Lecture 5 – साहित्य के रूप

Friday 18 Nov 2011, 12.30 – 14.00, ACE

नमस्कार साथियो.

आज की कक्षा में मैंने अपने उद्देश्य को पुन: आप सभी के समक्ष स्पष्ट रखा…मुझे पाठ्यक्रम पूरा करने के साथ साथ आपको शिक्षण के कुछ नए औज़ार, कुछ ऐसी नई विधियाँ प्रदान करना है जिनके प्रयोग से आप आजीवन स्वावलम्बी बन सकते हैं.

आज की कक्षा में गद्य और पद्य के बारे में कहते हुए मैंने हरेक साहित्यिक विधा में प्रयुक्त होने वाले शब्द-प्रयोग तथा भाषिक संरचना के रूपों की चर्चा की. शब्द के अपने इस संसार को आपके सामने खोला गया.

साथ ही एक गतिविधि दी गई: as a class activity, आपको किसी भी विषय पर एक संवाद लिखना था. उसके बाद, उनका अध्ययन किया जाएग, और आपके ही कार्य से संवाद-लेखन की कुछ विशेषताएँ व त्रुटियाँ समझाई जाएँगीं.

अगले सप्ताह तक …

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

7 Responses to Lecture 5 – साहित्य के रूप

  1. rajni says:

    नमस्ते गुरूजी,
    इ विद्या साइट पर अपना नाम दर्ज कर दिया है,आगे क्या करना है? ए सी ई के लिए सामग्री दिखाई नहीँ दी ।आपकी कक्षा हमेशा की तरह जीवंतता-भरी थी। संवाद लिखते समय मेरी टोली की हँसी का ठिकाना नहीँ था। we enjoyed the class ,सुबह की लघू परीक्षा के बाद tension कम हुई।धन्यवाद!

  2. neerputh anjalee says:

    neerputh anjalee
    नमस्ते गुरुजी
    आप की कक्षा हमेशा की तरह रोचक रही. आप को धन्यवाद.

  3. taranginee devi ramphul says:

    as usual your class was interesting n helpful for us…as we come to know about evidya…sims we’ll benefit much from it…

  4. prema mohundin says:

    नमस्ते गुरू अपकी कक्षा हमेशा की तरह लाभदायक थी।आज भी नई जानकारियाँ प्राप्त करने का अवसर मिला-इ वि्दया के माध्यम से।संवाद लेखन करते समय सभी लोग सुबह का class test भुल गए।कक्षा मनोरंजक थी।धन्यवाद।

  5. neerputh anjalee says:

    neerputh anjalee: assignment (1)

    राषत्रपिता चाचा रामगुलाम

    आप हमारे मोरिशस के इतिहास के प्रथम प्रधान मंत्री, राषत्रपिता, डाक्‍टर एवं प्यारे चाचा थे। आप का नाम सदा अमर है और रहेगा।

    आप एक अत्यन्त गरीब परिवार में जन्मे. आप का जन्म स्थल फ्लाक का बेलरीव गाँव है । आप के बचपन का नाम केवल है। आप के पिता मोहित के देहान्त के बाद, आप की माता बसमती तथा बड़े भाई रामलाल ने आप का पालन पोषण किया। किसान परिवार होने के कारण परिवार में पढ़ाई की रुचि नहीं थी अतः आप को स्कूल नहीं भेजा गया। आप के दिल में भी पढ़ने की इच्छा थी और आप छिप छिप कर पढ़ने भी जाते थे । यहाँ तक कि एक दिन एक आर.सी.ए की अध्यापिका सीरीस नामक, आप को घर छोड़ते हुए यह कह गई कि आप को अवश्य स्कूल भेजे क्योंकि आप एक होनहार और मेधावी बालक हैं।

