MA Yr 1: Lecture 6 – कविता “भारत” का विश्लेषण + कविताओं का संकलन

 

Monday 10 October 2011, 16.00 – 17.30, MA Yr 1, Freedom Movement & Hindi Poetry

नमस्कार मित्रो.

इस बार कक्षा में कवि सुधींद्र कृत “भारत” कविता की फोटोकॉपी बाँटी गई. कविता का विश्लेषण व व्याख्या करना था. साथ ही इस कविता को भी तत्कालीन संदर्भ में समझाया गया.

कुछ आवश्यक सूचनाएँ :-

1. इस मोड्यूल में मेरे हिस्से के अंतर्गत हम केवल स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि पर ही काम नहीं करेंगे अपितु कुछ प्रतिनिधि कविताओं का भी अध्ययन हमें करना होगा.

2. इन कविताओं का संकलन किया जा रहा है और अनेक कविताएँ भी बाद में संकलित किए जाएँगे. So, there are many other poems in your syllabus which are nor included in the typed list of poems (these will be provided to you in class). अभी तक संकलित कविताएँ जिनका अध्ययन स्वतंत्रता आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए, इस प्रकार हैं (आपको शीघ्र की ईमेल किए जाएँगे) :-

 

माखनलाल चतुर्वेदी
http://www.kavitakosh.org/mchaturvedi

जन्म: 04 अप्रैल 1889
निधन: 30 जनवरी 1968

उपनाम एक भारतीय आत्मा
जन्म स्थान ग्राम बबई, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश, भारत
कुछ प्रमुख
कृतियाँ
हिम किरीटनी, हिम तरंगिनी, युग चारण, साहित्य देवता
विविध काव्य संग्रह “हिम तरंगिनी” के लिये 1955 का साहित्य अकादमी पुरस्कार
जीवनी माखनलाल चतुर्वेदी / परिचय

अमर राष्ट्र / माखनलाल चतुर्वेदी

 

छोड़ चले, ले तेरी कुटिया,
यह लुटिया-डोरी ले अपनी,
फिर वह पापड़ नहीं बेलने;
फिर वह माल पडे न जपनी।

यह जागृति तेरी तू ले-ले,
मुझको मेरा दे-दे सपना,
तेरे शीतल सिंहासन से
सुखकर सौ युग ज्वाला तपना।

सूली का पथ ही सीखा हूँ,
सुविधा सदा बचाता आया,
मैं बलि-पथ का अंगारा हूँ,
जीवन-ज्वाल जलाता आया।

एक फूँक, मेरा अभिमत है,
फूँक चलूँ जिससे नभ जल थल,
मैं तो हूँ बलि-धारा-पन्थी,
फेंक चुका कब का गंगाजल।

इस चढ़ाव पर चढ़ न सकोगे,
इस उतार से जा न सकोगे,
तो तुम मरने का घर ढूँढ़ो,
जीवन-पथ अपना न सकोगे।

श्वेत केश?- भाई होने को-
हैं ये श्वेत पुतलियाँ बाकी,

आया था इस घर एकाकी,
जाने दो मुझको एकाकी।

अपना कृपा-दान एकत्रित
कर लो, उससे जी बहला लें,
युग की होली माँग रही है,
लाओ उसमें आग लगा दें।

मत बोलो वे रस की बातें,
रस उसका जिसकी तस्र्णाई,
रस उसका जिसने सिर सौंपा,
आगी लगा भभूत रमायी।

जिस रस में कीड़े पड़ते हों,
उस रस पर विष हँस-हँस डालो;
आओ गले लगो, ऐ साजन!
रेतो तीर, कमान सँभालो।

हाय, राष्ट्र-मन्दिर में जाकर,
तुमने पत्थर का प्रभू खोजा!
लगे माँगने जाकर रक्षा
और स्वर्ण-रूपे का बोझा?

