MA Yr 1 – Lecture 5: गांधीजी और स्वतंत्रता-आंदोलन

Monday 03 Oct 2011, MA Yr 1, 16.00 – 17.30

Module: Freedom Movement & Hindi Poetry

 

इस बार की कक्षा में पुन: आपका स्वागत है. आज का विषय है: गाँधी जी और स्वतंत्रता आंदोलन. गाँधी जी के बारे में आप सभी जानते ही है, उनके सिद्धांत क्या है और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही, इन मूल जानकारियों से आप अनभिज्ञ नहीं है. इस लेक्चर का लक्ष्य गाँधी जी के मूल सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए, स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी जी की भूमिका का आकलन करना है साथ ही साथ गांधीवादी विचारदृष्टि का तत्कालीन काव्यों पर प्रभाव भी दिखाना है.

कक्षा में प्रयुक्त प्रस्तुतीकरण के मूल पहलू इस प्रकार है: –

  • दक्षिण अफ्रीका में – वकालत के सिलसिले में उन्हें एक बार दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा ! वहाँ भारतीयों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था ! स्वयं मोहनदास के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ ! उसे देखकर उनकी आत्मा चीत्कार कर उठी ! उनहोंने 1894 में ‘ नटाल इंडियन कांग्रेस ‘ की स्थापना करके गोरी सरकार के विरुद्ध बिगुल बजा दिया ! सत्याग्रह का पहला प्रयोग उन्होंने यही किया था ! उनके प्रयत्नों से गोरों के कुछ अत्याचार कम हो गए !
  • भारतीय राजनीति में – भारत आकर गाँधी जी स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े ! उन्होंने सत्य और अहिंसा को आधार बनाकर राजनीतिक स्वतंत्रता का आंदोलन छेड़ा ! 1920-22 में उन्होंने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन छेड़ दिया ! विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई ! हिंसा के कारण गाँधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया ! सन 1929 में गाँधी जी ने पुनः आंदोलन प्रारंभ किया ! यह आंदोलन ‘ नमक-सत्याग्रह ‘ के नाम से प्रसिद्ध है ! गाँधी जी ने स्वयं साबरमती आश्रम से डांडी तक पदयात्रा की तथा वहाँ नमक बना कर नमक कानून का उल्लंघन किया ! सन 1931 में गाँधी जी ‘ राउंड टेबल कांफ्रेस ‘ में सम्मिलित होने के लिए लंदन गए ! सन 1942 में उन्होंने ‘ भारत छोड़ो ‘ आंदोलन छेड़ दिया ! देश-भर में क्रांति की ज्वाला सुलगने लगी ! देश का बच्चा-बच्चा अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने पर उतारू हो गया ! गाँधी जी को देश के अन्य नेताओं के साथ बंदी बना लिया गया ! 15 अगस्त ,1947 को हमारा देश स्वतंत्र हो गया !
  • चंपारण और खेड़ा: अस्पृश्यता निवारण, खेड़ा (गुजरात), आश्रम
  • स्वराज और नमक सत्याग्रह:
    • १२ मार्च से ६अप्रेल तक नमक आंदोलन के याद में ४०० किलोमीटर (२४८ मील) तक का सफर अहमदाबाद से दांडी, गुजरात तक चलाया गया ताकि स्वयं नमक उत्पन्न किया जा सके। समुद्र की ओर इस यात्रा में हज़ारों की संख्या में भारतीयों ने भाग लिया। भारत में अंग्रेज़ों की पकड़ को विचलित करने वाला यह एक सर्वाधिक सफल आंदोलन था जिसमें अंग्रेज़ों ने ८०,००० से अधिक लोगों को जेल भेजा।
  • साइमन कमीशन:
    • असहयोग आंदोलन असफल रहा। इसलिए राजनैतिक गतिविधियों में कुछ कमी आ गई थी। साइमन कमीशन को ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत सरकार की संरचना में सुधार का सुझाव देने के लिए 1927 में भारत भेजा गया। इस कमीशन में कोई भारतीय सदस्‍य नहीं था और सरकार ने स्‍वराज के लिए इस मांग को मानने की कोई इच्छा नहीं दर्शाई। अत: इससे पूरे देश में विद्रोह की एक चिंगारी भड़क उठी तथा कांग्रेस के साथ मुस्लिम लीग ने भी लाला लाजपत राय के नेतृत्व में इसका बहिष्कार करने का आव्‍हान किया। इसमें आने वाली भीड़ पर लाठी बरसाई गई और लाला लाजपत राय, जिन्हें शेर – ए – पंजाब भी कहते हैं, एक उपद्रव से पड़ी चोटों के कारण शहीद हो गए।
  • नागरिक अवज्ञा आंदोलन
    • नागरिक अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्‍व – 1929
    •  इस अभियान का लक्ष्‍य ब्रिटिश सरकार के आदेशों की संपूर्ण अवज्ञा करना था।
    • यह निर्णय लिया गया कि भारत 26 जनवरी को पूरे देश में स्‍वतंत्रता दिवस मनाएगा।
    • बैठकें पूरे देश में -26 जनवरी 1930
    • ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को दबाने की कोशिश की तथा इसके लिए लोगों को निर्दयतापूर्वक गोलियों से भून दिया गया, हजारों लोगों को मार डाला गया।
    • नेहरू, गाँधी + कई हज़ार लोग गिरफ्तार
  • भारत छोड़ो आंदोलन
    • अगस्त 1942 में गांधी जी ने ”भारत छोड़ो आंदोलन” की शुरूआत की तथा भारत छोड़ कर जाने के लिए अंग्रेज़ों को मजबूर करने के लिए एक सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन ”करो या मरो” आरंभ करने का निर्णय लिया
    • इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए और ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया।
  • गांधी जी के कुछ मूलभूत सिद्धांत
    • सत्य
    • अहिंसा
    • शाकाहारी रवैया
    • ब्रह्मचर्य
    • सादगी
    • विश्वास

