ACE – Class 3 : रिपोर्ट लेखन

Friday 30 Sept 2011, ACE, 12.30 – 14.00

Module; Language and Linguistics

 

सभी को पुन: नमस्कार,

शेष अन्य कक्षाओं की तुलना में इस बार की कक्षा कुछ अधिक बोधगम्य रही,     ऐसा मुझे अनुभव हुआ. शायद भारती सभागार की वजह से! खैर जो भी हो,         मुझे खुशी हुई कि इस बड़े ग्रूप में से काफ़ी लोग अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं.           अर्थात शिक्षण-विधि का प्रभाव अधूरा नहीं चल रहा है..

इस बार, रिपोर्ट लेखन पर प्रस्तुतीकरण केंद्रित रहा. आप में से अधिकतर लोग   इसके बारे में पहले से जानते हैं, कइयों ने तो बाकायदा इसका अध्ययन किया    होगा.

यह बताया गया कि रिपोर्ट पत्रकारिता क्षेत्र की एक बहुत ही सजीव और    प्रभावशाली विधा है. आज के  संदर्भ में इसकी अद्वितीय भूमिका को कोई  नकार नहीं सकता, इसी के अधार पर सत्ता कायम रहती है और सत्ता  बिगड़ती भी है.

सृजनात्मक लेखन के क्षेत्र में रिपोर्ट / रिपोर्टाज / रपट का भी महत्वपूर्ण स्थान है. हालाँकि इस  विधा में लेखक की कल्पनाशीलता का प्रयोग उस रूप में नहीं होता है जैसे कि कहानी, कविता याअन्य विधाओं में होता है, फिर भी सामाजिक यथार्थ पर आधारित  घटनाओं के लेखा-जोखा के अतिरिक्त भाषागत प्रयोग और शैलीगत वैविध्य के क्षेत्र में इस  कल्पनाशीलता के प्रयोग के लिए भरपूर स्थान  है.

पॉवरपोईंट प्रस्तुति की मुख्य रेखाएँ आपके साथ बांट रहा हूँ –

प्रस्तावना

  • रिपोर्ट / रपट / रिपोर्ताज –
  • गद्य की नई विधा
  • इतिहास – आधुनिक संदर्भ – संचार माध्यम
  • पत्र-पत्रिकाएँ, इंटरनेट आदि के क्षेत्र
  • पत्रकारिता का विषय-प्रधान लेखा-जोखा
आवश्यक है …
§     प्रामाणिकता
§     तथ्यात्मकता
§     वस्तु-स्थितिपरक वर्णन (वस्तुपरक दृष्टिकोण)
§     कल्पनाशीलता ??
§     सीमित आकार
§     सजीवता & रोचकता
§     तात्कालिकता
कुछ अनिवार्य तत्व / उपकरण
  • मर्मांतर घटना-कांड
                  1. वर्ण्य विषय
                  2. समकालीनता
                  3. असाधारण घटना-दुर्घटना (प्रभाव)
                  4. सामग्री संकलन:
                        a. संवाददाता, प्रेस रिलीज़, घटना-स्थल, आदि
  • महत्त-उद्देश्य
मानवीय संवेदनाओं को जागृत
शाश्वत जीवन-मूल्यों का वाहक
मानवता से जुड़े प्रश्न
युग-चेतना,
युग-संघर्ष
  • वर्णन-विवरण की सत्यता & प्रामाणिकता
§  आवश्यक स्रोतों के छान-बीन
§  वस्तुपरकता
  • निजी-दृष्टिकोण, निजी प्रतिक्रिया
  • चित्रात्मकता & सजीवता
§  सजीवता
§  सरलता
§  चित्रात्मकता
§  रोचकता
§  प्रभावोत्पादकता
  •  भावावेश-प्रधान शैली
  • सीमित आकार की रचना
  • शैली-वैविध्य
  • साहित्यिक रोचक भाषा-शैली
§  मुहावरे-लोकोक्ति
§  रूपक-उपमा
§  अलंकार
§  बिम्ब प्रयोग
§  शब्द-चित्र

आशा है कि उपर्युक्त समग्री आप लोगों के लिए लाभदायक सिद्ध हों.

प्राप्त जानकारी के अनुसार हम लोग अनेक सप्ताह बाद पुन: कक्षा के लिए मिलेंगे..

इस  बीच आपसे आग्रह है ब्लॉग पोस्ट भेजें ..

NB:

As per the requests from some of your friends  in class,  i decided to reduce the number of blog posts from 5 to minimum 2 posts. You are hereby reminded that you can send at least two posts (any topic convenient to you & typed in unicode Hindi or any other font used which is visible on this blog) with a minimum of 2000 words. you can even write short blogs/ reports/ articles etc with lesser number of words but the total of all of them should be minimum 2000 words.

feel free to contact me for any further query.

take care और दीपावली की अग्रिम मंगलकामनाएँ

शुभम्

विनय

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

38 Responses to ACE – Class 3 : रिपोर्ट लेखन

  1. सादर प्रणाम, गुरुजी।
    हमेशा की तरह शुक्रवार को भी कक्षा दिलजसब और रोचक थी।आपने प्रोजेक्टर का प्रयोग करके सभी का ध्यान केंद्रित किया। आप ने रिपोर्ट लेखन के बारे में समझाया जो काफ़ी हद तक सूचनात्मक थी। हमारा ज्ञान भी बढ़ा। आशा करती हूँ कि आने वाली कक्षाओं में हम इसी प्रकार आपसे नई बातें सीखेंगे ।
    धन्यवाद
    नमस्कार
    भामिनी
    ए. सी. ई. छात्रा

  2. Reena Devi Jeebosseea says:

    namaste guruji,

    report writing ki yah kaksha bahut hi rochak aur labhpradh rahi. nahi tarha se aap ne sab kuch samjhaya yani projector aur power point ke madhyam se. is ke liye bahut dhanyavad.

  3. siddhi says:

    नमस्ते गुरूजी
    आज की कक्षा मैं आप ने projector का प्रयोग कर के कक्षा में सजीवता लाई . रिपोर्ट लेखन में हमने जो भी कुछ सिखा इसका प्रयोग हम अवश्य करेंगे और जल्द ही आप को आप का कार्य ब्लग पर भेजेंगे.

  4. मोरिशश का इतिहास
    नौंवीं शताब्दी के आस पास अरब नौसैनिकों ने मोरिशश का पता लगाया थाlस्वभावतःउस समय मोरिशश एक घना जंगल था जिसका कोई नाम नहीं थाlलेकिन कोई लिखित प्रमाण सिध्द नहीं कर सकता कि इस से पहले किसी निवासी ने इस टापू का पता लगायाl
    अरब सैनिकों को इस टापू से रूचि नहीं थीlअरब सैनिकों के बाद,लगभग १५०७में पुर्तगाली ने मोरिशश का पता लगायाlपुर्तगाली नौसैनिक ‘फेरनंडेज़ परेरा’ ने इस टापू का नाम ‘सेरने’ रखाlबाद में पुर्तगाली के महान सैनिक ‘पेरो मास्करेनहास’ ने मोरिशश, रोड्रिग और रेनियन को ‘ज़् मॅसक्रीन्स’ का नाम दियाl
    जब पुर्तगाली ने मोरिशश का पता लगाया तो उन्हें यहाँ वास करने के लिए या मोरिशश को अपने कब्ज़े में लेने के लिए कोई लगाव नहीं थाlउस समय उनका व्यापार मार्ग (भारत) ज़्यादा ज़रूरी थाlइसीलिए वे ‘मोज़ांबिक’ तट पर स्थापित हुएl
    सब से पहले यहाँ वास करने के लिए १५९८में डच आए थेlवे दक्षिण पूर्व(ग्रां-पोर)की ओर से आए थेlउनका कॉंमांदर’वन वॉरवीक’ ने मोरिशश को अपने कब्ज़े में ले लिया और ‘प्रिन्स नस्सो’ के नाम पर इस टापू का नाम ‘मोरिशश’ रखा गयाlडच ने गुलाम का आयात किया थाlडच ने इस टापू पर ईख की रोपाई कीlवे हरिण, बंदर आदि जानवर यहाँ लाएlउस समय मोरिशश में बहुत डोडो पक्षी भी थेlवे डोडो का शिकार करते गएlडोडो उड़ नहीं सकता था इसलिए अपनी जान न बचा सकेlसिर्फ़ यही नहीं उन्होंने इस टापू पर पाए गये सभी ‘एबोनी’ पेड़ों को काटकर ले गयेl१६५२से १७१०तक सभी डच यहाँ से चले गये थेlउनके साथ-साथ डोडो पक्षी भी लुप्त हो गयेl
    डच के बाद १७१५ में फ्रांसीसी ने इस टापू पर कब्ज़ा करके इसका नाम ‘इल दे फ्राँस’ रख दियाl‘माहे दे लबूर्दोने’ पोर्ट लुई बन्दरगाह के प्रवर्तक थेlउस समय(१७२१)उन्होंने इस टापू में काफ़ी सुधार लाएlउन्होंइने भारत और अफ्रीका से गुलाम लाएlउन्होंने ईख, कोफ़ी आदि की खेती कीlफिर उन्होंने अनेक रास्ते बनवाएlउन्होंने ‘गवन्मेंट हाउस’ और ‘शातो दे मों प्लासिर’ का निर्माण भी कियाl
    ‘रॉबर्ट फार्कवार’ पहले राज्यपाल थेlअँग्रेज़ और फ्रेंच दोनों ही भारत पर अपना अधिकार जमाना चाहते थेlइसी कारण १७४६ से ही दोनों में लड़ाई शुरू हो गईlजब फ्राँस लड़ाई में हार गया तो उल्टे ही अँग्रेज़ों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा दिया,सो युध जीतकर भी अँग्रेज़ों को इस टापू को लौटाना पड़ाl
    ‘पियर प्वर’ ने१७६७ से राज्य संभालाlउन्होंने यहाँ बहुत पॉधे लगवाएl’चार्ल्स डेकाएँ’ अंतिम फ्रेंच गवर्नर थेlउन्होंने प्रार्थमिक पाठशालाओं और रोयल कॉलेज का निर्माण कियाl
    १८१० में ब्रिटिश ने एक विस्मय आक्रमण करके फ्रेंच को हरा दियाlतभी ‘चार्ल्स डेकाएँ’ को मोरिशश छोड़ना पड़ाl
    तब से यहाँ पर ब्रिटिश राज्य स्थापित हो गयाlफ्रांसीसी सैनिकों को स्वदेश लॉटने की आज़ादी दी गई थीlगुलामी का अंत १८३५ में हुआl
    भारी संख्या में भारत से मज़दूरों को यहाँ लाया गया थाlभारतीय आप्रवासियों को कहा जाता था कि मोरिशश में पत्थर उलटने पर सोना मिलता हैlतय हुआ कि काम करने पर उन्हें वेतन दिया जाएगा और रहने के लिए जगह भी दी जाएगीlलेकिन जब भारतीय मज़दूर यहाँ आए तो उनके प्रति बुरा बर्ताव किया गयाlउनसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करवातेlफिर भी कम पैसे देकर उनके साथ अत्याचार किया जाता थाl
    १९०७में जब महात्मा गाँधी मोरिशश आए तो मज़दूरों की स्थिति देखकर उन्हें दुख हुआlमज़दूरों की सहायता करने के लिए उन्होंने मनिलाल डाक्टर को भेजाl१९३६ में उन्होंने ‘लेबर पार्टी’ को स्थापित कियाlबाद में सर शिवसागर रामगुलाम लेबर पार्टी के नेता बनेl
    १९५९ चुनाव के बाद सर शिवसागर रामगुलाम मुख्य मंत्री बनेl१९६५से१९८२ तक वे मोरिशश के प्रथम प्रधान मंत्री रहेl१९६८ में सर शिवसागर रामगुलाम के राज्य में ही मोरिशश को स्वतंत्रता मिलीl१९८२ चुनाव के बाद सर अनिरूद जग्नत मोरिशश के प्रधान मंत्री बनेl१९९२ में मोरिशश गणतंत्र बनेl२००६से लेकर आज तक सर अनिरूद जग्नत गणतंत्र मोरिशश के राष्ट्रपति हैं और डाक्टर नवीन रामगुलाम(सर शिवसागर रामगुलाम के पुत्र)गणतंत्र मोरिशश के प्रधान मंत्री हैंl

  5. Boodhoo Asha says:

    Namaste Guruji
    mujhe apki riporth wali kaksha bahut achi lagi. Apne laptop aur projector ka prayog kiya jisse se hamein avashyak suchnayein prapth hui. Riporth likhte samay mein in sab baton ko dhyan mein rakhoungi. Dhaniyawad

  6. neerputh anjalee says:

    guruji namaste. aap ne nayi vidhi apnakar aur new technology ka prayog kar ke kaksha ko aur rochak banaaya aur Report sambandhi kaafi jankariyan di. guruji ham ne aap ke assignment par kaam karnaa shuru kar diyaa hein lekin jiss ‘font’ mein aap ne likhne ko kahaa hein(bhasha india)ham likh nahi paa rahe hein. aap hamein koy cd dijiye ya koyi aur oupay bataaye. aap ko dhanyavaad.

  7. neelam says:

    प्रणाम गुरुजी, assignment के लिए एक निबंध प्रस्तुत है:

    ‘सहशिक्षा’

    गांधी जी का कथन है कि “शिक्षा से मेरा अभिप्राय है – व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा का विकास”। भाव स्पष्ट है कि व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए शिक्षा अतिआवश्यक है। शिक्षा एक आजीवन प्रणाली है जिसके अंतर्गत कई पद्धतियाँ आती हैं। और उन में से एक, सहशिक्षा है। सहशिक्षा से हमारा तात्पर्य यह है – शिक्षा की वह पद्धति जिसमें युवा लड़के और लड़कियाँ एक ही कक्षा में पढ़ते हैं। मॉरीशस में इस पद्धति का बोल-बाला विभिन्न स्तरों पर हैं जैसे माध्यमिक स्तर पर एवं उच्च स्तरों पर। इस आधुनिक युग में जहाँ पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव तेज़ी से हमारी युवा पीढ़ी पर पड़ रही है वहाँ सहशिक्षा से होने वाले लाभ और हानि पर विचार करना बहुत आवश्यक है।

    सहशिक्षा संबंधी विभिन्न लाभों पर दृष्टि डालते हैं। यह देखा जाता है कि कक्षा में जब अध्यापक चर्चा का एक विषय देता है तो छात्र अपने मतानुसार उत्तर देते हैं। यहाँ लड़के-लड़कियों के विभिन्न विचारों का आदान-प्रदान होता है जिससे उनके ज्ञान की सीमा विस्तृत होती है। यह एक तथ्य है कि स्त्री-पुरुष के विचार सभी विषयों में एक-सा नहीं होता। इस तरह जब भी कक्षा में विचार विनिमय होता है तो छात्र दोनों पक्षों के मतों को सुनते हैं और अंततः एक ऐसे निष्कर्ष पर आते हैं जो पक्षपातरहित हो एवं सर्वोतम विचार हो। एक तरह से छात्र अपने विचारों कि अभिव्यक्ति बिना किसी संकोच करते हैं जिससे उन्हें संप्रेक्षण दक्षता भी प्राप्त होती है। और तो और उनमें आत्म-विश्वास की भावना भी आ जाती है क्योंकि जब कक्षा में प्रस्तुतीकरण आदि ओटीए है तो छात्रों के सामने स्त्री-पुरुष, दोनों होते हैं। फिर उनके समक्ष अपनी बात रखना एवं अपनी बात मनवाना काफ़ी कठिन कार्य है। किन्तु सहशिक्षा पद्धति के अंतर्गत छात्र इस कठिनाई को पार करने में समर्थ होते हैं।

    सहशिक्षा का दूसरा लाभ लड़के-लड़कियों के चारित्रिक विकास का है। यह परीक्षण एवं अनुभव द्वारा देखा गया है कि जिन विद्ध्यालयों में सहशिक्षा का प्रबंध है, वहाँ के लड़कों में शिष्टता, साधुता एवं सौजन्य आदि गुण स्वभावतः ही अंकुरित हो जाते हैं। वे चंचल नहीं रहते और एक दूसरे का आदर करते हैं। कक्षा में शांति का साम्राज्य रहता है। लड़कों की प्रकृति में गंभीरता आ जाती है। कक्षा का कार्य शान्त भाव से सुचारु रूप से होता रहता है। कक्षा में अनुशासन बना रहता है। पारस्परिक व्यवहार से स्त्री पुरुष का संकोच चला जाता है। अनेक सद्गुणों का विकास होता है जैसे बाँटने की प्रवृति पैदा होती है एवं समानता का भाव उत्पन्न होते हैं। विद्ध्यालय में साथ से लड़के-लड़कियों को एक दूसरे के मन और हृदय के अध्ययन करने का अवसर मिलता है। इस प्रकार आपसी सम्बन्धों के बारे में ज़्यादा जान पाते हैं।

    यह एक सच्चाई है क आगे चलकर लड़के लड़कियों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर जीवन की नौका को चलाना है। स्त्री पुरुष दोनों पर ही संयुक्त रूप से परिवार को सुचारु रूप से चलाने का उत्तरदायित्व है। सहशिक्षा इस दृष्टि से अत्यंत लाभदायक है। इससे स्त्री पुरुष दोनों को प्रारम्भ से ही प्रेमपूर्वक व्यवहार करने, पारस्परिक सहानुभूति रखने तथा एक दूसरे को समझने की शिक्षा मिलती है। साथ-साथ पढ़ने और खेलने से उनमें आत्मीयता का विकास होता है। सतत साहचर्य से परस्परिक घनिष्ठता बढ़ती है। जब आगे चलकर लड़के लड़कियों का गार्हस्थ्य जीवन में साथ-साथ चलना है तो आरंभिक जीवन से ही साथ-साथ की शिक्षा भी अधिक उपकारी होती है। इस प्रकार सहशिक्षा लड़के लड़कियों को गार्हस्थ्य जीवन को शान्त तथा सुखद बनाने का पाठ पढ़ाती है। यही स्थिति नौकरी एवं समाज के विभिन्न क्षेत्रों में भी होती है। सहशिक्षा द्वारा हमारी नयी पीढ़ी को आनेवाले जीवन के लिए तैयार किया जाता है। उन्हें मिलजुलकर रहने की शिक्षा दी जाती है। फलस्वरूप वे अपने आप को हर परिस्थिति में ढालने में समर्थ हो जाते हैं।

    इसके अतिरिक्त कक्षा में लड़के लड़कियों के बीच प्रतियोगिता की भावना आ जाती हैं जहां वे एक दूसरे से ज़्यादा अच्छा करने का प्रयत्न करते हैं। फलस्वरूप वे ज़्यादा गंभीर होकर पढ़ाई करते हैं एवं अपना खोज कार्य भी पूर्ण रूप से करते हैं। इससे छात्रों की शिक्षा के स्तर में वृद्धि आती है। वे अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान देते हैं ताकि वे अपने दोस्तों के सामने अपमानित न हो और अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। इस तरह शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच के रिश्ते में भी मधुरता आ जाती है। वे अपने मन की बात को खुलकर अपने अध्यापक के सामने रखते हैं और उन से विचार विमर्श करते हैं। फलस्वरूप शिक्षक मार्ग दर्शक के साथ-साथ दोस्त भी बन जाते हैं।

    सहशिक्षा का दूसरा पहलू भी होता है अर्थात सहशिक्षा से हानि भी हैं। यह एक प्राकृतिक सत्या है कि नर और मादा एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। जब एक कक्षा में लड़का-लड़की, दोनों एक साथ पढ़ते हैं तो निःसन्देह उनके बीच आकर्षण होगा। इस तरह से उन के बीच मित्रता प्यार में परिवर्तित हो जाती है जिससे उनका ध्यान कक्षा में कम हो जाती है। कक्षा के अंतर्गत एक दूसरे को प्यार भरी निगाहों से देखते हैं या इशारों से बातें करते हैं। इस प्रकार अन्य छात्रों का भी ध्यान पूर्ण रूप से कक्षा में नहीं होती है। वे भी इस तरह की बाधाओं से विचलित होते हैं जिससे वे शिक्षण का पूरा लाभ उठा पाते हैं। और तो और कुछ लड़के लड़कियाँ नोट्स लिखने के बजाय कक्षा में मस्ती करते हैं; अपने दोस्तों को गंदे-गंदे पत्र लिखते हैं। वे अपना समय व्यर्थ में गवाते हैं। आजकल तो मोबाइल फोन आ गए हैं जिसके द्वारा कक्षा में एक दूसरे को संदेश भेजा जाता है। स्वयं तो वे पढ़ते नहीं और दूसरे को भी पढ़ते नहीं देते हैं, उन्हें परेशान करते हैं।

    युवावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसके अंतराल में लड़का लड़की के शरीर में परिवर्तन आते हैं और उन में जानने की उत्सुकता पैदा होती हैं। तभी हम देखने हैं कि वे एक दूसरे के साथ होने का अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं। किन्तु कभी-कभी उनका संबंध केवल जान पहचान तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि वे अपनी मर्यादा को भी भंग कर देते हैं। फलस्वरूप अल्प आयु में ओ जाते लड़कियाँ गर्भवती हो जाती है और उनकी पढ़ाई भी पूरा नहीं हो पाती है। माता-पिता का नाम रोशन करने के बजाय उन्हें पूरे समाज के सामने अपमानित करती हैं। ऐसी भी स्थिति आती है जहां लड़के अपने उत्तरदायित्व से मुँह फेर लेते हैं। अकेली लड़की को नवजात शिशु का पालन पोषण करना पड़ता है। आजकल ऐसी घटनाएँ सुनने को मिलती है जहाँ सहशिक्षा के दोषपूर्ण रूप झलकता है।

    सहशिक्षा से और भी हानि होती है जैसे छात्र बड़ी आसानी से प्रभावित हो जाते हैं। विद्ध्यलयों में छात्रों की विशेष टोली होती है। उन टोलियों में ऐसे लड़के-लड़कियाँ होते हैं जिनकी रूचि एवं व्यवहार एक समान होते हैं। अब यदि कोई इस टोली में प्रवेश करना चाहता हो, तो उसे भी वैसे व्यवहार करना पड़ता है जैसे अन्य लोग करते हैं। यहाँ छात्र बुरी संगति एवं बुरे प्रभाव में पड़ जाते हैं। लड़कों के लिए सिगरेट पीना शान की बात होती है,तो लड़कियाँ समानता की भावना की पूर्ति इस बुरी आदत को अपनाती हैं। दोस्तों की नकल करते हुए युवक-युवतियाँ शराब एवं नशीली पदार्थों का सेवन करते हैं। ऐसे व्यवहार से वे एक प्रकार से अपने आप को श्रेष्ठ तथा अलग मानते हैं।

    जहां तक प्रतियोगिता की बात है वहाँ आर जब वह छात्रों के मन में जुनून का रूप ले लेता है तो यह ठीक नहीं होता है। कुछ पाने के लिए छात्र किसी भी हद को आर कर सकते हैं। यदि शिक्षा के क्षेत्र में हो तो युवक या युवति एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते अथवा ऐसी समस्या आ जाती है जहाँ एक दूसरे से बहतर करने की प्रवृति से वे स्वार्थपूर्ण भावना को अपनाने लग जाते हैं। सहशिक्षा पद्धति में लड़का-लड़की एक साथ शिक्षण ग्रहण करते हैं। ऐसी अवस्था में किसी लड़की को पाने के लिए लड़के कुछ भी करने को उतारू हो जाते हैं, इसका विपरीत भी होता है। दोस्तों के बीच मतभेद होने लगता है और अंततः वे आपस में झगड़ा करना शुरू करते हैं जिससे पढ़ाई का वातावरण बिगड़ जाता है। कभी-कभी उनकी भाषा में अश्लीलता आ जाती है और उनके बीच सम्मान की भावना दिखाई नहीं देती है।

    अतः सहशिक्षा एक ओर से लाभदायक है तो दूसरी ओर हानिकारक भी है। इसीलिए हमारे देश में ज़्यादातर कॉलेज केवल लड़कियों या लड़कों को पढ़ाने के लिए बन रहे हैं। उन्हें अलग-अलग करके पढ़ाने में शिक्षक को भी ज़्यादा सुविधा मिलती है। परंतु उच्च स्तर पर सहशिक्षा को बढ़ावा दी जाती है।

