Happy Divali

मंगलकामनाएँ तो हज़ार मिली होंगी

जीवन भर

शुभचिंतक तो अनेक होंगे आपके

उम्र भर

आज अपने सभी साथियों को

दीपावली की शुभकामनाएँ दे रहा हूँ..

आप सभी सपरिवार खुश रहें..

ईश्वर करें कि आपके परिवार में हर प्रकार के दीप जले..

विनय

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

5 Responses to Happy Divali

  1. Ujoodha Priya says:

    धन्यवाद गुरूजी..आप को भी दीवाली की शुभकामनाएं..

  2. teesna etwaru says:

    aap ko bhi divali ki dher sari shoubhkamnayein guruji.enjoy well……..

  3. सिखा पानचू says:

    देर सही आप को भी दीवाली की शुभकामना है। लक्ष्मी मां आप के जीवन को रोशनी से भरें ।

  4. awotar manisha says:

    नमस्ते गुरूजी, assignment के लिए एक निबंध :
    हमारी अभिलाषाएँ
    संसार में ऐसा कोई सुख नहीं है, जिसके लिए हम लालायित नहीं होते हैं । लेकिन उसकी प्राप्ति क्या सरल है ? क्या इच्छा मात्र से कोई काम हो जाता है ? असम्भव । हमारी कोई भी इच्छा, अभिलाषा तब तक पूरी नहीं हो सकती है, जब तक कि हम प्रयत्न न करें । बिना हाथों को कष्ट दिए हम भोजनतक नहीं कर सकते हैं । प्रत्येक इच्छा की पूर्ति के लिए परिश्रम आवश्यक है । हमारे मन में जिस वस्तु की अभिलाषा है, वह हमसे बहुत दूर पड़ी अवश्य है । वह केवल हमारी कल्पना में साकार है । उसे कार्यरूप में साकार करना अर्थात उसे वास्तविक रूप देना आवश्यक है।
    हरेक के मन में कुछ इच्छाएँ एवं कल्पनाएँ अवश्य होती हैं । हमें अपने जीवन को अपनी इच्छाओं और कल्पनाओं के योग्य बनाना चाहिए । तभी सब अपने आप पूरी होती जाएगी । हमारी सभी लालसाएँ, आत्मिक आकांक्षाएँ केवल कल्पना की कोरी उड़ानें ही नहीं है, वे उन वस्तुओं की भविष्यवाणियाँ हैं, जो वस्तुएँ वास्तव में सत्य में परिणत होने वाली हैं । हमारी अभिलाषाएँ हमारी सामर्थ्य के संकेत-चिह्न हैं । उनसे हमारे लक्ष्य की ऊँचाई नापी जाती है । हम जिस वस्तु को पाना चाहते हैं, यदि सच्चाई से उसकी इच्छा करते हैं, ईमानदारी से उसके लिए प्रयत्न करते हैं,वही एक दिन वास्तविकता बन जाती है । एक मूर्तिकारके मन में स्थित मूर्ति का एक स्वरूप होता है । जब वह उसे ठोस रूप में परिवर्तित कर देता है तब उसके मन में संतुष्टि, हर्ष व उल्लास की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं । उसी प्रकार जब हमारी अभिलाषाएँ साकार होंगी तो हमें अत्यंत प्रसन्नता होंगी ।
    हमें असम्भव को सम्भव बनाना चाहिए । हम जिस वस्तु को पाने के लिए निरंतर प्रयत्न करते हैं, वह चाहे पहले पहल असम्भव ही प्रतीत होती हो, हम उसे प्राप्त करने के योग्य बनते जाते हैं । यदि हम अपने जीवनोद्देश्य को, अपने आदर्श को वाणी से बराबर प्रकट करते रहें, बार-बार उसी के बारे में कहते रहें, जिसे हम जीवन में सच्चाई के रूप में परिणत हुआ देखना चाहते हैं- उसे हम अवश्य ही एक दिन प्राप्त करके रहेंगे,चाहे वह श्रेष्ठ स्वास्थ्य हो अथवा उत्तम चरित्र,अच्छी नौकरी हो या कोई व्यवसाय । हमें अपनी इच्छाओं को दबाकर नहीं रखना चाहिए । हमें हर समय अपने आदर्शउद्देश्य की ओर ध्यान एकाग्र करना चाहिए, दृढ़ विश्वास धारण करना चाहिए, तथा अपने आप को सर्वशक्तिमान व कार्यकुशल व्यक्ति मानते रहना चाहिए । इससे हमें अपने कार्य में असफलता का मुहँ नहीं देखना पड़ेगा । हम जो करना चाहते हैं, जो बनना चाहते हैं,केवल उसी पर अपना सारा ध्यान रखना चाहिए । हमें निरंतर कार्यरत रहना चाहिए । हमें अपने मस्तिष्क से निराशा और पराजय की भावनाओं को सर्वथा के लिए पोंछ देना चाहिए जिससे की हम सफलता के मार्ग पर चल सकें ।