मैं यह चला पत्थरों पर चढ़,
मेरा दिलबर वहीं मिलेगा,
फूँक जला दें सोना-चाँदी,
तभी क्रान्ति का समुन खिलेगा।

चट्टानें चिंघाड़े हँस-हँस,
सागर गरजे मस्ताना-सा,
प्रलय राग अपना भी उसमें,
गूँथ चलें ताना-बाना-सा,
बहुत हुई यह आँख-मिचौनी,
तुम्हें मुबारक यह वैतरनी,
मैं साँसों के डाँड उठाकर,
पार चला, लेकर युग-तरनी।

मेरी आँखे, मातृ-भूमि से
नक्षत्रों तक, खीचें रेखा,
मेरी पलक-पलक पर गिरता
जग के उथल-पुथल का लेखा !

मैं पहला पत्थर मन्दिर का,
अनजाना पथ जान रहा हूँ,
गूड़ँ नींव में, अपने कन्धों पर
मन्दिर अनुमान रहा हूँ।

मरण और सपनों में
होती है मेरे घर होड़ा-होड़ी,
किसकी यह मरजी-नामरजी,
किसकी यह कौड़ी-दो कौड़ी?

अमर राष्ट्र, उद्दण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र !
यह मेरी बोली
यह `सुधार’ `समझौतों’ बाली
मुझको भाती नहीं ठठोली।

मैं न सहूँगा-मुकुट और
सिंहासन ने वह मूछ मरोरी,
जाने दे, सिर, लेकर मुझको
ले सँभाल यह लोटा-डोरी !

 

प्यारे भारत देश / माखनलाल चतुर्वेदी

प्यारे भारत देश
गगन-गगन तेरा यश फहरा
पवन-पवन तेरा बल गहरा
क्षिति-जल-नभ पर डाल हिंडोले
चरण-चरण संचरण सुनहरा
ओ ऋषियों के त्वेष
प्यारे भारत देश।।
वेदों से बलिदानों तक जो होड़ लगी
प्रथम प्रभात किरण से हिम में जोत जागी
उतर पड़ी गंगा खेतों खलिहानों तक
मानो आँसू आये बलि-महमानों तक
सुख कर जग के क्लेश
प्यारे भारत देश।।
तेरे पर्वत शिखर कि नभ को भू के मौन इशारे
तेरे वन जग उठे पवन से हरित इरादे प्यारे!
राम-कृष्ण के लीलालय में उठे बुद्ध की वाणी
काबा से कैलाश तलक उमड़ी कविता कल्याणी
बातें करे दिनेश
प्यारे भारत देश।।
जपी-तपी, संन्यासी, कर्षक कृष्ण रंग में डूबे
हम सब एक, अनेक रूप में, क्या उभरे क्या ऊबे
सजग एशिया की सीमा में रहता केद नहीं
काले गोरे रंग-बिरंगे हममें भेद नहीं
श्रम के भाग्य निवेश
प्यारे भारत देश।।
वह बज उठी बासुँरी यमुना तट से धीरे-धीरे
उठ आई यह भरत-मेदिनी, शीतल मन्द समीरे
बोल रहा इतिहास, देश सोये रहस्य है खोल रहा
जय प्रयत्न, जिन पर आन्दोलित-जग हँस-हँस जय बोल रहा,
जय-जय अमित अशेष
प्यारे भारत देश।।

 

उठ अब, ऐ मेरे महाप्राण / माखनलाल चतुर्वेदी

उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!
आत्म-कलह पर
विश्व-सतह पर
कूजित हो तेरा वेद गान!
उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!

जीवन ज्वालामय करते हों
लेकर कर में करवाल
करते हों आत्मार्पण से
भू के मस्तक को लाल!

किन्तु तर्जनी तेरी हो,
उनके मस्तक तैयार,
पथ-दर्शक अमरत्व
और हो नभ-विदलिनी पुकार;

वीन लिये, उठ सुजान,
गोद लिये खींच कान,
परम शक्ति तू महान।

काँप उठे तार-तार,
तार-तार उठें ज्वार,
खुले मंजु मुक्ति द्वार।

शांति पहर पर,
क्रान्ति लहर पर
उठ बन जागृति की अमर तान;
उठ अब, ऐ मेरे महा प्राण!