  8. Second blog for assignment
    केवल-शिवसागर रामगुलाम की कहानी l
    शिवसागर रामगुलाम की कहानी बीसवीं शताब्दी की हैlशिवसागर रामगुलाम केवल’ नाम से भी जाना जाता थाlउनका जन्म १८ सिप्टेंबर १९०० फ्लाक ज़िले के बेल-रिव गॉव में हुआ थाlउस समय देश में गरीबी और अनेक प्रकार के रोग फैले हुए थे l
    उनके पिताजी मोहित रामगुलाम, एक भारतीय आप्रवासी मज़दूर थे lउन्होंने बसंती रामचन से शादी की जो एक विधवा थी और दो बेटों(नकछेडी हीरामन और रामलाल रामचन) की माँ भी थीlकेवल बसंती जी का तीसरा पुत्र हुआl
    केवल के बचपन प्रकृति,पेड़-पॉधे,घास-फूस,फूल,पहाड़ आदि के मद्य में बिता lवे अपने पिताजी के साथ ‘फुरगेट’ नदी में मछलियाँ और झींगे मारने जाते थे l बचपन से ही उन्होंने दुखों को झेला lइसीलिए उनके लक्ष्य थे कि बड़े होकर इस देश के ‘गवर्नर’ बनेंगे lवे देश वासियों की रक्षा करेंगे और ग़रीबी मिटाएँगे l
    उनके प्रारंभिक शिक्षा बैठका और घर पर शुरू हुई, जहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति का ज्ञान प्राप्त किया lउन्होंने ‘बेल एर’ सरकारी पाठशाला में प्रार्थमिक शिक्षा पूरी की lजब वे सात साल के थे तभी उनके पिताजी चल बसे lबारह साल की उम्र में केवल,गोशाले में काम करते हुए एक गंभीर दुर्घटना के शिकार बने,जहाँ उन्होंने अपनी एक आँख खो दीl
    केवक मेधावी थे lछात्रवृति प्राप्त करके उन्होंने’क्युपीप’ के ‘रॉयल कॉलेज’ में माध्यमिक शिक्षा पूरी कीl
    कॉलेज में वे अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य से बहुत उत्सुक थेlउन्हें फ्रेंच साहित्य के प्रति भी रूचि थीlमाध्यमिक शिक्षा के बाद केवल ने तीन महीनों तक सरकारी नॉकरी कीl
    एक दिन वे एक भारतीय बुढ़िया से मिले,जो बहुत दुखी थीlबुढ़िया दर्द के मारे रो रही थीlकेवल पास गए और पूछे “माताजी आप क्यों रो रही हैं?कृपया बताइए कैसे मैं आप की मदद कर सकता हूँ?”
    बुढ़िया आश्चर्य होकर केवल की ओर देखा और कहा,”बाबू तुम कुछ नही कर सकते होlयह अपना भाग्य हैlहम जीवन भर दुख सहते रहेlगोरे मलिक का वही अपमान, वही अनादरl”
    तभी केवल को उसकी बीमार माँ की याद आ गयी जो निमोनिया का शिकार थाlकेवल की माँ अंतिम सांस लेते हुए रामलाल और नकछेडी से कहा,”मैं केवल को तुम्हारे हाथों में छोड़ रही हूँlइसका ख़याल रखनाl
    वास्तव में केवल के सव्तेले भाइयों ने उनका देखभाल अच्छी तरह कियाlभाइयों का सपना था कि एक दिन केवल देश के सरकार बनेlकेवल भी अपने भाइयों का आदर करते थे lकेवल हमेशा बीमार व्यक्तियों के साथ गॉव के अस्पताल जाते थे l
    उसी समय केवल को अहसास हुआ कि उसी दिन वे गरीबों की मदद कर पाएँगे,जब वे डाक्टर बनेंगेlउनके भाई रामलाल ने भी उन्हें वचन दिया कि डाक्टर बनने के लिए उनकी सहयता करेगा l
    माध्यमिक शिक्षा के बाद उन्हें छात्रवृति प्राप्त हुई lतभी १९२१ में केवल डाक्टर बनने के लिए लंडन गए l
    वहाँ उन्होंने रवीन्द्रनाथ तागॉर,नेहरू आदि महान व्यक्तियों से भेंट कीlकेवल ने उनसे प्रेरणा प्राप्त की क्योंकि उन्होंने भी अपने देश को स्वतंत्र करने में लगे हुए थे l
    केवल ज़िंदगी के उतराव चढ़ाव सहकार हिमत नही हाराlउन्होंने बहुत मेहनत से पढ़ाई करके डाक्टर बनेlऔर तो और उन्होंने देश को आज़ादी भी दिलाईl वे प्रधान मंत्री और राज्यपाल भी बनेl उनके लिए हमारे हृदय में हमेशा आदर रहेगा l
    केवल की ज़िंदगी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि मेहनत करने से हमेशा सफलता मिलती है l

  9. teena caumul says:

    साहित्य और टेक्नोलॉजी
    सामाजिक परिवर्तन के लिए विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी ने मह्त्वपूर्ण भूमिका निभायी
    है│इन्होंने विकसित तथा विकासशील देशों के लोगों के जीवन में परिवर्तन ला दिया है│ रडियो, टेलिविजन, कार, कम्प्यूतर, आदि ने लोगों की जीवन शैलियों और विचार धाराओं में महान परिवर्तन ला दिया है │ इन आधुनिक टेक्नोलॉजी ने न केवल सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है बल्कि साहित्य और आधुनिक टेक्नोलॉजी एक दूसरे के साथ अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं│
    आज के ज्ञान-विज्ञान और टेक्नोलॉजी के फलस्वरूप उत्पन्न स्थितियों का नया बोध आधुनिकता है│ आधुनिकता का बोध एक वास्तविकता अवश्य है किन्तु स्थायी नहीं है│ हिन्दी साहित्य में काव्य, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि हैं│ आधुनिक टेक्नोलॉजी ने काव्यों को भी प्रभावित किया है│ जहाँ पर कवि प्रकृति की गोद में रह्कर अपनी प्रेरणा का स्त्रोत ढूढते रह्ते थे, आज वहीं कवि इंटर्नेट पर दुनिया के किसी भी कोने को अपनी प्रेरणा बनाकर अपने काव्यों की रचना कर सकते हैं│ कहानी लेखन, उपन्यास-लेखन तथा निबंध-लेखन भी आधुनिक टेक्नोलॉजी से प्रभावित होते आ रहे हैं│ किसी निबंध तथा कहानी लिखने के लिए, इंटर्नेट पर प्राप्त की गईं जानकारियाँ काफ़ी हैं│ प्रेस भी एक आधुनिक टेक्नोलॉजी है और कहानी-लेखन तथा उपन्यास लेखन में इसका बड़ा योगदान है│ समाचार पत्रों द्वारा समाज की कुरीतियों पर कोई खबर पाकर कोई भी कहानीकार या उपन्यासकार अपने कार्यों को आसानी से बढ़ा सकता है│
    दिजिटल कैमरा भी एक आधुनिक साधन है│ उसका प्रभाव नाटक साहित्य पर काफ़ी है│रंगमंच पर किये गये नाटकों को कैमरे से फ़िल्माया जा सकता है│ इससे नायक स्वयं अपना अभिनय देख सकता है│ कैमरे के बिना कोई भी फ़िल्म दर्शक तक नहीं जा पाती है│
    आधुनिक टेक्नोलॉजी में टेलिविजन तथा रेडियो भी आते हैं│ ये साधन जीवन के आवश्यक अंग बन गये हैं│ हिंदी नाट्य-साहित्य रेडियो और चलचित्रों के माध्यम से उन्नति की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ने लगे│यहीं कारण है कि आज भी नाटक समाज में जीवित है│
    सत्त्रह्वीं और अठारह्वीं शताब्दी के कुछ कवियों को ऐह्सास होने लगा था कि विज्ञान के बढ़ावा से उनका अस्तित्व कम होने लगा था│प्रसिद्ध पाश्चात्य कवि सामुएल टेलर कोलरिज ने अत: मह्सूस किया कि उसे भी परिस्थितियों के साथ बदलना होगा│ इसी प्रकार उसने भी आधुनिक टेक्नोलॉजी को अपने काव्यों में उतारने का प्रयत्न किया│ उसकी दृष्टि में भूगोल भी आधुनिक टेक्नोलॉजी में गिना जाता है│
    “But rein your stallion in, too daring Nine!
    Should Empires bloat the Scientific line?”
    हिंदी साहित्य पर आधुनिक टेक्नोलॉजी का योगदान मह्त्वपूर्ण रहा परन्तु यहीं टेक्नोलॉजी कभी-कभी हानिकारक सिद्ध हो सकती है│ आधुनिक हिंदी साहित्यकार सदा इस बात को ध्यान में रखते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी की अत्यधिक मोह में उसके काव्य में मात्र आधुनिकता ही न रह जाए और बेचारी साहितियकता का निर्वासन हो जाए│ इसलिए अनेक साहित्यकार प्रकृतिवादी थे और आधुनिक बोध का खण्डन किया│
    “हम मायामय संसार को त्यागकर अपने आप को पुन: ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं│”- त्रिआट
    “ we can cast away a world of illusion and rediscover our own self.”- Wright
    आधुनिक टेक्नोलॉजी ने साहित्यकारों कहीं –न-कहीं आलसी बना दिया है│ आधुनिक साहित्यकार प्राचीन ग्रन्थों को कम मह्त्व देकर इन्टरनेट पर अधिक ध्यान देने लगा है│
    अंत में ह्म कह सकते हैं कि साहित्य और आधुनिक टेक्नोलॉजी अपने आप तक ही सीमित रहे तो अच्छा है│ परन्तु अगर साहित्य और टेक्नोलॉजी साथ-साथ चलें तो भी बहतर है│

  10. दीवाली/दीपावलीl
    दीवाली/दीपावली का अर्थ है दीयों की श्रेणीlसभी त्योहारों में से दीवाली सब से भव्य और मुख्य हैl हर धर्म के लोग इस त्योहार को हर्षोल्लास से मनाते हैंlदीवाली की शानदार चमक वातावरण को आनंदित करता हैlदीवाली अश्विन महीने की अमावस्या को मनाई जाती है जो अक्टूबेर और नोवमबर के बीच में पड़ती हैl
    यह दीपों का त्योहार है, जो बुराई मिटाकर भलाई की जीत का प्रतीक हैl अनेक पौराणिक कथाएँ हैं जो दीवाली से जुड़ी हुई हैंlलेकिन व्यापक रूप से दीवाली मनाने की प्रथा यह है कि श्री रामचंद्र जी चौदह साल बाद प्रवास पूरा करके अपने अयोध्या राज्य लौट रहे थे, दीवाली इसी की श्रधांजलि हैl श्री रामचंद्र जी तो विजयी होकर अयोध्या लौट रहे थे क्योंकि उन्होंने प्रवास के समय ही रावण को हराया भी थाl
    दूसरी कथा यह है कि उसी दिन कृष्ण भगवान ने नाकासूर राक्षस का नाश किया थाl
    तीसरी कथा यह है कि उसी दिन लक्ष्मी माँ क्षीर-सागर से प्रकट हुई थींlउन्होंने मानव-जाती के लिए धन-सम्पत्ति और यश साथ लाई थींl उस दिन लक्ष्मी माँ को सम्मानित करने के लिए उनकी पूजा हुई थीl उसी रूप में, हर साल दीवाली के दिन, हिन्दू उनकी पूजा करते हैंl दीवाली लक्ष्मी माँ का भी उत्सव हैl
    वैसे तो दीवाली का प्रबंध कुछ दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैंlलोग घर-आँगन साफ़ करते हैंl लोग रंग-बिरंगे दीपों से घरों को सजाते हैंl और तो और इस अवसर पर लोग नए कपड़े और गहने भी खरीदते हैंl
    दीवाली के दिन माताएँ तरह-तरह की मिठाइयाँ और शाकाहारी व्यंजन तैयार करती हैंl सभी घरों में शकरकन्द की मिठाई बनाना उस दिन का नियम हैl
    पहले घर-घर में मिठाइयाँ तैयार करना एक अनिवार्य प्रथा थींlलेकिन आजकल तो ज़्यादातर लोग दुकान से मिठाइयाँ खरीदकर बाँटते हैंlदीवाली के दिन लोग पास-पड़ोस और हित-मित्रों में अनेक प्रकार की मिठाइयाँ जैसे लड्डू, बरफी, गुलाब-जामुन आदि बाँटते हैंl हम एक दूसरे से मिलकर दीवाली की शुभकामनाएँ देते हैंlहम बड़ों से आशीर्वाद भी लेते हैंl
    किसी भी पूजा शुरू करने से पहले सब से प्रथम गणेश जी की आराधना होती हैlदीवाली के दिन भी पहले गणेश जी की पूजा करना अनिवार्य हैl यह माना जाता है कि दीवाली के दिन लक्ष्मी माँ भक्तों के घरों में दर्शन देकर शांति और समृद्धि लाती हैंlइसीलिए सायंकाल को घर-घर में लक्ष्मी पूजा होती हैl हम अपने भविष्य के सुख-शांति, स्वास्थ्य और शुभ ही शुभ के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैंl
    पूजा के बाद लोग घर-आँगन में दीए जलाकर विश्व-लोक का अंधकार दूर करते हैंl
    दीवाली सभी के लिए खुशी का दिन है खासकर बच्चों के लिए क्योंकि उन्हें पटाखे जलाने का मौका मिलता हैlजब चारों ओर लोग पटाखे जलाते हैं,तो मानो आकाश में चिंगारियों की लड़ाई होती हैंl चारों तरफ़ की सजावट और आतिशबाज़ी यही सूचित करती हैं कि क्रूरता के प्रति ईश्वरीय ताकत की ही जीत होती हैंl
    रात्रि में गाँव और शहरों में चहल पहल होती हैं क्योंकि लोग चारों ओर की सजावट देखने जाते हैंl
    दीवाली खुशी के साथ-साथ पूजा और परम्परा का भी लय हैlयह प्रथा आज भी सक्रीय हैl
    सभी को दीपावली की मंगलकामनाएँ l

  11. prema mohundin says:

    नमस्ते गुरु जी मैं ACE की छात्रा Mohundin Prema हूँ ,पहले मैं पि़छले सप्ताह के बारे में बात करूँगी।कम्प्यूतर के प्रयोग से कक्षा रोचक बनी।रिपोर्ट पर काफी जानकारियाँ मिली।मैं अपनी Assignment भेज रही हूँ।इस में थोङी सी अक्षर गलतियाँ होगी क्योंकि कुछ अक्षर नहीं मिल रहे है।इस के लिए में क्षमा चाहती हूँ।

    स्वस्थ शरीर के रहस्य
    सदा काम करने के फलस्वरुप जैसे मशीनों के भाग खराब हो जाते है वैसे ही हमारे शरीर के अंग भी समय बितने पर खराब हो जाते हैं। वातावरण में पाए जाने वाले प्रदूषण इस का मुख्य कारण है। अच्छे स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए अनेक उपाय अनिवार्य हैं।
    हमारे शरीर में दो प्रकार के अंग है। पहला जो शरीर के अंदर होता है और दूसरा जो शरीर के बाहर होता है। बाहरी भाग हमें दिखाई देता है परन्तु भीतरी अंश नेत्रों से नहीं दिखते। हमें दोनों भागों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। भीतरी अंग को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित भोजन,स्वच्छ पानी और शीतल जलवायू की आवश्यकता है। साथ ही हमें नशीली पदार्थों से बचना चाहिए। इस के अलावा व्यायाम करना भी आवश्यक है। व्यायाम करने से हमारे भीतरी अंग तेज चलते है जिस से स्वास्थ्य बना रहता है। भीतरी अंग जो दिखाई नहीं देते है हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होते है।
    हालाकि बाहरी अंग दिखाई देते है परन्तु मनूष्य कभी-कभी उनका ध्यान रखना भूल जाता है।बाहरी शरीर का प्रमुख अंग त्वचा है। त्वचा वहाँ अंश है जो सबसे पहले प्रदूषण का शिकार बनता है। त्वचा के माध्यम से ही कीटाणु शरीर के भीतर प्रवेश करते है।देखने पर हमारी त्वचा चिकना लगता है पर बारीकी से देखा जाए तो इसमें अनेकों छेद होते है जिसे हम रोमकूप कहते है। रोमकूप आकार में बहुत छोटे होते होते है पर इनका काम बहुत महत्वपूण है। बन्द हो जाने पर ये मनुष्य को मृत्यु भी दिला सकती है।रोमकूप अनेक कार्य करते है।उनमें से सबसे विशेष कार्य शरीर के भीतर वायू पहुँचाना और पसीने के माध्यम से गंदे पानी को बाहर निकालना है। रोमकूप में विकार आने से शरीर में अनेकों दोष पैदा होते है।ऐसे दोषों से बचने के लिए त्वचा को साफ रखना चाहिए।इसके लिए सबसे आसान और सस्ता तरीका स्नान करना है।स्नान करते समय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि रोमकूप के मुँह पर जमी मैल निकाली जाए।स्नान करने के बाद सूखे कपङे से रगङकर देह पौंछना चाहिए।इसके अलावा हमें अपनी आँखों,कानों और दाँत की भी ओर ध्यान देना चाहिए।वातावकण को भी साफ रखना अनिवार्य है।
    अत: यह कहा जा सकता है कि स्वस्थ शरीर का रहस्य सफाई है। साफ रहने से बीमारियॉ दूर रहती है और मन प्रसन्न रहता है।इसीलिए साफ शरीर रखीए और स्वस्थ शरीर पाइए।

    काजेला में एक दिन
    रविवार के सुनहरे दिन को बिताने के लिए काजेला जैसा प्राकृतिक स्थल उपयुक्त है। इसलिए सुरेश ने बच्चों को लेकर वहाँ जाने का प्रोग्राम बनाया। यहाँ जानकर सभी के चहरे खिलखिला उठे।थोङी ही देर में सभी तैयार हो गए।दो घंटे के सफर के बाद वे वहाँ पहुँचे।
    काजेला का बाहरी वातावरण अत्यन्त आकर्षक है।दाईं ओर एक छोटा तालाब है।सफेद पंख वाले बतख तालाब में अपनी मधुर आवाज से मानो दर्शक का स्वागत कर रहे हो।उन्हें देखते ही कदम अपने आप ही उनकी ओर बढने लगे।कई पर्यटक बतखों को चारा दे रहे थे।बतख गौरव से अपनी गर्दन ऊपर कर रहे थे।बाई ओर एक सरोवर है जिसमें सुन्दर और रंगीन मछिलयाँ है।ऐसे दृश्य दर्शक को अन्दर जाने के लिए उत्सुक करते है।टिकटों का दाम चुकाकर सभी ने प्रवेश किया।सभी की आँखों में खुशी चमक रही थी।
    पहले वे चिङियों को निहारने गए।हर एक पिजरे में एक प्रकार का चिडियाँ है।वहाँ पर लाल,नीला. पीला,हरा,सफेद और अन्य रंगों वाली पक्षियाँ थे।चारों ओर पक्षी ही नजर आ रही थी, साथ ही उनका मधुर कलरव सुनाई दे रही थी।मोरनी को देखकर सभी की खुशियाँ का ठिकाना ना रहा।पक्षी ने अपने पंख खोले और नाच भी दिखाया।सुरश ने यह नजारा अपने कैमेरा में बन्द किया।एक कोने में कछुए सुस्त पडे थे।बच्चों ने उनको खाने के लिए पत्ते दिए और कुछ बच्चों ने उनपर सवारी भी की।आगे बढकर उन्होंने एक बडा तालाब देखा।उसमें कई प्रकार के रंगीन मछलियाँ थीं। कुछ पैसे देकर उन्होंने मछलियाँ भी पकडीं।मार्ग पर आगे चलते हुए सभी को भारी गरजन सुनाई दी।यह दहारने की आवाज थी।सभी जान गए कि वे बाध के दर्शन करने जा रहे थे।स्याह धारीदार सुहली मखमल का कोव पहने बाध लोहे के सीखयों के पीछे खडा था।उसकी आँखों से क्रुरता टपक रही थी।बाध की खाल सुन्दर और चमकीली थी।बच्चों को देखते ही बाध जोर से दहारा।सभी ङर के मारे काँपने लगे और बच्चे सुरश के पीछे छीप गए।
    फिर सभी बन्दरों को देखने गए।बन्दर किलकारी मारते छलाँग लगा रहे थे।बच्चे उन्हें देखकर उनकी नकल कर रहे थे।सभी ने उस समय का बडा आनन्द उठाया।बन्दरों के निकट ही मृग थे।हिरण बङी-बङी जादूभरी आँखों से हिरनी और उसके साथ बैठे हुए अपने छोटे से छौने की ओर देख रहे थे।उन्हें देखकर उन्होंने उनको पुचकारा पर वे सकुचाकर पीछे हट गए।सुरेश ने बताया कि यह जानवर लजीले होते है।अन्त में वे एक चित्रगर्दभ को देखने गए।बच्चों ने पहली बार इस जानवर को देखा था।वे बहुत प्रसन्न हुए।
    इन सुन्दर दृश्यों को देखते ही पूरा दिन निकल गया।सभी का मन गदगद हो गया।यह दिन सभी के लिए अविस्मर्णनीय थी।

    शराब का शरीर पर असर
    हमारा आज का आधुनिक युग शीध्रता से आगे बढ रहा है।विज्ञान हो या कृषि,पर्यटन हो या कपडा हर उधोग में तेजी से प्रगति हो रही है।उधोगीकरण दुनिया में तेजी बढ रही है।परन्तू ऐसी उन्नति होते हुए भी कई देश पतंग की ओर बढ रही है।इस का कारण समाज में पाए जाने वाले दुराचार है।शराब इन में प्रमुख स्थान रखता है।
    शराब एक ऐसा पदार्थ है जो शरीर की कार्यक्षमता की गति को धीमी कर देता है।हमारा कानुन कहता है कि नाबालिकों को शराब खरीदने और इसका सेवन करने का अधिकार नहीं है।पर शायद यह कानुन तोङने के लिए ही बना है।वैज्ञानिक अनुसंधान के अनुसार ज्यादातर अठारह से कम उम्र वाले बच्चे ही शराब के शिकार बनते हैं।इस नशीली पदार्थ का हमारे शरीर पर क्या असर होता है आइए देखे।
    जब व्यकित शराब पीता है तो यह पदार्थ उसके खुन में मिल जाता है।खुन के बहाव से यह शरीर के हर कोशिका तक पहुँच जाता है।शराब का पहला शिकार मस्तिष्क है।वहाँ प्रवेश करते ही शराब विचार शक्ति को धीमा कर देता है,तब मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता घट जाती है।इस के बाद भावनाओं की बारी आती है। आदमी क्रोधी, चिंतित या उदास होने लगता है।फलस्वरुप ताल-मेल व प्रतिक्रियाओं में असर होता है।शराब शरीर के प्रमुख हिस्सों को प्रभावित करता है जैसे दिल की धडकन,साँसों की गति और पाचन क्रिया। दिमाग पर इस का असर सब से खतरनाक होता है क्योंकि यह जानलेवा हो सकता है।
    पीने वाले व्यक्ति की आँखें पर गहरा प्रभाव पडता है।शराब से नजर केंदित नहीं होती है।अतः धुँघला दिखाई देता है।यही कारण है कि लोगों को शराब पीकर गाङी चलाने की मनाही है।शराब पीने से हदय पर गहरा प्रभाव पङता है।हदय कमजोर हो जाता है।इस की गति में परिवर्तन होता है। इसी कारण उच्च रक्तचाप हो जाता है।फेफङा भी शराब से प्रभावित होता है।यह श्वास-गति को कम करता है।
    शराब पुरे पाचन तंत्र के अस्तर को छील देता है।परिणामस्वरुप उल्टी से लेकर अहसर और केंसर तक की समस्या हो सकती है।बहुत लम्बे समय तक पीने से “सिरहोसिस ऑफ लिवर” नामक बीमारी होती है।शराब माँसपेशियों को कमजोर बना देता है। शराबी आदमी वहाँ काम करने लगता है जो वह सामान्य अवस्था में नहीं कर सकता है।तभी वह अपने हदय के दबे भावनाओं को उभारता है।व्यक्ति अपनी योग्यताओं के प्रति बहुत ज्यादा विश्वासी हो जाता है। कुछ पीने वाले बेवकुफ बन जाते है तो कुछ निराश,क्रोधी,आक्रमक और आत्घाती तक बन जाते है।शराब युवाओं के लिए केवल शारीरिक,भावनात्मक व सामाजिक नुकसान ही नहीं लाती वरन बहुत सी दुर्घटनाओं का शिकार भी बनाती है।अधिकतर जानलेवा दुर्घटनाओं का कारण शराब ही है।
    हमें अपने समाज और देश को ऐसे दुराचारों से बचाना चाहिए।इसका एक मात्र माध्यम लोगों को शिक्षित करना है। लोगों को शराब से परिचित कराना है। इसी शिक्षा से समाज सुधर पाएगा और प्रगति कर पाएगा।

    प्रदूषण
    प्रदूषण एक ज्वलंत समस्या है। इस समस्या से विश्वभर प्रपीङित है।अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए मानव हर प्रयास करता है। जीवन को सहज बनाना उसका लक्ष्य बन गया है।वह नवीन उपकरणों का आविष्कार करता है और अपने जीवन को सरल बनाता है। औधोगिकरण भी तेजी से बढ रही है। परन्तु इस युग में मनुष्य अपने पीछे एक विशाल अंधकार पैदा कर रहा है जो उसकी मखमली जीवन को तहस-नहस करने की क्षमता रखती है। उस अंधकार का नाम प्रदूषण है।
    प्रदूषण अनेक प्रकार के होते है।सभी प्रकार मनुष्य के लिए हानिकारक ही होते है।प्रदूषण का मुख्य कारण मनूष्य रचित मशीन है।समस्त संसार उपकरणों का लाभ देखता है उसकी हानि नहीं।उसके कुकर्मों से परिचित होकर भी हम अनजान बने रहने में संतुष्ट और खुश भी रहते है।परन्तु कब तक ऐसा चल सकता है।एक दिन मनुष्य को उसका सामना करना ही पङेगा।इस के कुप्रभाव से कोई नहीं बच सकता है।
    मानव गगंनचुंबी बनाने के लिए अपने वनों को नष्ट करता है।निर्वनीकरण से हमारे पेङ-पौधे कम होते है।इस से जमीन बहने लगती है,वन सिमटते है,धरती अनुपजाऊ होती है,प्राकृतिक सौन्दर्य नष्ट होती है और सब से महत्वपूण बात प्राणवायू कम होती है।यदि मनुष्य ऐसा ही करता रहा तो शायद एक दिन ऐसा भी आएगा जब ईंधन की कमी भी हो सकती है।कारखानों की चिमनियों के धुआँ से वायू मण्ङल दूषित होता है।इस के कारण साँस लेने के लिए शीतल जलवायू नहीं मिलती है।परिणामस्वरुप कई संधात्मक बीमारियों भी होती है।कई कारखाने नदी, तालाब तथा सागार में अपने रासायनिक पदार्थ फेंकते है।इस से इन में बसे लाखों जीव की मृत्यू हो जाती है।
    प्रदूषण में ध्वनी-प्रदूषण भी आता है। ध्वनी-प्रदूषण लाउङस्पीकरों,वहनों तथा बैण्ङ बाजों से होती है।इस से जीवन की दैनिक कायों में परेशानी होती है।मनुष्य हमारे वातावरण को भी दूषित करता है।लोग किसी भी जमीन पर कुङा-करकट फेंक देते है।इस से पर्यायवरण की सुन्दरता नष्ट होती है।साथ ही इस के सङने पर मच्छर पैदा होते है जो बीमारियों फैलाती है।बाद में इन में से दुर्गन्ध भी आती है।
    देखा जाए तो हम चारों ओर से प्रदूषण से घिरे हूए है।इस के बारे में सोचना अनिवार्य हो गया है।पहले तो सरकार को सक्रिय आन्दोलन चलाना चाहिए। लोगों को प्रदूषण के प्रभावों से परिचित करराना चाहिए।प्रदूषण संबंधित अभीयान और गतिविधियाँ आयोजित करना चाहिए।प्रदूषण से बचने के लिए पेङ-पौधों को रोपना चाहिए। इस से प्राणवायू की मात्रा बढ सकती है। विज्ञापन के माध्रम से भी लोगों को सचेत करना चाहिए।वाहनों के क्षेत्र में कई देशों में धुआँ रहित गाङियों का आविष्कार करके का प्रयास किया जा रहा है।हमारे भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए लोगों को प्रदूषण के बारे में शिक्षित कराना अत्यन्त आवश्यक है।यही एक मात्र साधन है जिससे हमारे जीवन में परिवर्तन आ सकता है और हम उन्नति कर सकते है।

