BA Yr 1: Lecture 6 – काव्य लक्षण (शेष)

Friday 07 October 2011, 09.30 – 11.30, BA Yr 1, Literary Theory & Forms of Literature

 

सभी को नमस्कार.

पिछली बार काव्य-लक्षण पर तैयार powerpoint presentation के मूल बिंदु ब्लॉग पर अपलोड कर दिया था. इस बार इसी विषय पर चर्चा आगे बढ़ने वाली थी. परंतु पुन: आपकी ओर से काफ़ी छात्रों की लापरवाही इस रूप में रही कि बिना तैयारी के क्लास में आए. इस प्रकार के रवैये अक्षम्य है. कृपया अगली बार सभी, जी हाँ! सभी लोग पूर्व तैयारी के साथ कक्षा में आएँ. कोई भी बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा. वैसे भी विषय तो गंभीर है ही इसके अतिरिक्त आपकी ओर से सतत अध्ययन व अनुशासन की अपेक्षा है. आज की नोट पर विचार करें.

काव्य लक्षण के संबंध में संस्कृत आचार्यों के मतों को आपके सामने रखा गया.    इस संदर्भ में कृपया पिछले लेक्चर के नोट्स देखें.

“काव्य शब्दार्थमय है” इस मूल मंत्र पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए भरत मुनि की  काव्य-संबंधी मान्यताएँ रखी गईं. उस काल में नाटकों का प्रचलन था, इसलिए मूलत: सभी संस्कृत आचार्यों ने नाटक को ही केंद्र में रखते हुए काव्य की अवधारणा /परिभाषा सामने रखी.

भामह के “शब्दार्थौ सहितौ काव्यं” का भी विश्लेषण किया गया.

दण्डी, रूद्रट, वामन, कुंतक, विश्वनाथ, आनंदवर्धन, मम्मट, पं जगन्नाथ आदि संस्कृत आचार्यों के मतों की भी व्याख्या की गई.

Note 1: इन आचार्यों द्वारा दी गई काव्य-संबंधी परिभाषाओं का ज्ञान तो अनिवार्य है ही, साथ ही परिभाषाओं का उल्लेख करते हुए उनका विश्लेषण करना न भूलें. अपने समकालीन समाज व कविताओं की प्रवृत्तियों के परिप्रेक्ष्य में इन अवधारणाओं की सार्थकता, इनकी उपयोगिता आदि का विश्लेषण अनिवार्य है (यदि परीक्षा में अधिक अंक कमाने का लक्ष्य है तो!!). साथ ही न भूलें कि ये परिभाषाएँ हमें साहित्य की आलोचना करने के लिए दृष्टिकोण प्रदान करती हैं. साहत्य की समीक्षा हर साहित्य के छात्र  के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है. इसी क्रम में इस मोड्यूल की भी सार्थकता व प्रासंगिकता सिद्ध  होती है.

Note 2: अगली बार काव्य लक्षण समाप्त किया जाएगा. इसलिए सही मायने में आप सहयोग प्रदान करते हुए तैयारी के साथ कक्षा में आएँ.

Note 3: इंटरनेट पर इस संदर्भ में अनेक सामग्री उपलब्ध हैं, कृपया देखें.

धन्यवाद,

शुभम्,

विनय

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

6 Responses to BA Yr 1: Lecture 6 – काव्य लक्षण (शेष)

  1. Sarika Devi Judhun says:

    Namaste guruji. Mein kshamaprarthi hun, kyunki roman letter mein type kar rahi hun. Mein iss samay MGI ki computer lab mein hun aur purna prayaas ke pashchaat bhi Hindi ka software download nahin kar payi.
    Aapki kaksha atyant hi dilchasp hai. Aapka jo parhane ka maadhyam hai wa atyant prabhavotpaadak hai. Hamaari pichli kaksha jo hai wah Kaavya lakshana par aadhaarit tha. Kaksha mein hamne vividh sanskrit aachaaryon ki vistaarpurvak charcha ki. Kaavya ki srishti hetu hum apne man tatha mastishk donon ka prayog karte hai, aur issi prakar kavi apni srijanaatmak lekhan prastut karta hai. Atah aapki kaksha ke baad mein yaha sochne par vivash ho gayi ki harek manushya ke andar ek kavi hai aur issi baat ko lekar mei bhi kavita likhne ka prayaas karungi.

