..जैसे मैथिलिशरन गुप्त जी ने कहा हैं ” अविशवास थ!” ” अविशवास ही नारी के प्रति नर का” ” नर के तो सौ दोश माफ है’ ” स्वामी जो है वह घर का”…..मैं इससे येहि सीख मिलती है के सम्बंध में प्यार.आस्थ, विश्वास होना अनिवार्य है..और नारियों को नर से कम ना समझे….

  7. khus21jaan says:

    Varsha Gopee here….

    आज हमें फिर से गुरुजी विनय से कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ .हालांकि वे कुछ रफ्तार से गये,और मुझे कुछ बातें समझ में भी नहीं आयी.आज हमें भारित्य काव्यशास्त्र के बारे में जानने का मौका मिला. (WHY LITERARY THEORY IS IMPORTANT)….जैसे गुरुजी का कह्ना है की यह बरा निरस है परंतु हमें इसके बारे में थोरा ग्यान होना चाहिये क्योंकि येहि सब सीखने के बाद काव्य के सही तत्वों के बारे में जान पायेंगे…और काव्य की सही रचना कर पयेंगे….

  8. parmeetah deeljore says:

    आज ह्मे काव्य्शास्त्र के बारे मे जानने का अवसर मिला। लेकिन एक दो बातें समझ में नही आयी। परन्तु मुझे यह भी पता चला कि काव्य्शास्त्र सीखना क्यों आवश्य्क है ताकि हम काव्य की सही रचना कर पाए।

    parmeetah deeljore

  9. Ujoodha Priya says:

    मुझे लगता है कि आज आप थोरे निराश हुए..क्योंकि ज्यादातर ने तैयारियाँ नहीं की थी..
    अगली बार ऐसा न होगा..
    काव्यशास्त्र थोरा निरस है पर पढना तो परेगा…

  10. कैलाश दावोराज़ says:

    काव्यशास्त्र : १) काव्य से सम्बंधित सारे सिद्धांत प्राप्त होता है, २) ऐसा क्षेत्र है जहाँ कविता पढ़ने का दृष्टिकोण मिलेगा – इसमें कविता का अध्ययन करना होगा…
    यह स्वाभाविक है कि अलंकार की सुंदरता उसके काव्य सौन्दर्य में होता है. मनुष्य हमेशा सौन्दर्य के प्रति आकृष्ट व झुकता है. सौन्दर्य को बनाता है या बढ़ाता है?? यह तो एक विवादस्पद है. कविता में रसात्मकता होना अनिवार्य है.
    इसी प्रकार, काव्यशास्त्र के विषय में अनेक विद्वानों का मत भी प्राप्त हुआ जो सन्दर्भ के अनुकूल है और मेरे लिया लाभप्रद सिद्ध हुआ है.
    इसके अतिरिक्त साहित्य विषय पर चर्चा हुई. साहित्य में मनुष्य हमेशा अपने आप को अभिव्यक्त करता है. साहित्य को अनेक रूप से पहचान सकते हैं – श्रव्य, दृश्य, लिखित, रस…
    इसी प्रकार कक्षा काव्य-लक्षण विषय पर समाप्त हुआ.

    १) इस विषय को लेकर अलंकरवादी आचार्यों ने चर्चा कि: कुछ ने तो काव्य को सिर्फ बाहरी सौन्दर्य कि प्रधानता दी है. इसका तात्पर्य हुआ कि इसका आतंरिक रूप कि उपेक्षा कि गयी है.
    २) शब्दार्थमय है – शब्द को अर्थ सन्दर्भ में देते है : कविता में – शब्द का वज़न उसके सन्दर्भ में होता है…

    संक्षेप में आज कि कक्षा में अनेक चीज़ सिखने को मिला है.

  11. prinita mutty says:

    aaj kavyashastra ke bare mein jane ka mauka mila aur ye bhi gyat hua ki yaha vishay kyun avashyak hai.