  12. teena caumul says:

    सहशिक्षा
    लड़कों और लड़कियों के सामूहिक रूप में शिक्षा प्राप्त करना सहशिक्षा है│ सहशिक्षा का एक और तात्पर्य यह है कि न केवल लड़का और लड़की एक साथ पढ़ें-लिखें बल्कि दोनों लिंगों को समान शिक्षा दें│पुराने समय में औरतों या युवतियों को शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी│इसी कारण लड़का और लड़की के अलग अलग शिक्षा केंद्र था│परन्तु आधुनिक युग में सहशिक्षा एक साधारण प्रक्रिया है│ सहशिक्षा के लाभ तो हैं ही परन्तु इससे कुछ हानियाँ भी तो उल्लेखनीय हैं│
    संसार में, पुरुष हो या स्त्री, युवक हो या युवति, वे सभी सर्वप्रथम मनुष्य हैं│मनुष्यता ही प्रथम धर्म माना जाता है│लड़का और लड़की को अलग-अलग शिक्षाएँ देकर कहीं एक-दूसरे पर अन्याय न हो जाए│सहशिक्षासे कोई अपने आप को ऊँचा या नीचा मह्सूस नहीं करता है│हरेक अपना अस्तित्व बनाता है│ विद्यालयों में निष्पक्ष भाव से सामान्य रूप में लड़का-लड़्की के बीच में शिक्षाएँ बाँटी जा रही हैं│ दोनों लिंगों को समान दृष्टि से देखा जाता है│उनके बीच में ऊँच – नीच की भावना को दूर करने के लिये सहशिक्षा आवश्यक है│
    सहशिक्षा बच्चों में प्रतियोगिता का भाव पैदा करता है│ लड़के लड़्कियों से अच्छा काम करने का प्रयास करते हैं तो लड़्कियों भी आगे बढ़्ने का कोई कसर नहीं छोड़्ती हैं│अतः वे मन लगाकर अपनी पढ़ाई में ध्यान देते हैं│ छात्र छात्राएँ सफलता पाने हेतु कड़ी परिश्रम करते हैं│अतएव सहशिक्षा इन बच्चों के अच्छे भविष्य बनाने का योगदान करती है│
    छात्र हो या छात्रा, सभी को एक ही समाज में एक साथ रहना है│ कम उम्र में ही अगर बच्चों को सहशिक्षा दें तो आगे बढ़कर तथा बड़े होकर वे सरलता से समाज में अपने आप को ढाल सकते हैं│
    एक ही वातावरण में शिक्षा प्राप्त करते समय, लड़कों-लड़कियों के बीच आदर की भावना पैदा होती है│ वे एक दूसरे को अधिक समझने लगते हैं तथा एक-दूसरे के आचार-व्यवहार से परिचित होने लगते हैं│ अत: समाज के सफल निर्माण के लिए सहशिक्षा महत्त्व्पूर्ण है│
    सहशिक्षा के दौरान लड़्का और लड़की को एक ही स्तर पर देखे जाते हैं│समान शिक्षा प्राप्त करके तथा साथ-साथ शिक्षा प्राप्त करके कोई पीछे नहीं रहता│ अपनी क्षमता पर उनकी सफलता नापी जाती है न कि लिंग के आधार पर│इस प्रगतिशील संसार में लड़्का-लड़्की कदम मिलाकर आगे बढ़ सकते हैं तथा नौकरी की दुनिया में अपनी योग्यता के बल पर अपना उचित स्थान प्राप्त कर सकते हैं│
    सहशिक्षा के लाभ होने के साथ-साथ उसकी हानि को अनदेखी भी नहीं किया जा सकता│एक ही स्कूल या कालिज में शिक्षा प्राप्त करते समय कभी-कभी लड़का-लड़की अपनी मान-मर्यादा, अपने संस्कार तथा अपनी परम्पराओं को भूलकर गलत मार्ग अपना लेते हैं│ वे अपने ब्रम्ह्चर्य आश्रम से हट्कर प्रेम-वासना में डूबने लगते हैं जओ समाज के नियमों के विरुद्ध है│इस प्रकार उनके मन पढ़ाई में कम लगने लगता है│ इस रूप में सहशिक्षा वरदान कम अभिशाप अधिक है│
    निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि एक राष्ट्र के लिये, एक समाज के लिये तथा स्वयं व्यक्ति के लिए सहशिक्षा मह्त्वपूर्ण है│अगर समाज के नियमोंका पालन करके छात्र-छात्राएँ सहशिक्षा से लाभ उठाएँ तो राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए सहशिक्षा की बहुमूल्य भूमिका होगी│

  13. teena caumul says:

    नमस्ते गुरुजी. पराजय कहानी पर आपने अपना विचार प्रस्तुत करके मैं अच्छी तरहसे इस कहनी को समझ गयी हूँ . इस कक्षा केबाद इस कहानी के मूल भाव सामने आए. शायदमैंइस दिशा की ओर नासोच पाती.धन्यवाद गुरुजी

  14. rajni jhurry says:

    मोरिशस मेँ हिंदी का योगदान

    भाषा और वाणी ईश्वर प्रद्त्त मनुष्य की सबसे बड़ी देन है। ईश्वर प्रदत्त होने के कारण वाक्शक्ति के रूप में उस वरदान की रक्षा अमूल्य रत्न समझकर भारतीयों ने की है।
    मोरिशस मेँ हिंदी की स्थिति पर विचार करते समय हमेँ उन भारतीयोँ की याद अनायास ताज़ी हो जाती है जिसके फलस्वरूप हिंदी की रक्षा हुई है। वे ही इस देश मेँ हिंदी को जीवित रखने के कर्णधार माने जाते हैँ। यह तो अपने आप मेँ गौरव की बात है कि मोरिशस अपनी पराधीनता के काल मेँ भी हिंदी भाषा, अपने प्रचारकोँ तथा साहित्यकारोँ के बिना ही पदोन्नति के पथ पर प्रशस्त कर आगे की ओर उन्मुख होती रही है। इसका प्रमुख कारण था, ह्मारे पूर्वजोँ के मन के निष्ठा-भाव एवं आत्मविश्वास।
    1835 मेँ भारतीयों का आगमन हुआ। अंग्रेज उपनिवेश के चंगुल मेँ फँसकर भी अपनी भाषा की रक्षा की। एक अनजान देश, एक अजनबी परिवेश मेँ जहाँ दासोँ के साथ अमानवीय तथा बर्बरतापूर्ण व्यवहार करना अपनी शान समझते थे, वहाँ अपना अस्तित्व बनाए रखना कितना कठिन था।
    यह भी सच है कि भारतीयोँ का आना वहाँ उस समय हुआ जबकि भारत मेँ पाश्चात्य सभ्यता का अधिक प्रभाव नहीँ पड़ा था।
    हिंदी के प्रारम्भिक सेवी भले ही अज्ञानी थे पर उन्हेँ धर्म की मौलिक गतिविधियोँ एवं भारतीय संस्कृति की प्रमुख विधाओँ और परम्पराओँ का पूर्ण ज्ञान था। वे अपने धर्म एवं भाषा के प्रति रूढ़िवादी थे। वे अपने साथ गीता, रामायण एवं उपनिषद के ग्रंथोँ को लाकर मोरिशस को पावन बनाया।
    1900 के बाद महात्मा गांधी, मणिलाल डाक्टर तथा बुद्धिजीवियोँ के आगमन से हिंदी प्रेमियोँ मेँ नयी चेतना जागी। उन्हेँ आत्मशक्ति प्राप्त हुई। अशिक्षित वर्ग इन बुद्धिजीवियोँ से विचार-विनिमय करते हुए इस नई धरती को हिंदीमय बनाने मेँ ऐतिहासिक कदम उठाया।
    1935 तक मोरिशस मेँ ‘दुर्गा’ नामक पत्रिका निकलने लगी। पत्र भी निकलने लगे। फलस्वरूप हिंदी भाषी अपने-अपने घरोँ मेँ पत्र एवं पत्रिकाएँ पाने लगे। उन्हेँ अ‍क्षरोँ का ज्ञान, पण्डितोँ द्वारा दिया जाने लगा। भारतीयोँ के आगमन की शताब्दी भी मनाई गई।
    यह सर्वमान्य है कि मोरिशस की हिंदी को प्रशस्थ कराने मेँ भोजपुरी का बड़ा हाथ है। हिंदी यहाँ भोजपुरी के रूप मेँ अवतरित हुई जो आगे चलकर अपने परिष्कृत रूप खड़ीबोली मेँ पढ़ी और लिखी जाने लगी। उन्नीसवीँ शताब्दी के आरम्भ मेँ रामायण-पाठ आदि के प्रभाव से हिंदी को नई दिशा मिली। रसपूंज जैसे कवि हुए। साहित्य के क्षेत्रोँ मेँ कार्य होने लगा जैसे कहानी, नाटक,कविता।
    हिंदी प्रचारिणी सभा तथा हिंदू महासभा और आर्य सभा जैसी प्रमुख संस्थाएँ जो इस शताब्दी के प्रारम्भ से हिंदी को जीवित रखने के लिए कार्यरत हैँ। चार दशक पूर्व इस देश को नया संविधान मिला तभी से यहाँ भारतीय भाषाओँ को मान्यता मिली। यह मान्यता डाक्टर शिवसागर रामगुलाम के अथक परिश्रम का फल था। उन्हीँ के सह्योग से सरकार ने स्वीकृति दी कि भारतीय भाषाओँ को सरकारी पाठशालाओँ मेँ पढ़ाया जाए। स्वतन्त्रता बाद यह स्थिति और मज़बूत हुई। पूरे देश मेँ तह्लका मच गया। सभी के घरोँ मेँ हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य सी हो गई। इसके पीछे भी एक लक्ष्य था, रोटी कमाने का साधन। फिर भी हिंदी सबके मन और घर मेँ वास करती थी।
    गाँव-गाँव मेँ कवि-सम्मेलन का आयोजन और वार्क्षिकोत्सव मेँ हिंदी को इतना प्रोत्साह्न मिला कि कई साहित्यकार उभरकर सामने आये। सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर साहित्यिक रचनाएँ होने लगीँ।
    मोरिशस मेँ हिंदी की स्थिति पर चिंतन करने वाले डाक्टर शिवसागर रामगुलाम के मार्ग-दर्शन एवं नेतृत्व मेँ भारत से कई साहित्यकार जैसे रामधारीसिँह दिनकर, यशपाल जैन, जैनेंद्रकुमार तथा कमलेश्वर एवं धर्मवीर भारती आदि ने मोरिशस के साहित्यकारों को प्रोत्साहित भी किया।
    यहाँ पर हिंदी के विकास के साथ-साथ दिवतीय विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करने का गौरव प्राप्त है। महात्मा गांधी संस्थान की ओर से ‘वसन्त’ पत्रिका निकलती है। हिंदी प्रचारिणी सभा की स्वर्ण जयन्ती के अवोसर पर गंगाचल पत्रिका दिल्ली मेँ मोरिशस विशेशांक छ्पी।
    आजकल प्राथमिक और माध्यमिक पाठशालाओँ मेँ हिंदी की पढ़ायी की जाती है। भारत से कई स्नातक अब हिंदी की उन्नति के लिए कार्यरत हैँ। वहाँ पर हिंदी-फिल्मोँ एवं गीतोँ पर हावी होने वाले नवजवान लाखोँ की संख्या मेँ हैँ। भले ही हिंदी से उनका सीधा सम्पर्क न हो, फिर भी गीतोँ के माध्यम से भाषा का जान तो है। साहित्यिक दिशा की ओर कई नवोदित साहित्यकार अपनी रचनाओँ को भारत की पत्रिकाओँ मेँ छ्पवाते हैँ। इसी तरह हिमाचल प्रदेश की ओर से मोरिशस विशेशांक निकालकर मोरिशस के नवोदित साहित्यकारोँ को प्रोत्साहित किया। पठन-पाठन की ओर भी छात्रोँ की रूचि कम नहीँ है।
    मोरिशस मेँ हिंदी की स्थिति गंगा की धारा-सी बह रही है, जिसकी गहराई और प्रवाह को मापना अत्यन्त कठिन कार्य है।

    750 शब्द

  15. rajni jhurry says:

    हमारी शासन-प्रणाली और नागरिकता
    एक देश मेँ रह्ने वाला हर आदमी को नागरिक कह्ते हैँ। मोरिशस हिंद महासागर स्थित एक छोटा टापू है जहाँ के सभी नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैँ।इन को अपने विचार, भाषण द्वारा या लिखित रूप मेँ, स्वतंत्रतापूर्वक प्रकट करने की छूत हैँ।इनको अपने धर्म पर आचरण करने मेँ उन्हेँ कोई रूकावट नहीँ है।संसार के चार बडे धर्मो के मानने वाले यहाँ हिंदू, मुस्लिम बौद्ध और ईसाई लोग, भाईचारे के साथ रह्ते हैँ। वे स्वत्न्त्र रूप से अपने धार्मिक उत्सव मनाने के लिए या पूजा वंदना हेतु मन्दिरोँ, मस्ज़िदोँ, विहारोँ और गिरजाघरोँ मेँ इकट्ठे होते हैँ।
    हमारे टापू मेँ संसार की सबसे प्राचीन संस्कृतियोँ के अनुयायी भारत, चीन, यूरोप और अफ्रीका से आकर बसे हैँ। वे आपस मेँ मेल-मिलाप से रह्ते हैँ और अपनी मातृभूमि मोरिशस की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए प्रयत्न करते हैँ।
    इस देश की शासन प्रणाली लोकत्न्त्रात्मक हैँ। लोकत्न्त्रात्मक राज्य मेँ जाति, वर्ण, धर्म, भाषा, सस्कृति और रीति-रिवाज़ के भेद के कारण कोई बडा या छोटा नहीँ होता। सभी को उन्नति के समान अवसर प्राप्त होते हैँ। सभी को भय और अभाव से मुक्ति मिलती है।शिक्षा पाने की और कौशल सीखने की सुविधा सभी को होती है।
    लोकतांत्रात्मक राज्य मेँ प्रत्येक नागरिक को अपनी योग्यता और शक्ति अनुसार काम करके जीविका कमाने का अधिकार होता है। अपअनी रूचि अनुसार वह अपने भोजन, कपडे और घर की व्यवस्था कर सकता है। सरकार से शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सामाजिक सेवाएँ प्राप्त करने का उसे पूरा अधिकार होता है।यदि बेकारी, बीमारी, दुर्घटना,असमर्थता, वैधव्य, बुढापे या अन्य किसी कारण की क्षमता न रहे तो उसे सुरक्षा अर्थात सरकारी सहायता पाने का अधिकार प्राप्त होता है।
    लोकत्न्त्रात्मक राज्य मेँ सत्ता नागरिकोँ के हाथ होती है। वे अपने ग्राम, नगर, जिले और देश के शासन के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैँ। इक्कीस साल से अधिक आयु वाले स्त्री और पुरूष अपनी पसंद को उम्मीदवारोँ को चुनाव मेँ मतदान कर सकते हैँ।
    ग्राम परिषद गाँव को भलाई के कामोँ मेँ योग देती है।ग्राम परिषद के सदस्य सब ग्रामवासियोँ के कल्याण के लिए परस्पर विचार-विनिमय करते हैँ। प्रत्येक सदस्य अपने विचार और सुझावा पूरी स्वतंत्रता से प्रकट करता है। निर्णय हो जाने पर उसे कार्य रूप देने का कर्तव्य सब सदस्योँ का होता है। प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्योँ का सच्चाई और ईमानदारी से पालन करता है। ग्रामवासियोँ के सहयोग से ग्राम परिषद अपने गाँव मेँ सुख, शांति और समृद्धि ला सकती है।
    ग्राम परिषदोँ के प्रधान मिल कर ज़िला परिषद का निर्वाचन करते हैँ। सिविल कमिश्नर के सरक्षण मेँ ज़िला परिषद सफाई,स्वास्थ्य, कृषि,शिक्षा आदि कार्योँ की व्यवस्था और सुधार के लिए भिन्न-भिन्न सरकारी विभागोँ से ताल-मेल रखती है।
    नगर पालिका तथा नगर निगम नगरोँ मेँ, सामाजिक सेवाओँ, शिशु-कल्याण केंद्रोँ, गृहनिर्माण, पानी, बिजली, मनोरजन और पुस्तकालयोँ आदि की व्यवस्था करते हैँ। प्रत्येक नगर भवन के समीप आग बुझाने वाले दमकल का प्रबंध होता है। नगर पालिका की आय गृहकर अथवा मनोरजन-कर आदि से होती है। केंद्रीय सरकार से अनुदान भी प्राप्त होता है।
    हमारा देश ब्रिटिश उपनिवेश है। है।ब्रिटिश सरकार ह्मारे राज्यपाल को पाँच साल के लिए नियुक्त करती है। राज्यपाल टापू का शासन चलाते हैँ। राज्यपाल विधान परिषद के सदस्योँ मेँ से मंत्री चुनते हैँ।
    विधान परिषद के चालीस सदस्योँ का पाँच साल की अवधि के लिए वयस्क मताधिकारके आधार पर चुनाव होता है। बारह सदस्य राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैँ। विधान परिषद के तीन सरकारी सदस्य भी हैँ। मोरिशस की आर्थिक, राजनैतिक,सामाजिक और सास्कृतिक उन्नति के लिए भय और अभाव दूर करने के लिए शांति की व्यवस्था के लिए विधान परिषद कानून बनाती है।यदि हम एक दूसरे की सहायता करने को तैयार रहेँ और अपने कर्तव्योँ का सच्चाई और ईमानदारी से पालन करेँ तभी हम अच्छे नागरिक बन सकते हैँ। अपने अधिकारोँ की रक्षा के लिए भी हमेँ अपने कर्तव्योँ का पालन करना चाहिए। अपना उत्तरदायित्व सम्भालना चाहिए। अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैँ। यदि मोरिशस मेँ रहने वाले सभी वर्ग एक दूसरे के हितोँ, सुविधाओँ और भावनाओँ का सम्मान करेँ तभी हम सबका जीवन सुखी बन सकता है। जैसा व्यवहार ह्म अपने लिए नहीँ चाहते वैसा हमेँ दूसरोँ के साथ कभी नहीँ करना चाहिए। सबके सबके सुख मेँ अपना सुख मानना,लोक कल्याण के लिए अपने स्वार्थ को त्यागना, यही सच्ची नागरिकता है। सच्ची नागरिकता द्वारा ही एक देश महान बनता है।
    702 शब्द

  16. neelam says:

    नमस्ते गुरुजी,
    assignment के लिए मैं, Neelam Rajcoomar दो रिपोर्ट भेज रही हूँ।

    ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ के ३५वीं वर्षगांठ

    २० जून २०११ को ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ के ३५वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में कॉलेज के सभागार में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम को सफलता पूर्वक अंजाम देने में श्री तोरल जी का विशेष सहयोग रहा और अन्य अध्यापकों, छात्रों एवं कर्मचारियों ने भी अपना योगदान दिया।

    इस अवसर पर ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ की प्रवर्तिका श्रीमति हसीना देवी को विशेष आमंत्रण दिया गया। साथ ही साथ कॉलेज के सभी छात्रों, शिक्षकों एवं कॉलेज के कर्मचारियों को भी आमंत्रित किया गया। ठीक दस बजे कॉलेज के सभागार में सांस्कृतिक कार्यक्रम आरंभ हुआ और लगभग बारह बजे समाप्त हो गया। सबसे पहले हिन्दी अध्यापिका, सोनाली जी ने सभी उपस्थित लोगों का स्वागत किया। फिर श्रीमति हसीना देवी एच. एस. सी के दो छात्रों के साथ मिलकर कार्यक्रम को आरंभ करने हेतु दिये जलाए। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी संस्कृति कहती है कि किसी भी काम की शुरुआत करने से पहले भगवान का नाम लिया जाता है।

    उसके बाद सोनाली जी ने ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ के ३५वीं वर्षगांठ के लिए दो शब्द कहे और कार्यक्रम को जारी रखा। इस उपलक्ष पर कई छात्रों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। भाग लेने वालों में फोर्म फ़ौर, एस.सी, एच.एस.सी आदि छात्र रहे। कार्यक्रम के अंतर्गत वंदना की गयी, कविता पाठ हुई, गीत गाये गए, एस.सी के छात्रों द्वारा कृष्ण के रासलीला संबन्धित नृत्य प्रस्तुत किए गए, मराठी सीखनेवाले छात्रों द्वारा एक नाटक प्रस्तुत किया गया, एच.एस.सी के छात्रों द्वारा विभिन्न भाषाओं में एक गीत गाये गए।

    कॉलेज के इन छात्रों को इतनी निपुणता से अपनी कला का प्रदर्शन करते देखकर सभागार में उपस्थित सभी लोगों के मन गदगद हो रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति को इस बात का गर्व हो रहा था कि वह ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ का एक हिस्सा है। कार्यक्रम की समाप्ति पर सभी का सत्कार जूस और मिठाई से हुई। फिर सभी छात्र अपनी-अपनी कक्षा में प्रस्थान कर जाते हैं।

    इस प्रकार ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ के ३५वीं वर्षगांठ के सांस्कृतिक कार्यक्रम को सफलता प्राप्त हुई। सभी लोगों के मुख से इस कार्यक्रम के लिए केवल प्रशंसा ही निकल रही थी। इस तरह ‘हिन्दू गर्ल्स कॉलेज’ में न केवल पुस्तकीय ज्ञान अर्जित किया जाता है बल्कि कला एवं संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है। विभिन्न भाषाओं का प्रचार-प्रसार भी होता है। इस प्रकार यहाँ छात्रों का सम्पूर्ण विकास होता है।

    ‘हल्दी’ पर एक रिपोर्ट

    शनिवार का दिन था। २० अगस्त २०११ के शाम के साढ़े छः बजे थे। मैं अपने माता-पिता के साथ न्यू ग्रोव में बसे श्री रघुनाथ जी के यहाँ हल्दी में गया था। वहाँ कितने ही मेहमान आए थे। सभी सुंदर और खुशबूदार कपड़े पहने हुए थे। पंडाल लगभग भर गया था फिर भी और मेहमान आ रहे थे। दैवी विघ्नों को दूर करने के लिए पुरोहित जी यज्ञ कर रहे थे। मेहमान आपस में आपबीती सुना रहे थे।

    वर के साथ उसकी माता भी यज्ञ में भाग ले रही थी। वर ने एक सफ़ेद कुर्ता पहना था और विवाह के इस प्रथम अनुभव के लिए अपने आपको तैयार कर रहा था। यज्ञ के बाद प्रसाद बाँटा गया। फिर हल्दी विधि आरंभ हुई।

    परंपरा के अनुसार पहले पिता ने वर के सिर, भुजाओं, घुटनों और पैरों पर कुश के गुच्छे से हल्दी चढ़ाई। उसी समय कुछ वृद्धाएँ हल्दी का गीत गाने लगीं –

    “सोने के कटोरवा में पिसल हल्दिया हो,
    पहले बाबा चढ़ावेलन, पाछे सज्जन सब लोग,
    सिर से चढ़य बाबा, अंग से उतरय,
    हृदय से दिय आशीश हो’’

    बाबा के उपरांत हित-मित्र और रिशतेदारों ने बारी-बारी से हल्दी चढ़ाई। अंत में मेहमानों को भोजन से सत्कार किया गया। शादी का खाना सचमुच बहुत अच्छा लगा।

    हम साढ़े आठ बजे वहाँ से प्रस्थान हुए। घर पहुँचकर हमने हाथ-पैर धोये और सोने चले गए।

  17. rajni jhurry says:

    नमस्ते गुरूजी, मेरा आखरी कार्य आप को भेज रही हूँ। 3 निबन्ध संख्या 2000 शब्द-

    प्रदूषण- आज की बढ़ती हुई समस्या

    प्रदूषण का अग्रेज़ी रूपांतर पोल्यूशन है। अग्रेज़ी कोश के अनुसार ‘pollution is a term used to refer to the destruction of the purity of our surroundings and the contamination of the environment’ अर्थात् ‘प्रदूषण का तात्पर्य हमारे इर्द-गिर्द की पवित्रता को नाश करना और पर्यावरण मेँ गन्दगी फैलाना है। प्रदूषण कई प्रकार के होते हैँ जिनमेँ वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, ध्वनि-प्रदूषण, मिट्टी- प्रदूषण आदि उल्लेखनीय हैँ।

    प्रदूषण कोई आज की समस्या नहीँ है। इतिहास के शुरुआत से ही उसका अस्तित्व है| जिस दिन से मानव ने खाना पकाने के लिए अग्नि की खोज की और अपने वस्त्र नदी मेँ धोने लगे, उस दिन से प्रदूषण का जन्म हुआ। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ-साथ आज प्रदूषण इक्कीसवीँ शताब्दी की एक ज्वलंत समस्या बन गई है।

