MA Yr 1: Lecture 9 – अमर राष्ट्र कविता का विशलेषण

Monday 31 Oct 2011, 4.00-5.40 pm, MA Yr 1, Freedom Movement & Hindi Poetry

 

 

 

 

 

नमस्कार सभी को.

कुछ दुख हुआ यह जानकर कि आपमें से अधिकतर लोगों ने प्रस्तुत कविता “अमर राष्ट्र” (माखनलाल चतुर्वेदी) की तैयारी नहीं की.

जैसे कि आपको ज्ञात होगा ही, शिक्षण की विधि में हल्का-सा परिवर्तन आया है. आपस में यह स्वीकार्य भी हुआ कि हर सप्ताह कम से कम एक कविता आपको दी जाएगी कक्षा में, अध्ययन करें उसके बाद आपके साथ मिलकर हम कविता का विश्लेषण करेंगे. इसके लिए, आपके सहयोग की आवश्यकता होगी, आपकी ओर से तैयारी अनिवार्य है. कृपया इस पर ध्यान दें.

इस सप्ताह हमने “अमर राष्ट्र” कविता की व्याख्या की. यह कविता अपने आप में तत्कालीन परिस्थितियों की झलक देती है. भारतीय संदर्भ में स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत आम जनता की मानसिकता, उनकी हलचलें, उसके विद्रोह आदि इस कविता में देखने को मिलता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता इस कविता के माध्यम से प्रदर्शित कवि-कर्म है. उस समय रचनाकार तत्कालीन आंदोलनों में भाग लेते थे, उनका धर्म काव्य-रचना था परंतु सामाजिक परिवर्तन के लिए.

इस कविता में रूढ़िवादी मानसिकता पर व्यंग्य करते हुए कवि भारतीय जनता को जागृति की अवस्था में लाने की चेष्टा कर रहे हैं. अंधविश्वास व रूढ़ धार्मिकता को त्यागते हुए कवि सभी से अग्रह कर रहा है कि देश को आज़ादी दिलाने में सभी सक्रिय हो जाए. अनेक प्रतीकात्मक शब्दों से यह  भाव प्रकट होता है.

उग्रवादी चेतना से ओतप्रोत इस कविता में देश प्रेम के पथ पर समर्पण के भाव तो मिलते ही है, साथ ही निवृत्ति वाली मानसिकता पर करारा व्यंग्य भी है.

शेष आप विश्लेषण और करें,,,

धन्यवाद,

NOTE:

1. poems to read and prepare for next class: 1) तब समझूँगा आया वसंत   2) युग-युग तक ज़िंदगी खिलेगी  3)दिल्ली सर  करने निकल पड़े! 4)संकल्प

2. continue your preparation on historical aspects related to Freedom Movement in India.

 

Some useful links on माखनलाल चतुर्वेदी:

1. http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A4%B0_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0_/_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80

2. http://hindi.webdunia.com/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF/%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%96%E0%A4%A8%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-1110404083_1.htm

 

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

4 Responses to MA Yr 1: Lecture 9 – अमर राष्ट्र कविता का विशलेषण

  1. mili aartee lochon says:

    प्रस्तुतिकरण: आधुनिक काल की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थिति
    प्रवक्ताएँ: आरती लोचन; शिखा पांचू
    कक्षा: M.A Hindi Year 1 (2011-2013)

    नमस्ते
    प्रस्तावना
     साहित्य समाज का दर्पण है।
     आधुनिक युग का प्रारम्भ सन १८५० से माना जाता है ।
     अंग्रेज़ कुटिल चालों से सम्पूर्ण भारत पर कब्ज़ा जमा लिया था ।
     अत्याचारों के कारण भारत में उलके विरुद्ध भयंकर विक्षोभ और घृणा फैल चुकी थी …..
     सामन्ती प्रभाव समाप्त होने ल्गा जिससे नवीन आर्थिक और रज्नीतिक प्रणाली का सुत्रपात हुआ ।

