Lecture 6 – शब्द का महत्व / प्रयोग

Monday 21 Nov 2011, 12.30 – 14.00

सभी का स्वागत.

इस बार पुन: आप लोगों को इंटरनेट के माध्यम से मैंने evidya  और wordpress पर कुछ स्पष्टीकरण दिया, साथ ही यह भी बताया कि यदि आप यूनिकोड के अतिरिक्त किसी अन्य फोंट में टाइप करते हैं ति pdf में उसे कैसी परिवर्तित किया जा सकता है…

इसके बाद हमने निर्धारित विषय पर चर्चा की..

आपको याद होगा कि पिछली बार आपको एक कार्य दिया गया था, किसी भी विषय पर एक संवाद लिखें जिसके बाद साथ में हम सभी उन संवादों के शब्द-चयन, उनकी शैलियों व भाषिक कौशल का विश्लेषण करते, परंतु इस बार समय की कमी की वजह से हम ऐसा नहीं करा पाए… मैं आप सभी से  आग्रह करता हूँ  कि अपनी ओर से इसी कार्य की पूर्ति घर  पर करें …

इसके अतिरिक्त मैंने शब्द के अर्थ, उसके महत्व, उसके प्रयोगात्मक रूप, उसके विकास, अर्थ के साथ उसके संबंध आदि पर विस्तार से चर्चा की थी..

presenting you the outlines of the powerpoint presentation : –

शब्द संरचना,  शब्द संसार, शब्द प्रयोग और साहित्य

  • शब्द क्या है?
§शब्द की परिभाषा
§शब्द का संसार
§“शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्”
§शब्द-निर्माण
§सामान्य अर्थ और गूढ़ अर्थ
शब्द और साहित्य:-
§संदर्भ
§काव्यात्मक शब्द
úअर्थ वैचित्र्य
úअर्थ का चमत्कार
úलय
úआलंकारिकता
úदृश्यात्मकता / चित्रात्मकता
 बिम्ब विधान
§प्रतीक विधान

सूर्यकांत बाली: http://www.bhartiyapaksha.com/?p=4438

अगर कोई भाषा दुरूह न हो गई हो, उसमें लिखा  साहित्य आसानी से समझ में आने लायक न हो तो क्या उस भाषा और उसके साहित्य को समझने-समझाने  के लिए विशेष प्रयास करना पड़ता है? भाषा विज्ञान का नियम है कि केवल उसी भाषा  को समझाने के लिए नियमों की जरूरत पड़ती है, व्याकरण की जरूरत पड़ती है, जिसे आम बोलचाल की भाषा के रूप में समझना हमारे लिए आसान न रह  गया हो।

शब्द शक्ति :-
§अभिधा
§लक्षणा
§व्यंजना
1. अभिधा:-
§किसी शब्द या शब्द-समूह का सामान्य अर्थ में प्रयोग अभिधा शक्ति कहलाता है।
§अभिधा द्वारा अभिव्यक्ति अर्थ को अभिधेयार्थ या मुख्यार्थ कहते हैं.
§E.g. ‘सिर पर चढ़ना’ का अर्थ किसी चीज को किसी स्थान से उठा कर सिर पर रखना होगा।
2. लक्षणा:-
§जब मुख्यार्थ का बोध न हो + रूढ़ि या प्रसिद्ध के कारण अथवा किसी विशेष प्रयोजन को सूचित करने के लिए, मुख्यार्थ से संबद्ध किसी अन्य अर्थ का ज्ञान हो  >> लक्षणा शब्द-शक्ति।
§यह शक्ति ‘अर्पित’ अर्थात् कल्पित होती है।
§लक्षणा से ‘सिर पर चढ़ने’ का अर्थ आदर देना होगा।
§ उदाहरणार्थ, ‘‘अंगारों पर लोटना’, ‘आँख मारना’, ‘आँखों में रात काटना’, ‘आग से खेलना’, ‘आसमान पर दीया जलाना’, ‘दूध-घी की नदियां बहाना’, ‘खून चूसना’, ‘चैन की वन्शी बजाना’, ‘ठहाका लगाना’, ‘लम्बी बांह होना’, ‘विजय का डंका बजाना’ और शेर बनना’ आदि में लक्षणा शक्ति का प्रयोग हुआ है।
3. व्यंजना:-
§जब अभिधा और लक्षणा अपना काम करके विरत हो जाती हैं तब जिस शक्ति से शब्द-समूहों या वाक्यों के किसी अर्थ की सूचना मिलती है उसे ‘व्यंजना’ कहते हैं। मुहावरों में जो व्यंग्यार्थ रहता है, वह किसी एक शब्द के अर्थ के कारण नहीं बल्कि सब शब्दों के श्रृंखलित अर्थों के कारण होता है, अथवा यह कहें कि पूरे मुहावरे के अर्थ में रहता है।
§इस प्रकार ‘सिर पर चढ़ना’ मुहावरे का व्यंग्यार्थ न तो ‘सिर’ पर निर्भर करता है न ‘चढ़ाने’ पर वरन पूरे मुहावरे का अर्थ होता है ‘उच्छृंखल, अनुशासनहीन अथवा ढीठ बनाना।’ यह व्यंग्यार्थ अभिधेयार्थ तथा लक्षणा अभिव्यक्ति अर्थ से भिन्न होता है।