    ह्मारे देश का हरेक नागरिक अपने पर्यावरण के खतरोँ, समस्याओँ और बदलते तापमान से अवगत हैँ। कहना न होगा कि प्रदूषण के कुप्रभाव से ही आकाश की ‘ओज़ोन’ की परत मेँ छेद हो गयी है जिससे गरमी बढ़ गई है। कड़ी धूप से मनुष्य चर्म-रोग के शिकार हो रहे हैँ। उधर वनोँ को काट गिराकर मनुष्य प्राणवायु को कम करके खूद को हानि पहुँचा रहे हैं।

    औधोगिकरण के माया-जाल मेँ पड़कर कई कारखाने अपने रसायनिक पदार्थोँ से समुद्र को अपवित्र कर रहे हैँ। इन गम्भीर विषमताओँ से लोग भली-भाँति परिचित हैँ फिर भी वे प्रतिदिन तथा प्रतिपल ह्मारे इस स्वर्ग से मोरिशस को पतन की ओर ले जा रहे हैँ। दुर्भाग्य की बात है कि वे जाने-अनजाने अपनी प्राकृतिक विरासत को खोते जा रहे हैँ।

    हाल मेँ चिकुंगुन्या नामक जानलेवा रोग देश मेँ अपना डेरा बना लिया था। चिकुंगुन्या गंदे पानी मेँ उत्पन्न मच्छरोँ से होता है। भारी बरसात के कारण जगह-जगह पर पानी जमा हो जाता है। कई दिनोँ तक इसका निकास नहीँ होता है तो वह पानी गंदा हो जाता है और उसमेँ कीटाणु और मच्छर पैदा हो जाते हैँ। यही मच्छर लोगोँ को काट लेता है और लोग चिकुंगुन्या-ग्रस्त हो जाते हैँ।

    आजकल लोग सरल जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैँ। नवीन उपकरणोँ के प्रयोग से वे मशीनीकरण के हमसाथी बन गए हैँ। हर कोई अपने लिए व्यक्तिगत वाहन या घरेलू कल चाहता है। मनुष्य यह भूल जाता है कि एक तरफ़ विज्ञान की ये देन सुविधाजनक हैँ तो दूसरी तरफ़ ये हानिकारक भी हैँ। गाड़ियोँ से प्रतिदिन धुँए निकलते हैँ जो हमारे वायु-मंडल को अपवित्र करते हैँ। कारखानोँ के धुँए भी वायु- प्रदूषण बढ़ाने में साथ देते हैँ।

    प्रदूषण के कुपरिणामोँ से अवगत होकर ही सरकार ने इस घोर समस्या पर नियंत्रण पाने-हेतु कई आवश्यक कदम उठाये हैँ । एक विशिष्ट मंत्रालय स्थापित कर सरकार ने पर्यावरण को दूषित न करने का अभियान चलाया है। आज यह मंत्रालय हाथ पर हाथ धरे नहीँ बैठा है, अपितु वह हर प्रकार से कार्यरत है। वह प्रतिरोज़ चेतना अभियानोँ के माध्यम से गाँवोँ और शहरोँ मेँ सफाई और स्वास्थ्य का नारा लगा रहा है। यह करने से वह लोगोँ को प्रदूषण की हानियोँ से सचेत करा रहा है। इसके अंतर्गत लोगोँ के मन में सफाई की भावना जागृत की जा रही है।

    संचार के मह्त्वपूर्ण साधनोँ का सहारा लेकर प्रदूषण पर रोक लाने का प्रयत्न किया जा रहा है। टीवी, रेडियो और समाचार पत्रोँ द्वारा सूचनाएँ प्रसारित की जा रही हैँ। अत: संचार के माध्यम से ही देश के कोने-कोने मेँ साफ-सुत्रा रहने की सलाह और रोग-निवारण के उपचार दिये जा रहे हैँ। कूड़ा-कड़कट यहाँ-वहाँ न फेँककर कूड़ेदानोँ का प्रयोग हो इसलिए जगह-जगह कूड़ेदान बाँटे गए हैँ। पर्यावरण मन्त्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में गाँवोँ और शहरोँ की खास सफाई भी होती है।

    प्रदूषण जैसी ज्वलंत समस्या को दूर करने के लिए जनता को एकता के साथ कदम बढ़ाना होगा। पवित्रता और सफाई खूद से और खूद के घर-माहौल से शुरू होती हैं, फिर समाज से, देश से और फिर विश्व से।एक स्वच्छ और स्वस्थ समाज ही शान्ति और खुशी कायम रखता है।

  18. Lutchmun Lajwantee says:

    नमस्ते गुरुजी। मैं ए. सी. ई की छात्रा, Lutchmun Lajwantee हूँ। आप की रिपोर्ट वाली कक्षा बहुत ही रोचक थी। मैं निबंध और रिपोर्ट पर अपनी Assignment भेज रही हूँ।
    दीपावली :
    त्योहार ह्मारे सुख और उल्लास के प्रतीक हैं, जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रूप और आकार में भिन्न होते हैं। ये संस्कृति के पेहरेदार हैं और समाज के प्राण हैं। त्योहार मनाने का अभिप्राय आनन्द प्राप्ति या किसी आस्था का संरक्षण होता है। सभी त्योहारों से कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी हुई है और इन कथाओं का सम्बन्ध अधिकतर आस्था से होता है। त्योहारों में दीपावली का स्थान सबसे ऊँचा है।
    दीपावली का अर्थ है, दीपों की पंक्ति। यह दीपों का त्योहार है। दीपावली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। दीपावली नाम से स्पष्ट है कि इस पर्व पर स्थान-स्थान पर दीये जलाए जाते हैं। वस्तुत: दीपावली की रात को प्रत्येक गाँव और शहर दीपकों, मोमबत्तियों और बिजली के बल्बों के प्रकाश से जगमगाते हैं। दीपावली का यह पर्व प्रति साल कर्तिक मास की अमवस्या को मनाया जाता है।
    इस महान पर्व के साथ अनेक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। रामभक्तों के अनुसार विजयादश्मी को रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् चौदह साल का वनवास पूर्ण हो जाने पर श्रीराम, लक्ष्मण, और सीता इसी दिन अयोध्या लौटे थे। तब भारत, शत्रुघ्न आदि के साथ सभी अयोध्यावासियों ने खुशियाँ मनाई थीं और राम का राज्यभिषेक हुआ था। उस खुशी को प्रकट करने के लिए दीयों से घरों को कई दिनों तक रात को सजाते रहे। उसी घटना की स्मृति में लाखों सालों से दीपावली की रात को दीपक जलाए जाते हैं।
    कृष्ण भक्तों की मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और लोगों ने प्रसन्न्तापूर्वक घी के दीये जलाए। यह भी माना जाता है कि विष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकशिपु का वध किया था और प्रह्लाद की रक्षा की थी।
    हिंदुओं का विश्वास है कि इसी रात को लक्ष्मी नंगे पाँव बाहर आती है। वे सभी घरों को देखती हैं। जो घर ठीक से सजा सजाया होता है वे उसी घर को अपना निवास स्थान बनाती है। इसी से सभी अपने-अपने घरों को अपनी शक्ति के अनुसार सजाते हैं ताकि लक्ष्मी उसके घर को ही अपना बनाकर रहे।
    दीपावली के दिन ही आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द ने भी अपना भौतिक शरीर छोड़ा था। इस दिन को ऋषि निर्वाण दिवस भी कहा जाता है। दीपावली पुराण, धर्म और संस्कृति तीनों को अपने में सजाकर प्रतिवर्ष हमारे बीच आती है।
    दीपावली पर्व की तैयारी विजयादश्मी से ही आरम्भ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकनों आदि की सफ़ाई तभी से शुरू करते हैं। घरों में मरम्मत और रंग का कार्य होने लगता है। बाज़ारों की गलियों को भी सुनहरी झंडियों से सजाया जाता है। दीपावली से पह्ले ही घर-आँगन, बाज़ार सब साफ़-सुथरे और सजे- धजे नज़र आते हैं। लोग नए-नए वस्त्र सिलवाते हैं।
    दीपावली से दो दिन पूर्व धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन बाज़ारों में काफ़ी चह्ल-पहल होती है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा और भीड़ दिखाई देती है। इस दिन बरतन खरीद्ना शुभ माना जाता है। इस दिन घी के दीये जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। अगले दिन नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली होती है। इस दिन एक दीपक में सरसों का तेल और पाँच अन्न के दाने डालकर घर की नली की ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यमदीपक कहलाता है।
    तीसरे दिन अमावस्या को दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पकवान पकाए जाते हैं। घर-घर में सुंदर रंगोली बनायी जाती है। बाज़ारों में मिठाइयाँ और लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ बिकने लगती हैं। स्थान-स्थान पर आतिशबाजी और पटाखों की दुकानें सजी होती हैं। सुबह से ही लोग पास-परोसों, रिश्तेदारों और मित्रों के घर मिठाइयाँ बाँटते हैं। एक दूसरे को दीपावली की बधाई दी जाती है।
    दीपावली की शाम लक्ष्मी और गणेश जी की पूजा की जाती है। पूजा के बाद लोग अपने-अपने घरों के बाहर दीपक जलाते हैं। चारों ओर चमकते दीपक अतयंत सुन्दर लगते हैं। रंग-बिरंगे बिजली के बल्बों से बाज़ार और गलियाँ जगमगा उठती हैं। बच्चे तरह-तरह के पटाखे और आतिशबाज़ियों का आनन्द लेते हैं। कार्तिक की अँधेरी रात पूर्णीमा से भी अधिक प्रकाशमान दिखाई पड़ती हैं।
    दीपावाली का त्योहार सभी तरह से आदर्श है। यह त्योहार अंधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। लोगों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है और झूठ का नाश होता है। दीपावली समाज में उल्लास, भाई-चारे और प्रेम का संदेश फैलाता है। सभी त्योहारों में दीपावली सामाजिक और धार्मिक दोनों दृषिट से महत्वपूर्ण हैं।

    समाचार-पत्र :
    सूचनाओं के इस महादौर में सब कुछ तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। समाचार हो या अन्य कोई जानकारी, सभी तेजी से आँखों के आगे से निकल रही है। सिर्फ़ पलक झपकने की देरी है। तुरंत नई जानकारी, सूचना, संदेश या समाचार इंटरनेट के द्वारा कम्प्यूटर स्क्रीन पर या मोबाइल पर आ जाते हैं। टीवी समाचार चैनल भी समाचारों को दिखाने में इतनी ही तेजी दिखा रहे हैं। समाचार, सूचना और संदेश देने के लिए केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया ही अकेले नहीं हैं बल्कि प्रिंट मीडिया भी अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। प्रिंट मीडिया का सबसे शक्तिशाली माध्यम समाचारपत्र है।
    समाचारपत्र समाचारों पर आधारित एक प्रकाशन है। इसमें मुख्यत: ताजी घटनाएँ, खेल-कूद, व्यक्तिव, राजनीति, विज्ञापन की जानकारियाँ आदि छपी होती हैं। समाचार पत्र संचार के साधनों में मह्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
    समाचार पत्र का जन्म इट्ली में हुआ था। यह ‘द रोमन एक्टा’ से जाना जाता है। जूलिएस सीसर ने जनता को सामाजिक और राजनैतिक घटनाओं से अवगत कराने के लिए यह पत्र निकाला था। इंग्लेंड में इसका प्रारम्भ रानी एलिजाबेथ के समय में हुआ था। भारत में इसका जन्म अंग्रेजों क्र आगमन के बाद हुआ था। मोरिशस में चीनियों द्वारा १९३२ में ‘द चायनीज देयली न्यूज़’ का प्रकाशन हुआ। उसके बाद भारतीय मजदूरों द्वारा ‘द आदवान्स’ निकाला गया।
    समाचार पत्र के विभिन्न रूप हैं। दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक, वार्षिक आदि। समाचारों के प्रकाशन के लिए एक संगठन की आवश्यकता होती है। इसमें पत्र चालक, मुद्रक, प्रकाशक, सम्पादक आदि सभी होते हैं। संवाददाता नारद के समान सभी जगह जा सकता है और सभी प्रकार की खबरें प्राप्त कर सकता है।
    अधिक जानने के लिए ही मनुष्य ने समाचार पत्र को पहले पह्ल निकाला होगा। आज तो वह ऐसा छा गया है कि इसके बिना रह्ना कठिन है। सवेरे उठकर लोग भगवान का नाम लेना भूला जाते हैं पर अखबार का नाम लेना नहीं भूलते हैं। यदि सवेरे समाचार पत्र किसी कारण नहीं मिला तो सब कुछ उलट-पलट लगता है।
    समाचार पत्र एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा घर बैठे-बैठे ही हम सब कुछ जान सकते हैं। देश-विदेश में कुछ भी हो सभी घटनाएँ हमें समाचार पत्र से शीघ्र ही ज्ञात हो जाता है। दिन-प्रतिदिन इसका क्षेत्र व्यापक हो रहा है। किसी बालक गुम हो गया हो, तो उसकी सूचना भी फोटो सहित समाचार पत्रों में रहती है। शादी, तलाक, परीक्षा, नौकरी आदि की सूचनाएँ भी निरंतर छापी जाती है। लोगों के भाषण, लेख, खेल-कूद, होलिवूद, बोलिवूद आदि सभी खबरें तथा सूचानाएँ भी हमें घर बैठे समाचार पत्रों द्वारा प्राप्त हो जाती है।
    आज समाचार पत्र का एक विशेष स्थन है। इसका व्यवसाय इतना बढ़ चला है कि लाखों व्यक्ति इससे अपनी रोटी कमाते हैं। समाचार-पत्रों के मालिक बडे प्रभावशाली बन गए हैं। सभी समाचार पत्रों के लेखों से भयभीत रहते हैं। यह चाहे तो हाथी को चींटी बना दे और चींटी को हाथी, मूर्ख से मूर्ख को कभी ज्ञान की अंतिम सीढ़ी पर बैठा दे या विद्वान से विद्वान को भी मूर्खों की अंतिम श्रेणी में ला पटके।
    जिस देश में समाचार-पत्र जनता के प्रतिनिधि हैं, वहाँ अत्याचार के लिए तनिक भी स्थान नहीं हैं। ये सच्चाई के साथ सभी उलझी एवं सुलझी बातें जनता के सामने रखते हैं और इसा तरह सरकार तथा अन्य संस्थाओं को मनमानी करने से रोकते हैं। ये ठीक समय पर सही सूचनाओं द्वारा अनावाश्यक उलझनों से देश और समाज को बचाते हैं। पर जहाँ सच्चाई कमज़ोर पड़ जाता है, स्वार्थ का बोलबाला है, वहाँ समाचारपत्र अनर्थ कर रहे हैं। उलटी-सीधी खबरें छाप जनता को गुमराह करते हैं और इस तरह देश तथा समाज को परेशान करते हैं।
    बहुत से देशों में अजादी की जंग में समाचार पत्र आजादी के जाँबाजों का एक माध्यम और हथियार था जो उन्हें लोगों और घटनाओं से जोडो रखता था। इन पत्रों ने युवाओं को आज़ादी की लड़ार्ई में अधिक-से-अधिक सहयोग देने का आहान किया। इस से लोगों को हिम्मत मिलती थी। क्रांतिकरियों का एक-एक लेख जनता में स्फूर्ति उर देशभक्ति की भावना जागती थी। समाचार-पत्रों से ही देश की सही स्थिति का ज्ञान होता है। अगर किसी देश को जानना है तो समाचार पत्र पढ लिए जाए। शीशे की तरह देश की तस्वीर सामने आ जाएगी। एक कवि का कहना है:
    खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो।
    जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो॥

    संगति :
    संगति का अर्थ है – साथ करना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। यदि उसे अकेले छोड़ दिया जाए तो उसका जीवन भार हो जाएगा, नीरस बन जाएगा। यह बात ठीक है कि वह इस दुनिया में अकेला आता है और मरता भी अकेला है पर जीवन में वह साथियों की खोज में रहता है और उन्हें पाकर संतोष और शान्ति का अनुभव करता है।
    व्यक्ति जैसे लोगों की संगति में रहता है उसमें उसी प्रकार के गुण प्रकट होने लगते हैं। अच्छे लोगों की संगति उसे सद्गुणों से युक्त करती है और बुरे गुणों की संगति से उसमें दुर्गुण उत्पन्न होने लगते हैं। अच्छी संगति हुई तो समझो जीवन सुधर गया और यदि कहीं बुरी संगति हुई तो सर्वनाश ही समझना चाहिए। कहा जाता है कि खरबूजा खरबूजे को देखकर रंग बदलता है।
    यदि हमारे मित्र ऐसे हैं जो बहुत ही बुद्धिमान,पढ़ने में अत्यंत रूचि रखनेवाले तथा माता-पिता एवं गुरुजनों के आज्ञाकरी हैं तो निश्चित रूप से एक दिन हम भी ऐसे ही बन जाएँगे। लेकिन यदि हमारे साथी आवारा, गाली देनेवाला तथा झगड़ालू स्वभाव के हैं तो हम भी गालियाँ देने में संकोच नहीं करेंगे। एक अच्छे आदमी का साथ बुरे को भी अच्छा बना देता है और बुरे का साथ अच्छे को भी बर्बाद कर देता है। हमारे चारों ओर जिस तरह का वातारण होगा उसी में हम अच्छे और बुरे व्यक्ति के रूप में ढल जाएँगे।
    संसार में मनुष्यों की अनेक श्रेणियाँ हैं। उन स्भी श्रेणियों को दो वर्गों में रखा जा सकता है – सज्जन और दुर्जन। दुर्गुणोँसे युक्त लोग दुष्ट स्वभाव वाले दुर्जन कहलाते हैं। दुर्जनों की संगति कुसंगति कहलाती है। सज्जन लोगों में विद्या, दया, उपकर की भावन, नम्रता, सुशीलता, प्रेम आदि उत्तम गुण पाए जाते हैं। ऐसे लोगों की संगति में रहने से ऐसे ही गुणों का उदय होता है।
    सत्संग के प्रभाव को झुठलाया नहीं जा सकता है। सत्संग में गुण है, सफलता है और जीवन को सुखमय बनाने की अद्भुत क्षमता है। सत्संगति का आश्रय पाकर ही रत्नाकर डाकू आदि कवि महर्षि बाल्मीकि बन गए। वे ‘मरा…मरा’ कहते हुए ‘राम…..राम’ कहने लगे और रामायण जैसे महाकाव्य की रचना की। इसी प्रकार अंगुलिमान डाकू महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आकर भयंकर हत्यारे के भाव को छोड़कर बोद्ध-भिक्षु बन गया था।
    श्रेष्ठ जनों के वचन सुनने से मनुश्य के स्वभाव और वाणी में भी श्रेष्ठता आता है। वाणी से मन की अभिव्यक्ति होती है। भाषा मुँह से वैसे ही निकलेगी जैसा मन में भाव होगा। कुसंगति में पड़कर मनुष्य राम से रावण बन जाता है। कुएँ पर रखा हुआ पत्थर भी रस्सी के आने जाने से घिस जाता है। दुष्ट लोगा दुर्व्यसनों में फँसे होते हैं। जुआ खेलना, शराब पीना, दीन-दुखियाँ को पीड़ित करना, धोखा देना, झूठ बोलना आदि दुर्गुण उनके स्वभाव में मनुष्य में ऐसे ही दुर्गुणों का उदय होता है और शिष्ट समाज में ऐसे लोगों की कदापि मान-प्रतिष्ठा नहीं होती। जीवन दुर्गुणों के जाल में ऐसे उलझ जाता है कि चाहते हए भी उन से पिछा नहीं छूट सकता।
    कुसंगति से इश्वर भक्ति के विपरित चिंतन होने लगता है। यही चिंतन मनुष्य के मन में सांसारिक रसों के प्रति आसक्ति प्रकट कर देता है और फिर कामना की पूर्ति न होने पर मोह उत्पन्न होने लगता है। मोह ग्रसित व्यक्ति की स्मृति भ्रष्ट हो जाती है जिसके कारण उसकी बुद्धि कर्त्तव्य का विवेक न होने के कारण उसका सर्वनाश कर देती है।
    यह परिणाम निकाला जा सकता है कि सत्संगति से मनुष्य उन्नति कर सकता है और कुसंगति से वह अवनति की गोद में गिर जाएगा। मनुष्य को सदा श्रेष्ठ पुरुषों की ही संगति करनी चाहिए।
    दुर्घटना :
    फ़्लाक ज़िले के लालमाटी गाँव में नशे और रफ़्तार के मिलने का सबब सामने आया। शनिवार २९ अक्टूबर २०११ की रात को नशाखोरी मौत बनकर आयी। रोयल रोड पर एम.सी.बी बैँक के सामने एक तेज़ वैन अनियंत्रित होकर विपरित दिशा से आ रही एक कार से टकरा गयी। टक्कर इतनी भयंकर थी कि गाड़ी का इंजन टूटकर सड़क पर आ गया। वैन अपनी जगह पर कई बार घुम गयी और रास्ते के किनारे पलट गयी।
    सूचना पाकर पुलिस तुरन्त घटनास्थल पर पहुँची। आसपास के लोग वहाँ जमा हो गए। वरिष्ठ पुलिस अधिकरी ने सम्वाददाताओँ को बताया कि वैन में फंसे लोगो को ग्रामीणोँकी मदद से पुलिस ने उन्हेँ बाहर निकाला। इस दर्दनाक हादसे में कार में सवार चार लोग जो एक ही परिवार के थे और वैन के चालाक की मौके पर मौत हो गयी। वैन में सवार बाकि चार लोगोँ को गम्भीर चोटेँ आयी हैं। मृतकोँ में दो पुरुष, एक महिला और दो बच्चे थे। पुलिस ने घायलोँ को इलाज के लिए फ़्लाक अस्पताल में भर्ती कराते हुए शवोँ को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। घायलोँ की हालत नाज़ुक होने के कारण उन्हेँ आईसीयू में रखे गए हैं।
    मृतकोँ की पहचान हो गयी। प्राप्त जानकारी के अनुसार कार में सवार ‘बेलवेदेर’ के यश जीबन(३५), उसकी पत्नी नीतीश(३०), और उसके दो बेटे जीतेश(७), सहील(४) ‘बागातेल माँल’ से घूमकर घर जा रहे थे। वैन में वैन का ड्रायवर जय बेणी(३०) और उसके दोस्त आशीष बिहारी(२५), विशेष तिलकधारी(२७), चन्दन मंगर(२५) और रवि सीगोपोल(२२) थे। वैन में सवार सभी नशे में धुत थे। पुलिस ने बताया कि कार जय बेणी की थी और वह अपने दोस्तोँ के साथ ‘दीस्को’ जा रहे थे।
    दुर्घटना के बाद कार के भीतर से शराब की बोटलेँ मिलीँ। पुलिस ने कार और वैन को अपने अधिकार में लिया है। मामले की जाँच जारी है। इस ह्र्दय विदारक हादसे के बाद पूरे इलाके में सनसनी फैल गायी है।

  19. luchmun indranee says:

    ASSIGNMENT 1

    निबन्ध : आज की युवा पीढ़ी

    आज की युवा पीढ़ी उर्जा, खुशी और बदलाव का प्रतीक है। वे हमेशा चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर रहते हैं। युवा पीढ़ी हमारे देश का भविष्य है। हमारे सुनहरे भविष्य के निर्माण में उनका भारी योगदान है। वे बहुत ही आत्मविश्वासी हैं। अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए वे कड़ी परिश्रम करने से पीछे नहीं हटते। वे हमेशा खुलकर नये विचारों तथा सोच का स्वागत करते हैं। चाहे शिक्षा, चिकित्सा, पर्यावरण, विज्ञान या टेक्नोलोज़ी हो, आज की युवा पीढ़ी हर क्षेत्र में अपनी कला का प्रदर्शन कर रही है।

    आज की युवा पीढ़ी टेक्नोलोज़ी की उपज है। टेक्नोलोज़ी के बिना उन का जीवन निरर्थक है। कंप्यूटर का क्षेत्र जिस तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, उसी तेज़ी के साथ हमारे युवक भी प्रगति की राह पर अग्रसर हो रहे हैं। हर युवक टेक्नोलोज़ी से जुड़ा रहना चाहता है इसीलिए वे किसी भी माध्यम से कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख रहे हैं। कंप्यूटर का प्रयोग हर तरफ किया जा रहा है। युवकों के शिक्षण में कंप्यूटर का भारी योगदान है। इन्टरनेट के ज़रिए वे अपनी पढ़ाई से जुड़े खोज कार्य स्वयं कर लेते हैं। इसीलिए वे मात्र पुस्तकीय ज्ञान पर ही निर्भर नहीं रहते हैं, अपितु वे दुनिया भर की जानकारियाँ भी रखते हैं। साथ ही, आज की युवा पीढ़ी अन्धविश्वासी नहीं है। वे जाति और धर्म में भेद भाव नहीं करते हैं। उन के लिए स्त्री और पुरुष एक समान है। अत: इस विचारधारा को अपनाते हुए वे देश तथा समाज का कल्याण करते हैं।

    जहाँ एक ओर कंप्यूटर युवकों के लिए वरदान है, वहीं दूसरी ओर अभिशाप सिद्ध हो रहा है। पढ़ाई के बहाने युवक नेट पर अश्लीन तस्वीर तथा फिल्म भी देख रहे हैं जिस का कुप्रभाव उनके जीवन में पड़ रहा है। वे ऐसे कार्य कर जाते हैं जिन के लिए उन्हें जीवन भर पछताना पड़ता है। लड़कियाँ कम उम्र में गर्भवती हो जाती है जिस से उन का भविष्य अन्धकारमय हो जाता है।

