BA PT Yr 1: Lecture 9 – “पराजय” कहानी का प्रस्तुतीकरण

Saturday 22 Oct 2011, 12.30-14.00, BA PT Yr 1, Mauritian Hindi Literature

सभी को नमस्कार.

आज BA Full Time, Yr 2 की 3 छात्राएँ कक्षा में उपस्थित थीं, उनका स्वागत.

“पराजय” कहानी अनेक समस्याओं को लेकर लिखी गई कहानी है. तत्कालीन  मॉरीशसीय समाज में चाय उद्योग की स्थिति, मज़दूरों की दशा, पुलिस तंत्र,  राजनैतिक दाव-पेंच आदि अनेक चित्र इस कहानी के माध्यम से पूजानंद नेमा ने  प्रस्तुत किया है.

आज, नवेली तथा दिशा द्वारा इस कहानी पर पॉवरपोईंट प्रस्तुतीकरण था.

मूलत: उनकी तैयारी अच्छी रही, तात्विक विवेचना के स्थान पर उन्होंने समस्यागत विश्लेषण किया. अनेक उद्धरणों के  माध्यम से दोनों ने अपनी बात स्पष्ट की.

उनके प्रस्तुतीकरण के मूल पहलू प्रस्तुत है:-

स्वागतम्

दिशा & नवेली

द्वारा प्रस्तुतिकरण

“पराजय”

पूजानंद नेमा

  • पूजानंद नेमा जी का जन्म 24 नवंबर 1943 को मॉरीशस के दक्षिण प्रांत के लाफ्लोरा गांव में हुआ था। उनकी कविता संग्रह “चुप्पी की आवाज़” 1995 में नटराज प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।
  • उन्होंने “आकाशगंगा” नामक काव्य संग्रह का संपादन भी किया है।
  • उनकी कविताएँ अपनी एक अलग पहचान का अहसास देती हुई प्रतीत होती हैं। बड़ी कठिनाई से आज़ादी मिली है। आज़ादी कोई वस्तु नहीं है बल्कि संवेदना है।
  • “जो गैरहाज़िर है” कविता में आज़ादी के अस्तित्व के प्राप्ती कवि का चिंतन द्रष्टव्य है:-

आज़ादी चेहरों का तबादला नहीं

गुलामों की एर्जेसी भी नहीं

वायदे नहीं, नारे नहीं

आज़ादी चंद दिलों की सुहागरात भी नहीं

जिसे वेश्या भी मना लेती है।

कृतित्व:-

उनकी एक कहानी-संग्रह है “नया सफर सह्ने का”। इस संग्रह में स्वतंत्रता के बाद लिखी गयी कहानियाँ इस प्रकार से हैं:-

  • पराजय
  • किल्लतें
  • प्रतिक्षा
  • वह चालू थी
  • अधूरा आदमी
  • आग और बाग
  • नया सफर सहने का
  • विकल्प
  • तलाश
  • अंतिम-दर्शन
इनकी कहानियाँ जीवन के यथार्थ को छुती हुई तथा आसपास के माहौल के अनुभव से अपनी को

सम्रिध्द करती हुई शिल्प के चमत्कार से लबालब भरी होती हैं। हालाकि उनकी कहानियों की संख्या कम

है फिर भी शैलीगत विशेषता के कारण और स्थितियों को अच्छी तरह प्रस्तुत करने के कारण ये कहानियाँ

उनके व्यक्तिगत पहचान हैं।
स्वतन्त्र्योत्तर में मॉरीशस की स्थिति:-

  • यंत्रीकरण, औद्योगीकरण और आधुनिकरण से देश का विकास हो रहा था
  • समाज दो वर्गों में बँट गया
  • मील मालिक, मशीनमालिक और पूंजीपति
  • मज़दूर
  • न्याय व्यवस्था में विसंगतियाँ आने लगीं
  • राजनिती में भ्रष्टाचार, असमानता, भाईभतीजावाद जैसी कुरीतियाँ का जन्म

शीर्षक

शीर्षक सार्थक और सटीक

कहानी का सार:-

  • ‘पराजय’ में चाय बागान के मज़दूरों के संघर्ष का चित्रण
  • बलराज चाय बागान में मज़दूर के हैसियत से काम करता है।
  • उसकी पत्नी भी वहीं काम करती है।
  • चाय बागान में मज़दूर बहुत ही संघर्ष करते हैं, लेकिन उनकी स्थिति वही की वही रहती है। जो मज़दूर चीनी उद्योग में काम करते हैं वे बेहतर जीवन व्यतीत करते हैं,
  • साल के अंत में बोनस मिलता है। दुकानदारों ने भी खूब मुनाफा कमाया।
  • केवल चाय बागान में काम करने वाले मज़दूर ही दुखी थे।
  • वेतन बढ़ाने को लेकर मज़दूर हड़ताल करते हैं।
  • हड़ताल तीन महीनों तक चलती है। घर की स्थिती क्या हो सकती है इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
  • घर की दशा बिगड़ जाती है। घर की आर्थिक तंगी को देख कर उसकी पत्नी चाय के खेत में काम करने का निश्चय करती है।
  • मालिक और मज़दूर के बीच किसी प्रकार का समझौता नहीं हो पाता है बल्कि हड़ताल को गैर-कानूनी करार दी जाती है।

