BA PT Yr 1: Lecture 10 – “पराजय” की व्याख्या

Saturday 29 Oct 2011, 09.30 – 11.00, BA PT Yr 1, Mtian Hindi Lit

नमस्कार दोस्तो,

“पराजय” कहानी की एक मूल पंक्ति – “हड़ताल अवैध है …” व्याख्या के लिए आपको दिया गया. आप में से काफ़ी लोगों ने कोशिश की कक्षा में.. Please note that you need to post your work as “BLOG 1 – व्याख्या : पराजय” before our next class. ALSO NOTE THAT YOU WILL BE ASSESSED ON THIS PIECE OF WORK GIVEN AS CLASSWORK. IT WILL COUNT FOR YOUR COURSEWORK.

इसके अतिरिक्त मॉरीशसीय संदर्भ में ‘पराजय की सार्थकता पर चर्चा की गई आज..

वैश्विक स्तर हो हो रही हलचलों के संदर्भ में भी इस कहानी की सार्थकता स्वयंसिद्ध होती है.

प्रतीकात्म्नक ढंग से लिखी गई इस कहानी में अनेक समस्याओं को उभारा गया है जिनमें से हड़ताल संबंधी अनेक चित्र उपस्थित है.

अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे साधारण मज़दूरों पर किस प्रकार से दबाव डाला जाता है, इसे भी लेखक ने बहुत ही सजीव रूप से प्रस्तुत किया है.

कृपया अधिक जानकारी के लिए, देखें – BA Yr 2 FT के ब्लॉग… विस्तार से समझाया गया है..

यदि कोई प्रश्न है तो कृपया पूछें…

धन्यवाद.

NOTE:

  • PLEASE COME PREPARED BY READING THE SHORT STORY समस्या IN OUR NEXT CLASS.
  • DIVYA TEELUCK WILL CONDUCT A PRESENTATION ON THIS SHORT STORY.
  • COME IN CLASS WITH YOUR QUESTIONS AND AWAIT MINE!!
विनय

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

17 Responses to BA PT Yr 1: Lecture 10 – “पराजय” की व्याख्या

  1. disha luchun says:

    नमस्ते गुरुजी,

    सब से पहले, क्षमा माँगना चाहती हूँ, कक्षा में देर से आयी, क्या करूँ, बस ही नहीं मीली।
    जो कुछ आप ने समझाया, हमें समझ में आया, पराजय कहानी को एक दूसरे पहलू से समझ पाए, पता चला कि कहानी का वीशलेषन कैसे किया जाता है, किस ढ़ंग से व्याख्या की जाती है….

    अन्य प्राध्यापक इस प्रकार से नहीं करते, सब के अलग अलग तरीके होते हैं…..
    आज के लिए बस इतना ही…. और कुछ कह्ना चाह्ती हूँ, पर लिख नहीं पाऊँगी….
    तबीयत कुछ थीक नहीं है….. क्षमा करें…

    धन्यवाद….
    दिशा

  2. divya says:

    नमस्ते गुरुजी फिर से मेरि प्रस्तुतिकरन मे अभी tak sab कूछ अच्छा है लेकिन लेखक के बारे मे कोइ जानकारी नही मिली है! मदद किजिऎ!

  3. prema says:

    नमास्ते गुरुजी
    गत सपताह कक्शा मे न आने के लिये शमा. इस सप्ताह कक्शा मे जो भी कहानी के बारे मे समझाया मुझे समझ मे आ गया. जो कार्य आप ने दिया है थोरा कथिन हे पर पूरा करने की कोशिश करुगी.

  4. teena caumul says:

    नमस्ते गुरुजी. पराजय कहानी पर आपने अपना विचार प्रस्तुत करके मैं अच्छी तरहसे इस कहनी को समझ गयी हूँ . इस कक्षा केबाद इस कहानी के मूल भाव सामने आए. शायदमैंइस दिशा की ओर नासोच पाती.धन्यवाद गुरुजी

  5. nishta18 says:

    “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”

    प्रसंग-प्रस्तुत पँक्तियाँ “पराजय” नामक कहानी से उद्धृत है जिसके रचनाकार पूजानन नेमा जी हैं।

    संदर्भ-प्रस्तुत पँक्तियों से द्रष्टवय है कि कैसे मॉरीशसीय परिवेश में,स्वतन्त्रता के बाद भी सम्पन्न लोग,दीन मज़्दूरों पर शोषण करते थे।ये सम्पन्न व्यकित कोई और नहीं बल्कि अपने धर्म के ही लोग थे।यहाँ पर हमें इन पँक्तियों से पता चल जाता है कि कैसे उस समय अगर कोई ग़रीब मज़दूर अपने अधिकार के लिए हड़ताल करता या अपनी माँगों की पूर्ति करता तो ये सब करना अवैध माना जाता था अपितु इन सभी अत्याचारों कॊ सहना ही वैध था।