    प्राचीन काल और आधुनिक समय की वेशभूषा में बहुत अन्तर है। आज की युवा पीढ़ी जिस प्रकार से सजते सँवरते हैं, वे लोग न स्वयं का और न दूसरों का ही आदर करते हैं। वे लोग अपने शरीर के लिए सदैव कसे हुए चुस्त कपड़े पहनते हैं। ऐसे भी युवक हैं जो अपनी सारी कमाई महंगे-महंगे कपड़े, सूट-बूट आदि में खर्च कर देते हैं। वे पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यता से इतना प्रभावित होते हैं कि वे लक्ष्यहीन हो जाते हैं। उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य “खाओ पीओ और मौज उड़ाओ” बन जाता है। वे न बड़ों का और न छोटों का मान करते हैं। वे वृद्धजनों के सामने धूम्रपान करने से हिचकिचाते नहीं हैं। ऐसे भी युवक है जो दिन-रात नशा-खोरी करते हैं। इस का कुप्रभाव हमारे समाज पर पड़ता है। इसीलिए देखा जा रहा है कि आज की युवा पीढ़ी उत्तरदायित्व अभिभावक नहीं है। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वे भौतिकता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। उनकी लापरवाही के कारण उन के गृहस्थ जीवन में उथल-पुथल मच जाती है, जिस के कारण बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

    निष्कर्षत: कह सकते हैं कि युवक एक ऐसी खुली किताब के समान है जिस के हर पन्ने पर सियाही से उनके हरेक अनुभव को लिपिबद्ध किया जा सकता है। जहाँ एक ओर आज की युवा पीढ़ी बहुत ही जिज्ञासु और स्वालम्बी है, कुछ कर दिखाने की क्षमता रखते हैं। वे हर क्षेत्र में निपुन हैं। वहीं दूसरी ओर वे भावुक होकर कभी-कभार गलत राह अपना लेते हैं। फैश्यन के नाम पर वे इतने अन्धे हो जाते हैं कि मित्रों तथा विज्ञापन से प्रभावित होकर वे हिंसा करने पर उतर आते हैं। युवकों को सही राह दिखाने का उत्तरदायित्व हरेक नागरिक पर है। समय- समय पर नैतिक मूल्यों पर प्रचार करना चाहिए। ऐसा करने से न सिर्फ उनका भविष्य उज्जवल हो जाएगा अपितु देश का भी हीत होगा।

  20. luchmun indranee says:

    ASSIGNMENT 2

    वायु प्रदूषण मानव जाति के लिए एक खतरा

    आज के युग में मानव जाति के लिए सब से बड़ा खतरा वायु प्रदूषण है। प्रदूषण का अर्थ है- प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना और न शुद्ध वातावरण मिलना। प्रदूषण कई प्रकार का होता है, जिन में प्रमुख हैं- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण। वायु प्रदूषण औद्योगिक क्षेत्रों में कारखानों, मिलों आदि द्वारा छोड़े जाने वाले धुएँ से उत्पन्न होता है। स्वास्थ्य और जीवन के लिए यह एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है।
    इन्सान तथा कोई भी जीव भोजन के बिना कुछ दिन जीवित रह सकता है, पानी के बिना कई घण्टे जीवित रह सकता है किन्तु साँस के बिना कुछ मिनट ही जीवित रह पाएगा। जीने के लिए आक्सीजन जरूरी है अर्थात शुद्ध वायु जरूरी है। पर यह शुद्ध वायु है कहाँ? बसों, कारों, मोटर साइकिलों, हवाई जहाज़ों तथा कारखानों के धुएँ से वायु प्रदूषित होती है। केवल यही नहीं, गावों और शहरों में लोग जहाँ- तहाँ कूड़ा- करकट, अधसूखे घासफूस, पत्तियाँ, लकड़ी, कागज़, प्लास्टिक, टायर आदि जलाकर ज़हरीला धुआँ फैलाते हैं। प्लास्टिक शीघ्र नष्ट नहीं होता और इस के जलने से वायु अत्यन्त ज़हरीली बन जाती है। कुछ लोग सार्वजनिक स्थलों, बसों आदि में धूम्रपान करते हैं। यह तो धूम्रपान करने वाले के लिए हानिकारक है ही पर साथ ही जो धुआँ वह छोड़ता है, पास बैठे अन्य लोगों के लिए घातक सिद्ध होता है। इस से लोगों को खाँसी, सिरदर्द तथा साँस लेने में कठिनाई तक होती है। धूम्रपान करनेवाले व्यक्ति को तो कोई विशेष बीमारी नहीं होती है लेकिन उस के आसपास के लोगों को परेशानी होती है। क्योंकि धूम्रपान करनेवाला व्यक्ति तो शुद्ध आक्सीजन के साथ सिगरेट पीता है और अशुद्ध कार्बन-डाई-आक्साइड के साथ निकोटिन ज़हर हवा में छोड़ता है जिसे अन्य लोगों को साँस में निगलना पड़ता है, जो अत्यन्त हानिकारक है।
    आज जिस तेज़ी के साथ हम प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे हैं उतनी ही तेज़ी के साथ अपने जीवन को भी हानि पहुँचा रहे हैं। कारखानों से निकलने वाला धुआँ जब आसमान की ओर जाता है तो वातावरण दूषित हो जाता है जिस के परिणाम स्वरूप आज वायु प्रदूषण हमारे सामने एक बहुत बड़ा खतरा है। प्रदूषण के कारण ” ओज़ोन लेयर” में एक बड़ा छेद हो गया है जिस के कारण सूर्य की किरणें सीधा हम तक पहुँच रही है। इस से चर्म रोग का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा होती है और न सरदी- गरमी का चक्र ठीक चलता है। सूखा, बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है। दूषित वातावरण में साँस लेने से मनुष्य आजकल कई भयंकर एवं लाइलाज बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। खाँसी, सरदी, जुकाम, निमोनिया, आँखों की ज्योति का धीमा पड़ना, उल्टी, चक्कर आना, रक्त अशुद्ध होना, कैन्सर आदि अनेकानेक असाध्य व गम्भीर रोगों का मूल कारण अशुद्ध हवा में साँस लेना है।
    निष्कर्षत: कह सकते हैं कि प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप है जो विज्ञान की कोख से जन्मा है और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर है। पर यदि हमें इस स्थिति को और बिगड़ने से रोकना है और अपने जीवन को नरक बनने से बचाना है तो इस समस्या पर गम्भीरता से विचार करना होगा। हमारे लिए यह एक संतोष की बात है कि सरकार इस समस्या के प्रति सजग है और इसके लिए पर्यावरण मंत्रालय अच्छे तथा मज़बूत नियम लागू कर रही है। यह प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य भी है कि वह अपने पर्यावरण की रक्षा करे। प्रदूषण को कम करने में संचार परोक्ष रूप से बड़ा योगदान दे सकता है और वह लोगों को जागरूक कर सकता है।

  21. luchmun indranee says:

    ASSIGNMENT 3

    लेख : काँ-दे-मास्क में हुई सड़क दुर्घटना से सम्बन्धित रिपोर्ट

    सोमवार छब्बीस सिप्तंबर दो हज़ार ग्यारह के प्रात: काल साढ़े सात बजे काँ-दे-मास्क में एक बस और एक व्यक्तिगत गाड़ी के बीच एक भयंकर दुर्घटना हुई, जिसमें दो महिलाएँ बुरी तरह से घायल हुई। एक पुरुष को कुछ खरोंच आई और गाड़ी चालक भी बुरी तरह से घायल हुआ।
    यह घटना तब घटी जब मैं अपनी दैनिक चर्या के अनुसार साढ़े सात बजे नौकरी स्थल सें पियेर (St Pierre ) पहुँचने हेतु काँ-दे-मास्क के बस स्टोप पर पहुँची। मैं बस का इन्तज़ार कर ही रही थी कि अचानक ब्रेक की असाधारण आवाज़ सुनाई दी जिस के साथ ही साथ एक असहन्य शोर सुनाई दी। मैंने देखा कि कुछ ही दूरी पर एक बस और एक व्यक्तिगत गाड़ी में टकर हुई। बस फ्लाक की ओर जा रही थी और गाड़ी रोज़-हिल की तरफ जा रही थी। गाड़ी चालक बहुत तेज़ी से गाड़ी चला रहा था। एक दूसरी गाड़ी से आगे निकलने की कोशिश में अपने सामने बस को पाकर गाड़ी चालक गाड़ी का संतुलन खो बैठा और बस से जा टकराया। वहीं पटरी पर कुछ लोग खड़े थे। सौभाग्यवश उन को कुछ नहीं हुआ। दुख की बात तो यह थी कि जब गाड़ी बस से टकराई तो एक महिला जो सामने की सीट पर बैठी थी के माथे पर गहरी चोट आई जिस के कारण वह बेहोश हो गई थी। जो दूसरी महिला थी उसे भी बहुत चोट आई थी और जो एक पुरुष उन के साथ गाड़ी में था उसे सिर्फ कुछ खरोंच आई थी। बस में सवार लोगों में पाँच लोगों को हल्की चोट लगी थी। लोग शीघ्रता पूर्वक घटना स्थल की ओर दौड़े। कुछ ही देर में वहाँ बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गई।
    कुछ देर बाद पुलिस की जीप “सीरेंन” लगाए तेज़ी से घटना स्थल पर पहुँची। उस के साथ ही “सामू” भी आ पहुँचा। “सामू” में आए डाक्टर शीघ्र ही घायलों की चिकित्सा करने लगे। वे बारी बारी से बड़ी सावधानी से घायलों को “सामू” में डालकर फ्लाक की अस्पताल ले गए। “सामू” के जाने के बाद पुलिस अफ़िसरों ने अपना कार्य सम्पन्न किया। गवाहों और बस चालक के आधार पर सही जाँचपर्ताल किया गया। दुर्घटना के कारण सड़क पर यातायात ठप पड़ गया था। जाँचपर्ताल के बाद पुलिस अफ़िसरों ने बस तथा गाड़ी को मार्ग से हटाया। गाड़ी बुरी तरह से नष्ट हो गई थी। लोग आपस में घटना सम्बन्धित विचार विमर्श करने लगे और सभी के विचारों में समानता दिखी। अर्थात एक मत से लोगों ने स्वीकार किया कि गलती गाड़ी चालक की थी। गाड़ी तेज़ चलाने और दूसरी गाड़ी से आगे निकलने की कोशिश में गाड़ी चालक ने गाड़ी का संतुलन खो दिया।
    निष्कर्षत: मोरिशसीय समाज में आए दिन ऐसी घाटक दुर्घटनाएँ होती रहती है। कभी इस का मूल्य कारण नशाखोरी होता है, कभी तेज़ रफ़्तार तो कभी लापरवाही। मोरिशसवासी को सड़क दुर्घटना के दुष्ट परिणाम एवं कारणों से अधिक सचेत कराने में संचार माध्यम विशेषकर रेडियो, टेलिविज़न भारी योगदान दे सकता है। प्रत्येक देशवासी में उत्तरदायित्व और कर्त्तव्य की भावना विद्यमान हो तो इन दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है।

  22. luchmun indranee says:

    ASSIGNMENT 4

    पत्र लेखन
    भारतीय सहेली को मोरिशस में छुट्टी बिताने के लिए आमन्त्रित करना।

    पेचित काबान रोड
    काँ-दे-मास्क पावे
    मोरिशस
    १२/१०/२०११

    प्यारी ज्योति,
    कैसी हो? आशा करती हूँ कि तुम सपरिवार स्वस्थ तथा कुशल हो। काफ़ी महीनों से तुम्हारा कोई पत्र नहीं आया है। क्या इतनी व्यस्त हो? यहाँ पर मैं भी परिवार सहित आनन्द से जीवन व्यतीत कर रही हूँ। तुम्हारा काम-काज कैसे चल रहा है? तुम्हें तो पता ही है कि मैं अभी गरमी की लम्बी छुट्टी पर हूँ और तुम भी तो अगले महीने छुट्टी पर जा रही हो। इसी मौके का फायदा उठाकर मैं तुम्हें मोरिशस छुट्टी बिताने के लिए आमन्त्रित कर रही हूँ। वैसे भी तुम मोरिशस आने की योजना तो बना ही रही थी। क्या ख्याल है?
    ज्योति, अगर तुम सच में मोरिशस आ रही हो तो मुझे जल्दी ही बताना ताकि मैं अपनी ओर से तुम्हारे स्वागत के लिए तैयारी कर सकूँ। वैसे तो मैं ने तुम्हारे लिए बहुत कुछ सोच रखा है। जिस दिन तुम आओगी, मैं स्वयं तुम्हें सर शिवसागर रामगुलाम हवाई अड्डे पर लेने आऊँगी और तुम मेरे साथ मेरे घर पर ही रहोगी। अगले दिन ही हम घूमने जाएँगे। मोरिशस तो तुम्हारा भारत जैसा बड़ा नहीं है, यह बहुत छोटा है पर फिर भी मोरिशस को धरती का स्वर्ग कहते हैं। यह एक छोटा टापू ज़रूर है पर देखने योग्य बहुत सी सुन्दर-सुन्दर जगहें हैं। खासकर इस की समुद्र-तट तो देखते बनते हैं। दूर तक फैला हुआ समुद्र का नीला पानी और तट पर सफ़ेद बालू मन को मोह लेता है। तुम समुद्र में तैरने का पूरा आनन्द ले सकती हो।
    यहाँ पर एक बोटानिकल गाडेंन है जो सर शिवसागर रामगुलाम बोटानिकल गाडेंन के नाम से जाना जाता है। मोरिशस के लोग इसे ” पाम्प्लेमूस बाग” के नाम से जानते हैं और यह मोरिशस के उत्त्तर प्रान्त में पाया जाता है। मैं तुम्हें इस बाग में अवश्य ले जाऊँगी क्योंकि इस बाग में एक ऐसा पेड़ है जो साठ से सत्तर साल में एक बार फूलता है और इस का नाम “तालीपो” है। इसे देखने के लिए देश-विदेश से बहुत लोग आते हैं। इसी बाग में हमारे प्रथम प्रधान मन्त्री सर शिवसागर रामगुलाम जी की समाधि भी है।
    एक दिन मैं तुम्हें शक्कर का एक कारखाना दिखाने ले जाऊँगी। तुम तो जानती ही हो कि मोरिशस में बड़े पैमाने में ईख की खेती होती है और यहाँ पर कई जगहों पर कारखाने भी हैं। मेरा चचेरा भाई कारखाने में काम करता है और वही हमें कारखाना दिखाने ले जाएगा। तुम देख सकती हो कि जब ईख खेत से निकलकर कारखाना पहुँचता है तो किस प्रकार से ईख को पिरोकर रस निकाला जाता है और फिर चीनी बनती है। तुम वही पर चीनी चख भी सकती हो।
    ज्योति और कई ऐसी जगह है जहाँ मैं तुम्हें ले जाऊँगी जैसे काजेला चिड़िया घर, कोदाँ वाटर फ्रन्ट, ले गोर्ज, शामारेल जहाँ सात से अधिक रंगों की मिट्टी पायी जाती है। हम गंगा तालाब भी जाएँगे जो हिन्दुओं का एक तीर्थ स्थान है। यह एक प्राकृतिक झील है जहाँ से महाशिवरात्रि के अवसर पर हिन्दू जल लाकर शिवजी को चढ़ाते हैं। फिर मैं ने तुम्हें अपनी पिछली चिट्ठी में बताया था कि दिसम्बर के पहले सप्ताह में मेरी बड़ी बहन की शादी है तो इसी बहाने हम शापिंग भी कर सकते हैं। मैं तुम्हें यहाँ की कुछ ऐसी दुकानों में ले जाऊँगी जहाँ पर तुम अपनी मन पसन्द की मोरिशस की कुछ चीज़ें खरीद सको। मोरिशस में वैसे तो बहुत सी भारतीय तथा चीनी सामान मिलते हैं पर मैं तुम्हें मोरिशसीय घर सज्जा की वस्तुओं की दुकानों में ले जाऊँगी। अभी हाल में “बागाटेल शापिंग मोल” खुला है, मैं तुम्हें वहीं ले जाऊँगी। फिर तुम शादी में भी भाग ले सकती हो। तुम देखना कि किस प्रकार यहाँ विधिपूर्वक शुक्रवार से सोमवार तक शादी होती है।
    अब मैं अपना पत्र यही पर समाप्त करती हूँ। आशा करती हूँ कि तुम मुझे जल्दी ही एक सकारात्म्क उत्तर दोगी और हम साथ में खूब मस्ती करेंगे जैसे कि जब मैं भारत में थी तब हम किया करते थे। घर पर बड़ों को मेरा नमस्ते कहना और छोटों को प्यार देना।

    तुम्हारी सहेली
    इन्द्राणी

  23. Priyasy Jeetoo Bhantooa says:

    Jeetoo Priyasy.
    ACE 2011.

    व्यायाम
    व्यायाम का अर्थ है संपूर्ण शरीर या शरीर के किसी अंग विशेष को एक समान लय में कुछ निश्चित समय एवं निश्चित अनुपात में गति देना, माँसपेशियों, हड्डियों एवं रक्त परिवहन को सुषुप्तावस्था से जाग्रत करना, उत्तेजित करना, उनकी कार्यप्रणाली में गति प्रदान करना।

    परंतु देखने में यह आता है कि किसी बीमारी के होने पर जब तक किसी डॉक्टर द्वारा विशिष्ट व्यायाम या सुबह तेज गति से पैदल घूमने जाने की हिदायत न दी जाए तब तक लोग इसे समय की बर्बादी ही मानते हैं। व्यायाम का महत्व दो-चार प्रतिशत व्यक्ति ही समझते हैं, परंतु वे भी नियमित नहीं कर पाते। सिर्फ एक प्रतिशत ही होंगे जो व्यायाम के प्रति नियमित हों।
    अधिकांशतः मन में प्रश्न यह उठता है कि मजदूर गरीब व्यक्ति पैदल या साइकिल से चलते हैं। इतना पसीना बहाते हैं फिर भी बीमार रहते हैं तो व्यायाम कैसे फायदेमंद है।

    रोमसिन के शब्दों में स्वच्छता और श्रम मनुष्य के सर्वोत्तम वैद्य हैं। अज्ञानता, समयाभाव, स्वच्छता के प्रति जागृति की कमी, कुपोषण या अल्प पोषण के कारण ये बीमार होते हैं। शरीर एवं मांसपेशियाँ तो इनकी गठी हुई होती हैं। ये किसी शहरी बाबू की तुलना में कई गुना अधिक श्रम करने की शक्ति रखते हैं।

    महिलाएँ सोचती हैं कि घर के कामों में ही उनका इतना व्यायाम हो जाता है, वे थक जाती हैं, उन्हें अलग से व्यायाम करने की जरूरत नहीं है। पुरुष भी यह सोचते हैं कि उनको दफ्तर या दुकान में काम की भागदौड़ में इतनी मेहनत करनी पड़ती है कि व्यायाम की जरूरत ही नहीं है। दोनों ही धारणाएँ गलत हैं।

    एक जैसा कार्य करते-करते पूरे शरीर की मांसपेशियों का संचालन नहीं हो पाता, इसलिए उनकी मांसपेशियाँ गठी हुई नहीं होती और वे थक जाते हैं।

    झाड़ू लगाना, पोंछा लगाना, कपड़े धोना भी अच्छे शारीरिक व्यायाम हैं। परंतु समस्त अंगों को सुडौल रखने के लिए तथा फेफड़ों में शुद्ध हवा के लिए अन्य व्यायाम भी आवश्यक हैं।
    हर उम्र के व्यक्ति के लिए नियमित हल्के-फुल्के व्यायाम उचित हैं। जोश व उतावली में अनियमित व ज्यादा व्यायाम न करें। वृद्ध व्यक्ति, गर्भवती महिलाएँ, हृदय रोगी भी डाक्टर की सलाह लेकर कुछ व्यायाम कर सकते हैं। व्यक्तिगत स्थिति, उम्र, शारीरिक स्वास्थ्य समय और पसंद के आधार पर व्यायाम का चयन करना उत्तम रहता है।

    *प्रातःकाल पैदल घूमने जाना अच्छा व्यायाम है। परंतु कुछ तीव्र गति से चलें। नाक से साँस लें। मुँह बंद रखें। ऐसा नहीं कि दो-चार इष्ट मित्रों के साथ बातचीत करते हुए आराम से घूमें।

    *यथासंभव शुद्ध और साफ हवादार जगह पर व्यायाम करें।

    *प्रतिदिन निश्चित समय पर व्यायाम करें।

    *प्रारंभ में थोड़ा व्यायाम करना चाहिए बाद में व्यायाम की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

    *किसी दिन कम और किसी दिन अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए। व्यायाम नियमित करना चाहिए।

    *व्यायाम करने से शरीर में गर्मी पैदा हो जाती है। अतः व्यायाम करने के तुरंत बाद नहाना या कुछ खाना- पीना नहीं करना चाहिए।

    विज्ञान के लाभ-हानि
    विज्ञान का अर्थ है विशेष ज्ञान। मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के लिए जो नए-नए आविष्कार किए हैं, वे सब विज्ञान की ही देन हैं। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के अनगिनत आविष्कारों के कारण मनुष्य का जीवन पहले से अधिक आरामदायक हो गया है।

    मोबाइल, इंटरनेट, ईमेल्स, मोबाइल पर 3जी और इंटरनेट के माध्यम से फेसबुक, ट्विटर ने तो वाकई मनुष्य की जिंदगी को बदलकर ही रख दिया है। जितनी जल्दी वह सोच सकता है लगभग उतनी ही देर में जिस व्यक्ति को चाहे मैसेज भेज सकता है, उससे बातें कर सकता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।

    यातायात के साधनों से आज यात्रा करना अधिक सुविधाजनक हो गया है। आज महीनों की यात्रा दिनों में तथा दिनों की यात्रा चंद घंटों में पूरी हो जाती है। इतने द्रुतगति की ट्रेनें, हवाई जहाज यातायात के रूप में काम में लाए जा रहे हैं। दिन-ब-दिन इनकी गति और उपलब्धता में और सुधार हो रहा है।

    चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान ने हमारे लिए बहुत सुविधाएं जुटाई हैं। आज कई असाध्य बीमारियों का इलाज मामूली गोलियों से हो जाता है। कैंसर और एड्स जैसे बीमारियों के लिए डॉक्टर्स और चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार प्रयासरत हैं। नई-नई कोशिकाओं के निर्माण में भी सफलता प्राप्त कर ली गई है।

    सिक्के के दो पहलुओं की ही भांति इन आविष्कारों के लाभ-हानि दोनों हैं। एक ओर परमाणु ऊर्जा जहां बिजली उत्पन्न करने के काम में लाई जा सकती है। वहीं इससे बनने वाले परमाणु हथियार मानव के लिए अत्यंत विनाशकारी हैं। हाल ही में जापान में आए भूकंप के बाद वहां के परमाणु रिएक्टर्स को क्षति बहुत बड़ी त्रासदी रही।

    अत: मनुष्य को अपनी आवश्यकता और सुविधानुसार मानवता की भलाई के लिए इनका लाभ उठाना चाहिए न कि दुरुपयोग कर इनके अविष्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाना चाहिए।

    दशहरा/विजयादशमी

    दशहरा को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार वर्षा ऋतु के अंत में संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया जाता है। नवरात्र में मूर्ति पूजा में पश्चिम बंगाल का कोई सानी नहीं है जबकि गुजरात में खेला जाने वाला डांडिया बेजोड़ है। पूरे दस दिनों तक त्योहार की धूम रहती है। लोग भक्ति में रमे रहते हैं। मां दुर्गा की विशेष आराधनाएं देखने को मिलती हैं।

    दशमी के दिन त्योहार की समाप्ति होती है। इस दिन को विजयादशमी कहते हैं। बुराई पर अच्छाई के प्रतीक रावण का पुतला इस दिन समूचे देश में जलाया जाता है।

    इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था। और सारा समाज भयमुक्त हुआ था। रावण को मारने से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी। मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था।

    रावण दहन आज भी बहुत धूमधाम से किया जाता है। इसके साथ ही आतिशबाजियां छोड़ी जाती हैं। दुर्गा की मूर्ति की स्थापना कर पूजा करने वाले भक्त मूर्ति-विसर्जन का कार्यक्रम भी गाजे-बाजे के साथ करते हैं।भक्तगण दशहरे में मां दुर्गा की पूजा करते हैं। कुछ लोग व्रत एवं उपवास करते हैं। पूजा की समाप्ति पर पुरोहितों को दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट किया जाता है। कई स्थानों पर मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन भी किया जाता है।

    दशहरा अथवा विजयादशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष, उल्लास तथा विजय का पर्व है। देश के कोने-कोने में यह विभिन्न रूपों से मनाया जाता है, बल्कि यह उतने ही जोश और उल्लास से दूसरे देशों में भी मनाया जाता जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं।

    गाय

    भूमिका : गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है।

    उपयोगिता : गाय का दूध बहुत ही पौष्टिक होता है। यह बीमारों और बच्चों के लिए बेहद उपयोगी आहार माना जाता है। इसके अलावा दूध से कई तरह के पकवान बनते हैं। दूध से दही, पनीर, मक्खन और घी भी बनाता है। गाय का घी और गोमूत्र अनेक आयुर्वेदिक औषधियां बनाने के काम भी काम आता है। गाय का गोबर फसलों के लिए सबसे उत्तम खाद है। गाय के मरने के बाद उसका चमड़ा, हड्डियां व सींग सहित सभी अंग किसी न किसी काम आते हैं।

    अन्य पशुओं की तुलना में गाय का दूध बहुत उपयोगी होता है। बच्चों को विशेष तौर पर गाय का दूध पिलाने की सलाह दी जाती है क्योंकि भैंस का दूध जहां सुस्ती लाता है, वहीं गाय का दूध बच्चों में चंचलता बनाए रखता है। माना जाता है कि भैंस का बच्चा (पाड़ा) दूध पीने के बाद सो जाता है, जबकि गाय का बछड़ा अपनी मां का दूध पीने के बाद उछल-कूद करता है।

    गाय न सिर्फ अपने जीवन में लोगों के लिए उपयोगी होती है वरन मरने के बाद भी उसके शरीर का हर अंग काम आता है। गाय का चमड़ा, सींग, खुर से दैनिक जीवनोपयोगी सामान तैयार होता है। गाय की हड्डियों से तैयार खाद खेती के काम आती है।

    शारीरिक संरचना : गाय का एक मुंह, दो आंखें, दो कान, चार थन, दो सींग, दो नथुने तथा चार पांव होते हैं। पांवों के खुर गाय के लिए जूतों का काम करते हैं। गाय की पूंछ लंबी होती है तथा उसके किनारे पर एक गुच्छा भी होता है, जिसे वह मक्खियां आदि उड़ाने के काम में लेती है। गाय की एकाध प्रजाति में सींग नहीं होते।

    गायों की प्रमुख नस्लें : गायों की यूं तो कई नस्लें होती हैं, लेकिन भारत में मुख्यत: सहिवाल (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार), गीर (दक्षिण काठियावाड़), थारपारकर (जोधपुर, जैसलमेर, कच्छ), करन फ्राइ (राजस्थान) आदि हैं। विदेशी नस्ल में जर्सी गाय सर्वाधिक लोकप्रिय है। यह गाय दूध भी अधिक देती है। गाय कई रंगों जैसे सफेद, काला, लाल, बादामी तथा चितकबरी होती है।
    भारत में गाय का धार्मिक महत्व : भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।

    प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपाल भी है।

    निष्कर्ष : कुल मिलाकर गाय का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है। गाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तो आज भी रीढ़ है। दुर्भाग्य से शहरों में जिस तरह पॉलिथिन का उपयोग किया जाता है और उसे फेंक दिया जाता है, उसे खाकर गायों की असमय मौत हो जाती है। इस दिशा में सभी को गंभीरता से विचार करना होगा ताकि हमारी ‘आस्था’ और ‘अर्थव्यवस्था’ के प्रतीक गोवंश को बचाया जा सके।

    प्रदूषण : एक गंभीर समस्या

    प्रस्तावना : विज्ञान के इस युग में मानव को जहां कुछ वरदान मिले है, वहां कुछ अभिशाप भी मिले हैं। प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप हैं जो विज्ञान की कोख में से जन्मा हैं और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर हैं।

    प्रदूषण का अर्थ : प्रदूषण का अर्थ है -प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना! न शुद्ध वायु मिलना, न शुद्ध जल मिलना, न शुद्ध खाद्य मिलना, न शांत वातावरण मिलना !