कहानी की विशेषता

मॉरीशसीय परिवेश के जन जीवन को चित्रित करती है लेखक ने आंचलिकता दर्शाई है।

  • घर के पीछे लौंकू की बेल और कच्चु लगाना
  • छिपकली का गिरना, बदशकुन मानना
  • बांस का झाबा
  • बकरी के घर और आँगन में मुरगी
  • नए साल के लिए गोश्त
  • पहली तारीख पूजा-पाठ और नमस्ते करना
  • दूसरी तारीख खंसी मारना, मसाला पीसना, गुड़की मारना
  • बुरे दिन में केले के छिलकों की चटनी तथा अरवी-बंडे की तरकारी

यह एक मनोवैजानिक कहानी है। पात्रों की मानसिकता दर्शाई गई:

  • गरीब विवश होकर फिर से काम पर जाने का निर्णय लेता है
  • नौकरी खोने के भय से हार मान लेता है
  • स्वतंत्रता से पहले लोगों में एकता सहनशीलता भाईचारा और स्वतंत्रता के बाद स्वार्थ भावना भ्रष्टाचार अंहम भावना

इसमें अत्याचार तथा शोषण के विरुद्ध आक्रोश

सामाजिक दुर्व्यवस्था के दुष्टप्रभाव को पाठकों के समक्ष  नेमा जी लाते हैं।

पूँजीवादी व्यवस्था एवं शोषक-शोषितों का चित्रण

युद्ध अंग्रेज़ों से नहीं अपने लोगों के विरुद्ध है

अपने अधिकार की रक्षा करना मज़दूरों अपना धर्म और कर्तव्य मानते हैं

इसीलिए चाय के मज़दूर हड़ताल पर उतर आए

मनुष्य भूख की समस्या से पीड़ित है

कहानी समयानुकूल है।

कहानी के आरंभ में चित्रात्मक शैली तथा दृश्य बिम्ब का प्रयोग हुआ है।

  • टीन से बना मकान
  • सूरज की गरमी
  • केले के पौधों के नीचे चटाई पर लेटना
  • हरी छिपकली का गिरना
  • घबड़ाकर उठना और पतलून को झारना
  • कीड़ा लौंकू की बेलों में घुस जाना

मिश्रित भाषा का प्रयोग:-

  • संस्कृतनिष्ठ भाषा:- मुक्ति, सम्भव, विश्राम,          विश्वास, आदि…।
  • उर्दू शब्दों का प्रयोग:- हरकत, ज़िन्दगी, मुसीबत, फैसला, खत्म, आखिर आदि…।
  • अंग्रेज़ी शब्द:- फाइल, पिस्तौल, बोनस, रायट-युनिट, आदि…।
  • भाषा मुहावरेदार है:- पानी में तलवार मारना ,आँखें ज़मीन में फिसलना।
  • सामासिक शब्दों का प्रयोग:- रात-दिन, चाय-मज़दूरों, पिसा-जाना।
  • भोजपुरी शब्दों का प्रयोग:- गोश्त, खांसी, गुड़की आदि…

समस्याएँ:-

भ्रष्ट राजनीति का चित्रण

‘पराजय’ कहानी में स्वतंत्रता के बाद भी जनता को संघर्ष करना पड़ा

“बाप दादे सुनाते थे कि गोरे मालिक कुलियों को पेर कर चरबी निकालते थे…. अब अपने ही लोग ही हम को पेरने लगे हैं”

मनुष्य दास्ता की बेड़ियों से मुक्त नेता का चुनाव करता ताकि देश कुशल हो और प्रगति करे

यही स्थिति आज भी है

फरिश्ते की खाल पहने भेड़िया, हर पाँच वर्ष बाद जनता के सपने, अभिलाषाएँ और आशाओं का खून करता है

कुरसी मिलते ही केवल स्वार्थ सिद्धी के लिए कार्य करने लगते

“नेता चुनाव जीत कर कपूर की तरह उड़ गए ”

यही स्थिति यही है विवश होते आंतरिक आक्रोश बखान नहीं कर पाते क्योंकि नौकरी खोने का डर या प्रोमोशन न पाने का डर से अंदर की ज्वालामुखी फट नहीं पाता

धूमिल की कविता याद आती है।

“एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है”

“संसद से सड़क तक”

पूंजीपति द्वारा गरीबों का शोषण

इस पूँजीवादी दूषित व्यवस्था में गरीब अधिक गरीब  और अमीर अधिक अमीर बनता गया

कर्म करने वाले तो मज़दूर थे परन्तु उस मेहनत का फल चखने वाले पूंजीपति ही थे

कैसी विडम्बना है गरीब की दयनीय अवस्था का मज़ाक बनाया जा रहा है तीन महीने के हड़ताल के बाद भी मज़दूरों के बोनस का कोई प्रबंध नहीं किया गया