    आप तब से पाठशाला जाने लगे। प्राथमिक पढ़ाई की समाप्ति छात्रवृत्ति से हुई। तब आप क्यूर्पिप के रोयाल कालिज में माध्यमिक की शिक्षा के लिए भरती हुए। इसके बाद आप डाक्टरी सीखने लन्डन गए। वहाँ आप की मुलाकात महात्मा गांधी, नेहरु आदि बड़े विद्वानों से हुई। अवकाश के समय विचार विनिमय करने का अच्छा अवसर मिला जिससे आप में देशप्रेम जागा। डाक्टरी की अपादी लेकर आप स्वदेश लौटे।

    आते ही आप गरीबों की सेवा में लग गये और चिकित्सा भी मुफ़्त में करने लगे। उस समय हमारे पूर्वजों की स्थिति दयनीय थी। जनता अशिक्षित था। जनता अशिक्षित के कारण प्रगति नहीं कर पा रहा था। उचित भोजन, कपड़ा तथा मकान की कमी थी। आप ने स्थिति को सुधारना चहा। परतंत्र मोरिशस को स्वतंत्र बनाने की इच्छा से आप ने कुछ विद्वानों के साथ ’लेबर पार्ती’,’मज़दूर दल’ का निर्माण किया। परिणाम स्वरुप मज़दूर दल की भारी जीत हुई। आप और देश प्रेमियों के कठोर मेहनत के बाद १२ मार्च १९६८ में अंग्रेज़ों का झंडा उतारा गया और गर्व के साथ हमारा चौरंगा झंडा फहराया गया। तब आप मोरिशस के प्रधान मंत्री बने।

    मोरिशस विकासशील देश बनने लगा। कृषि, कपड़ा, पर्यटक आदि हर उद्योग में प्रगति होने लगी। स्वास्थ्य के लिए नए अस्पताल खोले गये, नई सड़कें का निर्माण हुआ, नए स्कूल बनाए गए और पढ़ाई भी निःशुल्क होने लगी। इस छोटे से देश में आप ने शांति तथा एकता कायम रखा। विदेश इस देश को स्वर्ग मानते हैं और पर्यटक यहाँ आना पसंद करते हैं। इस के लिए आप को कोटि कोटि धन्यवाद।

    आप की देश भक्‍ति एवं प्रेम के कारण आप को ’सर’ की उपाधि से विभूषित किया गया। मोरिशस के जनता आप के अच्छे कामों को कभी नहीं भूल पाएँगे। हमारे इतिहास के पन्‍नों में आप का नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखित चमकेगा। प्यार से आप को ’चाचा’ भी कहते हैं। आप की मृत्यु १९८४ में हुआ। आप की याद में आप की समाधि पाम्प्लेमूस भव्य उद्यान में बनाया गया है। आप महापुरुषों में माने जाते हैं। आप के अनेक शुभ चिंतक, मार्गदर्शी, चाहने वाले होंगे जो आप के सिद्धांतों पर चल रहे हैं। परिश्रम, साहस, सब्र का फल मीठा होता है, यही मंत्र आपने अपनाकर हमें भी इसी का आश्रय लेना सिखा गए। आप धन्य हैं एवं पूजनीय हैं।

  6. anoupam doobur says:

    नमस्ते गुरुजी,
    आप ने साहित्य के बारे मे हमे समझाया.कक्शा मे टोलियो मे हमे विभाजित किया.हुम सभी ने भाग लिया. आपने भी हमारा मार्ग द्रशन कराया.हमे अपनी गलतिया बतायी. इ विद्या के बारे मे भी हमे जानकारी मिली.