देश महान हमारा / रामधारी सिंह ‘दिनकर’

प्रीति विश्वास

देश महान हमारा
कण-कण तीर्थ करोड़ों बसते
क्षण-क्षण पर्व जहाँ है
कोई बतलाए दुनिया में
ऐसा स्वर्ग कहाँ है
गंगा, यमुना, सरस्वती की
बहे अमिय जलधारा

माटी में है कंचन इसकी
और धूल में चन्दन
गली-गली, वाटिका-वाटिका
खेल रहे हैं नन्दन
इनकी मुस्कानों पर मोहित
नाच रहा जग सारा

पवन पालकी में जो बैठी
गंध-वधू-सी झूमे
शीतल शशि की चन्द्रकला-सी
इस धरती को चूमे
‘सत्यमेव जयते’ के आगे
अंधकार है हारा

 

ख़ूनी हस्ताक्षर  / गोपाल प्रसाद व्यास 

वह ख़ून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं
वह ख़ून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन न रवानी है
जो परवश होकर बहता है, वह ख़ून नहीं है, पानी है
उस दिन लोगों ने सही-सही, ख़ूँ की क़ीमत पहचानी थी
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मांगी उनसे क़ुर्बानी थी
बोले स्वतन्त्रता की ख़ातिर, बलिदान तुम्हें करना होगा
तुम बहुत जी चुके हो जग में, लेकिन आगे मरना होगा
आज़ादी के चरणों में, जो जयमाल चढ़ाई जाएगी
वह सुनो! तुम्हारे शीषों के फूलों से गूँथी जाएगी
आज़ादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है
यह शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है
आज़ादी का इतिहास, नहीं काली स्याही लिख पाती है
इसको लिखने के लिए, ख़ून की नदी बहाई जाती है
यूँ कहते-कहते वक्ता की, आँखों में ख़ून उतर आया
मुख रक्तवर्ण हो गया, दमक उठी उनकी स्वर्णिम काया
आजानु बाँहु ऊँची करके, वे बोले रक्त मुझे देना
उसके बदले में, भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना
हो गई सभा में उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे
स्वर इंक़लाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे
‘हम देंगे-देंगे ख़ून’- शब्द बस यही सुनाई देते थे
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे
बोले सुभाष- इस तरह नहीं बातों से मतलब सरता है
लो यह काग़ज़, है कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता है
इसको भरने वाले जन को, सर्वस्व समर्पण करना है
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है
पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना है
वह आगे आए, जिसके तन में ख़ून भारतीय बहता हो
वह आगे आए, जो अपने को हिन्दुस्तानी कहता हो
वह आगे आए, जो इस पर ख़ूनी हस्ताक्षर देता हो
मैं क़फ़न बढ़ाता हूँ; आए जो इसको हँसकर लेता हो
सारी जनता हुंकार उठी- ‘हम आते हैं, हम आते हैं’
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्त चढ़ाते हैं
साहस से बढ़े युवक उस दिन, देखा बढ़ते ही आते थे
और चाकू, छुरी, कटारों से, वे अपना रक्त गिराते थे
फिर उसी रक्त की स्याही में, वे अपनी क़लम डुबोते थे
आज़ादी के परवाने पर, हस्ताक्षर करते जाते थे
उस दिन तारों ने देखा था, हिन्दुस्तानी विश्वास नया
जब लिखा था रणवीरों ने, ख़ूँ से अपना इतिहास नया

 

आर्य  / मैथिलीशरण गुप्त  

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, ये समस्याएँ सभी
भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ
सम्पूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि-भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है
यह पुण्य-भूमि प्रसिद्ध है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या, कला, कौशल्य, सबके जो प्रथम आचार्य हैं
सन्तान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े
वे आर्य ही थे, जो कभी अपने लिए जीते न थे
वे स्वार्थरत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे
वे मन्दिनी-तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
पर दु:ख देख, दयालुता से द्रवित होते थे सदा
संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट होकर किस तरह से बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में
ये मोह-बन्धक मुक्त थे, स्वच्छंद थे, स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख-संयुक्त थे, वे शान्ति-शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु-भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानन्द नद के, वे मनोहर मीन थे

 परतंत्रता की गाँठ / गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’    