आज भी पूंजीपति जो चाहे गरीबों के साथ खिलवाड़ करे, इन का शोषण-दमन करे फिर भी ये लोग आप ही झुक जाते घुटने टेक देते हैं क्योंकि इन के साथ सहानुभूति जताने वाला कोई नहीं

आर्थिक समस्या

आर्थिक परिस्थिति से ग्रस्त मनुष्य कल भी पीड़ित था और आज भी है।

पैसे न होने से तनाव होती और व्यक्ति  कर्ज़ में डूबता है

बलराज व उसके परिवार के माध्यम से, कहानीकार ने आर्थिक संघर्ष का अच्छा परिचय दिया है।

तीन महीनों तक हड़ताल चलती रही और इसके कारण बलराज के घर में तंगी आ जाती है

“केले के छिलकों की चटनी और अरवी की तरकारी से जी ऊब गया था।”

इस वाक्य से पता चलता है किस तरह से बलराज और उसका परिवार विवश हो जाता है।

आज भी देश में कहीं न कहीं गरीबी की समस्या प्रासंगिक है।

आज भी कई लोग भूखे सोते हैं

मनुष्य का खाली पेट ही समाज में अनैतिकता, भर्ष्टाचार आदि कुरितियाँ पैदा करता है

अधिकार के लिए हड़ताल

• उस समय हालात ऐसी थी कि मजदूरों को हड़ताल करना पड़ा
• बोनस के लिए संर्घष न करते तो शायद कायरता होती
• अपनी अधिकार की रक्षा करना मज़दूरों का कर्तव्य था
• परन्तु आज के संदर्भ में हड़ताल उतनी प्रासंगिक नहीं है
• सभी अपने हक के लिए लड़ते हैं।हड़ताल नहीं करते।
• आज कल काम पर कुछ कायदे-कानून है।

पुलिस तंत्र की दुर्व्यवस्था

न्याय व्यवस्था में विसंगतियाँ।

गरीब जनता न्याय की तलाश में भटकती पर निराश होते

पुलिस जनता की रक्षा के लिए परन्तु यहाँ तो उलती गंगा बह रही है

भ्रष्टाचार इतनी बढ़ गई है कि आज कल के पुलिस चारों ओर रिश्वत लेते हैं

उद्देश्य:-

व्यक्ति हमेशा विजय प्राप्त करना चाहता है, पराजय नहीं। लेखक इस छोटी सी कहानी के माध्य्म से समाज के कुछ ऐसे कटू सत्य दर्शाना चाहा जो आज भी दिखाई देता है। देश तो प्रगति कर रहा है, पर क्या उन पीड़ित मज़दूरों के लिए कुछ किया जा रहा है? नहीं! उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। मालिक का क्या जाता है, उसे अपनी जेब से मतलब है, कोई जीए या मरे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

आप के ध्यान के लिए

धन्यवाद

———-

नोट: अगली बार कहानी का विश्लेषण + व्याख्या होगी.

PLEASE NOTE THAT OUR CLASS WILL START ON 09.30 NEXT SATURDAY. SO, WE DO NOT HAVE ANY CLASS AT 12.30.

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

2 Responses to BA PT Yr 1: Lecture 9 – “पराजय” कहानी का प्रस्तुतीकरण

  1. disha luchun says:

    नमस्ते गुरुजी,

    क्ष्मा कीजिएगा, पराजय कहानी का काम ब्लोग में नहीं भेज पाई, समय ही नहीं मिला, परंतु आप ने डाल दिया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद……

    प्रस्तुतिकरण उतना थीक से नहीं कर पाए, तयरी तो कर ली थी, परंतु अंत तक शोध कार्य चलता रहा इसीलिए उतना थीक से नहीं हो पाया… आप ने जिस प्रकार से हमें बताया कि हम अपने काम को कैसे बेहतर बना सकते थे, हमें बहुत अच्छा लगा, सचमुच यह और भी बेहतर बन सकता था। अगली बार हम अधिक मेहनत करेंगे….

    शनिवार को जब आप कहानी का विशलेषण करेंगे, तब हमें पूरा विश्वास है कि हम कहानी को और अच्छी प्रकार से समझ पाऎंगे, और जो छूत गई है, उसे पकड़ पाऎंगे व इस कहानी से सम्बन्धित अन्य प्रश्नों को अच्छी प्रकार से कर पाऎंगे….

    आज के लिए य्ही कहना चाहती हूँ…. शनिवार को मिलते हैं और अपने काम को आगे बढ़ाऎंगे…

    धन्यवाद…

    दिशा🙂 🙂 🙂

  2. siddhi says:

    नमस्ते गुरुजी
    शनिवार की कक्षा में दिशा और नवेली का प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली था . उन्होंने chart आदि का प्रयोग किया. उन्होंने इस कहानी को आधुनिक समस्याओं से भी जोड़ा है
    आपने प्रस्तुतिकरण में हमें powerpoint के कुछ techniques बताया

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