  2. Madhvi Bholah says:

    namaste guruji,
    mein mgi ke computer lab se likh rahi hoon,maine MY.T ke liye ek mahine se apply ki thi lekin iss mein ab aur do teen mahine lagengi telecom se pata chala..ab maine ADSL apply ki hain.isi ki pratiksha mein hoon..
    isi liye kshama chahati hoon!!
    pichle kaksha main aapne aacharyon par charcha kiya tha..
    aapne ounke vicharon ko sparsh bhi kiya..
    koi aacharya alaankar par bal deta hain to koi arth aur shabd par….ye sab kavya ki soundarya barane ke liye..
    kavya lakshan mein bahut sikhne ko mil raha hain kekin saath saath mein yah vishay thora niras hain..phir bhi samajhne mein bahut kathinai nahin ho rahi hain kyun ki aap sahi roop se samjha rahe hain..
    dhanyavad aapko…

  3. soumaan puran says:

    Namaste guruji,

    Sarvapratham hindi mein na likhne ke liye main apse shama chahti hoon. Main iss samay MGI ke ‘lab’ mein hoon.Apki peechli kaksha mujhe achi lagi halaki maine yaktigat staar par koi vishesh tayyari nahin ki thi.Iske liye main punaha shamaprapti hoon .Gat kaksha mein ,vivdh sanskrit acharyon ke kavya lakshan par adharit unke vichar vistar purvak prapt hue.Mujhe yaha bhi gyat hua ki rachna ke liye keval shabdoon ki avashyakta nahin varan uske liye kalpana ki bhi avashakta parrti hein.Iske atirit mujhe apke padhane ka madhyaam atyant hi acha laga kyonki mere liye yaha naya hein ..

    Main yahi par samapt karongi kyunki mera samay nikla ja raha hein.
    Dhanyavad

  4. Kushboo Bisram (Khushi) says:

    Namaste Guruji, sarvapratham main aapko aabhaar prakat karti houn kyunki aapne sikhaane ki jo vidhaa chooni hein waha ati uttam hein aur shaayad hi MGI mein aapke jaisa vidyaarthiyon ko samajhne wala hoga…
    Aapki pichhli kakshaa mein main anupasthit thi kyunki mujhe private Doctor ke yahan jaana tha, aap to meri sthiti se to parichit hein hi.
    Anupasthit hone ke baawajud bhi mujhe saari shikshaprad notes mili jo aapne blog par dala hein, aapne jo Kavyalakshan ke baare mein kahan hein, usske maadhyam se, rishis muniyon thatha anya chizon mein meri gyaan ki vriddhi huwi hein… Dhanyavaad Guruji….

  5. Parvatee Doolarah says:

    Namasté Guruji,

    Guruvaar ki kaksha main der se aane ke liye shama mangti houn.

    Apki lecture kavya par adharit tha,anek aacharyon par charcha ki gayi unke bare mein sikhne ka awasar mila…

    Aarchayon ke vicharon ke bare mein sikhne ko mili, jaise meri saheli ne kaha koyi alaankar par bal deta hain to koi arth aur shabd par.

    Aapne jo parane ka madhaym apnaya hain, bahut hi dilchasp hain kyunki ek taraf hum apki baton ko sounte hain aur dousri aur powerpoint ke madyam se hum par patein hain. Arthat kavya lakshan jaise vishav ko parane ka yahi sahi madyam hain kyunki yaha vishay thora sa “bulky” hain.

    Dhanyavaad

  6. khus21jaan says:

    आज मैंनें रीतिकाल और आधुनिक काल के बारे में जानने का सुअव्सर प्राप्त हुआ. रीतिकाल,उत्तर मध्यकाल से भी जाना जाता है
    रीतिकाल अव्यव्स्था का युग था.इस काल में कवियों ने अपनी विलासपुर भावनाओं पर भक्ति का आवरन दालने की कोशिश की.रीतिकालिन कवियों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है.ये हैं रीतीबंध, रीतिसिध्द और रीतिमुक्त
    .रीतिसिध्द नामकरन केवल लक्श्य ग्रंथ प्रस्तुत करने वालों के लिये किया जाता है. रीतिबंध्द काव्य में : अशलीलता , आश्रय्दाता की प्तशंस,अतीशय अलंक्रिति,चमत्कारर्प्रियता, रुदिवादिता,मन की सुश्म भावतरंग्गों को अभिव्यक़्त करने की अशमता, आदि दोष रीतीबंध्द कविता को जरोन्मुख बना देते हैं ,पर रीतिमुक्त धारा के कवि मात्र कलात्मकता को ही साध्य ना मानकर मन की अक्रित्रिम , निश्कपत भावानुभव वणना को अपना साध्य मानते थे .
    रीतिकाल : १) कवि लोग पहले रस अथ्वा अलंकार के लक्शन बताते.
    २) अचाय वामन के अनुसार ” विशिश्ता पद रचना रीति:” ,अथाथ विशेश शैली युक्त पद राचना ही रीति है, रीतिकाल के अधिकांश कवियों की लक्शन रचना संस्क्र्त की पूस्तकों पर अधारित है, भिखारी दास हिंदी के प्रथम रीति कवि हैं, इनकी रचना “काव्य निर्नय है” .
    ३) कवियों ने इस काल में श्रन्गाररस, नायक्‌-नायिका भेद और नखशिख-वर्नन पर ही अधिक लिखा ,उनकी रचनायें सामाजिक अभिव्यक्ति से वंचित ही रही.
    ४) रीतिकाल कवियों ने अपनी कविता अधिकतर कवित्व और सवैयों में लिखी है.वास्तव में ये दो छंद श्रंगार के लिये बरे उपयुक्त होते हैं .इस काल की कविता श्रंगारप्रधान थी परंतू वीररस की भी कवितायें हुई हैं,कभी कभी तो श्रंगाररिकता अशलीलता की सीमा तक पहूच गयी है,किंतु इसके लिये उस समय का विलासी समाज ही उत्तरदायी है.
    ५) रीतिकाल के कवियों के लिये भक्ति एक मनोवैग्यानिक कवच के रुप में रह गयी थी, राधा क्रिश्ना की आर में ये कवि सामान्य नायक-नायिका का विलासपुर्न चित्रन करते थे.
    आधुनिक काल की सर्व्प्रमुख प्रव्रिति और महानतन देन खरी बोली में गध का विकास हैं, इस युग में गद्य कि अधिकता और अनेक उत्तम शैलियों को देखकर आश्चर्य होता है, इसके प्रमख कारन हैं राजनैतिक ,धार्मिक और सामाजिक शेत्र में अनेक विचारर्धाराओं वाले आन्दोलन. आधुनिक काल को एक प्रकार से गधयुग कहा जाता है, इस युग के आरम्भ होते ही सामाजिक, साम्प्रदायिक ,राजनैतिक और सांसक्रितिक श्रेत्रों में जो हलचल मची,जो परिवर्तन हुए ,उनके सजीव चित्रन के लिये गद्य का विकास अनिवाय था. साहित्य के तत्व सदैव जीवन से आते है ,जैसे-जैसे जीवन की वास्तविकता जतील होती जायेगी ,वैसे -वैसे उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भी बदती जायेंगे…और मैंनें यह्न भि सीखा के कविता एकाकी,प्रक्रिति का आनंद लेते हुए लिखा जाता है…अकेले में भावों का उमरना तथा उसको एक कोरे कागज में उतारना येहि कवि की सही पेह्चान है….कविता वो नहीं जो भीर में लिखा जये…कविता वो है जो एकांत वातावरन मे लिखा जाये….अपने भावों को सहि धंग में अभ्व्यक्त कर पयें…कविता में रमनीयता है…एक प्रकार का अकर्शन है…जिसे परकर मन को शानती प्राप्त हो…हो…कविता प्रभावशाली होना ( एRRORS KE LIYE MAIN SHAMA PRAPTI HOUN, HINDI LIKHNE MAIN KAAFI KATHINAYI HUI PHIR BHI MEINE PRAYATNA KIYA….asha karti houn ki meri mehnat bekar nahi jaayegi…meineapni taraf se kuch research work kiya…ritikaal ke bare mein aur aadhunik kaal . मैंने आपसे जो भी कुछ सीखा वो मेरे लिये काफी लाभदायक सीध हुआ…मैं पूरी कोशिश करूगी की अग्ली बार पूरी तयारी के साथ कक्शा में प्रवेश करू…….धन्यवाद)
    (VARSHA GOPEE)
    (CLASS 7)
    (15/10/2011)
    (20hr38)

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