    आर्थिक परिस्थिति
    १. अंग्रेज़ों के राजत्व काल में भारत का आर्थिक शोषण ।
    २. भारतीय जनता अंग्रेज़ी, साम्राज्यवादी, पूँजीवादी और औपनिवेशक शोषण नीति का शिकार ।
    ३. साम्राज्यवादियों के दूषित व्यापारिक नीति तथा शोषण प्रवृत्ति ।
    ४. भारत की वार्षिक आय E. I. C. के भागीदारों के हाथों में जाना ।
     किसान इस शोषण का फल भोगना ।
     सेना तथा प्रशासनिक विभाग से भारतीयों को निकालना ।
    ५. नमक आन्दोलन तथा आमदनी पर टैक्स ।
    ६. भारत से बाहर होनेवाले युद्ध का खर्च भारत के कोष से निकालना ।
    ७. विदेशी राजत्व के कारण अनेक बार अकाल पड़ना, भीषण बीमारियाँ फैलना ।
    “जब देशवासी अकाल के रक्ति म पंजे में जकड़े हुए थे, बड़े-बड़े सौदागर स्वार्थवश अपनी अर्थलिप्सा को शान्त करने के लिए लाखों मन गेहूँ तथा दूसरे अनाज विदेशों में भेज रहे थे ।”- ज. नेहरू
    ८. अकाल में अंग्रेज़ सहायता प्रदान न करना ।
    परन्तु
    सन् 1876, 1878 तथा 1900 ई. में लार्ड लिटन, साम्राथी विक्टॊरिया की स्वर्ण जयन्ती धूमधाम से मनाना ।

    ९. २०वी. शताब्दी तक आते-आते भारतीय आर्थिक स्थिति और दयनीय।
     औद्योगिक विकास के साथ-साथ नवीन आर्थिक व्यवस्था जो कृषकों के अनुकूल नहीं था ।
    १०. गांधी के आगमन से थोड़ा सुधार ।
     ग्रामोद्योग की प्रगति का प्रयत्न। किया गया ।
    ९१. सन्‌ १९३०ई. के ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक स्वतंत्रता का नारा ।

    निष्कर्ष: आर्थिक परिस्थिति
     भारत में ब्रिटिश शासन का इतिहास आर्थिक शोषण का इतिहास ।
     स्वातंत्र्योत्तर भारत के बाद पंचवर्षीय योजनाओं की सफलता से कुछ सुधार ।

    राजनीतिक परिस्थिति
     इस युग के साहित्य की राजनीतिक पृष्ठयभूमि में :
     ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना..
     प्रथम स्वतन्त्रता – संग्राम..
     भारत में विक्टोरिया शासन की प्रतिष्‍ठा..
     इण्डियन नेशनल काग्रेंस की स्थापना ..
     बंग भंग …
     मार्लेमिन्टो सुधार द्वारा साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली …
     संसार का प्रप्र्थम महायुद्ध…
     रोलेट ऎक्ट …
     जलियांवाला बाग हत्याकांड…
     खिलाफत आन्दोलन ..
     गांधी जी का असहयोग आन्दोलन..
     स्वाराज्य पार्टी की स्थापना…
     जिन्ना का कांग्रेस पृथक होना तथा मस्लिम लींग में सम्मिलित होना
     कांग्रेस और सरकार के बीच अनेक परिषदों और कमीशनों और पैक्टों द्वारा की गयी सन्धियों..
     १९३६-१९३७ में निर्वाचन तथा कांग्रेस और अन्य पार्टियों के मंत्रिमण्डलों की स्थापना द्वितीय महायुद्ध का आरम्भ ..
     १९३९ में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों का त्यागपत्र ..
     १९४० में पाकिस्तान की मांग..
     क्रिप्स महोदय का भारत आगमन..
     १९४२ में ‘भारत छोड़ो ’ आन्दोलन..
     इंग्लैंड में मज़दूर दल का विजयी होना..
     १९४६ में अन्तरिम सरकार की स्थापना …
     मुस्लिम लीग की घृणोत्पादक नीति के फलस्वरूप कलकत्ता, नोआखाली ,बिहार और पंजाब में भयंकर साम्प्रदायिक दंगे…
     १५ अगस्त सन १९४७ को भारत का स्वतन्त्र होना

