BA Yr 1: Lecture 7 – काव्य लक्षण (समाप्त)

Friday 14 October 2011, 9.30 – 11.00, BA Yr 1, Literary Theory & Forms of Literature

 

आज कक्षा कुछ अधिक गंभीर रही.

कुछ लोगों ने पिछली बार यह चिंता व्यक्त की कि क्या उन्हें परीक्षा के लिए संस्कृत के सभी उद्धरण कंठस्थ करना है… वैसे तो याद करें तो अच्छी बात है, इसके लिए अतिरिक्त अंक मिलेंगे ही. परंतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कि काव्य लक्षण अथवा किसी भी प्रश्न का उत्तर देते हुए, आप अपनी आलोचनात्मक शक्ति का प्रदर्शन करें. तुलनात्मक अध्ययन से, अनेक आचार्यों व विद्वानों के मतों/विचारों का अनुमोदन-खण्डन करने से आपको निस्संदेह अतिरिक्त अंक मिलेंगे.

साथ ही ज्ञान-अर्जन की प्रक्रिया कभी भी निरुद्देश्य नहीं होती, याद रखिए. इसलिए, हालाँकि यह मोड्यूल गंभीर, निरस व कठिन प्रतीत हो सकता है, परंतु इसका अध्ययन जमकर करना है, कम से कम सिद्धांतों के मूल पहलुओं को ठीक से समझने का प्रयास करें. यह इसलिए क्योंकि इसी के आधार पर आप किसी भी साहित्यिक विधा की सही आलोचना, व्याख्या, समीक्षा करने में सफल होंगे.

रही आज  की कक्षा की बात, हमने संस्कृत आचार्यों के मतों के अलावा रीतिकाल के आचार्यों के विचारों को भी आपके सामने रखा. ध्यान दीजिए कि संस्कृत युग में साहित्यिक विधा के रूप में केवल नाटक और काव्य ही थे, इसलिए इन दोनों विधाओं को केद्र में रखकर ही उन्होंने काव्य की परिभाषा पर अपने विचार व्यक्त किए.

रीतिकाल के आचार्य कलात्मक दृष्टि से काफी सुसंपन्न थे, इसलिए आप देखेंगे कि इस काल में कलात्मकता का भरपूर प्रसार मिलता है (साहित्य, चित्रकला, वास्तुकला, नृत्यकला आदि). देव, ठाकुर आदि के विचारों के बाद, आधुनिक काल के विद्वानों के मत प्रस्तुत किए गए.

आधुनिक काल के विद्वान असल में युग की मांग के अनुकूल सहित्य-सृजन करते हैं. यहाँ परिस्थितियाँ बदलने लगती हैं, युग-चेतना में बदलाव आने लगता है, साहित्य का लक्ष्य ही बदलने लगता है. इसलिए काव्य-लक्षण की जगह पर मैंने यहाँ साहित्य के लक्षणों की चर्चा की है जिनका सीधा संबंध आधुनिक रचनाकारों से है. फिर आप देखें कि यहाँ साहित्य/ काव्य में यथार्थ-तत्व प्रमुख बनकर उभरता है. प्रेमचंद जहाँ साहित्य को जीवन की अलोचना  के रूप में मानते है वहाँ प्रसाद प्रेय और श्रेय पर ध्यान केंद्रित करते है. इस संदर्भ में कृपया आप अपने नोट्स देखिए (पुराने ब्लॉग में अपलोड किए हुए). विस्तार से आप समझ सकते हैं.

अंतिम वर्ग के विद्वानों में पाश्चात्य विचारक आते हैं. यहाँ साहित्य के प्रति दृष्टिकोण में हलका सा अंतर आता है. imagination पर अधिक बल देते हुए इस वर्ग के कवि-रचनाकार-विद्वान अरस्तू के मूल सिद्धांत से काफी प्रेरित है. काव्य प्रकृति का अनुकरण करता है … इन विचारकों के अनुसार काव्य-सृजन की प्रक्रिया एक विशेष स्थिति में उभरती है…. contemplated in tranquility …. काव्य-बिम्ब, प्रतीक विधान आदि पर  विशेष बल देते हुए ये विचारक अपनी काव्य-संबंधी विचारधारा प्रस्तुत करते हैं.

Note: अपनी ओर से अतिरिक्त शोध कीजिए, अपनी तैयारी अनेक स्रोतों से कीजिए.