    प्रदूषण कई प्रकार का होता है! प्रमुख प्रदूषण हैं – वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण और ध्वनि-प्रदूषण !

    वायु-प्रदूषण : महानगरों में यह प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों का धुआं, मोटर-वाहनों का काला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। मुंबई की महिलाएं धोए हुए वस्त्र छत से उतारने जाती है तो उन पर काले-काले कण जमे हुए पाती है। ये कण सांस के साथ मनुष्य के फेफड़ों में चले जाते हैं और असाध्य रोगों को जन्म देते हैं! यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है, वृक्षों का अभाव होता है और वातावरण तंग होता है।

    जल-प्रदूषण : कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गंधित जल सब नाली-नालों में घुल मिल जाता है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती है।

    ध्वनि-प्रदूषण : मनुष्य को रहने के लिए शांत वातावरण चाहिए। परन्तु आजकल कल-कारखानों का शोर, यातायात का शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउड स्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है।

    प्रदूषणों के दुष्परिणाम: उपर्युक्त प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को खतरा पैदा हो गया है। खुली हवा में लम्बी सांस लेने तक को तरस गया है आदमी। गंदे जल के कारण कई बीमारियां फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर घातक बीमारियां पैदा करती हैं। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा आती है, न सर्दी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है। सुखा, बाढ़, ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है।

    प्रदूषण के कारण : प्रदूषण को बढ़ाने में कल-कारखाने, वैज्ञानिक साधनों का अधिक उपयोग, फ्रिज, कूलर, वातानुकूलन, ऊर्जा संयंत्र आदि दोषी हैं। प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना भी मुख्य कारण है। वृक्षों को अंधा-धुंध काटने से मौसम का चक्र बिगड़ा है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में हरियाली न होने से भी प्रदूषण बढ़ा है।

    सुधार के उपाय : विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने के लिए चाहिए कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं, हरियाली की मात्रा अधिक हो। सड़कों के किनारे घने वृक्ष हों। आबादी वाले क्षेत्र खुले हों, हवादार हों, हरियाली से ओतप्रोत हों। कल-कारखानों को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचना चाहिए।

  24. Busgeeth Indrani Devi says:

    नमस्ते गुरुजी,
    मेरे assignments इस प्रकार हैं

    Assignment 1
    भाषा अधिगम में भाषा प्रयोगशाला का मह्त्व

    भाषा विचारों के आदान-प्रदान का उच्चतम साधन है । भाषा के माध्यम से ही एक व्यक्ति अपने मनोभावों एवं विचारों को एक दूसरे पर प्रकट करता है । दूसरे शब्दों में , भाषा संचार का एक मह्त्वपूर्ण साधन है ।

    भाषा के अभाव में, एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से सम्पर्क स्थापित करना असम्भव ही होगा । भाषा के बिना, संसार में होनेवाली समस्त गतिविधियों की कल्पना नहीं की जा सकती । इस आधार पर, प्रत्येक मानव-मात्र को कम से कम एक भाषा तो अवश्य सीखनी चाहिए, जिसके माध्यम से वह अपने विचारों को प्रकट कर सके ।

    प्रत्येक बालक सवर्प्रथम अपने घर में ही प्रथम शब्द सीखता है । यह सीखना स्वाभाविक होता है । बालक अपने पारिवार के अन्य सदस्यों को बोलते देख स्वयं बोलने का प्रयत्‍न करता है । वह आरम्भ में तोतली भाषा बोलता है । अभ्यास और समय के साथ वह शब्दों का सही उच्चारण करने लगता है । यह उसकी मातृभाषा होती है । वह सरलता से अपनी मातृभाषा में वार्तालाप करता है । इसके बाद जब वही बालक पाठशाला जाना आरम्भ करता है तो भाषा- अधिगम के क्षेत्र में पदार्पण करता है । मातृभाषा के अतिरिक्‍त विद्यालय में वह अन्य भाषाओं को सीखता है । भाषा के विषय में वह वर्णों को सीखता है, शब्द-रचना, वाक्य-रचना आदि का ग्यान प्राप्‍त करता है ।

    कहा जाता है कि भाषा बोलने से आती है । किसी भाषा पर अपना अधिकार पाने के लिए लिखने के साथ-साथ बोलने में भी दक्षता प्राप्‍त करनी चाहिए । बोलते समय शब्दों का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए । इस संदर्भ में भाषा-प्रयोगशाला का विशेष महत्व है । कई बार होता है कि हम किसी विशेष भाषा में विशेषज्ञ बान जाते हैं और उच्चपद पर नियुक्‍त हो जाते हैं किन्तु जब किसी सभा में वक्‍‍तव्य देना होता है तो उच्चारण अशुद्ध होता है । उदाहरणार्थ ’ट’ को ’त’, ’श’ को ’स’, ’क्ष’ को ’छ’ बोलते हैं । हमें इन अशुद्धियों के बारे में ज्ञान नहीं होता किन्तु जो श्रोता-गण होते हैं, वे तुरंत हमारे उच्चारण-दोषों को पहचान लेते हैं । इस अवस्था में भाषा प्रयोगशाला अत्यन्त आवश्यक है ।

    भाषा प्रयोगशाला में अभ्यास करने से हम अपने उच्चारण संबंधी अशुद्धियों को सुधार सकते हैं । अतः भाषा प्रयोगशाला व्याकरण सीखने का उच्चतम माध्यम है । इसके माध्यम से हम स्वंय अपनी गलतियों को ढूंढ्ते हैं तथा उन्हें सुधारने का प्रयत्‍न करते हैं । वैसे जब हम बोलते हैं या वाचन करते हैं तो हमें ज्ञात नहीं होता कि कौन सी अशुद्धियाँ हो रही हैं किन्तु भाषा प्रयोगशाला के माध्यम से यह सम्भव है । हम अपनी ही आवाज़ को रिकोर्ड करते हैं तथा उसे पुनः सुनकर उच्चारण-दोषों को पहचानते हैं और उन्हें सुधारते हैं ।

    निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भाषा प्रयोगशाला किसी भाषा में दक्षता प्राप्‍त करने में मदद करती है तथा हमारे उच्चारण को शुद्ध बनाती है ।

  25. Busgeeth Indrani Devi says:

    Assignment 2

    विद्यार्थी जीवान में अनुशासन का महत्व

    किसी भी राष्‍ट्र का निर्माण उसके नागरिकों के चरित्र से होता है । चरित्रवान और अनुशासित नागरिक ही देश को उन्नति की ओर ले जाते हैं । वे सदैव नियमों का पालन करते हैं, व्यवस्थित जीवन व्यतीत करते हैं और जीवन में सफ़ल होते हैं । अतः चाहे वह राष्‍ट्र का विकास हो, व्यक्‍ति की उन्नति हो या मानव समाज का विकास हो, जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति एवं विकास के लिए अनुशासन अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।

    अनुशासन का अर्थ है शासन के पीछे चलना अर्थात सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक सभी प्रकार के आदेशों एवं नियमों का पालन करना । किसी समाज की व्यवस्था तब ही ठीक रह सकती है जब उस समाज के सभी सदस्य अनुशासित अर्थात नियमित हों । जीवान के प्रत्येक क्षेत्र, विद्यालय, अस्पताल, दफ़्तर इत्यादि अनेक जगहों में यदि अनुशासन का पालन न हो तो कार्य सुचारू रूप से नहीं चलेगा । समय का पालन करना, बड़ों के आदेश को मानना इत्यादि अनुशासन के अन्तर्गत आते हैं ।

    छात्रों के जीवन में अनुशासन का बहुत अधिक महत्व है । किसी भी देश की उन्नति एवं विकास उस देश के छात्रों की प्रगति पर निर्भर करता है । ये ही छात्र भविष्य में देश का बागडोर सम्भालेंगे तथा भावी मंत्री एवं महान व्यक्‍तित्व बनेंगे ।

    विद्यार्थी जीवन मनुष्य का सर्वश्रेष्‍ठ समय होता है । इसे एक व्यक्‍ति के जीवन का स्वर्णकाल भी माना जाता है । इसी काल के अन्तर्गत व्यक्‍ति अपने व्यक्‍तित्व को सँवारता है या बिगाड़ता है । इस समय का सदुपयोग करके मनुष्य अपने जीवन को सुखदायक और सफल बना सकता है । इसके लिए अनुशासन का पालन अनिवार्य है । अनुशासन के साथ-साथ विद्यार्थी में शील एवं सदाचार का समावेश होना चाहिए । किन्तु यह अनुशासन ज़बरदस्ती या हठपूर्वक उत्पन्न नहीं किया जा सकता । अनुशासन की भावना अभ्यास पर निर्भर करती है । प्रारम्भ में बच्चों को परिवार का वातावरण ऎसा मिलना चाहिए जिससे उनका कार्य और व्यवहार नियमित हो सके ।

    कहा जाता है कि माँ की गोद ही बालक का प्रथम विश्‍वविद्यालय है अर्थात बालक के व्यक्‍तित्व का निर्माण घर पर ही आरम्भ होता है । वह अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य सदस्यों के आचार-व्यहार को अपनाता है । इसी आचरण को वह विद्यालय के नियमों के आधार पर ढालता है ।

    तत्कालीन समय में प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के आचरण को देखकर ऎसा ज्ञात होता है कि समाज पतन की ओर जा रह है तथा मूल्यों का विघटन हो रहा है । प्राचिन समय में जहाँ शिष्य अपने गुरु को परब्रह्म एवं मार्गदर्शक मानकर गुरु-दक्षिणा के रूप में अंगूठा तक अर्पित कर देते थे, वहीं आह स्थिति इतनी गम्भीर हो गई है कि छात्र अपने अधिकारों का दावा कर शिक्षकों के आदेशों की अवहेलना करते हैम तथा नियमों को तोड़कर अपनी तानाशाही चलाते हैं । यहाँ तक की वे अपने शिक्शःअकोम पर हाथ उठाने से भी नहीं हिचकिचाते । छात्र परस्पर भेदभाव रखते हैं तथा शत्रुता निभाने के लिए एक-दूसरे की जान के भी हावी हो जाते हैं । आए दिन समाचार-पत्रों में ऎसी कई दुर्घटनाएँ छ्पती रहती हैं ।

    विद्यालयों में अनुशासनहीनता को मिटाने के लिए शारीरिक दण्ड देना निषेध है । अतः अनुशासन स्थापित करने के लिए ’भय’ एवं दण्ड की अपेक्षा प्रेम को महत्व देना चाहिए तथा अन्य उपायों को अपनाना चाहिए ताकि विद्यार्थी अपने जीवन को सही दिशा प्रदान कर उसे उन्नत बना सकें ।

    निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि अपने भावी जीवन को उन्नत बनाने के लिए विद्यार्थी को जीवन के प्रत्येक पग पर अनुशासन का पालन करना चाहिए । अनुशासित जीवन ही सफलता की ओर ले जाता है।

  26. Busgeeth Indrani Devi says:

    Assignment 3

    ए.सी.ई की कक्षा

    ‍६ साल प्राथमिक पाठशाला में छात्रों को पढ़ाने के बाद हम फ़िर से पहुँचे एम.जी.आई । प्राथमिक स्तर पर शिक्षण को अधिक कुशल बनाने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने अध्यापकों को एक साल के कोर्स ( ए.सी.ई ) के लिए फ़िर से छात्र के रूप में प्रशिक्षण देने का निर्णय किया ।

    प्रशिक्षण पाने हेतु हम प्रति शुक्रवार को महात्मा गांधी संस्थान जाते हैं । अपना कार्य छोड़कर दिन भर कक्षा में बैठकर प्राध्यापकों को ध्यान देना आरम्भ में काफ़ी बोझिल लग रहा था । किन्तु इस बात की प्रसन्न्ता है कि इस कोर्स के अन्तर्गत नवीन बातें सीखने का अवसर प्राप्‍त हो रहा है ।

    अध्यापन के क्षेत्र में अध्यापक को हमेशा अधुनातन रहना चाहिए, नवीन तकनीकों से परिचित होना चाहिए । तभी हम अपने अध्यापन को बेहतर बना सकेंगे । गुरुजी विनय गुदारी बधाई के पात्र हैं । हिन्दी भाषा को एक ऊँचा स्थान प्रदान करने हेतु उन्होंने नेट पर हिन्दी का एक वेबसाईट का निर्माण किया है जहाँ हिन्दी प्रेमी अपने विचार भेज सकते हैं तथा किसी विशेष विषय पर टिप्पणी भी भेज सकते हैं । कविता-प्रेमी तथा लेखक गण अपने भावों की अभिव्यक्‍ति भी नेट द्वारा दूसरों के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं ।

    गुरुजी ने हमें नेट का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया । अपनी कक्षा को रूचिकर बनाने के लिए तथा बच्चों के हृदय में हिन्दी भाषा के प्रति प्रेम उत्पन्न करने के लिए हमें भी कम्प्यूटर की सहायता लेनी ही पड़ेगी । हम छात्रों को बता सकते हैं कि कम्प्यूटर पर हिन्दी के कई फ़न्ट भी उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से हम हिन्दी में लिख सकते हैं तथा नेट पर हिन्दी में खोजाकार्य कर सकते हैं । इन सबके माध्यम से हम हिन्दी भाषा को जीवित रखने में समर्थ होंगे ।

    साथ ही हमें भाषा-शिक्षण की नवीन प्रणालियों से अवगत कराया जा रहा है ताकि प्राथमिक स्तर के शिक्षक अपनी कक्षा को रूचिकर बना सकें एवं छात्रों का ध्यान आकृष्‍ट करने में सफल हों । अन्यथा दिन ब दिन पूर्वी भाषाओं के प्रति छात्रों की रूचि घटती जा रही हैं । नेट का प्रयोग भी एक नवीन प्रणाली है ।

    कोर्स के अन्तर्गत साहित्य और भाषा- विज्ञान भी सीख रहे हैं । प्राथमिक कक्षाओं में तो कहानी या उपन्यास नहीं पढ़ाए जाते किन्तु निबंध लेखन में उनकी सहायता अवश्य कर सकते हैं तथा उनमें किसी विषय पर आलोचना एवं विचार-विमर्श करने की क्षमता उत्पन्न कर सकते हैं ।

    आशा है कि इस कोर्स का जो उद्‍देश्य है, उसकी पूर्ति हो और हम इससे लाभ उठा पाएँ तथा अपने अध्यापन को कुशल बनाने में सफल हों ।

  27. Busgeeth Indrani Devi says:

    Assignment 4

    दाम्पत्य जीवन में विघटन के कारण

    विवाह संस्कार को समस्त संस्कारों में से उत्तम और महत्वपूर्ण माना जाता है । विवाह संस्कार एक ऐसा संस्कार है जिसमें दो व्यक्‍ति तन और मन से एक हो जाते हैं । इस संस्कार में कई विधियाँ होती हैं जिसके अन्तर्गत वर और वधू एक-दूसरे से प्रण लेते हैं कि वे सदैव सुख-दुख, दोनों में एक-दूसरे का साथ देंगे तथा जीवनपर्यन्त इस वचन को निभाएँगे । पति एवं पत्‍नी एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं ।

    गृहस्थ जीवन तभी सफल होता है जब एक दम्पति में प्रेमभाव के साथ-साथ परस्पर सहयोग एवं विश्‍वास की भावना होती है । दोनों परस्पर सुख-दुख के भागीदार बनते हैं । साथ ही उनके विचारों में भी समानता होनी चाहिए । अर्थात किसी भी पारिवारिक विषय पर निर्णय लेने से पूर्व परस्पर विचार-विमर्श कर दोनों की सहमती आवश्यक है। एक दम्पति गाड़ी के दो पहियों की तरह हैं । यदि एक पहिया खराब हो जाए तो गाड़ी पथ से डगमगा जाएगी । वैसे ही यदि एक दम्पति में से कोई एक अपने कर्त्तव्यों का पालन न करे तो दाम्पत्य जीवन सुचारू रूप से नहीं चल पाएगा तथा उसमें दरारें उत्पन्न हो जाती हैं ।

    जहाँ एक ओर विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है तथा उसे विशेष मान्यताएँ दी जाती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ दम्पतियों के लिए सात वर्ष भी एक दूसरे का साथ निभाना असह्य हो जाता है । कितना उपहासास्पद है कि जो जोड़ियाँ , धार्मिक मान्यता के अनुसार स्वर्ग से बनकर आती हैं , वे ही भविष्य में चलकर क्यों एक-दूसरे को देखना या एक साथ रहना पसंद नहीं करते ? उनमें प्रेमभाव की अपेक्षा मतभेद एवं शत्रुता की भावना व्याप्‍त हो जाती है । इस प्रकार विवाह-विच्छेद हो जाता है । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि समाज में नैतिक मूल्यों का विघटन हो रहा है ।

    तत्कालीन समाज में अधिकाधिक प्रेम-विवाह होते हैं । विवाह से पूर्व वर-वधू को एक-दूसरे को जानने एवं समझने का अवसर प्राप्‍त होता है । फिर भी आज तलाक की संख्या अधिक है । इस पारिवारिक विघटन के अनेक कारण हैं । वर्तमान युग की युवा पीढ़ी में सहनशीलता का अभाव है । निम्न-निम्न बातों पर वे तू-तू मैं-मैं करने लगते हैं । उन्में अहम की भावना प्रबल होती है । वे दूसरे के समक्ष झुकना पसंद नहीं करते । यदि दम्पति के बीच किसी बात को लेकर अनबन हो जाती है तो उन्हें कदाचित पसंद नहीं कि दूसरे उन्हें सलाह या सुझाव दें । वे अपना जीवन अपने तरीके से व्यतीत करना चाहते हैं । इसीलिए समझौता की अपेक्षा तलाक की ओर झुकते हैं ।

    पहले अधिकत्तर परिवारों में पुरुष ही नौकरी करते थे तथा घर के मुख्या थे । स्त्रियाँ घर को संभालती थीं । किन्तु वर्तमान समाज में बढ़ती महंगाई का सामना करने के लिए पति एवं पत्‍नी दोनों ही नौकरी करते हैं तथा आर्थिक दॄष्‍टि से स्वतः निर्भर हैं । इसीलिए यदि विचारों में मदभेद होता है तो पत्‍नी पति की दासी बनकर रहने की अपेक्षा स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना पसंद करती है । साथ ही घर के दायित्वों को निभाने में यदि पत्‍नी को पति का सहयोग प्राप्‍त नहीं होता तो पत्‍नी घर और नौकरी की ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए कुंठित हो जाती है तथा तनावग्रस्त हो जाती है। परिणामस्वरूप, पति और पत्‍नी के बीच भी तनाव उन्पन्न हो जाती है जो कभी-कभी विवाह-विच्छेद की ओर ले जाता है ।

    इस पारिवारिक विघटन का अन्य कारण पश्‍चिमी सभ्यता का प्रभाव भी है । पति एवं पत्‍नी, दोनों ही अपने-अपने कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं कि एक-दूसरे को तथा अपने परिवार को समय नहीं दे पाते हैं । मशीनों के बीच मनुष्य भी मशीन ही बन गया है । केवल काम को मह्त्‍व देते हैं । इस बीच वे किसी अन्य स्त्री या पुरुष के साथ संबंध जोड़ लेते हैं जिसका परिणाम निश्‍चय ही विवाह-विच्छेद होता है ।

    निष्कर्षतः गृहस्‍थ जीवन को सफल बनाने के लिए एक दम्‍पति में सहनशीलता की आवश्यकता है । उनमें प्रेमभाव के साथ-साथ परस्पर सहयोग एवं विश्‍वास भी अनिवार्य है ।

  28. anoupam doobur says:

    नमस्ते गूरुजी,

    रिपोर्ट लेखन की कक्शा से हूम ने सिखा कि इसे लिखने का सही धंग क्या है.इसमे कोन-कोन सी बाते आती है.