इस बार के लेक्चर के लिए ये रहे कुछ पहलू. आपसे आग्रह है कि तैयारी व शोध करते समय आप गांधी जी के आंदोलनों व सिद्धांतों का विश्लेषण इस दृष्टि से करें जिससे कि गाँधीवाद का प्रभाव तत्कालीन कविताओं पर भी देख सकें. इस पक्ष को न भूलें.

धन्यवाद

शुभम्,

विनय


About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

2 Responses to MA Yr 1 – Lecture 5: गांधीजी और स्वतंत्रता-आंदोलन

  1. teesna etwaru says:

    गांधी जी के सत्याग्रह का उद्देश्य
    सत्याग्रह किसी भी नैतिक रूप से वान्चनीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जा सकता हैं। अपने पचपन वर्ष के सार्वजनिक जीवन में, गाँधी ने जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सत्याग्रह किये, उनसे ऐसे अनेक उद्देश्यों के उदाहरण मिलते हैं, जिनकी प्राप्ति के लिए सत्याग्रह का सहारा लिया गया और लिया जा सकता है। अपने नकारात्मक रूप में,सत्याग्रह अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष है और सकारात्मक दृष्टि से यह जन-कल्याण की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम का एक कार्य मार्ग है।वास्तव में, सत्याग्रह उन नैतिक अधिकारों, स्वतंत्रताओं व अवसरों को प्राप्त करने का एक साधन है, जो राज्य को हर व्यक्ति को उपलबधकरना चाहिए। यह एक ऐसा रास्ता है जिसके माध्यम से लोग अपनी शिकायतों की सुनवाई करवा सकते हैं। यह विवादों व समस्याओं के अहिंसक तथा स्थायी समाधान का एक अचूक साधन है: यह उन व्यवस्थाओं,नीतियों,कानूनों व आदेशों के उल्लघन का एक विधि-सम्मत रास्ता है, जिन्हें व्यक्ति की आत्मा व विवेक स्वीकार न कर सकें। उदाहरण के तोर, पर गाँधी ने सत्याग्रह का प्रयोग दक्षिण अफ्रीका की रंग-भेद की निति तथा भारत में विदेशी शाशन तथा सामंतवादी साशन जैसी असाधारण राजनैतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए किया।

  2. karishma bundhun says:

    सादर प्रणाम गुरुजी, मेरा दूसरा assignment – गांधी जी पर है.
    गांधी जी और सत्याग्रह

    गांधी जी ने विनाशकारी युद्धों को बंद करने का जो उपाय दुनिया को बताया-वह सत्याग्रह है । पशिचम के दार्शनिकों के बताये हुए उपाय और गांधी जी के बताये हुए उपाय में फर्क यह है कि गांधी जी का अहिंसात्मक सत्याग्रह मनुष्य-मनुष्य के बीच ईर्ष्या-द्वेष और उसकी खुदगरज़ी को नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकता । गांधी जी इस आपसी लड़ाई को नैतिक धरातल पर ऊंचा उठा देते हैं । वे एक दूसरे के प्रेम और मनुष्य मात्र में भाईचारे की भावना का उपदेश देते हैं । अहिंसात्मक सत्याग्रह में वैसा ही हिम्मत और बहादुरी की ज़रुरत पड़ती है जैसे किसी मामूली लड़ाई में ।

    भारत में पहला सत्याग्रह आन्दोलन 1917 ई. में नील की खेती वाले चम्पारण ज़िले में हुआ। इसके बाद के वर्षों में सत्याग्रह के तरीक़ों के रूप में उपवास और आर्थिक बहिष्कार का उपयोग किया गया। व्यावहारिक दृष्टि से एक सार्वभौमिक दर्शन के रूप में सत्याग्रह की प्रभावोत्पादकता पर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं। सत्याग्रह अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार करता जान पड़ता है कि विरोधी पक्ष किसी न किसी स्तर की नैतिकता का पालन करेगा, जिसे सत्याग्रही का सत्य अन्तत: शायद प्रभावित कर जाए। लेकिन स्वयं गांधी का मानना था कि सत्याग्रह कहीं भी सम्भव है, क्योंकि यह किसी को भी परिवर्तित कर सकता है। सत्याग्रह का अर्थ ‘सत्य के प्रति समर्पण या ‘सत्य की शक्ति’ हो सकता है। सत्याग्रह का अनुयायी सत्याग्रही अहिंसा का पालन करते हुए शान्ति व प्रेम का लक्ष्य सामने रखकर सत्य की खोज द्वारा किसी बुराई की वास्वविक प्रकृति को देखने की सही अंतदृष्टि प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय सामाजिक एवं राजनीतिक अन्यायों को दूर करने के लिए सत्य और अंहिसा पर आधारित आत्मिक बल का प्रयोग था। यह एक प्रकार का निष्क्रिय प्रतिरोध था, जो व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से कष्ट सहन द्वारा विरोधी का हृदय परिवर्तन करने में सक्षम हो। दक्षिण अफ़्रीका में इस आन्दोलन को अत्यधिक सफलता मिली। जनरल स्मट्स को प्रवासी भारतीयों के आन्दोलन का औचित्य स्वीकार करना पड़ा और भारत के वाइसराय लॉर्ड हाडिंग्ज ने भी उनके प्रति सहानुभूति प्रकट की। अन्तत: इस आन्दोलन से दक्षिण अफ़्रीका के भारतीयों की अनेक शिक़ायतें दूर हुईं।