    निष्कर्ष
     आर्थिक शोषण:
    भीतर भीतर सब रस चूसै ।
    हँसि हँसि कै तन मन धन मूसै ।
    जाहिर बातन मैं अति तेज ।
    क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज ।
    – भारत दुदर्शा, भारतेन्दु

     राजनीतिक परिस्थिति:
    हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे,
    आओ विचार करें आज मिलकर,यह समस्यांए सभी। ।
    – भारत भारती, गुप्त

  2. samantah says:

    नमस्ते गुरुजी नंदिता और मैं ने कांगेस तथा स्वराज्य आंदोलन पर प्रस्तुतीकरण किया था जो सभी को भेजना चाहते हैं ।
    नमस्कार
    विषय : “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और स्वराज आंदोलन” (1857 – 1918 )

    विषय सूची
    १. भारत में कांग्रेस का जन्म
    पृष्ठभुमि तथा परिस्थिति
    स्थापना
    २. कांग्रेस के प्रारम्भिक उद्देश्य तथा मांगें
    ३. प्रारम्भिक कांग्रेसी नेताऒं के कुछ महत्वपूर्ण कार्य (1885 – 1905)
    ४. कांग्रेस में दो दल
    ५. कांग्रेस का विभाजन
    बंग – भंग आंदोलन
    स्वदेशी आंदोलन
    ६. स्वराज आंदोलन

    कांग्रेस का जन्म
    पृष्ठभुमि
    1857 में असफल स्वतंत्रता संग्राम परन्तु भारतीयों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध दुर्भावना । क्रांति की आग ।
    १. वहाबी आंदोलन –पेशावर तथा पटना में मुख्य केद्र परन्तु 1863 में अंग्रेजों द्वारा नुकसान
    २.कुका विद्रोह – सद्गुरु रामसिंह कुका – धार्मिक प्रचार के साथ विद्रोह की योजनाऍ – गोहत्था …
    विचारवान अंग्रेजों ने सरकार को सलाह दी “ हमें ऎसी नीति अपनानी चाहिए जिससे देश की जनता में जो असंतोष आ गया है , वह पुनः उग्र रुप न ले सके । उसे यदि हम अपने सहयोगी के रुप में प्रयोग कर सकें तो अधिक अच्छा होगा । “

    स्थापना
    28 दिसंबर 1885 में एक अवकाश प्राप्त अंग्रेज़ अफसर एलेन ओक्टेवियन ह्यूम ने कांग्रेस को जन्म देना ।
    72 प्रतिनिधि बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत महाविद्यालय पहुँचना ।
    विधिवत रुप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को संगठित ।

    प्रारंभिक उद्देश्य
    १. शुरु में कांग्रेस एक आंदोलन पार्टी नहीं ।
    २. जनता के असंतोष तथा विदेशी शासन का विरोध नहीं
    ३. आरंभ में कांग्रेस भी एक सुधारवादी संगठन के रुप में समाज के समक्ष -क्रांतिकारी आंदोलन करना नहीं । ( भारीतय समाज में उन दिनों कई राष्ट्रीय संगठन: आर्य समाज , प्रार्थना स. , थियासोफिकल सोयायटी … समाज सुधारक तथा राजनीतिक चेतना )
    ४. भारत से जुड़ा हर विषय कांग्रेस के दायरे में था परन्तु कोई भी निशिचत नीती कार्यक्रम नहीं था ।
    ५. 1908 तक इसका कोई संविधान नहीं था । – 1919 तक इसका कोई सदस्यता शुल्क भी नहीं ।

    मांगें
    – परिषदो का पुनर्गठन
    – इंगलैड और भारत में एक साथ परीक्षा
    – इंडिया काउंसिल का उन्मुलन अथवा उसका पुनर्गठन
    – न्यायपालिक का कार्यपालिका से अलगाव