  29. Vandanna Ramma says:

    नम्स्ते गुरुजी। मैं अपना assignment निबन्ध और रिपोर्ट पर भेज रही हूँ।
    Assignment 1:

    विज्ञान के लाभ-हानि

    विज्ञान का अर्थ है विशेष ज्ञान। मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के लिए जो नए-नए आविष्कार किए हैं, वे सब विज्ञान की ही देन हैं। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के अनगिनत आविष्कारों के कारण मनुष्य का जीवन पहले से अधिक आरामदायक हो गया है।
    मोबाइल, इंटरनेट, ईमेल्स, मोबाइल पर 3जी और इंटरनेट के माध्यम से फेसबुक, ट्विइटर ने तो मनुष्य की जिंदगी को बदलकर ही रख दिया है। जितनी जल्दी वह सोच सकता है लगभग उतनी ही देर में जिस व्यक्ति को चाहे मैसेज भेज सकता है, उससे बातें कर सकता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।
    यातायात के साधनों से आज यात्रा करना अधिक सुविधाजनक हो गया है। आज महीनों की यात्रा दिनों में तथा दिनों की यात्रा चंद घंटों में पूरी हो जाती है। इतने द्रुतगति की ट्रेनें, हवाई जहाज यातायात के रूप में काम में लाए जा रहे हैं। दिन-ब-दिन इनकी गति और उपलब्धता में और सुधार हो रहा है।
    चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान ने हमारे लिए बहुत सुविधाएं जुटाई हैं। आज कई असाध्य बीमारियों का इलाज मामूली गोलियों से हो जाता है। कैंसर और एड्सज जैसे बीमारियों के लिए डॉक्टर और चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार प्रयासरत हैं। नई-नई कोशिकाओं के निर्माण में भी सफलता प्राप्त कर ली गई है।
    सिक्के के दो पहलुओं की ही भांति इन आविष्कारों के लाभ-हानि दोनों हैं। एक ओर रमाणु ऊर्जा जहां बिजली उत्पन्न करने के काम में लाई जा सकती है। वहीं इससे बनने वाले परमाणु हथियार मानव के लिए अत्यंत विनाशकारी हैं। हाल ही में जापान में आए भूकंप के बाद वहां के परमाणु रिएक्टर्स को क्षति बहुत बड़ी त्रासदी रही।
    विज्ञान के इस युग में मानव को जहां कुछ वरदान मिले है, वहां कुछ अभिशाप भी मिले । प्रदूषण एक ऐसा अभिशाप हैं जो विज्ञान की कोख में से जन्मा हैं और जिसे सहने के लिए अधिकांश जनता मजबूर हैं।
    प्रदूषणों के कारण मानव के स्वस्थ जीवन को खतरा पैदा हो गया है। खुली हवा में लम्बी सांस लेने तक को तरस गया है आदमी। गंदे जल के कारण कई बीमारियां फसलों में चली जाती हैं जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर घातक बीमारियां पैदा करती हैं। पर्यावरण-प्रदूषण के कारण न समय पर वर्षा आती है, न सर्दी-गर्मी का चक्र ठीक चलता है। सुखा, बाढ़, ओला आदि प्राकृतिक प्रकोपों का कारण भी प्रदूषण है।
    विभिन्न प्रकार के प्रदूषण से बचने के लिए चाहिए कि अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाएं, हरियाली की मात्रा अधिक हो। सड़कों के किनारे घने वृक्ष हों। आबादी वाले क्षेत्र खुले हों, हवादार हों, हरियाली से ओतप्रोत हों। कल-कारखानों को आबादी से दूर रखना चाहिए और उनसे निकले प्रदूषित मल को नष्ट करने के उपाय सोचना चाहिए।

  30. Vandanna Ramma says:

    Assignment 2:

    आर्कटिक में रिकॉर्ड स्तर तक पिघली बर्फ़

    वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में वृद्धि का क्रम जारी है।

    संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में तापमान बढ़ने का लंबे समय से चला आ रहा सिलसिला जारी है जबकि आर्कटिक समुद्र में इस वर्ष बर्फ़ रिकॉर्ड स्तर तक पिघल गई है।
    मौसम विज्ञान से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठन (आईएमओ) की ओर से जेनेवा में ये रिपोर्ट जारी की गई है।
    इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 1850 से मौसम का रिकॉर्ड रखना आरंभ किया गया था और रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2011 अब तक का दसवाँ सबसे गर्म वर्ष रहा है। उल्लेखनीय है कि दक्षिण अफ़्रीका में मौसम परिवर्तन पर भविष्य की रुपरेखा तैयार करने के लिए दो सप्ताह का एक सम्मेलन चल रहा है जिसमें 192 सदस्य किसी नतीजे पर पहुंचने का प्रयास करेंगे।

    आर्कटिक को वैज्ञानिक सबसे संवेदनशील क्षेत्र मानते हैं और आईएमओ का कहना है कि यह एक तरह से भविष्य का बैरोमीटर है। इस वर्ष आर्कटिक में बर्फ़ पिघलने का रिकॉर्ड है और इससे पहले सिर्फ़ एक ही बार इससे अधिक बर्फ़ पिघली थी। आईएमओ के उपनिदेशक आरडीजे लेंगोसा ने सम्मेलन स्थल के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि ये वर्ष पिछले 15 वर्षों में तेरहवाँ सबसे गर्म साल रहा है।

    लेंगोसा ने कहा, “वैज्ञानिक प्रमाण पुख़्ता हैं और स्पष्टरूप से साबित करते हैं कि दुनिया गर्म हो रही है.”
    उनका कहना था कि मानवीय गतिविधियाँ ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। समाचार एजेंसी एपी के अनुसार उन्होंने कहा, “मौसम परिवर्तन वास्तविक है और हम पूरी दुनिया में हो रहे मौसम परिवर्तन से इसे महसूस कर रहे हैं।”
    ये रिपोर्ट वर्ष के पहले दस महीनों के आधार पर तैयार की गई है। संस्था ने कहा है कि वर्ष 2011 अति वाले मौसम का वर्ष रहा है। पूर्वी अफ़्रीका में जहाँ सूखे की वजह से दसियों हज़ार लोग मौत के शिकार हो गए वहीं एशिया में बाढ़ का बड़ा प्रकोप रहा। अमरीका में 14 से अधिक मौसमी त्रासदियों का सामना करना पड़ा जिससे निपटने के लिए अमरीका को हर त्रासदी में एक अरब डॉलर से अधिक की राशि ख़र्च करनी पड़ी।

  31. Vandanna Ramma says:

    Assignment 3:

    चीन की ग़रीबी रेखा भारत से ऊपर

    पड़ोसी देश चीन ने ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीबी रेखा की परिभाषा बदल दी है। अब चीन में प्रतिदिन एक डॉलर यानी क़रीब 50 रुपए से कम कमाने वाले व्यक्ति को ग़रीब माना जाएगा। वर्तमान में ये रेखा 55 सेंट पर थी, लेकिन अब चीनी सरकार ने इसे 92 फीसदी बढ़ा दिया है।इसका मतलब ये होगा कि अब चार गुना अधिक लोग सरकारी सब्सिडी और प्रशिक्षण के दायरे में आएँगे।सरकारी समाचार एजेंसी के मुताबिक़ हू जिंताओ ने कहा, “लोगों के वेतन में बढ़ती असमानता को रोकने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है, वर्ष 2020 तक चीन में किसी को खाने या कपड़ों के बारे में चिंता नहीं करनी पड़ेगी”।

    ग़रीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों को चीन में सब्सिडी, रोज़गार के लिए प्रशिक्षण, सस्ती दरों पर कर्ज़ और ग्रामीण इलाकों में सरकारी मदद से चलनेवाली ढांचागत परियोजनाओं में नौकरी के अवसर मिलेंगे।
    चीन की राजधानी बीजिंग में स्थित टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार के संवाददाता सैबल दासगुप्ता का मानना है कि इस हितकारी फ़ैसले के पीछे चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी है।
    एक बात और ध्यान रखने लायक है कि चीन की कुल आबादी का 40 फीसदी शहरों में रहता है और 60 फीसदी ग्रामीण इलाकों में। ग़रीबी रेखा का ये फैसला सिर्फ़ ग्रामीण इलाकों पर लागू होता है। चीन के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में ग़रीबी और बेरोज़गारी एक बड़ी परेशानी है।

    हू जिंताओ के सत्ता में आने से पहले चीनी सरकार की नीति दक्षिणी इलाक़ों पर केन्द्रित थी।
    सैबल सगुप्ता के मुताबिक हू जिंताओ ने अपने वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए ही इस समय ये फ़ैसला लिया है। साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी की वजह से चीनी सरकार स्थानीय बाज़ार में मांग को बढ़ावा देना चाहती है । संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा जारी की गई मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में, दुनिया के सबसे ज़्यादा बहुआयामी ग़रीब रहते हैं। विश्व बैंक ने ग़रीबी रेखा का अंतरराष्ट्रीय स्तर 1.25 डॉलर रखा है और चीन का एक डॉलर का नया मानक उसके बेहद क़रीब है।

    लेकिन भारत के योजना आयोग के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में प्रतिदिन 26 रुपए यानी क़रीब 50 सेंट से कम कमाने वाला व्यक्ति ही ग़रीब माना जाएगा।

    आलोचकों का मानना है कि इस सीमा को तय कर देने से लाखों लोग समाज कल्याण की नीतियों और सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाएंगे।

  32. Tarangini Devi Ramphul says:

    मोरिशस में भोजपुरी
    सभी लोगों की अपनी-अपनी भाषा होती है। किसी का किसी रूप में अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं। भारत से जब हमारे पूर्वज़ों को सख्य-भाव दिखाकर लाया गया था तब भी भाषा लेकर आए थे। हमारे पूर्वज़ों की भाषा भोजपूरी थी। वह भाषा बहुत समृद्ध थी। हर पल लोग इसी का प्रयोग करते थे। दुख-सुख में, पूजा-पाठ में अदान-प्रदान करते थे। यह उनकी आत्मा की भाषा थी।
    भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तों, जैसे आंध्र प्रदेश, बिहार, कल्कत्ता, बम्बई, आग्रा, आरा आदि-आदि से वे एक साथ आए थे। मुसलमान भी साथ में थे।
    मोरिशस में आकर सभी ने भोजपुरी को अपनाया। एक दूसरे के विचारों के आदान-प्रदान करने के लिए यह भोजपुरी ही एक सशक्त माध्यम बन गई थी। सभी के लिए एक ही बैठक, एक ही सभा-सोसाइटी थी और एक ही रूप में पूजा आदि-आदि होती थी।
    बैठकों के बहुत महत्वपूर्ण स्थान था। सभी वहां एक साथ बैठते, सत्संग करते, पूजा-पाठ करते, जिथि-त्योहार मनाते थे। विवाह आदि का आयोजन भी होता था। कभी-कभी बैठक न्यायालय का रूप ले लेता था। लोग मिलकर अपनी समस्याओं का समाधान यहीं कर लेते थे, पंचायत में।
    हर परिस्थिति के गीत भोजपुरी में पाये जाते थे। जन्म से लेकर मत्यु तक के गीत भिन्न-भिन्न रूपों में पाये जाते थे। उनको सभी कण्ठस्थ था। राग भी उत्तम था। जीवन के हर एक अंग और परिस्थिति पर गीत होते थे। भोजपुरी तो एकदम सरल भाषा थी। अनपढ़ लोग भी जल्दी ही से अपना लेते थे।
    जहां खुशी के गीत थे वहां मज़दूरों की पीड़ा की भी झलक मिलती थी। बीरहा में हमें यह दर्द दिखाई देता है।
    भोजपुरी भाषा के शब्दों के साथ-साथ क्रियोली के एक-दो शब्द आ जाते थे। जैसे:
    १. मुसे मनेस ( Mr. Maness) के मुलवा जर गइले हो, मुसे मनेस के मुलवा …
    २. लाली लाली (line, line) कान (ईख) पलांते (बोई) मिराई में मकई…
    इन गीतों में परिस्थितियों की झलक, दुख-दर्द की झलक आदि मिलती थी।
    भोजपुरी का फैलाव मोरिशस में हो गया, यहां तक कि गैर जाति के लोग जैसे-चीनी, हब्शी (creole) आदि इन्हें फटाफट बोलने लगे। गाना-बजाना इस भाषा में करने लगे। भोजपुरी भाषा मोरिशस की भूमि के कण-कण में बस गई। पेड़-पौधों में प्रवेश कर गई। जिधर भी जाते थे सभी को भोजपुरी की ही भाषा सुनाई देती थी। हमारे पूर्वज़ों पर कोड़ों की मार पड़ती थी और अनेक तरह के कष्ट दिये जाते थे, फिर भी वे सहते रहते थे।
    एक बार महात्मा गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका से गरीबों आदि से मुकदमों की पैरवी करके अपने जहाज़ “नौशेरा” द्वारा भारत लौट रहे थे। कुछ समय के लिए मोरिशस के बन्दरगाह में कुछ समय के लिए रुके।
    यह मज़दूरों के लिए भगवान का आशीर्वाद रहा। गांधी जी के आगमन का समाचार मोरिशस भर में बिजली की तरह फैल गया था। उस समय न डाक, न फ़ोन था या न अन्य कोई समाचार फैलाने का साधन। जनता में इतना साहस था कि उन्होंने इस समाचार को मोरिशस भर में फैला दिया। ताहेर बाग, पोर्ट लुई, तायाक और अन्य जगहों पर बहुत संख्या में लोग जमा हुए।
    गांधी जी गुजराती में बोलते थे क्योंकि वे भोजपुरी नहीं जानते थे। बाद में उन्होंने हिन्दी का प्रयोग किया, जिसे मोरिशसवाले “भाषा” बोलते थे। हिन्दुओं की परिस्थिति को देखकर गांधी जी बहुत दुखी हुए। उन्होंने लोगों को भाषा के साथ-साथ राजनीति में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
    भारत लौटने पर गांधी जी ने डा. भारद्वाज को भेजा। फिर उनके प्रोत्साहन से मणिलाल डाक्टर मोरिशस आए थे। उस समय उस परिस्थिति में भारतीय वकीलों को गोरों से टक्कर लेना कठिन था।
    भोजपुरी के माध्यम से, भोजपुरी और गुजराती आदि में पत्रिकाओं को निकालकर लोगों ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किए।
    आर्य समाज की स्थापना हुई। स्वामी दयानन्द की चर्चा होने लगी। लोगों के प्रोत्साहन से मोरिशस में बहुत भोजपुरी लेखक और लेखिकाएं हुए जैसे कि दिमलाला मोहित जी, श्रीमती सरीता बुद्धु इत्यादि।
    आरम्भ में हम यह देख पाते हैं कि लोग छोटे-मोटे गीत गाते थे या कोई छोटी कविता। कभी मज़ाकि या भोजपुरी-संग्रह। भारत से कुछ सम्पर्क होने पर भोजपुरी कविताओं का कुछ अदान-प्रदान हुआ। और लोगों के प्रोत्साहन से लोगों ने भोजपुरी के लिए बहुत महान कार्य किया। सुचिता रामदीन की पुस्तक ’संस्कार मंजरी’ में सभी संस्कारों के गीत हैं। जैसे कि सोहर, पुत्र जन्मोत्सव, शिव-विवाह, दो मेला इत्यादि। आजकल एम.बी.सी. में भोजपुरी बहार तथा भोजपुरी टोप ५ जैसे कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।
    डा. कुबेर मिश्र मोरिशस में आए थे और उन्होंने भोजपुरी के बारे में विशेष खोज की थी। गांव-गांव जाकर उन्होंने भोजपुरी के गीतों का संग्रह किया। वे कई वृद्ध युवतियों से मिले और उनमें से एक का नाम था केवलपति मोहित। उनके पास भोजपुरी गीतों का खज़ाना था। श्री कुबेर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “मोरिशस के भोजपुरी लोक गीतों का विवेचनात्मक अध्ययन” (१९८१) है।
    श्री ब्रजेन्द्रकुमार भगत, जिनको लोग ’मधुकर’ नाम से अधिक जानते हैं, का आगमन हुआ। वे मोंताईं-लोंग धारा नगरी में रहते थे। उनके पास हर परिस्थिति के गीत पाए गए। ललना, सोहर, राजनीति, बिरसा, मज़ाकिया आदि-आदि जिनका संग्रह उनकी “काव्य-रचनावली” में विस्तार-पूर्वक पाते हैं”।
    भ्रमर गीतों की परम्परा में ’उद्धव’ की मधुकर कहलाते हैं और कष्ण के संदेशों को गोपियों तक पहुंचाते हैं, उन्हीं के नाम से इन्हें ’मधुकर’ कहा गया है।
    वास्तव में ये भोजपुरी के संदेश लाने में सफल हुए। उनके भोजपुरी के संग्रह में स्वदेश, १५ अगस्त तीस जनवरी, मटकोड़, कन्यादान, भंसुर के गारी, दहेज आदि-आदि बहुत गीतों का संग्रह है।
    आपसे आग्रह है कि कभी-न-कभी मौका पाकर ब्रजेन्द्रकुमार भगत (राष्ट्रीय) कवि की पुस्तक “काव्य रचनावली” अवस्य पढ़ें।
    मोरिशस में भोजपुरी के कुछ लेखकों व कवियों की पुस्तकें छपी हैं। कुछ लोगों का लेख व भोजपुरी रचनाएं भारतीय भोजपुरी पत्रिकाओं में छपी हैं।
    मोरिशस के भोजपुरी लेखकों व लेखिकओं की रचनाओं से प्रभावित होकर मोरिशस में अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन का आयोजन हुआ था। बहुतों को अन्तर्राष्ट्रीय भोजपुरी आवार्ड मिला था।
    भोजपुरी के पठन-पाठन के लिए महत्वपूर्ण कार्य किये गये हैं।
    महात्मा गांधी संस्थान तथा अन्य संस्थाओं द्वारा भोजपुरी को आगे बढ़ाने के लिए काफ़ी प्रयत्न हो रहा है।
    मोरिशस में बहुत से उभरते भोजपुरी लेखक व कवि नज़र आ रहे हैं।
    गायक और गायिकाएं उभर रहे हैं। लेखकों द्वारा भोजपुरी का पाठ्य्क्रम तैयार हो गया है। माध्य्मिक कालेज, विशेषकर वसुदेव विष्णुदयाल कालेज में भोजपुरी की पढ़ाई दस सालों से हो रही है।
     पुस्तक का नाम: ’भोजपुरी की हीरा मोती”
     लेखक का नाम: श्री दिमलाला मोहित
    कला मंत्रालय की ओर से भोजपुरी नाटक प्रतियोगिता आदि का आयोजन हो रहा है। कसैट की भड़मार हो रही है। प्रगति हो रही है।
    विश्वविद्यालय में भोजपुरी को बी.ए. के स्तर पर भी मान्यता मिली है। विद्यार्थी भोजपुरी की खोज करने में लालायित हैं।
    स्थानीय लेखक श्री दिमलाला मोहित द्वारा तैयार:
    १. “भोजपुरी हिन्दी अंग्रेज़ी” शब्द कोश – भाग ७ कड़ी एक।
    २. “भोजपुरी हिन्दी अंग्रेज़ी शब्द कोश – भाग ऽ कड़ी दो।
    इनमें शब्द, बुझौवल, लोकगीत, व्याकरण आदि-आदि ने भोजपुरी में नई जान फूंक दी है।
    अगले साल से प्राथमिक स्तर पर पहली कक्षा से भोजपुरी की पढ़ाई आरम्भ होगी।
    मोरिशस में भोजपुरी संगठन भोजपुरी को नई दिशा देगी ऐसा अनुमान है। अभी भी मोरिशस में अनेक प्रकार के गीत गाये जा रहे हैं। इसका आन्दोलन चला रहे हैं। प्राथमिक स्कूल में इसकी पढ़ाई शुरू हो रही है। लेकिन सबसे बड़ा और सही आन्दोलन भोजपुरी के लिए होगा तो यह होगा।
    “अपन में और औरू में भोजपुरी बोल।
    नय तऽ बेक दिन बहुते पछतयबऽ॥“

    “भोजपुरी न रहत तऽ हिन्दी नऽ आवत।
    और हिन्दी ना आवत तऽ हिन्दुत्व न रहत॥“
    आप सभी लोगों की सहायता, लगन से भोजपुरी का भविष्य उज्ज्वल रहेगा, ऐसी आशा है।

    इंटरनेट, टेलीविज़न और वीडियो गेम बच्चों को आक्रमक बनाते हैं।
    टेलीविज़न, इंटरनेट जैसी नई टकनीकों ने मनुष्य जीवन की जटिलता और निरसता को बहुत हद तक समाप्त कर दिया है। ज़रूरी सूचनाओं के प्रचार-प्रसार में टी.वी. और इंटरनेट अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह बहुत प्रभावी रूप से कर रहे हैं। देश-विदेश से संबंधित कोई जानकारी अगर हमें लेनी हो या दूर परदेश में हमारे दोस्त एवं रिश्तेदारों से अगर संपर्क रखना हो तो इंटरनेट के माध्यम से ये सभी ज़रूरतें चुटकियों में पूरी की जा सकती हैं।
    इंटरनेट के द्वार प्रेषक अपना संदेश चित्रों के साथ भेज सकता है तथा प्रापक घर बैठे उसे प्राप्त कर सकता है। ई-मेल संचार के अन्य उपायों से ज़्यादा सस्ता और तीव्र है। इंटरनेट के माध्यम से प्रेषक और प्रापक एक दूसरे से बात करने के साथ-साथ एक दूसरे को देख भी सकते हैं। टेलीविज़न द्वारा हम समाचार सुनने के साथ-साथ दृश्य भी देख सकते हैं। टेलीविज़न पर आनेवाले विभिन्न कार्यक्रम मनोरंजन का ज़रिया होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी होते हैं जो लगभग सभी लोगों के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने का कार्य करते हैं।
    हर सिक्के की जैसे दो पहलुएँ होती हैं, वैसे ही हम कह सकते हैं कि जहां टी.वी और इंटरनेट जैसी सुविधाएँ मनुष्य के लिए ज्ञानवर्धक होती हैं, वहीं दूसरी ओर हर व्यक्ति के चारित्रिक पतन का कारण भी बनती हैं। लोगों के वास्तविक जीवन की झूठी उम्मीदें दे सकती हैं।
    आजकल बच्चे इंटरनेट पर हिंसक विडियो गेम्स खेलते रहते हैं। यह भी हो सकता है कि अपने बच्चों की ज़िद्द के आगे घुटने टेकते हुए कइयों ने ऐसी विडियो गेम्स खुद लाकर भी दिये होंगे। एक सर्वेक्षण के मतानुसार यह प्रवृत्ति भले ही कुछ समय के लिए अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। लेकिन पारिवारिक और सामाजिक तौर पर इसके दीर्घकालिक परिणाम बहुत हद तक घातक सिद्ध हो सकते हैं।
    एक शोध के अनुसार जो उटाह ब्रह्मि यंग यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था बताता है कि टेलीविज़न पर दिखाई जाने वाली गाली-गलौज और हिंसक वीडियो गेम्स में होनेवाली मारधाड़ बच्चों के कोमल मन पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
    ऐसा भी माना जाता है कि वीडियो गेम्स की लोकप्रियता और ज़रूरत से ज़्यादा इनका प्रयोग बच्चों के भीतर आक्रमकता प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के साथ-साथ उनके नैतिक आचरण में भी गिरावट लाता है। कुछ लोग पूरी तरह से वीडियो गेम के आदी हो जाते हैं कि वे ठीक से अपने स्वास्थ्य का ध्यान ही नहीं रख पाते हैं। वे ठीक से खाते-पीते नहीं हैं और पर्याप्त व्यायाम भी नहीं करते हैं क्योंकि उनको समय ही नहीं मिलता है। वे अपने वीडियो गेम्स के साथ ही पूरे दिन-रात बिताते हैं। वे एक उचित शारीरिक कसरत का गठन भी नहीं कर पाते हैं।
    वैज्ञानिकों के परीक्षण के आधार पर यह देखा गया है कि जो बच्चे गाली-गलौज और अभद्र भाषा के संपर्क में ज़्यादा रहते हैं वे अभद्र और गलत व्यवहार करने में भी आगे रहते हैं। भविष्य में यही अभद्र व्यवहार आक्रमक स्वभाव में परिवर्तित हो जाता है। वे बिना सोचे-समझे दूसरों के साथ मारपीट शुरू कर देते हैं।
    हिंसक दृश्यों और व्यक्ति के स्वभाव का सीधा संबंध है। अकसर देखा गया है कि बच्चे जो भी अपने आस-पास के वातावरण में देखते और सीखते हैं वैसा ही व्यवहार करनी की कोशिश ज़रूर करते हैं। विशेषकर युवाओं और किशोरों के विषय में तो हम सभी यह जानते हैं कि टी.वी. और इंटरनेट की दुनिया से बहुत जल्दी वे ही प्रभावित हो जाते हैं। वे जल्द से जल्द अपने फ़िल्मी हीरो के जैसे बनने की कोशिश करते हैं। वे उनकी नकल उतारने लगते हैं जैसे उनकी तरह बातें करना, कपड़े पहनना और ‘फ़ूल’ दिखना उन्हें बहुत पसंद आता है और इसी के चक्कर में वे बिना सोचे-समझे कुछ भी करने को उतारू रहते हैं। वे फ़िल्मी दुनिया और यथार्थ जीवन के बीच के अंतर को भी भूल जाते हैं। असल में फिल्म बनाने वाले लोगों का एक-मात्र उद्देश्य अधिकाधिक धन कमाना होता है। लेकिन वे यह नहीं समझते हैं कि इससे उन्हें कोई लेनी-देना नहीं होता, कि फ़िल्म में दिखाए जाने वाले दृश्य और संवाद देखने लायक हैं या नहीं। बच्चे उस आभासी किरदार की जीवनशैली को ही आदर्श मानने लगते हैं। अगर उनका हीरो अभद्र भाषा का प्रयोग करता है तो बच्चे उसे ‘मार्डन स्टाइल’ समझते हैं और अपने दोस्तों के साथ उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। उनका यही स्वभाव आगे चलकर उनके भीतर उग्रता का प्रचार करता है।
    इंटरनेट जैसी सुविधाओं के आने से बच्चे अपने मित्रों और परिवारों के साथ बहुर कम समय बिताते हैं। परिवारों के साथ बैठकर गप-शप करने के बजाय वे आजकल एक कमरे में बंद अपनी दुनिया को टी.वी. और इंटरनेट तक ही सीमित किए हुए हैं।
    पहले ज़माने में जो भी खेल प्रमुखता से खेले जाते थे आज वह ‘बोरिंग’ और ‘आऊटडेटड’ माने जाते हैं। आजकल बच्चे को वीडियो गेम ज़्यादा भाता है। इसके प्रभावों को बिना जाने-समझे वे इन्हें खेलते हैं। हद तो तब हो जाती है जब अभिभावक उनकी इस पसन्द को अपनी स्वीकृति दे देते हैं। बच्चे उस गेम में होनेवाले लड़ाई-झगड़े को रोमांचक समझते हैं और उस रोमांच को अपने जीवन में लाने की कोशिश करते हैं। बच्चे भूल जाते हैं कि गेम की समाप्ति में हीरो सब ठीक कर देता है लेकिन अगर वे ही गलती वास्तविक जीवन में कर देते हैं तो सुधारा जाना लगभग असंभव हो जाता है।
    ऐसी हालातों में अभिभावकों का यह कर्त्तव्य बन जाता है कि वे अपने बच्चों को सही मार्गदर्शन दें। उन लोगों को बच्चों को ऐसे खेलों और कार्यक्रमों से दूर रखने के लिए बचावें जो उनके मस्तिष्क को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। माता-पिता को भी एक यह सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है कि वे अपने बच्चों को एक उज्ज्वल भविष्य दें।
    नि:संदेह समाज में अपनी और परिवार की पहचान निर्धारित करना भी उनकी एक महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी होती है। अभिभावकों को यह चाहिए कि वे अपने कर्त्तव्यों के मोल को समझें और बच्चों के भविष्य का एक मज़बूत आधार प्रधान करें।

  33. Narvada Devi Ramnochane says:

    मॉरिशस में भोजपुरी लोकगीत

    लोक गीत लोक साहित्य के अन्तर्गत आता है। लोक साहित्य में लोकगीतों का स्थान सबसे ऊँचा है। लोक गीत के न तो कोई रचयिता है और न ही वे लिखित रूप में होते हैं। लोकगीतों का जन्म कब हुआ, यह ठीक-ठीक बताना कठिन है। लोकगीत किसी व्यक्ति विशेष का नहीं होता है। भले ही आज लोकगीत की लिखित प्रतियाँ उपलब्ध नहीं हैं किन्तु मौखिक रूप से कई लोकगीत आज भी पाए जा रहे हैं और हमारे जीवन में उनका महत्त्व आज भी है।
    लोक साहित्य विज्ञान (१९७१) में डॉ. सत्येन्द्र लिखते हैं:
    “लोक गीतों के शब्दों में लोक मानस्परक अथवा आदिम प्रवृत्ति के जैसा एक प्रभाव होता है, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, केवल जिसे अनुभव किया जा सकता है। उसमें आदिम मानवीय भावना के उत्तराधिकरण का एक रहस्य रहता है। उसमें जैसे एक टोना रहा है। लोक गीत जैसे एक सदैवी वाक्य” है, जिसका न कोई निर्माता है न स्वर-संधाता। वह जैसे मानव-समुदाय में सहज ही स्वयं उद्धरित हो उठा है, और बिना प्रयास के सहज ही कंठ से कंठ पर उतरती हुई अपनी परम्परा स्थापित करता रहा है।”