    सत्याग्रही के लिए पहले इस बात को समझ लेना ज़रुरी है कि मनुष्य जाति एक कुटुम्ब है और हमें मानव मात्र के साथ प्रेम करना चाहिए । गांधी जी ने हर अपमान का अहिंसा से मुकाबला किया । उन्होंने ज़ुल्म के आगे सर झुकाने से इनकार कर दिया । चाहे रेलगाड़ी हो या सार्वजनिक घोड़ा गाड़ी , चाहे अदालत हो या होटल, उन्होंने अपूर्व साहस के अपमान , मार-पीट और व्यक्तिगत हिंसा का स्वागत किया । हर खतरा उनके मन में नया साहस पैदा करता था । दिल में भगवान था और ओठों पर मुसकान थी । इस तरह अहिंसात्मक सत्याग्राह का व्यक्तिगत स्तरपर दक्षिण अफरीका में जन्म हुआ । सत्याग्रह का यह व्यक्तिगत प्रयोग था । गांधी जी ने दक्षिण अफरीका में ही सामुहिक सात्याग्राह का भी कामयाबी के साथ प्रयोग किया । गांधी जी जब हिंदुस्तान आये और उन्होंने आज़ादी की लड़ाई की बागडोर अपने हाथ में ली तो सात्याग्रह के व्यापक प्रयोग का उन्हें मौका मिला । गांधी जी ने हर क्षेत्र और हर स्तर पर हिंसा के मुकाबले में अहिंसात्मक सत्याग्रह को एक सफल टेकनीक की शक्ल दी । वे कहतेथे कि यदि दुनिया में हिंसा को समाप्त करना है तो हमें हर झगड़े का समाधान अहिंसा से ही करना होगा , फिर चाहे वह झगड़ा व्यक्तिगत हो या सामुहिक, राष्ट्रीय हो या अंतराष्ट्रीय , राजनैतिक हो या आर्थिक,सामाजिक हो या सामप्रदायिक । गांधीजी का कहना था कि जब हिंसा विशाल पैमाने पर अपनी चरम सीमा पर हो तब उसका मुकाबला अत्यंत शुद्ध और उत्कृष्ट अहिंसा से ही किया जा सकता है,तब सामन्य दरजे की सामूहिक अहिंसा से उसका मुकाबला नहीं किया जा सकता है ।

    इसलिए गांधी जी ने 1946/1947 की साम्प्रदायिक हिंसा की आग में अपने आप को झोंकने का फैसला किया । उन्हें यह देखकर गहरी मायूसी हुई कि जिन लोगों ने राजनैतिक क्षेत्र में अहिंसात्मक सत्याग्रह में भाग लिया उन्हीं लोगों ने साम्प्रदयिक हिंसा के आगे कायरता के साथ घुटने टेक दिये । यह देखकर गांधी जी इस नतिजे पर पहुँचे कि कांग्रेसजनों की अहिंसा कभी अहिंसा थी ही नहीं , केवल सविनय अवज्ञा । देश ने राजनैतिक आज़ादी हासिल की किंतु गांधीजी के शब्दों में –जब तक आर्थिक और सामाजिक आज़ादी हासिल न हो तब तक राजनैतिक आज़ादी महज़ लंगड़ी और लूली आज़ादी है । कुछ नेताओं ने राजनैतिक प्राप्त होने के बाद बार-बार इस बात पर ज़ोर देना शुरु किया कि आज़ादी मिलने के बाद अब सत्याग्रह की न तो गुंजाइश रह गयी है और नज़रुरत । सत्याग्राह के खिलाफ नेताओं का यह सिद्धांत कहाँ तक सही या गलत है और गांधीजी के अनुसार सत्याग्राह का मार्ग प्रेम से प्रकशित है । उसमें किसी दूसरे मनुष्य के शोषण की कोई गुंजाइश नहीं है । वह मनुष्य-मनुष्य के बीच सत्याग्राही कायम करना चाहता है । वह जानता है कि अपने विरोधी को मार डालने या डरा देने से यह मतलब पूरा नहीं हो सकता । किसी का भी डर मनुष्य-मनुष्य के बीच नई-नई दिवारें खड़ी कर देता है । एक दूसरे को समझना और भी कठिन हो जाता है । सत्याग्राह का उसूल प्रेम है । दूसरा उसूल यह है कि अपने विरोधी के विचारों को बदलने के लिए अथवा उसके दिमाग तक पहुँचने के लिये उसके दिल में जगह बनाने की कोशिश करें । सात्याग्राह इस बात को समझताहै कि दुनिया को कोई भी अनयाय बिना पीड़ित की सहायता और सहयोग के कायम नहीं रह सकता ।