    – आर्म्स एक्ट को रद्द करना तथा सेना के खर्चों में कटौती
    – स्वयं सेवकों के रुप में भारतीयों की भर्ती
    – कमीशन प्राप्त पदों पर भारतीयों की नियुक्ति
    – देश के अन्य भागों स्थायी अधिवार का विस्तार

    कांग्रेसी नेताओं के महत्वपूर्ण कार्य
    – साम्राज्यवाद के आर्थिक आधार की ठोस समीक्षा प्रस्तुत की ।
    – देश में बढ़ती दरिद्रता के लिए विदेशी शासकों को दोषी माना ।
    – उन्होंने भारत और ब्रिटेन के मध्य मौजूदा आर्थिक संबंधों में बुनियादी तौर पर परिवर्तन करने की वकालत की ।
    – भारत को कच्चे माल का संभरक बनाने : ब्रिटिश उत्पादकों के लिए बिक्री का बाज़ार बनाने का विरोध किया ।
    – सीमा – शुल्क व्यापार, परिवहन और कर निधारण की नीतियाँ की आलोचना की ।
    – आर्थिक और राजनीतिक आधारों पर रेलों, बागानों और उद्योगों में बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी के आयात और सरकारी सुविधाऒं का विरोध ।
    – सेना और सार्वजनिक सेवा पर खर्च की आलोचना ।
    – भु-राजस्व और बिक्री कर में कटौती करने के लिए निरंतर आदोलन किया।
    – सार्वजनिक आय को इस दंग से खर्च करने की वकालत की कि उससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लाभ ।
    – कपास पर आयात शुलक हटाने तथा नमक कर का विरोध ।
    – ऊँचे वेतनों में कटौती और चपरासियों के वेतन में वृद्धि चाहना । …

    कांग्रेस में दो दल
    – उन्नीसवीं सदी समाप्त होने से पूर्व उग्रवादीविचार जन्म
    – स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए स्वावलंबन, संगठन, क्रांति और संघर्ष ।

    उग्रवाद ( गरम दल ) नरम दल
    बाल गंगाधर तिलक दादा भाई नौराज़ी
    लाला लाजपतराय गोपालकृष्ण गोखले
    विपिनचंद्र पाल मोतीलाल नेहरु
    1916 – 1947 गांधी जी
    कांग्रेस का विभाजन
    20 जूलाई 1905 को लोर्ड कर्जन बंगाल का विभाजन करवाना ।
    – विरोध में एस. एन बनर्जी जैसे नरमपंथियों द्वारा बंग – भंग आंदोलन की शुरुआत ।
    परन्तु शीध्र ही उग्रवादी नेता जैसे बिपनि चद्र पाल, अश्वनी कुमार दत्ता और अरविद द्वारा स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन चलाए जाते हैं ।
    – उद्देश्य स्वदेशी अपनाओ विदेशी चीज़ों का बहिष्कार करो ।
    – विदेशी वस्त्रों की दुकान में पिकेटिंग – ब्रिटिश माल का बहिष्कार तथा होली जलाई गई ।
    – इसी आंदोलन में गरम तथा नरम दल के मतभेद खुलता है ।
    लाला लाजपत राय का मानना था कि अंग्रेज भारतीयों की बात तब सुनेंगे जब उनकी जेबों पर असर होगा । गरम दल पूर्ण स्वराज की माग परन्तु नरम दल ब्रिटिश राज में स्वशासन …
    – परिणामस्वरुप जब 1907 में कांग्रेस का अधिवेशन सुरत में हुआ, लोमान्य तिलक के राष्ट्रीय शिक्षा , स्वाराज्य तथा बहिष्कार संबंधी प्रस्तावों का विरोध
    – झगड़ा इतना बढ़ा कि अंततः नरमपंथियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से पुर्णत बाहर कर दिया ।
    – इस प्रकार 1916 तक कांग्रेस कोई भी महत्वपुर्ण कार्य नहीं कर पाता ।

    जिस तरह कांग्रेस में नरम तथा गरम दल इसका प्रभाव साहित्य मे भी पड़ा ।
    द्विवेदी युग में दो मुख्य कवि मैथिलिशरण गुप्त – नरम दल का सर्मथक