    मनुष्य चाहे कोई भी हो, उसमें प्रत्येक कार्य करने की क्षमता होती है । अगर मनुष्य में इस प्रकार की क्षमता न होती,तो आज संसार के अन्य प्राणियों के समान परम्परागत जीवन ही जीता रहता । आज मनुष्य अपनी क्षमता के बल पर जल-थल-आकाश में विचरण कर रहा है । हमें अपने आप को कहीं से भी हीन नहीं समझना चाहिए । जब हम अपनेकाम में अपना ह्रदय लगा देते हैं और पूरी कोशिश कर लेते हैं,तो हमें शांति तथा उल्लास का अनुभव होता है । हमें मन में सदा अपने कार्य के लिए संकल्प बनाए रखना चाहिए तभी हमारी अभिलाषाएँ पूर्ण होंगी । अपने मन का उत्साह हमेशा बनाए रखना चाहिए । ऊँचे विचारों, आदर्श-आकांक्षा को निरंतर मन में दोहराने से दुर्बलता और अपूर्णता दूर होती है । प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उसके आदर्श का ही अनुसरण करता है । यदि आदर्श श्रेष्ठ है तो जीवन भी श्रेष्ठ होगा । यदि आदर्श सुंदर है तो जीवन भी सुंदर होगा । जो आदर्श हमारे मन में हर समय रहता है, उसे हम अपने चेहरे पर प्रकट होने से रोक नहीं सकते हैं । इसलिए हमें सदा सकारात्मक विचार लाना चाहिए । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी क्षमतओं को पहचाने और कार्य करने के लिए एकाग्र हो जाए तभी हमारी अभिलाषाओं कि पूर्ति हो पाएगी ।
    दृढ़ संकल्प की भावना बड़ा ही महत्वपूर्ण है । दृढ़ निश्चय करने से,मन में संकल्प करने से हमारी अभिलाषाएँ अवश्य पूर्ण होंगी । मन में विश्वास भी अति महत्वपूर्ण है । यदि विश्वास का अभाव हो तो अभिलाषाएँ मात्र स्वप्न बनकर रह जाती हैं। हर व्यक्ति में अपार शक्तियाँ होती हैं । जो व्यक्ति यह समझते हैं कि हमारी शक्तियाँ सीमित हैं, जिनके मन में यह बात जम गई कि हम अपनी परिस्थितियों से घिरे हुए हैं, उससे निकल ही नहीं सकते हैं, और अत: दुखी ही रहते हैं । उनकी ऐसी सोच ने ही उनकी लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति को कम कर दिया है, विचारों को क्रिया रूप में परिणत करने की उनकी योग्यता को नष्ट कर दिया है । इस प्रकार उनकी अभिलाषाएँ पूर्ण नहीं हो पाती है । कुछ लोग अपने आपको दुर्बल समझते हैं । यह केवल मन की बीमारी है । क्या ऐसा भी कोई विज्ञान या उपाय है, जिसकी सहायता से कोई मनुष्य कोई कार्य कर सके,जबकि वह सोचता है कि मैं नहीं कर सकता? क्या कोई ऐसा तरीका भी कि मनुष्य ऊपर भी न देखे और ऊपर उठ भी जाए ? क्या कोई ऐसा मार्ग भी है कि कोई मनुष्य असफलताके विषय में ही सोचता रहे, और फिर सफल भी हो जाए ? कोई मनुष्यएक ही समय में दो विरुद्ध दिशाओं में नहीं जा सकता है । जहाँ स्नेह रहता है,वहाँ निश्चयनहीं रहता । जब तक हम अपने शब्द कोश से नहीं कर सकता निकाल नहीं देंगे,तब तक हम उन्नति नहींकर सकते हैं । हम तब तक शक्तिशाली नहीं बन सकते, जब तक हमारे मन में यह जमा रहेगा कि हम दुर्बल हैं, नाकाम हैं । मन में दृढ़ संकल्प की भावना होना अति महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ही हमारी अभिलाषाएँ पूर्ण होंगीऔर सफलता हमारा कदम चूमेगा ।
    अंतत: हम यह कह सकते हैं कि आशाएँ और अभिलाषएँ हरेक के मन में उत्पन्न होती हैं । पर हमारी कोई भी इच्छा तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक हम प्रयत्न नहीं करेंगे । हमें असम्भव कार्य को सम्भवबनाना चाहिए । मन में विश्वास, सकारात्मक विचार, दृढ़ संकल्प की भावना आदि होना अनिवार्य है । हीनता की भावना छोड़कर हमें अपनी क्षमताओं को पहचानना चाहिए । अत: हमारा यह कर्तव्यहो जाता है, कि हम निरंतर अपने विचारों को श्रेष्ठता की ओर,दिव्यता की ओर, महानता की ओर ले जाएँ । हमारे विचारों में श्रेष्ठता और उदारता आनी चाहिए । फिर हम निरंतर उन्नति की ओर कदम बढ़ा सकते हैं और हमारी अभिलाषाएँ पूर्ण होंगी ।