    व्याख्या:- “पराजय” नामक इस कहानी में देखा गया है कि कैसे मॉरीशस में भी ग़रीबी,शोषण,अत्याचार,भ्रष्टाचार आदि जैसी समस्याएँ समाज में फैली हुई थीं।
    सम्पन्न लोग और भी सम्पन्न तथा रम्रृद्ध होते जाते थे और ग़रीब लोग और भी ग़रीब,मजबूर,लाचार एवं बेबस होते जाते थे.चाय उद्योग के बन्द होने से कई मज़दूरों की रोटी छीन ली गई और उनके वेतन काट लिया जाता था।इस प्रकार बेरोज़गारी की समस्या समाज में चहूँ ओर हाहाकार करती थी।बलराज इस कहानी का मुख्य पात्र है.कहानीकार ने इस पात्र को एक प्रकार से इसको आदर्श बनाया क्योंकि बलराज ही वह एकलौता व्यक्ति था जिसने इन अत्याचारों के व शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी और अपने परिवार तथा मित्रों को हड़ताल करवाया तकि उनकी माँगों की पूर्ति किया जए।

    वह उद्योग इन ग़रीबों के खून-पसीने से चलती थी लेकिन उन लोगों के साथ बेवफ़ाई की गई.तभी वे लोग हड़ताल में जट गए।इससे इन के घरों में अन्न का दाना नहीं था,चूल्हा नहीं जलाया जाता था तथा रोज़ एक हि प्रकार क खाना खाकर वे लोग ऊब गए थे।बलराज उनसे कहता था कि काम पर ना जएँ लेकिन मज्बूरन उन्हें झुकना पड़ा।

    इस प्रकार देखा जाता है कि बलराज भी “हार” मान लेता है और काम पर पुन: लौट जाता है।असल में,बलराज हारता नहीं है क्योंकि जहाँ पर भी व्यक्ति अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाता है वहाँ पर उसकी जीत पक्की होती है।राज्नेता,मालिक,श्रमिक संघ,पूँजीपति तथा पुलिस वाले हारे हैं न कि बलराज और उसके साथी।लेकिन कहानी में मज़दूर लोग ही हार कर,घुटने टेक देते हैं इन पूँजीवादी मनसिक्ता के सामने और जीवन यापन भी इसी प्रकार करते हैं.इसीलिए यह कहा गया है:-

    “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”

  6. Sunaina Joypaul says:

    नमस्ते गुरुजी,
    गत सपताह कक्शा मे न आने के लिये शमा| तबीयत कुछ थीक नहीं है….. क्षमा करें…| पराजय कहानी पर आपने विचार प्रस्तुत करके मैं कहनी को समझ गयी हूँ| पराजय नामक इस कहानी में देखा गया है कि कैसे मॉरीशस में भी ग़रीबी,शोषण,अत्याचार,भ्रष्टाचार आदि जैसी समस्याएँ समाज में फैली हुई थीं।
    धन्यवाद गुरुजी

  7. medhaveenee says:

    कहानि पराजय “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”
    संदर्भ -प्रसंग
    प्रस्तुत पँक्तियाँ स्वातंत्रोत्तर कहानिकार पूजानन्द नेमा कृत ’पराजय” से उदघृत है / इस कहानि की रचना लगभग ३० साल पहले हुई है/ प्रस्तुत कहानी में नेमा जी ने निम्न वगॅ के गरीब मंज़दुरों की दैनीय दशा तथा उनके संघषॅमय जीवन क उल्लेख किया है / कहानी के चरम सीमा पर यह गध्यांश आता है / इससे पूवॅ कहानीकार ने यह सत्य साम्ने लाया कि ह्ड़्ताल तीन महीने तक चल रहा है/ उसी विष्य पर सोचते हुए कहानीकार पात्र बलराज के मध्यम से कह रहा है कि :-
    व्याख्या

  8. medhaveenee says:

    व्याख्या:- ह्ड़्ताल करना नाजायज़ है तथा माँग करना भी नाजायज़ है/ साथ-ही-साथ गरीबी सहना भी नाजायज़ है/ कहानीकार यह भी जोड़ता है कि गरीब वगॅ में जन्म लेना भी नाजायज़ है पर हाँ, सिफॅ सब कुछ छुप -छाप सहना जायज़ है/ उपयुक्त ग्ध्यांश में दीन वगॅ मज़दूरों की द्शा दिखाते हुए कहानीकार यह व्यंग्य कर रहा है कि इस आधुनिक समाज में अपने ह्क्क के लिए, अपनी गरीबी से मुक्त होने हेतु ग्रीब व्यक्ति लाचार होकर संघषॅ न कर सकता है अपितु केवल उस स्थिति का सामना मौन रहकर सहता है/ इस समस्या को जो ३० साल पहले व्यक्ति सह रह था आज भी स्थिति वही है पर शोष्क वगॅ गोरे न होकर अपने ही लोग है/ पुँजीप्तियाँ द्वारा लोगा पीड़ित है/ इस गध्यंश तथा कहानी से यह साफ नज़्र आता है कि गरीबी अऔर अमीरी की यह समस्या पासंघिक है/ आज भी जो कम पौसे वाले हैं पुँजीप्तियों के हाथ कि कट्पूट्ली हो रही है/ उदाहरणथॅ पुँजिप्तियँ व्यापार कर रहे है और बढ़िया पोस्टर , पब के माध्यम से निम्न वगॅ के लोगों को खचॅ करने के लिए मजबूर कर रही है/ समस्य तो वही है, गरीब वयक्ति ्जीवन यापन के लिए समझौता करता जा रहा है/ वह इतना लाचार है कि अपनी माँगों को पूरा करने के लिए आवाज़ भी नही उठा सकता और नाही हड़ताल कर सकता है/
    विशेष;- भाषा सरल है – हिन्दी के शब्द के साथ यत्र-तत्र उदॅ और संस्कृत के भी शब्द हैं/
    शेली :- वणॅनात्मक और व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है/
    मूल संदेश :- गरीबों पर अत्याचार न करने की मांग, गरीबों को पुंजिप्तियों की अमीरी ज़जीरों से मुक्त करने की मांग, पुंजिप्तियों की मनसीकता मै बदलाव लाना आवश्य्क है/
    जिस प्रकार एक बच्चा बीन बाप के नाम से नाजायज़ कहलाता है उसी भांति गरीब घर मै जन्म लेना अस्तित्वहीनता का प्रमाण है/
    गुरुजी इन पक्तियों की व्याख्या मै इसी प्रकार पेश कर सकती हुँ कृपया आप इसका संशोदन करे/
    धनयवाद, मेधाविनी.