    स्वराज आंदोलन
    अर्थ : अपना राज्य या ‘’self governance’’ or ‘’home rule’’

    प्रथम प्रयोग- स्वामी दयानंद अपने सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में किया

    ”कोई कितना ही करे , परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वापरि उत्तम होता है अथवा मतमतान्तर के आग्रह – रहित अपने और पराये का पक्षपात
    शुन्य, प्रजा पर पिता के समान कृपा न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य पूर्ण सुखदायक नहीं है ।

    लोकमान्य तिलक गर्जना करते हैं- “ स्वराज्य मेरा जन्मसिद अधिकार है और उसे में लेकर रहुँगा ।

    गांधी जी की विचारधारा
    1909 हिद स्वराज पुस्तक में देश की आज़ादी अंग्रेज़ों ने नहीं छीनी वरन हमने ही आपसी फूट, लालच और अन्य कमज़ोरी के कारण अपनी आज़ादी खोई है ।… सांस्कृतिक गुलामी… कि स्वराज यानी स्व का राज नहीं अपितु अपने ऊपर राज ।

    गाधी जी ने स्वतंत्रता आंदोलन का केन्द्र बिन्दु स्वदेशी को माना है जो स्वराज की आत्मा है ।

    कांग्रेस और स्वराज आंदोलन

    – स्वदेशी आंदोलन की शुरुवात बंगाल के बंग – भंग से होता है जो 1911 तक चलता है
    – 1914 में प्रथम महायुद्ध प्रारम्भ होता है लोकमन्य तिलक जेल से वापस आना गरम और नरम दल पुनः मिल जाना
    – आयरीश महिला त्रीमती ऎनी बेसेंट राजनीति में प्रवेश – 1915 में हाम रुल लीग का गठन जिससे तिलक प्रभावित होते हैं और 1916 में इंडियन होम रुल लीग की स्थापना करते हैं ।
    – परन्तु अंग्रेज़ी सरकार द्वारा समाप्त 1917 में ऎसी वेसेंट गिरफतार और बाद में कांग्रेस की अध्यक्ष बनी ।

    निष्कर्ष :
    अपने शुरुवाती दिनों में कांग्रेस का द्वष्टिकोण एक कुलीन वर्गीय संस्था का था । कांग्रेस के द्वार सभी वर्गों और समुदायों के लिए खुले थे और सदैव जनसाधारण के हितों का ध्यान रखता था ।

    सन 1916 के पश्चात कांग्रेस पुनः अपनी प्रसिद्धि गांधी जी के माध्यम से पाती है । इसकी शुरुवात चम्पारण एवं खेड़ा के संग्राम से होती है जो धीरे – धीरे स्वाराज्य के लिए असयोग आंदोलन तथा रचनात्मक कार्यों की ऒर बढ़ती हैं ।

    बाद में गांधी जी के मार्गदर्शन में कांग्रेस कुलीन वर्गीय से बदलकर एक जन्मसुदाय संस्था बन जाती । 1947 से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत के मुख्य राजनेतिक दलों में से एक रही हैं । वर्तमान भारतीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी इसी दल से हैं ।

  3. sikha says:

    नमस्ते गुरु जी, न आने की माफी मांगती हूं ।
    कुछ लिखने की कोशिश की है :