कोई प्रश्न अथवा कोई दुविधा हो तो कृपया पूछें.

धन्यवाद,

शुभम्,

विनय

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

7 Responses to BA Yr 1: Lecture 7 – काव्य लक्षण (समाप्त)

  1. Ujoodha Priya says:

    आपके उत्तर के लिए धन्यवाद…
    आधुनिक युग के विद्वान:
    -पन्त जी
    -द्विवेदी जी
    -महादेवी वर्मा जी आदि..
    और पाश्चात्य विचारक:
    -Coleridge
    -Milton
    -Aristotle आदि..
    के बारे में आपने समझाया परन्तु गंभीर रूप से जानने के लिए हम शोध अवश्य करेंगे..

  2. Mamta Gopalsing says:

    नमस्ते गुरुजी,
    पन्त जी, द्विवेदी जी,महादेवी वर्मा जी, प्रेमचंद जी आदि..आधुनिक युग के विद्वानो के बरे में तो थोरा पता था(क्योंकि उनके बरे में मैंने hsc में पढ़ा था) पर पाश्चात्य विचारक:Coleridge,Milton,Aristotle आदि..के बरे में ज़्यादा पता न था.आज की कक्षा में उनके बारे में कुछ सीखा.
    गंभीर रूप से जानने के लिए मैं शोध करूँगी.

  3. Varsha Goburdhun says:

    आदर्न्य गुरुजी
    जिस तरह से आपने आचार्यों के विचारों और सिद्धांतों के मूल पहलुओं को समझाया हैं अब ज़्यादा स्पर्ष्ट हुआ. अब हम इन्हीं सिद्धंतों पर ध्यान दैंगे तकी इनका प्रयोग अपनी आलोचना मैं प्रयोग कर सकैं. इन सब मैं आधूनिक काल मुझ्को प्रिय लगा. मगर सब तो सिखना पढ़ता हैं.
    शुक्रिया गुरुजी

    वर्षा

  4. khus21jaan says:

    आज मैंनें रीतिकाल और आधुनिक काल के बारे में जानने का सुअव्सर प्राप्त हुआ. रीतिकाल,उत्तर मध्यकाल से भी जाना जाता है
    रीतिकाल अव्यव्स्था का युग था.इस काल में कवियों ने अपनी विलासपुर भावनाओं पर भक्ति का आवरन दालने की कोशिश की.रीतिकालिन कवियों को तीन भागों में विभाजित किया जाता है.ये हैं रीतीबंध, रीतिसिध्द और रीतिमुक्त
    .रीतिसिध्द नामकरन केवल लक्श्य ग्रंथ प्रस्तुत करने वालों के लिये किया जाता है. रीतिबंध्द काव्य में : अशलीलता , आश्रय्दाता की प्तशंस,अतीशय अलंक्रिति,चमत्कारर्प्रियता, रुदिवादिता,मन की सुश्म भावतरंग्गों को अभिव्यक़्त करने की अशमता, आदि दोष रीतीबंध्द कविता को जरोन्मुख बना देते हैं ,पर रीतिमुक्त धारा के कवि मात्र कलात्मकता को ही साध्य ना मानकर मन की अक्रित्रिम , निश्कपत भावानुभव वणना को अपना साध्य मानते थे .
    रीतिकाल : १) कवि लोग पहले रस अथ्वा अलंकार के लक्शन बताते.
    २) अचाय वामन के अनुसार ” विशिश्ता पद रचना रीति:” ,अथाथ विशेश शैली युक्त पद राचना ही रीति है, रीतिकाल के अधिकांश कवियों की लक्शन रचना संस्क्र्त की पूस्तकों पर अधारित है, भिखारी दास हिंदी के प्रथम रीति कवि हैं, इनकी रचना “काव्य निर्नय है” .
    ३) कवियों ने इस काल में श्रन्गाररस, नायक्‌-नायिका भेद और नखशिख-वर्नन पर ही अधिक लिखा ,उनकी रचनायें सामाजिक अभिव्यक्ति से वंचित ही रही.
    ४) रीतिकाल कवियों ने अपनी कविता अधिकतर कवित्व और सवैयों में लिखी है.वास्तव में ये दो छंद श्रंगार के लिये बरे उपयुक्त होते हैं .इस काल की कविता श्रंगारप्रधान थी परंतू वीररस की भी कवितायें हुई हैं,कभी कभी तो श्रंगाररिकता अशलीलता की सीमा तक पहूच गयी है,किंतु इसके लिये उस समय का विलासी समाज ही उत्तरदायी है.
    ५) रीतिकाल के कवियों के लिये भक्ति एक मनोवैग्यानिक कवच के रुप में रह गयी थी, राधा क्रिश्ना की आर में ये कवि सामान्य नायक-नायिका का विलासपुर्न चित्रन करते थे.
    आधुनिक काल की सर्व्प्रमुख प्रव्रिति और महानतन देन खरी बोली में गध का विकास हैं, इस युग में गद्य कि अधिकता और अनेक उत्तम शैलियों को देखकर आश्चर्य होता है, इसके प्रमख कारन हैं राजनैतिक ,धार्मिक और सामाजिक शेत्र में अनेक विचारर्धाराओं वाले आन्दोलन. आधुनिक काल को एक प्रकार से गधयुग कहा जाता है, इस युग के आरम्भ होते ही सामाजिक, साम्प्रदायिक ,राजनैतिक और सांसक्रितिक श्रेत्रों में जो हलचल मची,जो परिवर्तन हुए ,उनके सजीव चित्रन के लिये गद्य का विकास अनिवाय था. साहित्य के तत्व सदैव जीवन से आते है ,जैसे-जैसे जीवन की वास्तविकता जतील होती जायेगी ,वैसे -वैसे उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम भी बदती जायेंगे…और मैंनें यह्न भि सीखा के कविता एकाकी,प्रक्रिति का आनंद लेते हुए लिखा जाता है…अकेले में भावों का उमरना तथा उसको एक कोरे कागज में उतारना येहि कवि की सही पेह्चान है….कविता वो नहीं जो भीर में लिखा जये…कविता वो है जो एकांत वातावरन मे लिखा जाये….अपने भावों को सहि धंग में अभ्व्यक्त कर पयें…कविता में रमनीयता है…एक प्रकार का अकर्शन है…जिसे परकर मन को शानती प्राप्त हो…हो…कविता प्रभावशाली होना ( एRRORS KE LIYE MAIN SHAMA PRAPTI HOUN, HINDI LIKHNE MAIN KAAFI KATHINAYI HUI PHIR BHI MEINE PRAYATNA KIYA….asha karti houn ki meri mehnat bekar nahi jaayegi…meineapni taraf se kuch research work kiya…ritikaal ke bare mein aur aadhunik kaal . मैंने आपसे जो भी कुछ सीखा वो मेरे लिये काफी लाभदायक सीध हुआ…मैं पूरी कोशिश करूगी की अग्ली बार पूरी तयारी के साथ कक्शा में प्रवेश करू…….धन्यवाद)
    (VARSHA GOPEE)
    (CLASS 7)
    (16/10/2011)
    (20hr03)

  5. khus21jaan says:

    अपनी तरफ से मैने कुछ शोध कार्य किया…..कविता मन के भावों को अभिव्यग्क्त करने का सबसे उत्तम माध्यम है, हमें आज कुछ प्रसिध्द कवियों के बारे में जानने का मौका प्राप्त हुआ .आधुनिक तथा रीतिकाल के प्रर्सिध्द कवियों परने का सुअव्सर प्राप्त हुआ… आधुनिक कविता में भाव और कला संबंधी इतने मौलिक परिवर्तन हुए कि सबका ठीक-से लेखा-जोखा लेना कठिन काम हो गया है। आधुनिक कविता में सबसे क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ प्रकृति-वर्णन के क्षेत्र में। वीरगाथा-काल में प्रकृति प्राय: उपेक्षा का विषय रही। संतों और सूफियों ने उसे आध्यात्मिक संकेतों के लिए ग्रहण किया। भक्तों ने उसे उपदेश और व्यंग्य का माध्यम बनाया। रीति-काल में उद्दीपन और अलंकरण के लिए उसे स्वीकार किया गया। आश्चर्य का विषय है कि जिस देश में प्रकृति का वैभव कण-कण में बिखरा पड़ा हो, वहाँ के कवि स्वतंत्र रूप से उसके सौंदर्य का वर्णन नहीं कर पाए। आधुनिक युग की विशेषता यह है कि इसमें ‘प्रकृति वर्णन’ का एक स्वतंत्र विषय ही बन बैठा। मनुष्य से भिन्न उसकी स्वतन्त्र सत्ता घोषित हुई। आकाश, समुद्र, पर्वत, पृथ्वी, पक्षी, फूल, सरोवर, झरने, वर्षा, बसंत, पतझर, ग्रीष्म छाया, चाँदनी, उषा, संध्या आदि पर सैकड़ों कविताएँ लिखी गयीं। इय युग में प्रकृति को इतने रूपों में देखा गया, जितने रूपों में एक हजार वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं देखा गया, सभी कवि प्रकृति-वर्णन की अपनी-अपनी विशेषताएँ लेकर आए। इनमें प्रकृति के रम्य दृश्यों के वर्णन के लिए पंत और उसके उपेक्षित सामान्य वर्णनों के लिए गुरुभक्तिसिंह ने अपने-अपने क्षेत्र चुने। उपाध्याय चित्रों के लिए प्रसिद्ध रहे। प्रसाद और महादेवी की दृष्टि प्रकृति के वैभवशाली पक्ष पर अधिक रही। निराला ने प्रकृति के श्रृंगारी और विद्रोही रूप को चुना। यों इस युग के प्राय: सभी कवियों ने प्रकृति के चेतना से युक्त देखा है। आधुनिक युग एक प्रकार से ‘वादों’ का युग है। बीसवीं शताब्दी में जिन साहित्यिक वादों का प्रचार हुआ, उनमें, छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद मुख्य है।आधुनिक युग एक प्रकार से ‘वादों’ का युग है। बीसवीं शताब्दी में जिन साहित्यिक वादों का प्रचार हुआ, उनमें, छायावाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद मुख्य है।
    (varsha Gopee)
    (CLASS 7)
    (21HR45)

  6. parmeetah deeljore says:

    नमस्ते गुरुजी,
    आज ह्मने आधुनिक युग के विव्द्नो के बारे मे सिखा। निराला, पन्त जी, दविवेदी, शुक्ल जी, आदि के विचारो के बारे मे सिखा। साथ ही साथ ह्मने पाश्चात विद्व्नो के विचारो को जानने का अवसर मिला। अब आलोचना करते समय ह्म इनके विचारो और इनके सिद्धान्तो का प्रयोग कर सकते है।

    parmeetah deeljore

  7. Ourvashi Devi Moosnah says:

    आदरणीय गुरू,
    आज मुझे यह पता चला जब हम किसी भी प्रश्न का उत्तर देते हैं तो आलोचनात्मकता,तुलनात्मकता एवं विचारों का खंडन अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं. वैसे तो साहितिक शेत्र में प्रतिएक युग की एक विशेषता हैं. कलम के पंडितों ने हर युग के बारे में अपना मत प्रकट किया हैं.इसी शेत्र में आज हमें संस्कृत के आचार्य एवं रीतिकाल के आचार्य के मतों के बारे में ज्ञात हुआ. इन दोनों में अंतर जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ.जहाँ संस्कृत के साहित्यकार केवल नाटक और काव्य को सर्वोपरि मानते थे वहाँ रीतिकाल के आचार्यों ने कलात्मकता पर अत्यधिक जोर दिए.रीतिकाल एक ऐसा युग था जहाँ मुग़ल सम्राटों का राज्य होने लगा और स्त्रियों का चारित्रिक पतन हुआ. दूसरी ओर आधुनिक काल में कवियों ने सीधे समाज को लक्ष्य-बेध किया. आधुनिक युग को वेज्ञानिक युग भी कहा गया क्योंकि समाज के हर तत्व को मशीनों से टोला जाता हैं. और तो और प्राकृतिक तत्वों को (नदी,चाँद.तारे.रात,पत्ते,द्वीप,घाट) आदि का
    वर्णन काव्यों में देखने को मिला. इस युग में मिथिलिशरण गुप्त,जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद,महादेवी वर्मा जैसे उच्च कोटि के रचनाकार हुए. आधुनिक युग सबसे ठोस एवं संदेशात्मक युग बन गया.
    पाश्चात विचारकों ने कल्पनात्मक शेली पर ज्यादा बल दिया.
    अतः कहा जा सकता हैं की इन चार युगों के बारे में आपसे काफी सिखने को मिला.
    धन्यवाद.
    (उर्वशी)
    क्लास 7.

    .

    .

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