  5. awotar manisha says:

    नमस्ते गुरूजी, assignment के लिए एक निबंध

    जीवन का लक्ष्य
    जीवन में हमें सफलता तभी प्राप्त हो सकती है,जब हम अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं । जब तक हम अपने जीवन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं कर लेते, हमारी कोई भी कामना, अभिलाषा और इच्छा पूरी नहीं हो सकती । जो मनुष्य अपने जीवन का लक्ष्य निश्चित कर लेता है , और उसके लिए उत्साहपूर्ण रहता है । वह रचनात्मक , क्रियात्मक व निर्माणात्मक सृजन- शक्ति बन जाता है । एक लक्ष्य के बिना कोई भी व्यक्ति साधनयुक्त आविष्कारक, मौलिक या रचनात्मक कर्ता नहीं बन सकता । जब तक मनुष्य एकनिष्ठ होकर अपने मन को किसी एक बिंदु पर एकाग्र नहीं कर लेता तब तक वह अपनी आकांक्षा की पूर्ति के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता,तब तक वह अपने जीवन के लक्ष्य को नहीं पा सकता । जीवन का लक्ष्य ही जीवनका सर्वोच्च अधिकारी होता है ।
    प्रत्येक मनुष्य को चाहिए कि वह अपने काम को उसी दृष्टि से देखे, जैसे एक कलाकर अपने काम को उसी दृष्टि से देखे, जैसे एक कलाकर अपने सर्वोत्तम चित्र को देखता है । उसे उसके विषय में चर्चा करते हुए बड़ा ही गर्व होता है । उसे उससे इतनी संतुष्टि होती है, जितनी अन्य किसी भी बात से नहीं । परंतु कुछ लोग अपने काम के बारे में रुचिहीन होते हैं । वे हर समय दुविधा में पड़े रहते हैं कि जिस काम में लगे हुए हैं, क्या वह ठीक है और क्या उसमें वे अपनी योग्यता को सर्वोत्तम रूप में लगाकर लाभ उठा सकते हैं ? वे जब किसी अन्य व्यक्ति को किसी अन्य काम में सफल हुआ देखते हैं,तो सोचने लगते हैं कि वे भी उस काम में जाकर अपनी भाग्य – परीक्षा करें ।जिस कार्य से आपके जीवन का विशिष्ट स्वाद बनता है, जिससे आपका जीवन शक्तिशाली बनता है, वही आपका जीवन लक्ष्य है । वह आपके जीवनकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। उसी को आप करना चाहते हैं । इस उद्देश्य तक पहुँचने में भले ही कितनी देर लग जाए,कुछ परवाह नहीं, परंतु इसे आप छोड़ नहीं सकते । उस उद्देश्य को प्राप्त करने का अटल संकल्प हमारे मन से कभी नहीं निकल सकता । सच्ची निष्ठा व लगन से काम करने के पश्चात अंततः हम अपने जीवन के लक्ष्य तक अवश्य पहुँच पाएँगे ।
    कुछ लोगों में इतना चरित्र – बल नहीं होता कि वे लगातार किसी काम को करते रहें । वे तब तक धीरज नहीं रख सकते,जब तक उनके बीच के लक्ष्य की बाधा नहीं हट जाती । वे अपने आपको इधर – उधर विचलित हो जाने देते हैं, वे अपना लक्ष्य पथ छोड़ बैठते हैं,वे कभी भी उद्देश्य को प्राप्त करने में समर्थनहीं होते । यदि इस संसार में कुछ ऐसी वस्तु है,जिसके लिए मनुष्य को संघर्ष करना चाहिए, तो वह यह है कि मनुष्य अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के प्रयत्न में स्वतंत्र हो, उद्देश्य की प्राप्ति में ही मनुष्य अपने पूर्ण रूप को प्रकट करने का अवसर पाता है । उसका सर्वोत्तम विकास उसी में प्रकट हो सकता है । यदि मनुष्य अपने उद्देश्य के लिए जी तोड़ परिश्रम नहीं करता, यदि वह अपने उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाता तो उसका जीवन व्यर्थ होता फिर चाहे वह कितना ही कर्तव्य पालन करे, कितना ही परिश्रम करे, पर उद्देश्य नहीं तो जीवन कुछ नहीं ।