संज्ञाओं का प्रयोग होने से :

oकभी-कभी व्यक्तिवाचक संज्ञाओं का प्रयोग जातिवाचक संज्ञाओं की भांति करके मुहावरे बनाए जाते हैं;
oजैसे – कुंभकरण की नींद, द्रौपदी का चीर, जयचंद होना, युधिष्ठिर बनना, विभीषण होना, हरिश्चन्द्र बनना, आदि।

  जब मनुष्य प्रबल भावावेश में होते हैं तब उनके मुंह से कुछ अस्पष्ट ध्वनियां निकल जाती हैं जो बाद में किसी एक अर्थ में रूढ़ हो जाती हैं और मुहावरे कहलाने लगती हैं।

v हर्ष में : आह-हा, वाह-वाह, आदि।
vदुःख में : आह निकल पड़ना, सी-सी करना, हाय-हाय मचाना, आदि।
vक्रोध में: उंह-हूं करना, धत् तेरे की, आदि।
vघृणा में : छि-छि करना, थू-थू करना।
§
§पशु-वर्ण की ध्वनियों पर आधारित : टर-टर करना, भों-भों करना, में-में करना, आदि।
§पक्षी और कीट-पतंगों की ध्वनियों पर आधारित : कांव-कांव करना, कुकड़ू-कूं बोलना, भिन्ना जाना आदि।
§
§कठोर वस्तुओं की संघर्ष-जन्य ध्वनियों के अनुकरण पर आधारित : फुस-फुस करना, फुस-फुस होना, आदि।
§तरल पदार्थों की गति से उत्पन्न ध्वनि पर आधारित : कल-कल करना, कुल-कुल करना या होना, गड़-गड़ करना, आदि।
§वायु की गति से उत्पन्न ध्वनि पर आधारित : सर-सराहट होना, सांय-सांय करना, आदि।
§

शारीरिक चेष्टाएं मनोभाव प्रकट करती हैं और उनके आधार पर कुछ मुहावरे बनते हैं;

 

§जैसे-छाती कूटना या पीटना, दांत पीसना, नाचने लगना, पूंछ हिलाना, पैर पटकना, मुंह बनाना, मूछों पर ताव देना, आदि।
§
§अचानक किसी संकट में आने से सम्बन्धित मुहावरे : आठों पहर सूली पर रहना, कहीं का न रहना, तकदीर फूटना, आदि।
§अतिशयोक्ति की प्रवृत्ति से उद्भुत मुहावरे : आसमान के तारे तोड़ना, कलेजा बांसों उझलना, खून की नदियां बहाना, आदि।
§भाषा को अलंकृत और प्रभावोत्पादक बनाने के प्रयास से उद्भुत मुहावरे : ईद का चांद होना, गूलर का फूल होना, सरसों-सा फूलना, आदि।
§
§अभी-अभी
§छिः –छिः
§छिप-छिप कर
§तिल-तिल भर
§थोड़ा-थोड़ा करके, आदि।
§
§उठना-बैठना
§खाना-पीना
§पढ़ाना-लिखना, आदि।
§
§कपड़ा-लत्ता
§चूल्हा-चौका
§दवा-दारू
§गाजर-मूली
§नदी-नाला
§भोजन-वस्त्र
§रोज़ी-रोटी, आदि।
§
§दान-दहेज
§मेल मुहब्बत होना
§मेल-मुलाकात रखना
§दिशा-मैदान जाना
§टेंशन-वेंशन आदि।
§

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

3 Responses to Lecture 6 – शब्द का महत्व / प्रयोग

  1. siddhi says:

    नमस्ते गुरुजी
    सोमवार की कक्षा में आपने शब्द शक्ति की चर्चा की है पर व्याकरण की पुस्तक से जो आपने समझाया वो काफी भिन्न है
    .

  2. taranginee devi ramphul says:

    नमस्ते गुरुजी
    hamesha ki taraha apki kaksha bahut labhpradh thi.. shab ki paribhasha ityadi par humein achee taraha se samjhaye…

  3. anoupam doobur says:

    नमस्ते गुरुजी,
    जो सम्वाद आपने पिछ्ली बार दिया था उसी का प्रस्तूतीकरण हर टोली ने कक्शा मे किया. हमारी गलतिया सामने आयी और हम ने काफी कुछ सीखा.

    धन्यवाद

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