    युग युग तक जिन्दगी खिलेगी
    कवि उस अदम्य साहस की ओर इशारा कर रहे हैं ,जो ’अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ आन्दोलन में भाग लिया था। द्वितीय विश्व युद्ध चल रही थी , अंग्रेज़ॊं का शोषण कम नहीं हुइ
    -सत्याग्र्ह , असहयोग और सिविल नाफरमानी आन्दोलनों के बाद ,देश में नया उत्साह भरने की दृश्टि से गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन शुरु किया ।
    – प्रस्तुत कविता में इसी आन्दोलन की पृश्ठ्भूमि है
    -१-कवि उस टोली की ओर ईशारा कर रहे हैं जो गांधी जी के ’करो या मरो ’ के नारे से प्रभावित होकर भूमिगत आंदोलन चला रहे थे ।
    -उस क्रान्ति यात्रा मेम अनेक नव जवान शामिल थे, देश के लिए मर- मिटने की भावना लिये आगे नारा गाते हुए जा रहे ,
    -अब मन में कोइ डर नहीं , हाथ में तिरंगा लिये चले जा ररहे है ,कवि यहां उस दिमेर अरुण आसफ का उदाहरण दे रहे है जो ९ अगस्त १९४२ को ग्वालियाटैंक में हाथॊं में राश्ट्रीय झंडा लहरातॆ डरे नहीं।
    -कवि आगे कहते है कि क्षणिक सुख को भुलकर मुक्ति की ओर बढ़ना चाहिए।असिम गंगा के समक्ष लालच का ताज तुच्छ है
    -दीपक तथा सुरज का प्रतीक देकर उन क्रान्तिकारों की साहस तथा शक्ति को प्रोत्साहित कर रहे है।
    जिस प्रकार दिपक जल कर ज्योति देता है उसी तरह पुलिस की लाठियों तथा गोलियों की मार सह कर आगे स्वतन्त्रता की प्राप्ती हो सकती है । जलकर ही उन अंग्रेज़ोम का नाश होना सम्भव है ।
    – कायर लोगों पर व्यंग कर रहे है जो अपने प्राणों को बचाते रहते हैं। देश के लिए मरना व्यर्थ नहीं होता है।
    -लोगों के मन में देश पर मर मिटने की भावना कॊ तीव्र करने का प्रयास
    -राषट्र पर निछावर होना मामुली बात नहीं है , सभी शहीदों का गाण करते हैं ।प्राण्देकर ही स्वतन्त्रता मिलना संम्भव है ।
    -कविता में भारत की नई पीढ़ी के अदम्य , ओजभरे , सश्क्त स्वर को बुलन्द करने का प्रयास हुआ है

    -दिल्ली सर करने —-

    व्यक्ति के भीतर का विद्रोह ज्वालामुखी की तरह फटे की राह पर है, इसी भावना का समावेश इस कविता में है
    – लोग अब पुरे जोश के साथ अग्रसर हो रहे हैं
    – वीरता का बखान हो रहा है
    – ’करो या मरॊ ’ नारे से लोग अपनी आत्मा की पुकार सुनकर , बिखरी जन चेतना को संगठित कर रहे हैं

  4. Kowal Hemant says:

    माखनलाल चतुर्वेदी (१८८९-१९६८)

    मध्य प्रदेश के ख्यातिप्राप्त कवि लेखक और पत्रकार थे जिनकी रचनाएँ पूरे भारत में लोकप्रिय हुईं। सरल भाषा और ओजपूर्ण भावनाओं के वे अनूठे हिंदी रचनाकार थे।

    प्रभा और कर्मवीर जैसे प्रतिष्ठत पत्रों के संपादक के रूप में उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ ज़ोरदार प्रचार किया और नई पीढ़ी का आह्वान किया कि वह गुलामी की जंज़ीरों को तोड़ कर बाहर आए। इसके लिए उन्हें अनेक बार ब्रिटिश साम्राज्य का कोपभाजन बनना पड़ा। वे सच्चे देशप्रमी थे और १९२१-२२ के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेते हुए जेल भी गए।

    हिमकिरीटिनी, हिमतरंगिणी, युग चरण, समर्पण, मरण ज्वार, माता, वेणु लो गूँजे धरा आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियाँ हैं। कृष्णार्जुन युद्ध, साहित्य के देवता, समय के पाँव, अमीर इरादे :गरीब इरादे आदि आपकी प्रसिद्ध गद्यात्मक कृतियाँ हैं। आपकी कविताओं में देशप्रेम के साथ-साथ प्रकृति और प्रेम का भी सुंदर चित्रण हुआ है।

    भोपाल का पं. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है। उनके काव्य संग्रह ‘हिमतरंगिणी’ के लिए उन्हें १९५५ में हिन्दी के ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।

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