बीतीं दासता में पड़े सदियाँ, न मुक्ति मिली
पीर मन की ये मन ही मन पिराती है
देवकी-सी भारत मही है हो रही अधीर
बार-बार वीर ब्रजचन्द को बुलाती है
चालीस करोड़ पुत्र करते हैं पाहि-पाहि
त्राहि-त्राहि-त्राहि ध्वनि गगन गुंजाती है
जाने कौन पाप है पुरातन उदय हुआ
परतन्त्रता की गाँठ खुलने न पाती है

 

पावन प्रतिज्ञा / गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’    – http://kavyanchal.com/navlekhan/?p=480

चरखे चलाएंगे, बनाएंगे स्वेदशी सूत
कपड़े बुनाएंगे, जुलाहों को जिलाएंगे
चाहेंगे न चमक-दमक चिर चारुताई
अपने बनाए उर लाय अपनाएंगे
पाएंगे पवित्र परिधान, पाप होंगे दूर
जब परदेशी-वस्त्र ज्वाला में जलाएंगे
गज़ी तनज़ेब ही सी देगी ज़ेब तन पर
गाढ़े में त्रिशूल अब नैन-सुख पाएं

 

असहयोग कर दो / गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’   

हृदय चोट खाए दबाओगे कब तक
बने नीच यों मार खाओगे कब तक
तुम्हीं नाज़ बेजा उठाओ कब तक
असहयोग कर दो, असहयोग कर दो

 

ताशों में ही बचे रहेंगे  / नागार्जुन     

किस पर हुक्म चलाएंगे अब राजा-रानी
नहीं मिलेगा इन्हें कहीं चुल्लू भर पानी
हाय, हाय, कैसे बेचारे डूब मरेंगे!
दीपक-तारा ध्वजपट ओढ़े
हाँ, इनके महबूब मरेंगे!
इन पर बालू करूँ निछावर
करूँ निछावर खारा पानी
इनके उन काने मित्रों पर
करूँ निछावर सुरमेदानी
अमानिशा के निविड़ तिमिर में
तत्पर जिनकी अपलक आँखें
उन जीवों पर करूँ निछावर
उल्लू दल की पंगुल पाँखें
क्षमा करेगी जनता इनको
अब भी यदि इन्सान बनें ये
छोड़ें लतें पुरानी अपनी
नवभारत की शान बनें ये
साथ-साथ सब दु:ख-सुख भोगें
लोक-बन्धु हों, लोक-मित्र हों
कथनी-करनी एक सरीखी
शुभ हों, तन-मन से पवित्र हों
खण्डहरों में लोट-लोटकर
प्राण गँवाएंगे क्यों नाहक़!
राजा जी के पद-पद्मों में
शीश नवाएंगे क्यों नाहक़!
दीप करेगा रक्षा इनकी
क्षुब्ध जनों के कोपानल से!
अमृत-बिन्दु पाएंगे कैसे
ये युग के विष भरे अतल से!
अच्छा होता ‘प्रिवी पर्स’ यदि
छोड़ा होता अपने मन से!
अच्छा होता अब भी तो ये
समरस होते जन-जीवन से!
अभी करेगी इन ‘प्रभुओं’ की जाँच-
संघर्षों की निर्मम-निष्ठुर आँच!
लन्दन-पेरिस-रोम-शिकागो
भटकेंगे ये कब तक?
चमगादड़ से इधर-उधर तरु-
शाखाओं से लटकेंगे कब तक?
ख़ाक़ बन गए सूर्यवंश-चन्द्रवंश के ठूँठ!
तलवारें गल गईं आग में, बिकी रत्नमय मूठ!
उँह, इनका तो सदियों पहले
उतर गया था पानी!
ताशों में ही बचे रहेंगे
अब तो राजा-रानी!