    बहुत से लोग बहस करते हैं कि गांधी जी सुघारक हैं या क्रांतिकारी , सुधारक वह होता है जो एक छोट-मोटे फायदे से दूसरे फायदे की तरफ, या रोटी के एक कौर की तरफ बढ़ता है लेकिन गांधी जी हमें एक फायदे से दूसरे फायदे की तरफ, एक कुरबानी से दूसरी बड़ी कूरबानी की तरफ ले जाते थे, जिसमें हमें और ज़्यादा हिम्मत , और ज़्यादा धीरज मनुष्य मात्र के भाईचारे में ज़्यादा पक्के विश्वास की ज़रुरत होता है । गांधी जी ने एक बार कहा था- कुछ लोगों का कहना है कि मैं अपने समय का सबसे बड़ा क्रांतिकारी हूँ । असहयोग मेरा साधन है । गांधी जी चाहते थे कि लोग धीरे-धीरे एक-एक कर असहयोग और अधिकाधिक असहयोग की तरफ बढ़ते रहे । वैसे अपने यहां उपवास, अनशन, रथ यात्रा और अहिंसात्मक आंदोलनों की लंबी परंपरा रही है। घरों में बच्चे अपने माता-पिता से कुछ पाने के हठ में भूखे रहते हैं तो सियासी मंचों से हुंकार के दौरान भी इसका जमकर इस्तेमाल होता है। लेकिन इसकी असली समझ बापू के आंदोलनों (जिसमें उपवास, सत्याग्रह और पदयात्राएं शामिल थे) से ही बनती है। इसके जरिए आत्मशुद्धि की प्रक्रिया, अंग्रेजों पर नैतिक दबाव बनाने की चेष्टा और सबको साथ लेकर चलने की कवायद उनका मकसद होता था। जहां भी बापू को लगा कि उनके इन उपायों का बेजा इस्तेमाल हो सकता है, उन्होंने पीछे हटने का फैसला लिया। जबकि मौजूदा वक्त में अपनी राजनीतिक-सामाजिक साख बचाए रखने के लिए लोग हठधर्मिता दिखाते हैं। बापू के आंदोलन का यह कतई मतलब नहीं था कि आप अपना कामकाज छोड़कर भीड़ का हिस्सा बन जाए । सत्याग्रह के सम्बंध गांधी जी ने कहा –“शुद्ध लड़ाई में लड़ने वाले जो लक्ष्य अपने सामने शुरु में रख लेंगे उससे आगे फिर कभी न बढ़ेंगे , चाहे इस बीच उनका बल कितना ही क्यों न बढ़ गया हो । जब तक किसानों को इस बात की शिक्षा न मिल जाये कि वे अहिंसात्मक लगांबंदी के कारणों और उसके गुणों को समझ सकें और जब तक कि वे अपने खेतों और ज़मिनों की ज़ब्ती की शांति और संतोष के साथ बर्दाश्त करने को तैयार न हो जावें और अपने पशुओं और अपने माल-असबाब की ज़बर्दस्ती कुर्की और बिक्री को शांति के साथ न सह सकें तब तक उन्हें लगांबंदी की सलाह नहीं देना चाहिये ।

    सत्याग्रही अपने विपक्षी के साथ समझौते के लिये सदा तैयार रहता है । गांधी जी लिखते हैं – सत्याग्राही समझौते का एक भी मौका हाथ से जाने नहीं देता , और अगर इसकी वजह से कोई उसे कायर समझे तो वह परवाह नहीं करता । जिस आदमी को अपने अंदर विश्वास है , और जिसमें वह बल है जो आत्मविश्वास से पैदा होता है ,वह दूसरों के इस तरह समझने- साम्झाने की परवाह नहीं करता । गांधी दर्शन के आचार्य किशोरलाल जी मशरुवाला स्वराज्य के बाद स्थिति में ,” लोकशाही में सत्याग्रह का क्या स्थान है”, इस पर अपने विचार प्रकट करते हैं‌-
    “ सचमुच अहिंसक सत्याग्रह के ज़रिये ही समाज और राज की तंदुरुस्ती संभाली जा सकती है । सत्याग्रह के ज़रिये ही सामाजिक प्रगति हो सकती है ।

    इसी प्रकार गांधी जी ने अपने सिद्धांतों के बल पर और कई आंदोलनों के सहारे ही भारवसियों को अंग्रेज़ के शासन से बचाया । गांधी जी इतने इतने महापुरुष थे कि बिना कोई अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग किये उन्होंने भारत को आज़ाद किया ।

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