Lecture 11 – “वह तोड़ती पत्थर” – Classwork & व्याख्या

Friday 11 Nov 2011, 09.30 – 11.30

नमस्कार.

आज की तिथि अद्भुत है… 11.11.11, 11.11.11 am,…. शतक में एक बार आने वाली इस तिथि से सभी को सुख पहुँचे और यदि इसके पीछे कोई खास बात है, तो आग्रह है नियति से, भाग्य से (भले ही, इसपर मैं कुछ अधिक विश्वास नहीं रखता!!) काव्य-हेतु का अनिवार्य तत्व -“प्रतिभा” {जिसे संस्कृत के आचार्यों ने पूर्व-जन्म संस्कार माना है, जन्मजात जो है…} आप सभी के भीतर “बिजली की कौंध” की तरह अवतरित हों… और आप भी श्रेष्ठ काव्य-सृजन करने में सक्षम हों, जो समाजोपयोगी हों…

बहरहाल, सभी को एक काम दिया गया था पिछली बार… एक स्वरचित मौलिक कविता लिखकर उसे इस ब्लॉग पर पोस्ट करना था. अनेकों ने यह काम किया. बधाई. जो 2-3 लोग पोस्ट नहीं कर पाए, उनसे यह कहना है कि भविष्य में ऐसा न हों कृपया. कुछ लोगों  की स्थिति समझी जा सकती है, जिनके पास  कम्प्यूटर नहीं, फिर भी अनिष्ठा जैसे लोगों ने मुझे अपना काम दिखाया, इसे मैं यूँ ही स्वीकार करता हूँ… लेकिन अगली बार से कृपया MGI computer lab का प्रयोग करें..

आज के लिए, सभी को निराला कृत “वह तोड़ती पत्थर” कविता की एक-एक प्रति दी गई.

अभी तक काव्य संबंधी इस मॉड्यूल के ज़रिए जितना कुछ सीखा है, उनके आधार पर इस कविता की आलोचना आपको कक्षा में ही करनी थी. यह गतिविधि आपके व्यावहारिक ज्ञान के लिए अनिवार्य थी. मेरा लक्ष्य यह नहीं कि आप केवल सिद्धांत रटकर परीक्षा पास कर लें (3 Idiots के चुतुर की तरह) बल्कि प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहार में जो (तभी ज्ञान सार्थक बनता है). यह आजीवन आपके साथ रहे, कल यदि मैं रहूँ अथवा नहीं, काव्यहेतु की भाषा में यह “उपादान ज्ञान” आपके साथ हमेशा रहे. वह “निमित्त कारण” बनकर समाप्त न हों….

साहित्य की  आलोचना अनेक दृष्टिकोणों से होती है. इस कविता में आप लोगों ने पाया कि निराला ने एक गरीब महिला के यथार्थ को हमारे सामने रखा.. तो कुछ लोगों  को लगा कि इलाहबाद के पथ पर तोड़ती पत्थर वाली इस महिला के पास अदम्य साहस, धैर्य व शक्ति है… जो भी हो, यह एक प्रगतिशील कवि , निराला की अद्भुत कविता है जिसका गहन विश्लेषण कक्षा में हुआ. शब्द-चयन, शैली, बिम्ब, प्रतीक विधान, आदि को निराला ने यथार्थ वाले संदर्भ के साथ ही जोड़ा है.

The complete poem is as follows: –

तोड़ती पत्थर

वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर –
वह तोड़ती पत्थर।

नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार बार प्रहार –
सामने तरु मालिका अट्टलिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिंदी छा गई
प्राय: हुई दोपहर –
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा, मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्न तार,
देख कर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से,
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहम सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा –
“मैं तोड़ती पत्थर।”

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

7 Responses to Lecture 11 – “वह तोड़ती पत्थर” – Classwork & व्याख्या

  1. khus21jaan says:

    इस हल्की सी मुस्कान के पीछे छुपे है…
    हाजारों दर्द…..
    आंखों से बयां की है मैंने…
    अपने दिल के अफसानों को…
    पता नहीं क्यों इसे पर नहीं पया कोई
    आजतक….