 

 ऐलान-ए-जंग  / ज़फर अली खां

गांधी जी ने जंग का ऐलान कर दिया
बातिन से हक़ को दस्त-ओ-ग़रीबान कर दिया

हिन्दोस्तां में एक नई रुह फूँककर
आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया

शेख़ और बिरहमन में बढ़ाया है इत्तिहाद
गोया उन्हें दो क़ालिब-ओ-यक़जान कर दिया

ज़ुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते
क़तरे को आँखों-आँखों में तूफ़ान कर दिया

 

जय-जय-जय, जय हे   / रवीन्द्रनाथ टैगोर 

जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
पंजाब-सिन्ध-गुजरात-मराठा
द्राविड़-उत्कल-बंग
विन्ध्य-हिमाचल, यमुना-गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मांगे
गाहे तव जय गाथा
जन-गण-मंगलदायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे

पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा
युग-युग धावित यात्री
हे चिर-सारथी
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माँझे
तव शंखध्वनि बाजे
संकट-दुख-श्राता
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे

घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथ
पीड़ित मूर्च्छित-देशे
जागृत दिल तव अविचल मंगल
नत-नत-नयन अनिमेष
दुस्वप्ने आतंके
रक्षा करिजे अंके
स्नेहमयी तुमि माता
जन-गण-मन-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे

रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले
साहे विहंगम, पूर्ण समीरण
नव-जीवन-रस ढाले
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा
जय-जय-जय हे, जय राजेश्वर
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय-जय-जय, जय हे

 

कर्मवीर   / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’  

देख कर बाधा विविध, बहु-विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के, दु:ख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उबताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो, वीर दिखलाते नहीं
हो गए इक आन में उनके बुरे दिन भी भले
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले-फले
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही
सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही
मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही
जो मदद करते हैं अपनी इस जगत् में आप ही
भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं
कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं
काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं
आज-कल करते हुए, जो दिन गँवाते हैं नहीं
यत्न करने से कभी जो दिल चुराते हैं नहीं
बात है वह कौन, जो होती नहीं उनके लिए
वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए
व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर
वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर
गरजते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर
आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट
ये कँपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं
भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं

 

बढ़े चलो!   / सोहनलाल द्विवेदी    

न हाथ एक शस्त्र हो
न हाथ एक अस्त्र हो
न अन्न वीर वस्त्र हो
हटो नहीं, डरो नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

रहे समक्ष हिम-शिखर
तुम्हारा प्रण उठे निखर
भले ही जाए जन बिखर
रुको नहीं, झुको नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

घटा घिरी अटूट हो
अधर में कालकूट हो
वही सुधा का घूँट हो
जिये चलो, मरे चलो
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

गगन उगलता आग हो
छिड़ा मरण का राग हो
लहू का अपने फाग हो
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

चलो नई मिसाल हो
जलो नई मशाल हो
बढ़ो नया क़माल हो
झुको नहीं, रुको नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

अशेष रक्त तोल दो
स्वतन्त्रता का मोल दो
कड़ी युगों की खोल दो
डरो नहीं, मरो नहीं
बढ़े चलो! बढ़े चलो!

 

सरफ़रोशी की तमन्ना (गीत)  / रामप्रसाद ‘बिस्मिल’     

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है

है लिए हथियार दुश्मन ताक़ में बैठा उधर
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर
ख़ून से खेलेंगे होली ग़र वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनूं कटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पर क़फ़न
जां हथेली में लिए लो बढ़ चले हैं ये क़दम
ज़िन्दगी तो अपनी मेहमां मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्क़लाब
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज
दूर रह पाए जो हमसे, दम कहाँ मन्ज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

 

सरफ़रोशी की तमन्ना (ग़ज़ल)  / रामप्रसाद ‘बिस्मिल’    

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए-क़ातिल में है

क्यों नहीं करता कोई भी दूसरा कुछ बातचीत
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तिरी महफ़िल में है

ऐ शहीदे-मुल्क़ो-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
अब तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है

खींच कर लाई है सबको क़त्ल होने की उमीद
आशिक़ों का आज जमघट कूँचा-ए-क़ातिल में है

यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है

 

 

यह दीया बुझे नहीं  / गोपाल सिंह ‘नेपाली’      

घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो
आज द्वार-द्वार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया, ला रहा विहान है

शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ
भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता दिया
रुक रही न नाव हो, ज़ोर का बहाव हो
आज गंग-धार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह स्वदेश का दिया, प्राण के समान है

यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना
यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना
शान्ति हो, अशान्ति हो, युद्ध, सन्धि, क्रान्ति हो
तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं
देश पर समाज पर ज्योति का वितान है