  9. prema says:

    “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”

    संदर्भ -प्रसंग
    प्रस्तुत पँक्तियाँ स्वातंत्रोत्तर कहानिकार पूजानन्द नेमा कृत ’पराजय” से लिया गया है / यह एक आधुनिक कहानी हे / इस की रचना स्वतन्त्रता के पशचात लिखा गया था / इस कहानी के माद्यम से कहानीकार ने पाट्को को यह दिखाने की कोशिश की हे कि किस प्रकार स्व्तन्त्रता के पस्चात भी यहा के मज़दूरो को शोशित कर रहे थे / शोशन कहानी का मूल अन्श हे / जब चाय के कारखाने मे काम करने वाले मज़्दूरो को बोनस नही प्राप्त होता हे तो वे हरताल करते हे / वे अपने अधिकार के लिये तथा अपनी मागो की पूर्ति के लिये हरताम करते हे/ बलराज इन दीन मज़दुरो का प्रतिनिधिव करते हुए कहता हे:
    व्याख्या:-
    बलराज कहता हे हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है/ गरीबो के लिये हरताम नाजाइज़ हे / गरिबो को चूप चाप हर प्रकार का शोशन सहना चाहिये/ उन को जितना मिलता हे उसी मे सन्तुश्त रहना चाहिए/ हरताल करना गेरकानुनी हे/ उन का अमिरो द्वारा इस्तमाल किया जाता हे/ गरीब रात दिन मेहनत करता हे अपना खून बहाता हे पर बदले मे उसे सिफ़ गरीबी मिलता हे और अमीर अपनई जेब भरता जाता हे/ गरीबो की परेशानियो को कोइ नही समझता, उन का सिर्फ़ फायदा उथाया जाता हे/ चाय उद्योग के बन्द होने से कई मज़दूरों की रोटी छीन जाती हे और उनके वेतन काट लिया जाता हे/ इस प्रकार बेरोज़गारी की समस्या समाज में चहूँ ओर हाहाकार मचाती हे/ पुँजीप्तियाँ द्वारा गरीबो को पीसा जाता हे/ उन की मागो को थुकराया जात हे/ अगर गरीब दूख सह रहा हे, खाली पेट सो रहा हे, उस के बचचो को सही रुप मे शिक्शा नही प्राप्त हो रहा तो इस से अमीर को कोइ फर्क नही परता/ गरीब अपनी माग पूरी करने के लिये हरताल करता हे पर उस की आवाज़ को डबा दिया जाता हे/ वह उस चिरिया के समान हे जो पिन्रे मे बन्द फर्फराता हे पर उस की आवाज़ को अन्सूना कर दिया जाता हे/ उसे सभी कथिनाइयो को सहना परता हे/
    विशेष;- भाषा सरल है – हिन्दी के शब्द के साथ यत्र-तत्र उदॅ और संस्कृत के भी शब्द हैं/
    शेली :- वणॅनात्मक और व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है/

  10. Sunaina Joypaul says:

    कहानि पराजय:- “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”

    संदर्भ -प्रसंग:
    प्रस्तुत पँक्तियाँ “पराजय” नामक कहानी से उद्धृत है जिसके स्वातंत्रोत्तर रचनाकार पूजानन नेमा जी हैंयह एक आधुनिक कहानी हे। इस कहानि की रचना लगभग ३० साल पहले हुई है| प्रस्तुत कहानी में नेमा जी, कैसे मॉरीशसीय परिवेश में,स्वतन्त्रता के बाद भी निम्न वगॅ के गरीब मंज़दुरों की दैनीय दशा,दीन मज़्दूरों पर शोषण करते तथा उनके संघषॅमय जीवन के उल्लेख किया है| इन पँक्तियों से हमें पता चलता है कि कैसे उस समय ग़रीब मज़दूर के अधिकार,माँगों की पूर्ति,अनेक दैनीय समस्याओं तथा गरीबी सहना भी नाजायज़ है अपितु इन अत्याचारों कॊ सहना ही वैध था। पर ये व्यकित कोई और नहीं बल्कि अपने धर्म के ही लोग थे। ह्ड़्ताल तीन महीने तक चल रहा है कहानी के चरम सीमा पर यह गध्यांश आता है| बलराज इन दीन मज़दुरो का प्रतिनिधिव करते है| कहानीकार ने यह सत्य साम्ने लाया तथा पात्र बलराज के मध्यम से कह रहा है कि:-