  2. khus21jaan says:

    इस हल्की सी मुस्कान के पीछे छुपे है…
    हाजारों दर्द…..
    आंखों से बयां की है मैंने…
    अपने दिल के अफसानों को…
    पता नहीं क्यों इसे पर नहीं पया कोई
    आजतक….

    varsha sounitee gopee

  3. khus21jaan says:

    आपने जो कविता लिखने की प्रतिभा को बदावा दिया है उसके लिए हम आपको तहे दिल से धन्यवाद करना चाहते हैं…अगर हम कविता लिखने की कोशिश नहीं करते तो शायद हमें कभी नहीं पता चलता कि हमारे अन्दर कौन से गुन छिपे हुए हैं…फिर भी मैं कोशिश जरुर करुगी के इस प्रतिभा/कला का युही जारी रखू और इसे कोरे कागज पर उतारुं..

    varsha sounitee gopee

  4. khus21jaan says:

    निराला की यह कविता स्त्री की शक्ति पर अधारीत है…निराला एक ऐसे विध्वान है जो छ्न्दों का पालन नहीं करते..उसका यह मानना है कि कविता को जीवन के सत्य पर आधारित होना चहिये, समाज के यथाथ को लेकर होना चाहिये नाकि सिफ समाज तथा मन को प्रसन्न करने वाली कविता हो,अलंकार काव्य की सौंदर्य को बदाता है….वह एक असाधारन कवि हैं, जिसने नियमों का पालन नहीं किया ..इस कविता के आधर नारी सशक्तिकरण पर कवि ने ज्यादा बल दिया है,और भी विस्तार से कवि ने शील्प शक्ति का प्रयोग कर…गरीबी का चित्रण अच्छे धंग से किया हैं…कवि ने अपने असाधारण शब्दों से अपने विचारों को कोरे कगज पर उतारा है…” छायावाद शब्द”: प्रक्रिति का उल्लेख करता है…”भर बँधा यौवन” का अभिप्राय कवि ने अपने रचनात्मक धंग से किया है.. “यौवन” शब्द से काफि कुछ पता चलता है कि कैसे अपने यौवन अवस्था में स्त्री पथर तोर रही है…इससे नारि शक्ति का प्रमाण मिलता है, करि धूप में भी वह् पथर तोर रही है…शायद उसकी कोई मजबूरी होगी या फिर उसे अपना काम प्रिय है,….””””””नारी सशक्तिकरण””””..मैंने अपने विचारों को एक कविता के रूप में प्रस्तूत किया है…आशा है कि आपको पसन्न आये
    ,,,,,,,,,,

    नारी महान है तू,
    तुझ जैसा कोई नहीं.
    बाकि लोगों के लिये मिसाल है तु,
    सभी देखे तुझे एतक..
    जब रण भूमि पर उतरी तु..
    नारी मिसाल है तू..
    नारी तू जीवन धारिनि..
    बाकि लोगों से न्यारि…
    नारी तू सेहती पिरा अनेक.
    फिर भी कुछ बोलती नहीं तु..
    कोई समझ न पया आजतक
    कि कौन सी मिट्टी से बनी है तु…
    नारी मिसाल है तु..

    ( Varsha Sounitee Gopee)

  5. Sulakshana Roopowa says:

    नमस्ते गुरुजी,
    कल(11.11.11) की ककशा मे हमने निराला की कविता “वह तोड़ती पत्थर” का विश्लेषण किया.

    पहले तो हम यह कर्य करने से संकोच रहे थे पर आपकी प्रोत्साहन से हमने कोशिश की और इस तरह हमने यह सीखा की विश्लेषण कैसे किया जाता है.
    निराला की इस कविता मे नारी की सहनशक्ति के बारे मे है. यह कविता हमे नारी की चरित्र के बारे मे अधीक बताती है.
    जब आपने हमे अपनी कविता सुनाई तब मै ने सोचा क्या हम भी कभी ऐसा लिख पयेगे.
    इस कक्शा के लिये धन्यवाद. आपकी अग्ली कक्शा कि प्रतीक्शा रहेगी.
    धन्य्वाद..

  6. Ujoodha Priya says:

    आपकी लिखी हुई कविताएं बहुत अच्छी थी ..
    निराला जी की कविता को समझने में थोरी सी कठिनाई हुई..
    आपने जो नया वेबसाइट के बारे में बताया था वो काफी रोचक हैं..

  7. कैलाश दावोराज़ says:

    नमस्ते!
    पिछले शुक्रवार कि कक्षा अत्यन्त ही दिलचस्प रही है. हम ने विविध तरीके से निराला जी की ‘वह तोड़ती पत्तर’ कविता का अध्ययन किया. यह भारतीय परिप्रेक्ष कि कविता है जो अपने आप में सार्थक सिद्ध हुआ है.
    जिस प्रकार कविता, मनुष्य की संवेदनाएँ छुटी है उसी प्रकार निराला जी की कविता में नारी शोषण हमें इस तथ्य की ओर आकर्षित करता है. यह भी सर्वज्ञात है की काव्यशास्त्रीय छन्द प्रणाली को नाकारा नहीं ज सकता. इस कविता में अनुभवों का यथार्थ चित्रण भावात्मक माध्यम से हुआ है. इसके अतिरिक्त निराली जी ने अपनी कविता में नारी सशक्तिकरण को अंकित किया है.

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