तीन-चार फूल हैं, आस-पास धूल है
बाँस हैं, बबूल हैं, घास के दुकूल हैं
वायु भी हिलोर दे, फूँक दे, चकोर दे
क़ब्र पर, मज़ार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह किसी शहीद का, पुण्य प्राण-दान है

झूम-झूम बदलियाँ, चूम-चूम बिजलियाँ
आंधियाँ उठा रहीं, हलचलें मचा रहीं
लड़ रहा स्वदेश हो, यातना विशेष हो
क्षुद्र जीत-हार पर, यह दिया बुझे नहीं
यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है

 

मेरा भारत
विश्वजाल पर देश-भक्ति की कविताओं का संकलन – http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mera_bharat/mera_bharat09.htm

 
 

 

अरुण यह मधुमय देश जयशंकर प्रसाद

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

– जयशंकर प्रसाद

 

ऐ इंसानों गजानन माधव मुक्तिबोध

 
आँधी के झूले पर झूलो।
आग बबूला बनकर फूलो
कुरबानी करने को झूमो
लाल सबेरे का मुँह चूमो
ऐ इंसानो ओस न चाटो
अपने हाथों पर्वत काटो

पथ की नदियाँ खींच निकालो
जीवन पीकर प्यास बुझा लो
रोटी तुमको राम न देगा
वेद तुम्हारा काम न देगा
जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा।।

– गजानन माधव मुक्तिबोध

 

 

 

चल मरदाने –  हरिवंश राय बच्चन

चल मरदाने, सीना ताने,
हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते,
मन मुसकाते, गाते गीत।

एक हमारा देश, हमारा
वेश, हमारी कौम, हमारी
मंज़िल, हम किससे भयभीत।

चल मरदाने, सीना ताने,
हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते,
मन मुसकाते, गाते गीत।

हम भारत की अमर जवानी,
सागर की लहरें लासानी,
गंग-जमुन के निर्मल पानी,
हिमगिरि की ऊँची पेशानी,
सब के प्रेरक, रक्षक, मीत।

चल मरदाने, सीना ताने,
हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते,
मन मुसकाते, गाते गीत।

जग के पथ पर जो न रुकेगा,
जो न झुकेगा, जो न मुड़ेगा,
उसका जीवन उसकी जीत।

चल मरदाने, सीना ताने,
हाथ हिलाते, पाँव बढ़ाते,
मन मुसकाते, गाते गीत।

– हरिवंश राय बच्चन

 
 

जय जन भारत सुमित्रानंदन पंत

जय जन भारत जन- मन अभिमत

जन गणतंत्र विधाता
जय गणतंत्र विधाता

गौरव भाल हिमालय उज्जवल
हृदय हार गंगा जल
कटि विंध्याचल सिंधु चरण तल
महिमा शाश्वत गाता
जय जन भारत …

हरे खेत लहरें नद-निर्झर
जीवन शोभा उर्वर
विश्व कर्मरत कोटि बाहुकर
अगणित-पद-ध्रुव पथ पर
जय जन भारत …

प्रथम सभ्यता ज्ञाता
साम ध्वनित गुण गाता
जय नव मानवता निर्माता
सत्य अहिंसा दाता

जय हे- जय हे- जय हे
शांति अधिष्ठाता
जय -जन भारत…

– सुमित्रानंदन पंत
१५ जनवरी २०११

 

ध्वजा वंदना – रामधारी सिंह ‘दिनकर’

नमो, नमो, नमो।

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज – शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य – शक्ति – शील – धारिणी!
प्रणय – प्रसारिणी, नमो अरिष्ट – वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा – प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!