    • niveta chooramun says:

      आज काव्यशास्त्र के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त हुई और उसकी आवश्यकता के बारे में भी पता चला है.

  12. हमेशा की तरह आज भी कक्षा दिलजसब और रोचक रही. हाँ यह में मानती हूँ कि काव्य-शास्त्रा थोरा निरस है लेकिन आपके समझाने के ढंग से हमें कभी भी कक्षा से भाग जाने की ज़रूरत नही पड़ी. .
    काव्य-शास्त्रा हमें कविता का अध्ययन करने एवं पढ़ने,लिखने और समझने का अवसर देता है. कविता में हर एक शब्द का अपना एक संदर्भ एवं अर्थ निकलता है. हमें ये भी पता चला के “रस”,कविता के लिए बहत ही महत्‍वपूर्ण है. भारत मुनि:रस को काव्य की आत्मा मानते है…………………
    संशेप ही सही लेकिन काफ़ी मुख्य वास्तु के बारे में जाना
    धन्यवाद🙂

  13. Varsha Goburdhun says:

    आदर्नीय गुरुजी,
    आज की कक्शा ने काव्यशास्त्र पर ज़्यादा प्रकाश दाला हालाकि जैसे आप ने कहा कि यह विशय निरस् है. हम ने काव्य के अलग – अलग रूप सिख्ने को मिले… जिस तरह से आप्ने ईतिहास को समझाय, वहा भी रोमांचक रह. काव्य को सूंदर बनाने वाले अलंकार के बारे में भि ज़्यादा स्पर्श हुआ. ईस् कक्शा को आप्ने जीता – जागता बनाया. हमे आशा हैं कि आप्के सन्योग से हम ईस् विशय के बारे में अधिक जानेंगे. इस् के अतिरिक, मैं यहि कहूंगी कि यह विशय सब को भाएग.
    धन्यवाद
    वर्शा

  14. Sulakshana Roopowa says:

    आज की कक्शा मे हमे कव्यशास्त्र के बारॆ मे सीखा. आचार्य भरत मुनी, भाम्ह, दण्दी के बारे मे पता चला.. भरत मुनी एक रसवादी आचार्य थे जो रस को कव्य की आत्मा मानते थे और भामह और दण्दी और उद्भट अलंकारवादी आचार्य थे.. इसे हमे पता चला की रस और अलन्कार दोनो कव्य की आभूशन है..आप्कि कक्शा ब्री दिल्चस्प थि..

  15. Yatasha says:

    brief but interesting class.learnt a lot abt ritikaal.

  16. Kritika Gunagaram says:

    –हमारी चवथी कक्षा जो शुक्रवार ३० सितम्बर २०११ थी, भारितीय काव्य शास्त्र पर आधारित था. यह विषय अपने आप में एक नीरस विचय हजा पर केवल सिद्धांत पर्ण है.
    -काव्य शास्त्र एक ऐसा शेत्र हैं जहाँ पर काव्य को समजने के दृष्टिकोण प्राप्त होता है.
    -साहित्य केवल पर्ने योग्य नहीं होता अपितु उसका अध्ययन करना भी होता है.
    -काव्य शास्त्र आदि कल से शुरू होता हैं और अंतिम काल से समाप्त.
    -रसवादी आचार्य भारत मुनि रस को ही काव्य कि आत्मा मानते थे और अलान्कारवादी आचार्य भामह, डंडी, ओउध्त अलंकार को भी काव्य कि आत्मा मानते थे.
    -संस्कृत युग वाला कल था जहा पर हर लोग अपने सिद्धांत के साथ आते थे.
    – काव्य शास्त्र के ५ प्रमुख सिद्धांत:
    १. अलंकार सिद्धांत
    २. रीती
    ३. ध्वनि
    ४. वक्रोती
    ५. रस

    मनुष्य गहनों के साथ समजौता कर लेता है लेकिन साहित्यकार नहीं करता. जो घटना ज्यादा समय तक अपने दिमाग में रहता हैं वही कवे, काव्य, के रूप धारण कर लेता है.