    आपको बहुत-बहुत धन्यवाद

  7. Sanita RAMSURN-RAJMUN says:

    Sanita RAMSURN- RAJMUN
    ACE COURSE 2011
    ASSIGNMENT
    भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार में महात्मा गांधी संस्थान का योगदान I
    मॉरीशस हिंद महासागर का एक छोटा सा द्वीप है जो कई विदेशियों के लिए एक आकर्षण का कारण है I अनेक संस्कृतियों एवं भाषाओं की विविधता है I वास्तव में मॉरीशस एक बहुजातीय देश है जहाँ अनेक भाषाओं का बोलबाला है I चूँकि आज की युवा पीढी पाश्चात्य सभ्यता की ओर आकृष्ट हो रही है तो यह ज़रूरी है कि भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा की ओर उसका ध्यान आकर्षित करें I वास्तव में आज के इस औद्योगिक युग में लोग अपनी संस्कृति और भाषा से कटते जा रहे हैं I परंतु सौभाग्य की बात है मारीशस में ऐसे भी संस्थान हैं जो हमें अपनी संस्कृति एव भाषा से अवगत कराने में कार्यशील हैं I इनमें महात्मा गांधी विशेष उल्लेखनीय है I
    वास्तव में मैं इसी संस्थान के भाषा विभाग में बी.ए (आनर्ज़) हिंदी की शिक्षा प्राप्त कर चुकी हूँ I अपनी पढाई के दौरान मुझे यह एहसास हुआ कि भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रचार – प्रसार में महात्मा गांधी संस्थान अपना अमूल्य योगदान दे रहा है I इस तथ्य से तो सभी भली भाँति परिचित हैं कि राष्ट्रीय स्तर हो या अंतराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी संस्थान भारतीय संस्कृति एवं भाषाओं के लिए अद्वितीय हैI
    भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रचार- प्रसार में महात्मा गांधी संस्थान के अनेक विभाग कार्यशील हैंI इन विभागों में से माध्यमिक विद्यालय, भारतीय नृत्य और संगीत विद्यालय, ललिय कला विद्यालय , भारतीय भाषा विद्यालय ,प्रकाशन विभाग और पुस्तकालय विशेष उल्लेखनीय हैं I इन्हीं विभागों द्वारा किए गए कार्यों के माध्यम से संस्थान अपना योगदन दे रहा है I
    भारतीय संगीत और नृत्य का एक विशेष विद्यालय है जिसके माध्यम से लोग भारतीय संस्कृति से परिचित हो पाते हैं I संगीत एवं नृत्य के विभिन्न रूपों को विषयों के रूप में प्रस्तुत करके लोगों को आकर्षित किया जाता है I जहाँ एक ओर वे शौक के लिए इन विषयों में रुचि दिखाते हैं वहाँ दूसरी ओर प्रमाण पत्र प्राप्त करने की लालच में ऐसे विषयों को चुनते हैं और बाद में कुशल कलाकार हो जाते हैं I इस प्रकार वे भारतीय संगीत और नृत्य का अध्ययन करते तथा उनमें निपुण होकर उनका अभ्यास करने से भरतीय संस्कृति का प्रचार- प्रसर होता है I
    संगीत और नृत्य के अलावा चित्रकला में भी भारतीय संस्कृति की झलक मिलती है I वास्तव में भारतीय समाज खासकर भारतीय संस्कृति के विभिन्न अंगों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है I भारतीय नारी एवं समकालीन समाज को चित्रों में प्रस्तुत किया जाता है Iभारतीय मूर्तिकला पर भी ध्यान दिया जाता है I संस्कृति के विभिन्न अंगों को दर्शाकर संस्थान भारतीयता को जगाने का प्रयास कर रहा है I इस प्रकार भारतीय मूल के लोग भारतीय संस्कृति से परिचित हो पाते हैं I