    लोक गीत के माध्यम से गायक अपने मन की बातों को व्यक्त करता है और ये शब्द सहज तथा हृदयस्पर्शी होते हैं। लोक गीत मनुष्य के जीवन से लेकर उसकी मृत्यु तक की सोलहों संस्कार से संबंधित है। कई शताब्दियों से ग्रामीण जनता विभिन्न संस्कारों, ऋतुओं, पर्वों तथा देवताओं के गीत गा-गाकर अपना मनोरंजन करती आ रही है। समय के कठोर थपेड़ों ने इन गीतों को तोड़ा-मरोड़ा, इनको नये-नये प्रवाहों में प्रवाहित किया, इनमें कितने ही परिवर्तन लाए, परन्तु ये गीत आज भी समाज में अपना एक महत्वपूर्ण अलग स्थान बनाए हुए हैं।
    मॉरिशस में ब्रजेन्द्र कुमार भगत ’मधुकर’ एक महत्वपूर्ण भोजपुरी गीत रचयिता के रूप में देखे जाते हैं। ’मधुकलश’ (१९६५) तथा ’मधुबहार’ (१९७०) उनके भोजपुरी लोक गीतों के संग्रह हैं। ’मधुकलश’ में भोजपुरी लोक गीतों के अन्तर्गत भजन, विवाह-गीत, देवी-देवताओं के स्तुति-गान, बिरहा, झूमर आदि संस्कारों के गीत गाए जाते हैं। भगत जी की ’मधुलिका’ (१९९२) नामक रचना में सोहर तथा झूमर पर आधारित गीत हैं।

    भोजपुरी लोकगीतों के भेद

    डॉ. उदय नारायण गंगू के ’मॉरिशस का भोजपुरी लोक साहित्य एवं भारतीय संस्कृति’ (२००२) पर आधारित भोजपुरी लोक गीत परम्परा, संस्कार, पूजा-पाठ, ऋतु संबंधी होने के कारण इनके निम्नलिखित भेद हैं:
    १. संस्कार संबंधी गीत,
    २. ऋतु संबंधी गीत,
    ३. व्रत संबंधी गीत,
    ४. भक्ति संबंधी गीत,
    ५. देवी-देवता संबंधी गीत,
    ६. श्रम संबंधी गीत,
    ७. खेल संबंधी गीत,
    ८. जाति संबंधी गीत।

    मॉरिशस में क्रियोल

    इस विषय के अन्तर्गत शोध-छात्रा संक्षिप्त में यह बताने का प्रयास करेगी कि मॉरिशस में क्रियोल का प्रयोग कैसे आरम्भ हुआ और इसकी क्या स्थिति है। मॉरीशस में क्रियोल का प्रयोग आम बोलचाल के लिए होता है।

    क्रियोल एक ऐसी बोली है जिसका प्रयोग हर एक मॉरिशस वासी करता है। चाहे वह शिक्षित हो या अनपढ़, धनवान हो या गरीब, वह क्रियोल के माध्य्म से ही अभिव्यक्ति करता है। मॉरिशस में अधिकतर क्रियोल ही बोली जाती है और इसे बोलने में मॉरिशसवासियों को आसानी होती है।

    भारतीय शर्तबन्द मज़दूरों के मॉरिशस आगमन के पूर्व ही यहाঁ अन्य धर्म और भाषा के लोग बसते थे जिनमें से अंग्रेज़ी और फ़्रेंच बोलने वाले थे। फ़्रेंच उपनिवेश के समय में फ़्रेंच भाषा का प्रचार-प्रसार हो रहा था। उस समयहर कोई शिक्षित नहीं था। सुचीता रामदीन की (१९८९) में ऐसी मान्यता है कि मज़दूरों को अपने मालिकों से फ़्रेंच में बोलना पड़ता था। अशिक्षित होने के कारण वे इस भाषा में सही ढंग से बातचीत नहीं कर पाते थे। अतः यह कहा जा सकता है कि वे फ़्रेंच को बिगाड़कर कहते थे और फलतः वह क्रियोल बन गया। और धीरे-धीरे मॉरिशस में क्रियोल आम जनता की बोली बन गई। क्रियोल को भाषा बोलना अनुचित होगा क्योंकि इसका निश्चित लिखित रूप अब तक मॉरिशस में उपलब्ध नहीं है। क्रियोल की आढ़ में भोजपुरी भलि-भाঁति विकसित न हो सकी। मॉरिशस में पाए जाने वाला हर नागरिक हर एक क्रियोली के माध्यम से अपनी बात व्यक्त करता है और अन्यों के संपर्क में आता है। क्रियोली को सिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसका प्रयोग इतनी अधिक मात्रा में होता है कि हर एक मॉरीशस्वासी इसे आसानी से समझकर बोल लेता है। मॉरिशसवासी अधिक्तर तीन भाषाओं में अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं फ़्रेंच, क्रियोल तथा भोजपुरी। ऐसा कहा जा सकता है कि मॉरिशस की मातृ भाषा क्रियोल ही है।

    मॉरिशस के भोजपुरी लोकगीतों एवं वाक्यों में प्रयुक्त क्रियोल शब्दों की सामान्य प्रवृत्तियाँ

    आजकल मॉरिशस में गाए जा रहे लगभग हर नए भोजपुरी गीत में क्रियोल के शब्द अवश्य पाए जाते हैं। इस विषय के अन्तर्गत इन पहलुओं पर प्रकाश डाला जाएगा:
    (क) मॉरिशस में भारतीय मूल के लोगों की बहुलता
    (ख) मॉरिशस के लोगों में क्रियोल का प्रयोग
    (ग) भोजपुरी संदर्भों में क्रियोल शब्दों के प्रयोग के उदाहरण
    (घ) भोजपुरी लोकगीतों में क्रियोल शब्दों के प्रयोग के उदाहरण

    जैसा कि पहले कहा गया है कि हालाঁकि मॉरिशस में भारतीय आप्रवासियों की बहुलता थी, अधिक लोग भोजपुरी बोलते थे फिर भी धीरे-धीरे ही सही क्रियोल का भोजपुरी पर प्रभाव अधिक पड़ा। सुचीता रामदीन, संस्कार मंजरी (१९८९) के अनुसार जब स्वयं भोजपुरी बोलने वाले लोग इसे वह सम्मान नहीं दे पाए तब इसकी स्थिति दयनीय पड़ गई। किसी न किसी रूप मे अपेक्षित होते हुए भी भोजपुरी आज भी जीवित है। आज हर एक मॉरिशसवासी क्रियोल में बतचीत करता है । मोका, कोत-दोर, पाय, रोज़-हिल के कुछ छात्रों एवं अभिभावकों से एक वर्तालाप से यह बात स्पष्ट हुई कि वे आपस में तथा घर पर अपने परिवार के सदस्योम से क्रियोल में ही बात करते हैं। उनके माता-पिता भोजपुरी का प्रयोग कम करते हैं क्योंकि बच्चे यह भाषा नहीं समझते हैं। यहाँ तक कि उनके दादा-दादी को भी अपने नाती-पोतों से बात करने के लिए क्रियोल का सहारा लेना पड़ता है। । हालाँकि लोग कभी-कभी भोजपुरी का भी प्रयोग कर लेते हैं। चाहे वह गाঁव हो या शहर क्रियोल का प्रयोग अधिक होता है। नई पीढ़ी के अधिकतर मॉरिशस वासी अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए क्रियोल को ही अपना माध्यम बनाते हैं। कुछ अपवाद भी हैं जहाঁ लोग भोजपुरी को भी अपना माध्यम बनाते हैं।

    वास्तविकता तो यही है कि समय के साथ-साथ अन्य सभ्यता का भोजपुरी पर प्रभाव पड़ा। भोजपुरी में धीरे-धीरे क्रियोल के शब्द आने लगे। आज भोजपुरी में क्रियोल के शब्द इस प्रकार समाहित हो गए हैं कि कहना कठिन हो जाता है कि क्रियोल शब्द कहाঁ हैं और भोजपुरी के शब्द कहाঁ । भोजपुरी के एक सरल वाक्य में कई क्रियोल शब्द पाए जाते हैं। वाक्यों के साथ ही भोजपुरी के गीतों में भी इनके कई सशक्त उदाहरण मिलते हैं।

    कुछ शब्दों के उदाहरण:
    फ़्रेंच क्रियोल Creole भोजपुरी हिन्दी
    शेमें सीमें simein सीमा रास्ता
    पेची पीमाঁ चीपीमा tipima पिती पीमा चोटी मिर्च
    बानान बानान banane बनान केला
    ला बुचिक लाबुचिक laboutik बुतीक दुकान
    साक साक sac सकवा बस्ता
    ला क्विज़िन लाकुज़िन lacousine लकजीन रसोईघर
    ला राज्यो राजो radio रजोवा रेडियो
    ला ताब्ल लाताब la tab लतबवा मेज़
    ले ली लीली lili लीली पलंग
    पोम दामू पोम दामु pomme d’amou पलदामुन टमाटर

    कुछ वाक्यों के उदाहरण:
    १. लतबवा आनऽ – मेज़ ला दीजिए।
    २. बुतीक जो – दुकान जा।
    ३. बजार में पिती पीमा बा – बाज़ार में छोटी मिर्च है।
    ४. सकवा भारी बा – बस्ता भारी है।
    ५. लकजीन में पलदामु बा – रसोईघर में टमाटर हैं।
    कु्छ लोक गीतों के उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं:
    संस्कार मंजरी, मॉरिशस के भोजपुरी संस्कार गीत, सुचीता रामदीन (१९८९),
    झूमर: खरगोश के शिकार की महत्त्वपूर्ण चर्चा
    इस झूमर में खरगोश को मारने की चर्चा की गई है। इस गाने में यह बताया गया है कि किस प्रकार खरगोश खेती को नष्ट कर रहा है। खरगोश ने नाक में दम कर रखा है और इस कारण उसे मारने की चर्चा की गई है।

    मारो मारो खरगोसवा के फिजी से
    कान काटेला खरगोसवा जड़ी से॥१॥
    जरीको के खेत सफ़ा करेला काटि के
    मारो मारो खरगोसवा के फिजी से॥२॥
    खरगोसवा के गोसवा बड़ा मज़ेदार
    पका के लियावऽ खूबे बूयोंदार॥३॥
    मारो मारो खरगोसवा के फिजी से
    सहेबवा बोलेला ’लियेव मो माঁज़े॥४॥
    सो लापो से बोने मो राঁज़े
    मारो मारो खरगोसवा के फिजी से॥५॥
    लाक बनाके चाचा लियाने
    खरगोस फঁसा के भइया लियाने
    मारो मारो खरगोसवा के फिजी से॥६॥

    इस झूमर पर अनेक क्रियोल शब्द पाए जाते हैं जिनको रेखांकित किया गया है । इनका अर्थ निम्नलिखित हैं:
    १. फिजी – बंदूक
    २. जरीको – सेम
    ३. बूयोंदार – क्रियोल तथा भोजपुरी मिश्रित शब्द – बूयों क्रियोल शब्द है जिसका अर्थ है भाजी और पानी से बनाया गया एक शोरबा
    ४. लियेव मो माঁज़े –मैं खरगोश खाता हूঁ
    ५. सो लापो से बोने मो राঁज़े –उसके चमड़े से टोपी बनाता हूঁ
    ६. लाक – जाल

    संस्कार मंजरी, मॉरिशस के भोजपुरी संस्कार गीत, सुचीता रामदीन (१९८९),
    झूमर – मालिक के कारखाने के जलने का वर्णन …
    इस झूमर के माध्यम से गोरे मालिक के कारखाने के जलने की झलक दिखलाई गई है। गोरा मालिक पछताता है और मज़दूर से कहता है कि अब से कारखाने की छत छप्पड़ की नहीं होनी चाहिए। कारखाने में पाए जाने वाले लगभग सभी यंत्र जलकर बेकार हो जाते हैं। यही चित्र इस गाने में आगे मिलती है।

    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥१॥
    रुक गइले सिलेनवा हो खाड़ भइले लासेनवा
    बीरो के धउर के ए जी अइले कोलोमवा
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥२॥
    सोचऽता कपतनवा एजी बइठल बा कुपेरवा
    गाल पर हाঁत धरके रोवऽता सदरवा
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥३॥
    जर गइले मुलवा ए जी टूट गइल ढঁकवा
    हुवाঁ के लोग अब भइले बेहाल
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥४॥
    बोलऽता मानेस साहेब “उ ताঁदे ला गेते
    आस्तेर लाओ मुलें लापाइ नापा मेते!”
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥५॥
    फुरनो में आग लगल जनातेर में पानी
    सारी मुला जर गइल लछमिनिया निसानी
    मुसे मानेस के मुलवा जर गइले राम॥६॥

    मुसे – श्रीमान, क्रियोल – मिसिये
    मुलवा – कारखाना
    सिलेनवा – गन्ने पेरने की मशीन
    लासेनवा – ज़ंजीर
    बीरो – दफ़्तर
    कोलोमवा – सरदार
    कपतनवा – कप्तान, क्रियोल – कापितेन
    कुपेरवा – गन्ना काटनेवाला
    ढकवा – क्रियोल – दाঁ काঁ –डेरा
    उ ताঁदे ला गेते –आप सुनते हैं, देखिए
    आस्तेर लाओ मुलें लापाइ नापा मेते –ेअब कारखाने के ऊपर छ्प्पड़ मत डालना

    फुरनो –भट्टी
    जनातेर – चीनी पैदा करने वाली मशीन
    लछमिनिया – चिमनी –क्रियोल –लासेमिने।

    मॉरिशस में भोजपुरी पॉप गीत

    आधुनिक युग में, प्रौद्योगीकिकरण की दुनिया में, समय के बदलते समाज परिवर्तनशील होता जा रहा है। इसी परिवर्तन का प्रभाव गीतों पर भी पड़ रहा है। मॉरिशस में भी यह प्रभाव देखा जा रहा है। भोजपुरी के लोकगीतों को पॉप बनाया जा रहा है। मॉरिशस में बहुत पहले केवल साधारण गीत लिखे जाते थे तथा उनको साधारण रूप से गाया भी जाता था। किन्तु समय के बदलते गीतों में भी परिवर्तन होते गए। भोजपुरी लोक गीत भोजपुरी पॉप गीत में परिवर्तित होने लगे। पहले के ज़माने में लोग शिक्षित नहीं थे, उन लोगों के लिए मनोरंजन के कम साधन हुआ करते थे। ऐसा कहा जा सकता है कि इसी कारण वे भोजपुरी के सपाट गीत सुनकर अपना मनोरंजन कर लिया करते थे। दिन बीतते गए और हर एक के लिए जीवन यापन के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण बनता चला गया। जहाঁ एक समय में लोग भोजपुरी में केवल आपस में बातचीत किया करते थे, शिक्षा की महत्ता को ध्यान में रखते हुए वे अब फ़्रेंच का भी प्रयोग करने लगे। फ़्रेंच एक ऐसी भाषा है जिसकी पढ़ाई पाठशालाओं में आरम्भ हो चुकी थी। लेकिन बहुत लोग फ़्रेंच बोलने के आदि नहीं थे। फ़्रेंच भाषा पर पूरा अधिकार न होने के कारण वे क्रियोल का ही प्रयोग करने लगे। इस तरह भोजपुरी वाक्यों में फ़्रेंच के शब्द आने शुरु हो गए और जहाঁ फ़्रेंच शब्दावली नहीं मिलती थी तो वहाঁ उसका बिगड़ा हुआ रूप प्रयुक्त किया जाता था, अर्थात् क्रियोल शब्दों का प्रयोग किया जाने लगा। धीरे-धीरे भोजपुरी में क्रियोल शब्दों का आगमन होता गया। भोजपुरी के वार्तालाप में अधिकतर क्रियोल के शब्द सुनाई देते हैं। आज जब लोग भोजपुरी में बातचीत करते हैं तो पता ही नहीं चलता हैं कि कौन-से शब्द भोजपुरी के हैं और कौन-से क्रियोल के। क्रियोल के शब्द भोजपुरी में इस प्रकार समाहित हो गए हैं कि शब्दों की पहचान करना कठिन हो गया है। लगता है जैसे क्रियोल शब्दों का भोजपुरीकरण कर लिया गया है।

    चयनित गीतों की सूची गायक/एल्बम
    १. जलसा भोजपुरी लवर्ज़
    २. नया सिरे कुनल बाबुलाल
    ३. ज़ुबेदा रम्भा रामतोहल
    ४. सऽदार बोले ए त्वा रम्भा रामतोहल
    ५.चक चका चक रम्भा रामतोहल
    ६. सामदी के हरदी भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    ७. गाঁव के छोकरी नीरज गुप्त मधु
    ८. बीवी के मुँह नीरज गुप्त मधु
    ९. लेकोल में रोमांस भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १० . ए दादी भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    ११ . ए लंगरो भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १२ . चल गोरी भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १३ . लाय लाय लाय लाय रम्भा रामतोहल
    १४ . निसा-निसा भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १५ . सास मोरे सुमड़िन भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १६ . एगो फट भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १७ . पिती पिती छोकड़ी कुनल बाबुलाल
    १८ . पेंक-पेंकु भोजपुरी बाजाबाजे बोय्ज़
    १९ . एही लकुजिनवा रम्भा रामतोहल
    २० . अगे मिसिये ज़ोर्ज़ रम्भा रामतोहल

    इन्हीं गीतों के आधार पर शोध-प्रबन्ध आगे बढ़ाया जाएगा।

    निष्कर्ष के रूप में यह अध्याय भोजपुरी के आगमन, उसके प्रयोग, क्रियोल के प्रयोग पर आधरित है। पॉप गीत हो या लोकगीत क्रियोल का भोजपुरी पर प्रभाव पहले से ही उपस्थित था लेकिन इसका परिणाम समकालीन समाज में देखा जा रहा है।

  34. Hinchoo Komal Devi says:

    कात्र कोको सरकारी पाठशाला
    फ़लाक ज़ीले में स्थित, कात्र कोको गाँव में यह प्यारी सी पाठशाला, बहुत ही भव्य है। न सिर्फ़ इसका इमारत सुंदर है बल्कि इसमें किए जाने वाले काम भी सराह्नीय हैं। चार सौ पचास छात्रों की यह पाठशाला कात्र कोको गाँव के मध्य में पाया जाता है। यह एक पुरानी पाठशाला है, लेकिन इसका नवीकरण दो साल पह्ले, दिसम्बर २००९ में हुआ। श्री देव जौनकि जी फ़र्वरी २०११ में ही इस पाठशाला के मुख्य अध्यापक नियुक्त हुए। उनके संरक्षण में २० अध्यापक तथा ३ चप्रासियॉ काम करते हैं। श्री देव जी ने इस पाठशाला को एक नया रुप दिया है। उन्होंने स्कूल के बाह्य तथा आन्तरिक भाग में सुधार लाया है। आजकल सभी अध्यापक चप्रासी तथा छात्र‌‌‌‌- छात्राएँ एक उल्लास के साथ पाठशाला आते हैं। सालों से बच्चों के काम आने वाली कुछ पुस्तकें, विभिन्न उपकरणें तथा शिक्षक के काम आने वाली कुछ वस्तुएँ दफ़्तर में बन्द पड़ी थीं। अब सभी लोग इनका उपयोग करते हैं। श्री देव जी का यही कथन है; – मेरे छात्र और मेरे अध्यापक मेरे परिवार के सदस्य हैं, इनको हाथ लगाने से पहले मुझ से तकराना होगा। सभी छात्र व अध्यापक अब समय पर पाठशाला आते हैं। वे अनुपस्थित भी कम होते हैं। सब लोग अपना अपना कर्तव्य सही ढ़ंग से निभाते हैं। पाठशाला हमेशा साफ़ और शांत रहता है। सभी छात्र‌‌‌‌- छात्राएँ कतार में शौचालय जाते हैंऔर कतार में वापस लौटते हैं। अध्यापक अध्यापिकाएँ मुख्य अध्यापक से खुलकर कक्षा की समस्याओं तथा छात्रों की समस्याओं की चर्चा करते हैं। मुख्य अध्यापक भी अपकनी ओर से समस्या का ह्ल ढूँढने का भरपूर प्रय्त्न करते हैं। छठी कक्षा का परीक्षाफल भी ५ प्रतिशद से बढ़ गया है। इस पाठशाला में काम करने से मन की शान्ति तो मिलती ही है, लेकिन आगे बढ़ने की प्रेरणा भी मिलती है। “यदि एक पाठशाला का मुख्य अध्यापक संगठित तथा सुव्यवस्थित हो तो वहॉ काम करने में प्रेरणा मिलती है।

  35. Hinchoo Komal Devi says:

    अच्छा जीवन
    जीवन की समसयाएँ कभी हमारा साथ नहीं छोड़तीं। कुछ भी हो दुख हमारे इर्द गिर्द मंदराता रहता है। कोई कितना भी खुश क्यों न हो,वह खुशी बहुत समय के लिए नहीं होती। जैसे सुख थोड़ी देर के लिए हमारा साथ देता है वैसे ही दुख भी थोड़ी देर के लिए ही हमारे साथ रह्ता है। मनुष्य अपने जीवन में तभी सुखी से रह सकता है जब वह दुख का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो। समस्या आने पर हिम्मत हारने से कुछ नहीं मिलेगा। कुछ लोग कह्ते हैं कि जिसके पास धन है वह हमेशा खुश रह्ता है। धनी से धनी आदमी के जीवन में दुख का साया पड़ता है।वृद्ध लोग हमेशा कहते हैं – “जैसी करनी, वैसी भरनी” यह कहावत भी कभी कभी सत्य लगती है। जो मनुष्य अच्छा काम करता है, वह हमेशा सुखी रह्ता है। उसके जीवन में कम दुख होता है। और जो मनुष्य बुरा काम करता है,या बुरे विचार रखता है वह सदा संकट तथा पीड़ा का सामना करता है। हमें जीवन में अच्छा काम करना चाहिए। अच्छे काम का लक्ष्य है अच्छा जीवन। स्वार्थी होकर जीना अच्छा नहीं। यदि ह्म प्यार बाँटेंगे तो बद्ले में हमें प्यार मिलेगा। कुछ लोग समस्याओं से तंग आकर अपनों का साथ छोड़ देते हैं। ऐसा करना कहां की समझदारी है? ऐसा करने से समस्याएँ कहां खत्म होंगी, ये तो और बढ़ती जाएँगी। सह्नशील होने तथा धैर्य रखने से हम फट्टू नहीं बन जाते। ना ही हमारा आत्म सम्मान घटता है। अच्छे जीवन प्राप्त करने के लिए, हमें अच्छा बनना चाहिए! सुखी जीवन का मतलब खुश होना नहीं है।

  36. Hinchoo Komal Devi says:

    मोरिशस में पर्यटन उद्योग
    मोरिशस अपने समुद्र –तट, सफ़ेद बालू और सूर्य की किरणों के लिए संसार भर में प्रसिद्ध है। हमारे देश के प्राक्रितिक सौंदर्य के कारण पर्यटन उद्योग का विकास हो रहा है। हर साल यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। साल भर में पांच लाख से अधिक पर्यटक यहां छुट्टी मनाने आते हैं। पर्यटकों की सुविधाओं के लिए हवाई-अ‍ड्डे कॅ पुन: निर्माण किया गया। संचार-साधनों का आधुनिकीकरण हुआ है। नई नई सड़कें भी बनी हैं। समुद्री इलाकों में नए-नए होटलों का निर्माण हुआ है। पर्यटकों के मनोरंजन के लिए तरह-तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अपनी यात्रा के दौरान वे यहाँ खूब पैसे खर्च करते हैं। देश के कारिगरों (artisanal) के कामों से प्रभावित होकर वे खूब खरीदारी करते हैं। फलस्वरुप हमें विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। इस तरह पर्यटन उद्योग से हमें बहुत आर्थिक लाभ हो रहा है। इसी कारण कृषि और कपड़े उद्योग के बाद पर्यटन उद्योग का स्थान आता है। पर्यटन उद्योग में बहुत युवक-युवतियाँ तरह-तरह की नौकरियों में लगे हैं। कोई बावरची या माली है तो कोई टैक्सी ड्रायवर। कुछ लोग के सजावट में लगे रहते हैं तो कुछ पर्यटकों के मनोरंजन का प्रबन्ध करते हैं। पर्यटकों के लिए तरह तरह के लघु उद्योगों का विकास हुआ है। समुद्री इलाकों के छोटे छोटे दुकान भी उन्नति करके बहुत आगे निकल गए हैं।वहाँ के लोग तो अब पर्यटन उद्योग से ही अपना जीवन आगे बढ़ाते हैं। पर्यटक यहाँ पर अपने को सुरक्षित अनुभव करते हैं। यहाँ साल भर मौसम सुहाना रहता है। न अधिक गरमी होती है और न अधिक सरदी। इतना ही नहीं अन्य दशों की तरह यहाँ प्राकृतिक प्रकोपों की संभावना कम रहती है।यहाँ कोई हिंसक पशु भी नहीं है। हमारे स्वर्णिम सूर्य का फायदा उठाकर वे हर तरह के समुद्री खेलों में भाग लेते हैं, और अपना मन बहलाते हैं। यहाँ के लोग खुले दिल से पर्यटकों का स्वागत करते हैं। दुनिया के कोने कोने से आए पर्यटक हमारे बहु सांसकृतिक देश से प्रभावित होते हैं। पर्यटक यहाँ के रीति रिवाज,खान-पान, रहन-सहन आदि से प्रस्न्न होते हैं। हमारे देश में सभी शांतिपूर्वक रहते हैं। इसी कारण पर्यटक यहाँ आना पसन्द करते हैं। पर्यटन उद्योग मोरिशस के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हुआ है। इस उद्योग को मज़बूत बनाने के लिए सरकार हर प्रकार से प्रयत्नशील है। आजकल हर कोई ऐसे वैसे काम छोड़कर टूरिस्त टैक्सी ड्रायवर बन रहे हैं,या होटलों में काम करने जा रहे हैं।

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