    रचनाकार अनुभवों को ज्ञान के साथ जोरते है और लिपिबध होता है और यह इतिहास बन जाता है.
    काव्य भी इतिहास हैं जो अनुभव, कल्पना, अभिव्यक्ति, शिहन अदि से बनता है.

  17. doorvatee says:

    namaste guruji, der ke liyer manfi chahti hoon.
    kaksha thora bhari lagta hai apko aur apki kaksha samajne ke liye aur samay chahiyer.

  18. Divya Sandooram says:

    hmm..gyaanvardhak kaksha to thi hi…saath hi rochak!

  19. Divya Sandooram says:

    sahitya samaaj ka darpan nahi..balki ek ansh hai…
    sahi arthon mein itihaas samaaj ka darpan hota hai…

  20. LUCHOO Pooja says:

    देर के लिए क्षमा गुरुजी,
    आपने आधुनिक काल को विस्तार पुर्वक समझाया।आपने नारियों के तीन तरह के भेद बताए।आधुनिक यशोदा,राधा,अहिलया और सीता उन महापूरूषों से सवाल करती हैं क्योंकि कई न कई उनमें दोष होता हैं। “जहाँ पक तर्क है वहाँ पर साहस होता है”-आपने यह कहा जो अत्यन्न ही सुन्दर और प्रभावशाली है। आपने रीतिकाल के बारे में भी कई चर्चा की जहाँ कलात्मकता,संगीतकला और आदि हैं।नारी का अधिकार तथा Quotation भी दिए-अविश्वास था!अविश्वास ही!नारी के प्रति नर का……….
    अंत:यह विषय और भी रोचक बनती जा रही है.

  21. Parvatee Doolarah says:

    Namasté Guruji,
    Deri se comments bhejne ke liye shama kijiyé.
    Aapki kasha bahut hi rochak tha. Prachin mahila aur adhunik mahila ke antaar ke bare mein jaané ka mawka mila. Sath hi sath anek siddhatein sikhné ko mili.

  22. Mamta gopalsing says:

    मेरा सादर नमन गुरुजी \
    इस बार नरियों कि योगदान के बारे में पता चला \ यह मेरे एक assignment के लिये भी लाभप्रद सिध हुआ है जो नारी अस्मिता पर आधारित है \
    मैथिलिशरण गुप्त कि यह बात’
    “ अविश्वास था \
    अविश्वास ही नारी के प्रती नर क…”
    मुझे सिखने को मिला \

  23. anishta says:

    namaste guruji
    jab aapne hindi sahitya ke vibhajan kaal ke bare mein samjhaya tha,visheshtaha adhunik kal ke bare mein jin tathyn par prakash dala tha unse mujhe bahut kuch sikhne ko mila hai. jahan purv mein nariyon ki manyataa matr saundary par hi adharit hua karti thi wahi adhunik kal ke kaviyon ne unhe ek nae dhang se prastut kiya hai. nari-astitva ko ek naya ayam pradan kiya. jin kaviyon par apne bat ki thi, sabhi ne nari-chetna par bal diya tha. un kaviyon ne stree ki swabhiman ki punaha sthapnaa karne ki koshish ki hai. kissi ne pitritv samaaj ko samjhane ki koshish ki hai ki naari sehyogini hoti hai na ki path-badhak.
    kavyashashtr parampara ke panch pramukh siddhaton par apne jin baton par humara dhyan akrisht kiya waha behad hi laabprad rahaa. ek gyanvardk bat yaha thi ki sahity manushy ke anubhav v gyan ka vaha roop hai jo lipibad hokar humare samksh rakhi jati hai. saat hi sahity manushy-abhivyakti ka ek sadhan hai.

    guruji,jo bhi aap samjha rahe hai,uss par bahut kuch kaha ja sakta hai, lekin kshamaa kijiyegaa, shabdon ke abhav se mein sir yahi keh pa rahi houn ki aap ki kaksha niras nahi hai apitu shiksha v labhprdh hai.

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