    व्याख्या:-
    ह्ड़्ताल, माँगों, गरीबी तथा गरीब वगॅ में जन्म लेना नाजायज़ होते है| “पराजय” नामक कहानी में मॉरीशस में ग़रीबी, शोषण, अत्याचार, भ्रष्टाचार आदि जैसी समस्याएँ समाज में फैली हुई थीं। सिफॅ छुप-छाप सहना जायज़ है| सम्पन्न लोग और भी सम्पन्न और रम्रृद्ध होते जाते थे, ग़रीब लोग और भी ग़रीब और लाचार ह्क्क के लिए भी बेबस लाचार होते जाते थे| ग्ध्यांश में दीन वगॅ मज़दूरों की द्शा और व्यंग्य है| आज भी इस आधुनिक समाज में गरीबी से मुक्त होने हेतु ग्रीब व्यक्ति लाचार होकर संघषॅ न कर सकता है तथा ह्क्क के लिए लाचार होते है| चाय उद्योग के बन्द होने से कई मज़दूरों की रोटी छीन ली गई, वेतन काट लिया जाता था,बेरोज़गारी की समस्या समाज में चहूँ ओर हाहाकार करती थी| बलराज अत्याचारों के व शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी और अपने परिवार तथा मित्रों को हड़ताल करवाया तकि उनकी माँगों की पूर्ति किया जए| वह उद्योग इन ग़रीबों के खून-पसीने से चलती थी| लेकिन उन लोगों के साथ नाजायज़ माना जाता था तभी वे लोग हड़ताल में जट गए| हड़ताल से इन के घरों में अन्न का दाना नहीं था,चूल्हा नहीं जलाया जाता, खाली पेट सोना तथा रोज़ एक हि प्रकार क खाना खाकर वे लोग ऊब गए थे।बलराज उनसे कहता था कि काम पर ना जएँ लेकिन मज्बूरन उन्हें झुकना पड़ा। गरीब सम्पन्न के हाथ कि कट्पूट्ली हो रही है| बलराज उनसे कहता था कि काम पर ना जएँ लेकिन मज्बूरन उन्हें झुकना पड़ा।बलराज भी “हार” मान लेता है और काम पर पुन: लौट जाता है।बलराज हारता नहीं है क्योंकि जहाँ पर भी व्यक्ति अत्याचार के खिलाफ़ आवाज़ उठाता है वहाँ पर उसकी जीत पक्की होती है| राज्नेता,मालिक,श्रमिक संघ,पूँजीपति तथा पुलिस वाले हारे हैं न कि बलराज और उसके साथी| मज़दूर हार कर,घुटने टेक देते हैं इन पूँजीवादी मनसिक्ता के सामने और जीवन यापन करते हैं|मंज़दुरों की आवाज़ को डबा दिया जाता हे|

    विशेष:- भाषा सरल है –(1) हिन्दी के शब्द के साथ यत्र-तत्र (2) उदॅ और (3) संस्कृत के भी शब्द हैं|
    शैली:- वणॅनात्मक और व्यंग्यात्मक शैली|
    मूल संदेश :-
    दीन मज़्दूरों पर शोषण नहीं करने की मांग,माँगों की पूर्ति, सम्पन्न लोग की मनसीकता मै बदलाव लाना आवश्य्क है| मज़दूरों की मुक्त करने की मांग|

    मूल संदेश :-
    दीन मज़्दूरों पर शोषण नहीं करने की मांग,माँगों की पूर्ति, सम्पन्न लोग की मनसीकता मै बदलाव लाना आवश्य्क है| मज़दूरों की मुक्त करने की मांग|
    धनयवाद

  11. lovrata joycurn says:

    “हड़ताल अवैध है,माँगें अवैध हैं,गरीबी अवैध है,गरीब जन्म लेना भी अवैध है,केवल सहना वैध है।”

    संदर्भ –प्रसंग
    प्रसतुत गद्यान्श पुजानन्द नेमा क्रित पराजय कहानी से लिया गया हे/ यह एक आधुनिक कहानी हे/ इस कहानी मे मारिशसीय मज़दूरो के प्रती शोश्न पर बल दिया गया हे/ जब चाय के कारखाने मे काम करने वाले मज़्दूरो को बोनस नही प्राप्त होता हे तो वे हरताल करते हे / वे अपने अधिकार के लिये तथा अपनी मागो की पूर्ति के लिये हरताल करते हे/ यह कहानी स्वतन्त्रता के बाद लिखा गया हे अतः जो स्थिति यहा प्रस्तूत किया गया हे वह स्वतन्त्रता के पशचात की स्थिति हे/ बलराज इन दीन मज़दुरो का प्रतिनिधिव करते हुए कहता हे:

    व्याख्या:-

    ह्ड़्ताल करना नाजायज़ है तथा माँग करना भी नाजायज़ है/ साथ-ही-साथ गरीबी सहना भी नाजायज़ है/ / गरीबो के लिये हरताम नाजाइज़ हे / गरिबो को चूप चाप हर प्रकार का शोशन सहना चाहिये/ उन को जितना मिलता हे उसी मे सन्तुश्त रहना चाहिए/ हरताल करना गेरकानुनी हे/ उन का अमिरो द्वारा इस्तमाल किया जाता हे/ सम्पन्न लोग और भी सम्पन्न तथा रम्रृद्ध होते जाते थे और ग़रीब लोग और भी ग़रीब,मजबूर,लाचार एवं बेबस होते जाते थे.चाय उद्योग के बन्द होने से कई मज़दूरों की रोटी छीन ली गई और उनके वेतन काट लिया जाता था।इस प्रकार बेरोज़गारी की समस्या समाज में चहूँ ओर हाहाकार करती थी। मज़दूर रात दिन मेहनत करते हे पर बदले मे उन्हे गरीबी मिलती हे/ न उन्हे दो वक्त की रोटी नसीब होती हे और न ही बच्चो के लिये कुछ कर पाते हे/ पुँजीप्तियाँ द्वारा गरीबो को पीसा जाता हे/ उन की मागो को थुकराया जात हे/ अगर गरीब दूख सह रहा हे, खाली पेट सो रहा हे पर अमिरो पर इस क कोई असर नही परता/ वे सिर्फ अपनी जेब भरने मे लगे हे/ गरीब की आवाज़ को अन्सूना कर दिया जाता हे/ गरीबी और अमीरी की यह समस्या प्रासंघिक है/ आज भी जो कम पेसे वाले हैं पुँजीप्तियों के हाथ कि कट्पूट्ली हो रही है/ गरीब मज़दूर चूपचाप अपनी परेशानियो को झेलता हे/

    विशेष:
    भाषा सरल है/
    वणॅनात्मक और व्यंग्यात्मक शैली| का प्रयोग हुआ हे/

  12. preeti says:

    namaste guruji i’ve understood all the stories you have explained

    preeti

  13. teena caumul says:

    “हड़ताल अवैध है, माँगें अवैध हैं, गरीबी अवैध है, गरीब जन्म लेना भी अवैध है, केवल सहना वैध है│”
    प्रस्तुत गद्यांश ‘वसंत चयनिका’ में संकलित ‘पराजय’ कहानी से उद्धृत है│ यह कहानी मॉरीशसीय लेखक ‘पूजानंद नेमा’ द्वारा लिखित है│यह एक स्वातंत्र्योत्तर कहानी है जिसके माध्यम से कहानीकार उस समय की उभरती समस्याओं को दर्शाते हैं│मुख्यत: इस कहानी के माध्यम से कहानीकार बताते हैं कि गरीबों को अमीरों के बनाए गए नियमों का पालन कर, अपने ही अधिकारों से वंचित रखे जाते हैं│
    उपर्युक्त पंकित में कहानीकार कहते हैं कि समाज में मज़दूर वर्ग पर अनेक नियम लागू होते हैं│यह पर कहानी का मुख्य पात्र बलराज पूरे मज़दूर वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो चाय की खेती में काम करते हैं│इस कहानी में हड़ताल मुख्य समस्या है│ चाय उद्योग में कम मुनाफा मिल रहा है│ परिणम स्वरूप चाय की खेती में काम करने वाले मज़दूर हड़ताल कर रहे हैं क्योंकि उनको सालांत का ‘बोनस’ नहीं मिला है जबकि अन्य उद्योग में सभी काम करने वालों को मिला है│मिल-मालिकों से मांगें करना भी अवैध माना जाता है; गरीबी को अवैध कहा गया है और बस सहन करना ही वैध कहा गया है│
    भावार्थ: इस पंक्ति में कहानीकार उस मज़दूर वर्ग की मांसिकता दर्शाते हैं जो वेतन न पाकर कितना पीड़ित होता है│ उनकी दशा इतनी दयनीय हो जाती है कि हड़ताल करने जैसे भारी कदम उठाने में विवश होते हैं│कहानीकार बलराज के माध्यम से अपना उद्देश्य व्यक्त करते हुए बताता है कि मज़दूर अपने आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए किसी की सहायता प्राप्त नहीं होती है│श्रमिक संघ भी मिल-मालिकों का पक्षपात करता है न कि मज़दूरों की│ पुलिस हड़्ताल न होने के लिए तैनात है│ अत: हड़ताल को अवैध माना जाता है; स्वाभाविक है कि इससे कोई सकारात्मक परिणाम तो प्राप्त नहीं होगा│ मांगें करना मज़दूर दल के लिए भी कठिन है क्योंकि मिल-मालिक इनको अवैध बताकर इन पर ध्यान ही नहीं देते│ श्रमिक संघ भी मालिकों से मिलकर उन गरीब मज़दूरों की समस्या का हल ढूँढने में सहायक नहीं बनता│बलराज की मन:स्थिति दर्शाते हुए कहानीकार कहते हैं कि बलराज सोचनेके लिए मजबूर हो जाता है कि गरीब होना भी अवैध है क्योंकि स्थिति सुधारने के लिए कितना भी संघर्ष करने के बावजूद गरीब गरीब ही रहता है; किसी गरीब परिवार में जन्म लेना भी वह अवैध ही बताता है│तात्पर्य यह है कि बलराज अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति से इतना पीड़ित है कि अपने आप को गरीब होने का दोष देता है│ वह अपने आप को समझाता है कि गरीब होना पाप है│वह अपनी गरीबी से निराश हो गया है क्योंकि जितनी भी आवाज़ वह उठाएगा उतना ही अनसुना रह जाएगी│ न्याय पाने के लिए बलराज तो संघर्ष कर रहा है परंतु अंत में हालात से समझौता करने के लिए मजबूर हो जाता है│ अंतत: वह निराश स्वर में कहना पड़्ता है कि शोषित ही होना अंतिम समाधान है; जितना मिलता है उसी में उसे सन्तुष्ट होना है क्योंकि गरीबों के साथ संवेदना कोई नहीं करता│ अर्थात चूँकि बलराज का जन्म गरीब परिवार में हुआ; वह गरीब है; इसीलिए चुप रह्ने में तथा स्थिति को बिन सुधार स्वीकारने में ही उसका भला है│बलराज यह बात समझ जाता है कि गरीब होने के कारण वह अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ सकता है│ आवाज़ उठाने पर पुलिस निर्दयता के साथ गरीबओं पर अत्याचार करता है│ पेट की भूख मिटाने के लिए बलराज अपनी मांगों को दबाना पड़्ता है तथा अपनी मानसिकता के साथ संघर्ष करना पड़्ता है│अंत में वह हड़्ताल को रोककर विवशता पूर्वक खेत में जाना पड़्ताहै│ अत: मिल-मालिकों के आगे हार मानकर,उनके नियमों को स्वीकार कर, अपने इच्छओं को दबाकर वह पराजित होता है│वास्तव में गरीबों के प्रति समपन्न लोगों के मानव मूल्यों का हार है; उनके प्रति मानव मूल्यों का पतन है│ कहानीकार व्यंग्यात्मक रूप से “अवैध”शब्द का प्रयोग करते हैं│वास्तव में हड़ताल अवैध नहीं है: उसके अनसुने कारण अवैध हैं│मांगें अवैध नहींहैं बल्कि परिस्थितियाँ अवैधहैं│ गरीबी अवैध नहीं है: गरीबों के प्रति अमीरों के आचार-व्यवहार अवैध है│ गरीब जन्म लेना भी अवैध नहीं है बल्कि मालिकों की मानसिकता अवैध है│ अपने मुनाफे के लिए गरीबों की आशाओं का ध्यान कोई नहीं करता│
    विशेष: कहानीकार की भाषा मिश्रित है:
    • संस्कृत शब्द: “अवैध”, “जन्म”, “वैध”
    • हिंदी शब्द:” केवल” “हड़ताल”, लेना”…
    • वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है│
    • व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है│
    • प्रासंगिकता: आज भी मज़दूर वर्ग अपनी मांगों को पूरा करने के लिये ‘हड़ताल’ को माध्यम बनाते हैं│ वास्तव में ह्ड़ताल अवैध तो नहीं है परंतु कानून की ओर से इसके लिए अनेक नियम लागू हैं│
     हड़ताल करने की सूचना पहले से देना चाहिए│
     हड़ताल हिंसात्मक न होकर शांतिपूर्ण होना चाहिए│ पुलीस निग्रानी करती है न कि हड़ताल वालों पर अत्याचार कर हिंसा भरकाना│
     हड़ताल हमारे देश में अंतिम उपाय है अधिकारों को पाने के लिए│
     श्रमिक संघ ही मज़दूरों का प्रतिनिधित्व करता है और मांगों को सामने रखकर समाधान की शांति मांग करता है│
     जैसे शक्कर उद्योग के लिये Mauritius sugar industry labour welfare fund है│
     किसानों के लिए small planters welfare association है│
     अध्यापकों के लिए GTU है│
    ये संघ कर्मचारियों की आवाज़ है│ इनके बिना हड़ताल अवैध है│
     “पिछले साल ‘त्रिओले’ गाँव में कुछ लघु किसानों ने अपनी मांगों को पूरा करने के लिए भूख हड़ताल की और सरकार ने उन्हें अन्य जगह पर ज़मीन देकर शांतिपूर्वक इस समस्या का समाधान किया│”
     “कुछ महीने पह्ले “Infinity call centre’ के कर्मचारियों ने हड़ताल की क्योंकि वहाँ बंद होने वाला था और उनको अंतिम वेतन नहीं मिला था│ भलाई इस रूप में है कि उन्हें अपनी आमदनी मिली│”