हम न किसी का चाहते तनिक अहित, अपकार।
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार।
सत्य न्याय के हेतु
फहर-फहर ओ केतु
हम विचरेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

तार-तार में हैं गुँथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग!
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग।
सेवक सैन्य कठोर
हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान
वीर हुए बलिदान,
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिंदुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

 

 

वंदे मातरम – बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

वंदे मातरम,
वंदे मातरम
सुजला सुफला मलयज-शीतलाम
शश्य-शामलाम मातरम
वंदे मातरम

शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित यामिनी
फुललकुसुमित-द्रुमदल शोभिनी
सुहासिनीं सुमधुर भाषिनीं
सुखदां वरदां मातरम
वंदे मातरम

– बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय

 

 

 

सारे जहाँ से अच्छा –  मुहम्मद इक़बाल

सारे जहाँ से अच्छा
हिंदुस्तान हमारा
हम बुलबुलें हैं उसकी
वो गुलसिताँ हमारा।
परबत वो सबसे ऊँचा
हमसाया आसमाँ का
वो संतरी हमारा
वो पासबाँ हमारा।

गोदी में खेलती हैं
जिसकी हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिनके दम से
रश्क-ए-जिनाँ हमारा।

मज़हब नहीं सिखाता
आपस में बैर रखना
हिंदी हैं हम वतन है
हिंदुस्तान हमारा।

– मुहम्मद इक़बाल

 

 

हम होंगे कामयाब – गिरिजा कुमार माथुर

होंगे कामयाब,
हम होंगे कामयाब एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे कामयाब एक दिन।
हम चलेंगे साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ
हम चलेंगे साथ-साथ, एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन।

होगी शांति चारों ओर, एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
होगी शांति चारों ओर एक दिन।

नहीं डर किसी का आज एक दिन
मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास
नहीं डर किसी का आज एक दिन।

– गिरिजा कुमार माथुर

 

 

 

 

कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,
एक हिलोर इधर से आए,
एक हिलोर उधर से आए,

प्राणों के लाले पड़ जाएँ,
त्राहि-त्राहि रव नभ में छाए,
नाश और सत्यानाशों का –
धुँआधार जग में छा जाए,

बरसे आग, जलद जल जाएँ,
भस्मसात भूधर हो जाएँ,
पाप-पुण्य सद्सद भावों की,
धूल उड़ उठे दायें-बायें,

नभ का वक्षस्थल फट जाए-
तारे टूक-टूक हो जाएँ
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए।

माता की छाती का अमृत-
मय पय काल-कूट हो जाए,
आँखों का पानी सूखे,
वे शोणित की घूँटें हो जाएँ,

एक ओर कायरता काँपे,
गतानुगति विगलित हो जाए,
अंधे मूढ़ विचारों की वह
अचल शिला विचलित हो जाए,

और दूसरी ओर कंपा देने
वाला गर्जन उठ धाए,
अंतरिक्ष में एक उसी नाशक
तर्जन की ध्वनि मंडराए,

कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ,
जिससे उथल-पुथल मच जाए,

नियम और उपनियमों के ये
बंधक टूक-टूक हो जाएँ,
विश्वंभर की पोषक वीणा
के सब तार मूक हो जाएँ

शांति-दंड टूटे उस महा-
रुद्र का सिंहासन थर्राए
उसकी श्वासोच्छ्वास-दाहिका,
विश्व के प्रांगण में घहराए,

नाश! नाश!! हा महानाश!!! की
प्रलयंकारी आँख खुल जाए,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ
जिससे उथल-पुथल मच जाए।

सावधान! मेरी वीणा में,
चिनगारियाँ आन बैठी हैं,
टूटी हैं मिजराबें, अंगुलियाँ
दोनों मेरी ऐंठी हैं।

कंठ रुका है महानाश का
मारक गीत रुद्ध होता है,
आग लगेगी क्षण में, हृत्तल
में अब क्षुब्ध युद्ध होता है,

झाड़ और झंखाड़ दग्ध हैं –
इस ज्वलंत गायन के स्वर से
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है
निकली मेरे अंतरतर से!

कण-कण में है व्याप्त वही स्वर
रोम-रोम गाता है वह ध्वनि,
वही तान गाती रहती है,
कालकूट फणि की चिंतामणि,

जीवन-ज्योति लुप्त है – अहा!
सुप्त है संरक्षण की घड़ियाँ,
लटक रही हैं प्रतिपल में इस
नाशक संभक्षण की लड़ियाँ।

चकनाचूर करो जग को, गूँजे
ब्रह्मांड नाश के स्वर से,
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है
निकली मेरे अंतरतर से!

दिल को मसल-मसल मैं मेंहदी
रचता आया हूँ यह देखो,
एक-एक अंगुल परिचालन
में नाशक तांडव को देखो!