    भारतीय संगीत और नृत्य विद्यालय की स्थापना बो बासें में १९६४ में हुई और १९७५ में महात्मा गांधी संस्थन में सम्मिलित हुआ I इस विद्यालय का मुख्य उद्देश्य है विद्यार्थियों को भारतीय संगीत और नृत्य के पारंपरिक और वैज्ञानिक पहलुओं से परिचित कराना I महात्मा गांधी संस्थान में भारतीय संगीत और नृत्य के अध्ययन से छात्रों को केवल उनके शास्त्रीय स्वरूपों के जटिल एवं सख्त नियमों को जानने के अलावा भारत और मारिशस के लोग स्वरूपों का अनुभव करने का सुनहरा अवसर प्राप्त हो जाता है I इस प्रकार छात्रों को प्रोत्साहन मिलता है तथा वे भारतीय संस्कृति से भी परिचित होते हैं I संस्थान के इस विद्यालय के माध्यम से स्थानीय और भारतीय कलाकारों द्वारा अनेक नाट्य प्रदर्शनों , कार्यशालाओं,गोष्ठियों तथा संगीत पाठों का आयोजन होता रहा है I
    यहाँ विद्यालय भी अन्य विभागों की तरह शैक्षिक है i यहाँ संगीत एवं नृत्य के विभिन्न रूपों के बारे में शिक्षा प्रदान की जाती है i संगीत के क्षेत्र में कंठ संगित और वाद्य संगित जैसे विषय आते हैं i कंठ संगीत में हिंदुस्तानी तथा कार्नाटिक संगीत सम्मिलित हैं जबकि वाद्य संगीत के अंतर्गत सीतार,वायलीन, तबला, मृदंग आदि वाद्य यंत्र आते हैं i इन्हीं विषयों को लेकर ‘ डिप्लोमा,’ ‘एडवांस सर्टिफ़िकेट ‘ तथा ‘बी.ए ‘स्तर तक की भी व्यवस्था है i इन विषयों के माध्यम से संस्थान लोगों में भारतीय संस्कृति के प्रति चेतना लाना चाहता है i अगर लोग इन विषयों में दिलचस्पी दिखाकर उनका अभ्यास करते हैं तो भारतीय संस्कृति का प्रसार- प्रचार स्वत: हो जाता है I भारतीय नृत्य के अंतर्गत भारत नाट्यं ,कथक और कुचीपुरी पर अधिक बल दिया जाता है I भारतीय संगीत की भाँति भारतीय नृत्य की भी व्यवस्था शैक्षिक स्तर पर की गई है I नृत्य के सीखने से लोग अपने आप भारतीय परंपराओं एवं भारतीय संस्कृति से परिचित हो पाते हैं I
    शैक्षिक गतिविधियों के अलावा यहा विद्यालय अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन करता है ताकि भारतीय संस्कृति का प्रचार- प्रसार केवल एक विशेष वर्ग के लोगों तक ही सीमित न रहकर पूरे मारिशसीय समाज तक उसका प्रचार हो I इसके लिए विद्यालय द्वारा दर्शक अनेक प्रांतों में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सफ़लतापूर्वक आयोजन होता है जिससे लोगों का मनोरंजन तो होता ही है I परंतु इसके साथ- साथ लोगों को भारतीय के विभिन्न अंगों तथा स्वरूपों से अवगत कराया जाता है I आज के इस वैज्ञानिक युग में लोगों को शायद ही संस्कृति की ओर ध्यान देने का अवकाश मिलता हैI परंतु महात्मा गंधी संस्थान के इस विद्यालय द्वारा आयोजित सांस्कृतिक गतिविधियों में ऐसा आकर्षण होता है कि लोग कम से कम इनमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भाग लेकर भारतीय संस्कृति को समृद्ध करते हैं I