    • देश में गरीबों की स्थिति सुधार के लिए सरकार की ओर से अनेक प्रयत्न किये जा रहे हैं:
     सरकार की ओर से छ्त प्रदान की जा रही है│
     बेरोज़गारी की समस्या को दूर करने के लिए सरकार कार्यरत है│ इससे गरीबी कम होने कि सम्भावना है│

  14. disha luchun says:

    नमस्ते गुरुजी,

    “हड़ताल अवैध्य है, माँगे अवैध्य हैं, गरीबी अवैध्य है, गरीब जन्म लेना भी अवैध्य है, केवल सह्ना वैध्य है।“

    प्रसंग:- प्रस्तुत पंक्तियाँ “पराजय” कहानी से उद्धृत है व इस कहानी के रचियता पूजानंद नेमा जी हैं।

    संदर्भ:- इन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि स्वतंत्रता के उपरांत भी मॉरीशस में दीन मज़दूरों पर शोषण किया जाता था, स्वतंत्रता से पूर्व तो गोरे लोग शोषण करते थे, परंतु अभी आज़ाद होते हुए भी गरीब मज़दूर अपने ही धर्म के लोग द्वारा शोषित हो रहे हैं। इन पंक्तियों द्वारा यह ज्ञात होता है कि किस प्रकार मज़दूरों की माँगे, अधिकार प्राप्त करने के लिए हड़ताल करना तथा आवाज़ उठाना अवैध्य मानाअ जाता है, परंतु अत्याचार, शोषण व ताने सुनना, ये सब सहना वैध्य माना जाता है।

    व्याख्या:- “पराजय” कहानी में पूजानंद नेमा जी ने प्रस्तुत पंक्तियों में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार मॉरीशस परीवेश में अभी तक गरीब मज़दूरो पर शोषण होता जा रहा है। कहानी का मुख्य पात्र बलराज है और कहानीकार ने बलराज के माध्य्म से यह संदेश दिया है कि यदि एक व्यक्ति अपने अधिकार के लिए कुछ कम उठाता है तो उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। इन पंक्तियों में कहा गया कि गरीब होना अवैध्य है, गरीब जन्म लेना अवैध्य है, पर्ंतु यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि क्या मनुष्य स्वयं चुनता है कि वह किस घर में तथा किस वर्ग के लोगों के बिच जन्म लेना है, यह मनुष्य के हाथों में नहीं होता, ईश्वर यह निर्नय लेते हैं। गरीब होना कोई पाप नहीं है कि जहाँ जाएँ, ओच्च वर्ग के लोगों द्वारा शोषित होते जाऐं और सदैव के लिए गरीब ही रहें।

    इन पंक्तियों में गरीब मज़दूरों अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं, बलराज हार कर भी जीत जाता है क्योंकि उसने अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए पहल तो किया, अपनी अवाज़ उठायी, यही सब से बड़ी बात है। गरीब, बेबस लोगों को आजीवन अपने अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सभी प्रकार के अत्याचार, शोषण सहना ही वैध्य माना जाता है परंतु उन अत्याचारों के विरूद्ध जाकर आवाज़ उठाया जाए तो अवैध्य माना जाता है, इससे गरीब मज़दूरों की दयनीय स्थिति आँखों के सामने आता है। चाय उद्योग के बन्द होने पर, गरीब चाय मज़दूरों की रोटी छीन जाती है।

    घर परिवार की दशा बिगड़ती जाती है, घर में एक दाना भी नहीं था, केले के छिलकों की तरकारी से गुज़ारा करना पड़ता था। प्रतिदिन एक ही प्रकार का भोजन ग्रहण करना आदि। इस तरह का जीवन यापन करना बहुत ही कठिन था। ऐसे किस प्रकार जीवन व्यतीत कर सकते थे। एक न एक दिन तो इस से बाहर निकलना तो था। बलराज एक ही ऐसा व्यक्ति था जिन्होंने अपने तथा अपने परिवार और मित्रों के लिए आवाज़ उठायी, परंतु उस आवाज़ को डबा दी गयी। परंतु बलराज हार कर भी जीत गया।
    पूँजीवादी लोगों की मानसिकता से कोई नहीं जीत सकता। इस कहानी में बताया गया है कि बलराज व उसके मित्र हड़ताल करने के बावजूद हार गये, परंतु असल में वे लोग नहीं हारे बल्कि उन पूँजीवादी लोगों की हार हुई है फिर भी वे लोग जताते हैं कि उनकी जीत हुई है। वे लिग शोषण करते जाए और गरीब लोग सहते जाए, उनके हिसाब से यही थीक है, परंतु यह बिल्कुल गलत है, यह जाइज़ नही है।

    विशेष:- – इन पंक्तियों में सरल हिन्दी शब्दों का प्रयोग हुआ है।

    – इस छोटे से वाक्य में व्यंग्य, संदेश, गरीब की दयनीय स्थिति देखने को मिलती है।
    – वर्णनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

    – इस वक्य में व्यंग छिपा हुआ है, अर्थाथ व्यंग्यात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

  15. siddhi says:

    नमस्ते गुरूजी
    शनिवार को आपने कक्षा में एक व्याख्या पर काम दिया था और साथ ही साथ आपने पुछा कि क्या हम blog का लाभ उठा रहे है मेरे देखने से यह blog हमारे लिए लाभदायक है हम टंकन कर सकते है और हम दूसरी कक्षाओं में किये गये कार्य को देख सकते है यह एक नयी technique है जिस का लाभ हमे उठाना चाहिए क्योंकि काफी लोगो अभी तक हिन्दी को एक अलग नज़रिए से देखते है और सोचते है कि हिन्दी भाषा इस क्षेत्र में अभी develop हुए है जबकि हम लोगों ने बहुत तरकी की है

  16. siddhi says:

    व्याख्या:

    प्रस्तुत गद्यांश पूजानन्द नेमा जी की “ पराजय” कहानी से उद्धत है । इस कहानी में मॉरीशस के आधुनिक समाज के परिप्रेश को ध्यान में रखकर लिखा गया है ।यह एक स्वातंत्रयोत्तर कहानी है ।“ पराजय “ कहानी में चाय उधोग में काम करने वाले मज़दूर वर्ग की दयनीय स्थिति को दर्शाते है । मज़दूर अपने अधिकारों के लिए लड़ते है पर उन को कैकानुनी करा दिया जाता है ।

    उपर्युक्त पंक्ति में कहानीकार कहते है कि हड़ताल कानून के खिलाफ़ है। हमें सरकार के विरूद्ध कोई काम नहीं करना चाहिए. जहाँ हम काम करते है हमें उन्हीं लोगों के नियम पर चलना चाहिए । गरीबों को अमीरों के बनाइए कानूनों पर काम करना चाहिए चाहे वे अपने अधिकारों से वंचित क्यों न हों ।
    इस पक्ति में हमें कहानीकार के व्यंग्यात्मक शैली सामने आती है । बलराज के माध्यम से कहानीकार अपना संदेश व्यक्त करता है । बलराज मज़दूर वर्ग का प्रतिनिध्त्व करता है । वह चाय उद्योग में काम करता है । साल के अन्त में मज़दूरों को बोनस नहीं मिलता है और वे अपने हक को माँगने के लिए हड़ताल करते हैं । मिल मालिकों उनके माँगों को अवैध मानते है पर फिर भी बलराज हिम्मत नहीं हारता है । मज़दूरों के घर में चुल्हे बड़ी मुश्क्लि से जल रहे है और इसी स्थिति को सुधारने के लिए मज़दूर हड़ताल पर उतर आते है । यहाँ पर कहानीकार यह कहना चाहते है कि मज़दूर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते है पर जो अमीर पुँजिपतियाँ है वे उनकी आवाजों को कैकानूनी कार दिया जाता है । अन्य शब्दों में यह कहना चाहता है कि दीन लोगों को हमेशा गरीब ही रहना चाहिए तथा अमीर वर्ग हमेशा उन पर शोषण करता रहेगा । मील मालिकों ये भूल जाते है कि उनकी मील उन्हीं दीन मज़दूरों के बदौलत चलता है । अगर वे काम नहीं करते तो मील कब की बन हो जाती या उन्हें कभी मुनाफा नहीं मिलता । बलराज के माध्यम से कहानीकार मज़दूर वर्ग सुधार लाना चाहता है पर उनकी आवाजों को अवैध मान कर उनको डबाया जाता । उनके संघर्ष को निराशा में बदल दिया जाता है क्योंकि उनके साथ न पुलिस्त होता है न ही श्रमिक संघ । अन्त में हम यह कह सकते है कि समाज में एसा कानुन है या नियम है जो सरकार ही बदल नहीं पा रहा है । जो शोषित वर्ग है उनपर हमेशा शोषण किया जाएगा क्योंकि दीन दुखियों का साथ देने वाला कोई नहीं है । हड़ताल अवैध नहीं है माँगें अवैध नहीं पर समाज उसे अवैध मानता है क्योंकि हड़ताल गरीबों के लिए एक माध्यम है कि वे अपनी अधिकारों को व्यक्त करें । अमीरों को गरीबों के प्रति अपना आचार व्यहार तथा मानसिकता को बदलना चाहिए तभी हम एक स्वस्थ समाज में जी सकेंगे ।

    विशेष
    • प्रासंगिकता आज भी समाज में अधिकार प्राप्त करने के लिए आवाज उठानी पड़ती है अर्थात हडताल के माध्यम से ही दीन दुखियों के कष्ट हमारे सामने आते है ।
    • मिश्रित भाषा का प्रयोग किया गया है
    • हिन्दी के सरल शब्दों का प्रयोग – हड़ताल
    • संस्कृत शब्दों का प्रयोग : वैध
    • व्यंगात्मक शैली का प्रयोग किया गया है

  17. Ramphul kritee says:

    नमस्ते गुरुजी
    देर से व्याख्या पोस्त करने के लिये माफ़ कीजिए।
    बहुत समय लगा ताइप करने में फिर भी कोशिश कर रहे हैं। कुच नया सीखने में समय लगता है
    आशा है आप नाराज़ नहीं होंगे। धंयवाद गुरुजी।

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