विश्वमूर्ति! हट जाओ!! मेरा
भीम प्रहार सहे न सहेगा,
टुकड़े-टुकड़े हो जाओगी,
नाशमात्र अवशेष रहेगा,

आज देख आया हूँ – जीवन
के सब राज़ समझ आया हूँ,
भ्रू-विलास में महानाश के
पोषक सूत्र परख आया हूँ,

जीवन गीत भूला दो – कंठ,
मिला दो मृत्यु गीत के स्वर से
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है,
निकली मेरे अंतरतर से

 

 

 

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

3 Responses to MA Yr 1: Lecture 6 – कविता “भारत” का विश्लेषण + कविताओं का संकलन

  1. samantah says:

    नमस्ते गुरुजी
    पिछ्ली कक्षा में कवि सुधीन्द्र की भारत नामक कविता पर चर्चा हुई जिसमें मुख्य रुप से जागरण का भाव देखने को मिलता है । देशमक्ति कविता लिखनेवालों में कवियित्री
    सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम भी उल्लेखनीय है ।

    सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन १९०४ में एक क्षत्रिय परिवार में नागपंचमी के दिन प्रयाग के निहालपुर गाँव में हुआ था । सुभद्रा जी की प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग में ही क्रास्थवाइट बालिका विद्यालय में हुई । उसी विद्यालय में महादेवी वर्मा भी पढ़ती थी और इस प्रकार दोनों की कविताई का मैत्री – योग भी वहीं जुड़ा ।पंद्रह वर्ष की ही उम्र में इनकी शादी एक अघ्ययन प्रंमी और दशभक्त युवक खंडवा निवासी ठाकुर लक्षमण सिंह चौहान के साथ हो गई ।

    सुभद्राकुमारी जी का हदय देश – प्रेम से लबालब भरा है । देश को स्वाधीन देखने की उनकी उत्कट उत्कंठा है । गाँधीवादी होने के नाते , गाँधीजी के हर कार्य में तत्पर रहती थी । वास्तव में पहले महिला कवियों के लिए कवियित्री शब्द नहीं था सुभद्राजी ने ही इसके लिए कवियित्री शब्द दिया । उनकी कविताओं में वे सारी खूबियाँ विद्यमान हैं जो द्विवेदी युग की थीं । संपूर्ण राष्ट्र में स्वतंत्रता संग्राम की जो लहर फैल चुकी थी उसका चित्रण स्पष्ट रुप से करना सुभद्राजी की विलक्षण प्रतिभा थी उदाहरण झाँसी की रानी कविता से उद्वत पंक्तियाँ
    “सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी
    बूढ़े भारत में आयी फिर से नई जवानी थी …”

    मुकुल (१९३०) , बिखरे मोती (१९३२), उन्मादिनी (१९३४), त्रिधारा सभा के खेल और सीधे सादे चित्र (१९४७) उनकी रचनाएँ हैं । ’मुकुल’ उनकी प्रथम कविता संग्रह है जिसके लिए उन्हें सेक्सरिया पुरस्कार मिला ।

  2. karishma bundhun says:

    नमस्ते गुरुजी, इस कक्षा में आपने भारत तथा भारत स्वतंत्रता के बारे में हमें परिचित कराया है. भारत कविता में कवि सुधींद्र अपने कविता में “भारत का गौरव गान करते हैं .

    भारत का मांविकरण किया गया है. कवि भारत देश को सम्बोधित कर रहे हैं और शायद कहिं पर भारत देश थक गये हैं इसिलिये वे सो रहे हैं. भारत देश तो अपनी शिक्षा से पुरे संसार को आलोकित किया है. भारत देश की संकृति का गौरव गान हो रहा है और कवि ने भारत के महा पुरुषों का प्रकितमक रुप पर प्रकाश डाला है. अशोक “विरता का प्रतिक है….

    इसी प्रकार कवि ने भारत वासियों के मन में जाग्रिती उत्पन्न किया है.

  3. Pingback: सन्तान, यश, लक्ष्मी की कृपा, वैभव, चन्द्र दोष से निवृति आदि का एक उपाय – प्रदोष व्रत | Medicalastrology

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