    दृढ़ संकल्प में बड़ी शक्ति है । उससे प्रेरित होकर मनुष्य जीवन में आगे बढ़ता है । दृढ़ संकल्प ही मनुष्य को उसके लक्ष्य तक ले जाता है । जब किसी लक्ष्य की शक्ति जागृत होती है , जब लक्ष्य के लिए मन में दृढ़ संकल्प उठता है , तब मनुष्य सर्वथा नवीन बन जाता है । जो मनुष्य अपने उद्देश्य को आगे के लिए टाल देते हैं , जो अपने विचारों को कार्य रूप में परिणत नहीं कर पाते हैं , जो अपने विचारों को बंद करके रख देते हैं, वे सदा दुर्बल बने रहते हैं । शक्तिशाली एवं प्रभावशाली वे ही लोग होते हैं , जो अपने विचारों को कार्यरूप में परिणत कर देते हैं । जब कोई मनुष्य अपने संकल्प को कार्यरूप में परिणत नहीं कर पाता, उसे व्यर्थ ही नष्ट होने देता है,तब इसका चरित्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है । जब मनुष्य अपनी योजना को पूर्ण कर लेता है, तब उसकी सहनशक्ति और साहस बढ़ जाते हैं । प्रायः कोई भी व्यक्ति किसी भी काम को पूर्ण करने का संकल्प कर सकता है, परंतु संकल्प को कार्यरूप में वही परिणत कर पाता है, जिसका चरित्र दृढ़ हो, जिसका निश्चय पक्क हो,जो निष्ठावान व आत्मविश्वासी हो ।
    प्रत्येक मनुष्य कुछ-न-कुछ सोचता-विचारता अवश्य है । यदि कहीं हम अपने चिंतन के सर्वोत्तम क्षणों को कार्यरूप में परिणत कर सकें तो कितना उत्तम होगा । फिर हमारा जीवन श्रेष्ठ बन जाएगा । परंतु कुछ लोग अपने विचार को बाहर नहीं आने देते हैं और वे अपने संकल्प को नष्ट हो जाने देते हैं । अत: वे अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते हैं । कुछ ऐसे लोग हैं जिनको काम को बीच में ही छोड़ देने की आदत हैं । इस प्रवृत्ति के कारण काम में बाधा उत्पन्न होती है । दूसरे अपने काम में ज़रूरत से ज़्यादा सावधानी लाते हैं या अपने आप पर हद से ज़्यादा विश्वास रखते हैं । ये सब कार्य के शत्रु हैं जो हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने में रोकते हैं ।
    जीवन में निरंतर प्रयत्न करते रहना चाहिए । निरंतर प्रयत्न के द्वारा ही मनुष्य विद्वान बनता है । आकांक्षा और प्रयत्न के सहारे ही आप जैसा चाहें,वैसा बन सकते हैं । लोग सोचा करते हैं कि यदि वे अपने मनोवांछित काम या लक्ष्य को भली-भांति पूर्ण न कर सके तो जीना व्यर्थ है ।वे अपने मन से ही प्रतिज्ञा करते हैं कि वे जीवन में निर्धारित कार्य या लक्ष्य को अवश्य पूर्ण करके रहेंगे । वे निश्चय कर लेते हैं कि सभी साधनों को जुटाकर अपना काम आरम्भ करेंगे और जब तक उसमें पूरी तरह सफल न होंगे, चैन न लेंगे । सफलता की प्राप्ति के लिए जीवन में लक्ष्य निर्धारण करना अति आवश्यक है । इससे ही लोग प्रेरित होकर जीवन में प्रगति की मार्ग पर चलते हैं ।
    अंतत: हम यह कह सकते हैं कि जीवन में लक्ष्य का बड़ा ही महत्व है । जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने के पश्चात ही हमें सफलता प्राप्त हो सकती है । लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य को सच्ची निष्ठा व लगन से काम करना चाहिए । मन में दृढ़ संकल्प की भावना भी अति आवश्यक है क्योंकि इससे प्रेरित होकर मनुष्य आगे बढ़ता है । अपने संकल्प को कार्यरूप में परिणत करने के बाद ही हमें लक्ष्य की प्राप्ति होगी । यदि जीवन का कोई लक्ष्य नहीं तो जीवन जीना बेकार है । हमारे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होगा । अत: जीवन में लक्ष्य निर्धारित करने की बड़ी आवश्यकता है । इससे ही हम सफल जीवन जी पाएँगे ।

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