    भारतीय संस्कृति के अलावा महात्मा गांधी संस्थान हिंदी भाषा के लिए उल्लेखनीय है I जब हम हिंदी भाषा की बात करते हैं तो सबसे पहले संस्थान की शैक्षिक गतिविधियों पर ध्यान देना आवश्यक है I संस्थान द्वारा हिंदी की पढाई विभिन्न स्तरों पर हो रही है जैसेकि माध्यमिक स्तर पर हिंदी की पढाई ‘ एच.एस.सी. ’ तक हो रही है और तृतीय स्तर पर लोग ‘एम. ए.’ हिंदी में पढाई कर रहे हैं I इसके अलावा अनेक कोर्स हैं जो हिंदी भाषा से संबंधित हैं जैसेकि अध्यापक प्रशिकक्षण ,’ बी.ए.’, ‘जोइंट बी. ए’, ‘डिप्लोमा ‘, ‘जोइंट डिप्लोमा ‘, ‘ए.सी.ई’ आदि I
    शैक्षिक गतिविधियों के अलावा संस्थान अन्य संस्थाओं को अपना योगदान देकर हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार कर रहा है I इन संस्थाओं में ‘एन.सी.सी.आर.डी’, ‘एम. आइ.ई’, ‘एम.बी.सी.’ सार्वजनिक सेवा आयोग के नाम लिए जा सकते हैं Iवास्तव में प्राथमिक हिंदी जगत के लिए ‘एन. सी. सी. आर.डी’ द्वारा हिंदी पुस्तकों की तैयारी की जाती हैI यह गर्व की बात है कि इस तैयारी में महात्मा गांधी संस्थान के प्राध्यापकों की सहायता लि जाती है I जहाँ तक ‘एम. आइ.ई’ की बात है इसके द्वारा अध्यापक प्रशिक्षण के कोर्स प्रदान किये जाते हैं और जहाँ हिंदी भाषा से संबंधित कार्य होते हैं वे महात्मा गांधी संस्थान द्वारा ही सम्पन्न होते हैं I
    एम.बी.सी. में भी महात्मा गांधी संस्थान अपनी भूमिका कुशलतापूर्वक निभाता हैI वास्तव में जब भी एम.बि.सि. द्वारा कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम के प्रस्तुतीकरण से पहले भाषा को उच्चस्तरीय बनाने के लिए महात्मा गांधी संस्थान के हिंदी भाषा विभाग के विद्वानों से सहायता ली जाती हैI इससे हिंदी भाषा का प्रचार -प्रसार अप्रत्यक्ष रूप से होता हैI जहाँ तक सार्वजनिक सेवा आयोग की बात है तो इसके द्वारा हिंदी अध्यापकों की भर्ती से सम्बंधी भेंटवार्ताओं के अंतर्गत महात्मा गांधी संस्थान के महानुभावों की ही सहायता ली जाती है I
    इस आयोग के अनुसार महात्मा गांधी संस्थान के विद्वान ही हिंदी भाषा में अधिक प्रखर होते हैं और ऐसे कार्यों में उनकी राय अमूल्य होती है I
    हिंदी कक्षाओं के अलावा, पाठ्य पुस्तक लेखन, अध्यापक प्रशिक्षण, साहित्यिक कार्यक्रम,कवि सम्मेलन तथा हिंदी की अन्य सेवाओं के माध्यम से हिंदी भाषा की उन्नति हो रही है I चूँकि महात्मा गांधि संस्थन एक सुव्यवस्थित संस्थानहै, इसलिए इसमें अनेक विभाग सम्मलित हैं जैसेकि माध्यमिक विद्यालय , भाषा विभाग, पुस्तकालय और प्रकाशन विभाग जिनके माध्यम से संस्थान अपने लक्ष्य की पूर्ति करने में समर्थ है I
    हिंदी की पढाई के अलावा संस्थान ने अनेक अवसरों पर साहित्यिक गोष्ठियों एवं व्याख्यानों और कवि सम्मेलनों का आयोजन करके स्थानीय एवं भारतीय साहित्यकारों को साहित्यिक मंच प्रदान किया I स्थानिय और भारतीय साहित्यकारों ने परस्पर विचारों का आदान -प्रदान करके इसा देश में साहित्यिक वातावरण के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दिया I हिंदी भषा के उज्जवल भविष्य के लिए अनेक कवि सम्मेलन होते हैं I इन सम्मेलनों में स्थानीय कवियों के साथ- साथ भारतीय कवि भी भाग लेते हैं I
