MA Yr 1: Lecture 8: अमर राष्ट्र / माखनलाल चतुर्वेदी की कविता का विश्लेषण

Monday 17 Oct 2011, 16.00-17.30, MA Yr 1, Freedom Movement & Hindi Poetry

 

नमस्कार साथियो,

आशा है सब ठीक है. इस बार काफी लोग अनुपस्थित रहे, पहले से ही आपने सूचना दे थी.

आज की कक्षा में हमने साथ में देखने की चेष्टा की है कि कविता का विश्लेषण कैसे हों. करीब 45 मिनट तक आपके सामने माखनलाल चतुर्वेदी की  कविता “अमर राष्ट्र” रखी गई और अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर इसकी व्याख्या करनी थी आप लोगों को. कुछ लोगों ने अपनी  विश्लेषणात्मक शक्ति का प्रदर्शन किया जबकि शेष सभी से निनम्र आग्रह है और अधिक अध्ययन करें, व्याख्या करें, कविता को समाजशात्र के साथ  जोड़कर देखें आदि..

फिर अगले 45 मिनट तक मैंने कविता समझाने की चेष्टा की.

कविता के संदर्भ को समझना अति आवश्यक है. इस कविता में चतुर्वेदी जी रूढ़ आध्यात्मिकता को तिलांजलि देने का आग्रह कर भारतीय जनता में  क्रियाशीलता, स्फूर्ति लाने का प्रयत्न कर रहे हैं. अपने भाग्य को सर्वस्व सौंपकर भाग्य को सर्वोपरि माननी वालों की मानसिकता पर व्यंग्य कसते हुए, बताया जा रहा है कि इससे देश आज़ाद नहीं होने वाला..

अनेक प्रतीकात्मक शब्दों के प्रयोग से काव्य-कौशल का भी दर्शन होता है.

इनके बिम्ब पर भी ध्यान दीजिए तो दिखेगा कि एक ओर कुटिया, साधु, धर्म, संसार से निवृत्ति आदि के चित्र दिखते हैं तो दूसरी ओर कर्मण्यता, देश-प्रेम, क्रांति, विद्रोह, ऊर्जा आदि भाद सम्प्रेषित हो रहे हैं. तत्कालीन संदर्भ और आन्दोलनों के परिप्रेक्ष्य में इस कविता की महत्ता अधिक बढ़ जाती है.

शेष आप लोग अपना विश्लेषण जारी रखिए.

कविता इस प्रकार हैं –

छोड़ चले, ले तेरी कुटिया,
यह लुटिया-डोरी ले अपनी,
फिर वह पापड़ नहीं बेलने;
फिर वह माल पडे न जपनी।

यह जागृति तेरी तू ले-ले,
मुझको मेरा दे-दे सपना,
तेरे शीतल सिंहासन से
सुखकर सौ युग ज्वाला तपना।

सूली का पथ ही सीखा हूँ,
सुविधा सदा बचाता आया,
मैं बलि-पथ का अंगारा हूँ,
जीवन-ज्वाल जलाता आया।

एक फूँक, मेरा अभिमत है,
फूँक चलूँ जिससे नभ जल थल,
मैं तो हूँ बलि-धारा-पन्थी,
फेंक चुका कब का गंगाजल।

इस चढ़ाव पर चढ़ न सकोगे,
इस उतार से जा न सकोगे,
तो तुम मरने का घर ढूँढ़ो,
जीवन-पथ अपना न सकोगे।

श्वेत केश?- भाई होने को-
हैं ये श्वेत पुतलियाँ बाकी,

आया था इस घर एकाकी,
जाने दो मुझको एकाकी।

अपना कृपा-दान एकत्रित
कर लो, उससे जी बहला लें,
युग की होली माँग रही है,
लाओ उसमें आग लगा दें।

मत बोलो वे रस की बातें,
रस उसका जिसकी तस्र्णाई,
रस उसका जिसने सिर सौंपा,
आगी लगा भभूत रमायी।

जिस रस में कीड़े पड़ते हों,
उस रस पर विष हँस-हँस डालो;
आओ गले लगो, ऐ साजन!
रेतो तीर, कमान सँभालो।

हाय, राष्ट्र-मन्दिर में जाकर,
तुमने पत्थर का प्रभू खोजा!
लगे माँगने जाकर रक्षा
और स्वर्ण-रूपे का बोझा?

मैं यह चला पत्थरों पर चढ़,
मेरा दिलबर वहीं मिलेगा,
फूँक जला दें सोना-चाँदी,
तभी क्रान्ति का समुन खिलेगा।

चट्टानें चिंघाड़े हँस-हँस,
सागर गरजे मस्ताना-सा,
प्रलय राग अपना भी उसमें,
गूँथ चलें ताना-बाना-सा,
बहुत हुई यह आँख-मिचौनी,
तुम्हें मुबारक यह वैतरनी,
मैं साँसों के डाँड उठाकर,
पार चला, लेकर युग-तरनी।

मेरी आँखे, मातृ-भूमि से
नक्षत्रों तक, खीचें रेखा,
मेरी पलक-पलक पर गिरता
जग के उथल-पुथल का लेखा !

मैं पहला पत्थर मन्दिर का,
अनजाना पथ जान रहा हूँ,
गूड़ँ नींव में, अपने कन्धों पर
मन्दिर अनुमान रहा हूँ।

मरण और सपनों में
होती है मेरे घर होड़ा-होड़ी,
किसकी यह मरजी-नामरजी,
किसकी यह कौड़ी-दो कौड़ी?

अमर राष्ट्र, उद्दण्ड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र !
यह मेरी बोली
यह `सुधार’ `समझौतों’ बाली
मुझको भाती नहीं ठठोली।

मैं न सहूँगा-मुकुट और
सिंहासन ने वह मूछ मरोरी,
जाने दे, सिर, लेकर मुझको
ले सँभाल यह लोटा-डोरी !

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

One Response to MA Yr 1: Lecture 8: अमर राष्ट्र / माखनलाल चतुर्वेदी की कविता का विश्लेषण

  1. karishma bundhun says:

    माखनलाल चतुर्वेदी (४ अप्रैल १८८९-३० जनवरी १९६८) भारत के ख्यातिप्राप्त कवि, लेखक और पत्रकार थे जिनकी रचनाएँ अत्यंत लोकप्रिय हुईं। सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे हिंदी रचनाकार थे। प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रतिष्ठत पत्रों के संपादक के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ जोरदार प्रचार किया और नई पीढी का आह्वान किया कि वह गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर बाहर आए। इसके लिये उन्हें अनेक बार ब्रिटिश साम्राज्य का कोपभाजन बनना पड़ा। वे सच्चे देशप्रमी थे और १९२१-२२ के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए। आपकी कविताओं में देशप्रेम के साथ साथ प्रकृति और प्रेम का भी सुंदर चित्रण हुआ है।

    कविता अमर राष्ट्र में कवि कहते हैं कि मनुष्य सपने में जी रहे हैं कि भगवान ही भारत देश को आज़ाद करेगा. कवि तो इस तरह का विरोद्ध करते हैं. वे लोगों के प्रति जागृति की चेतना लाने का प्रायास करते हैं .

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