    महात्मा गांधी संस्थान एक ऐसा प्रतिष्ठित संस्थान है जिसके माध्यम से भारतीय संस्कृति तथा हिंदी भाषा का प्रचार -प्रसार हो रहा है I यह ज्ञात होता है कि संस्कृति और भाषा के क्षेत्र में महात्मा गांधी संस्थान का अमूल्य योगदान है I अपने अनेक विभागों के माध्यम से वह अपने लक्ष्य में सफल रहा I यह एक ऐसा संस्थान है जहाँ जाकर भारतीय मूल के लोग अपनी अस्मिता को पहचानने में समर्थ हो पाते हैं I जब हम वहाँ जाते हैं तो हम भारतीयता का अनुभव करते हैं I
    हिंदी ही वह भाषा है जिसने हमारे पूर्वज़ों को इस देश में अन्याय, अत्याचार और शोषण के विरुद्ध लडने का स्वर प्रदान किया था I इसी के फलस्वरूप मारिशस आज तक एक स्वतंत्र राष्ट्र है I अत: इस भाषा को आजीवन जीवित रखना चाहिए तथा अन्य भाषाओं की भाँति उसे समान अधिकार एवं महत्त्व देना चाहिए I कुछ लोगों का यह विचार है कि हिंदी प्राचीनता तथा गँवारेपन की भाषा है I परंतु जब हम महात्मा गांधी संस्थान द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रमों पर एक नज़र डालते हैं तो हमें आश्चर्य होता है I वासतव में इस वैज्ञानिक युग में भी अभी तक लोग बडी संख्या में हिंदी भाषा के पठन- पाठन में दिलचस्पी दिखा रहे हैं I अत: कोई भी भाषा मृत या प्राचीन नहीं होती जब तक उसके बोलनेवाले होते हैं I इसी लक्ष्य से महात्मा गांधी हिंदी भाषा के प्रचार- प्रसार करने में सफ़ल है I
    भाषा और संस्कृति साथ -साथ चलती हैं I अगर महात्मा गांधी संस्थान भाषा की ओर इतना ध्यान दे रहा है तो संस्क्रिति उससे अछूती कैसे रह सकती है ? संस्कृति को लेकर संस्थान ने अनेक कार्य किए जहाँ भारतीय संस्कृति कि बात है, इस क्षेत्र में संस्थान एक मिसाल था, एक मिसाल है,और एक मिसाल रहेगा I अन्य संस्थाओं की अपेक्षा भारतीय संस्कृति के प्रचार- प्रसार में महात्मा गांधी संस्थान अधिक प्रतिष्ठित है I यद्यपि अन्य संस्थाएँ हैं जो भारतीय संस्कृति की अन्नति में कार्यशील हैं, तथापि महात्मा गांधी संस्थान के सहयोग के बिना उनका काम नहीं बनता I
    निष्कर्ष्त: भारतीय संस्कृति तथा हिंदी भाषा के प्रचार- प्रसार में महात्मा गांधी संस्थान द्वारा किए गए कार्यों को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह संस्थान भारतीय मूल के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत माना जा सकता है I इस वैज्ञानिक युग में लोग विज्ञान के चंगुल में इस तरह फंस गए हैं कि वे अपनी संस्कृति और भाषा से कटते जा रहे हैं I परंतु संस्कृति और भाषा के संतुलन को बनाए रखने के लिए ही महात्मा गांधी संस्थान की स्थापना हुई I अत: यह एक गलत धारणा होगी अगर हम कहें कि मारिशस में भारतीय संस्कृति और हिंदी भाषा की स्थिति दयनीय है क्योंकि संस्थान द्वारा किए गए कार्यों से पता चलता है कि उनके महत्त्व में परिवर्तन नहीं आया है बल्कि वह है हमारे दिमाग में I

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