Lecture 12 – general

Wednesday 23 Nov 2011.

आज की कक्षा में हमने कुछ सामान्य बातें कीं. मॉड्यूल के विषय में, संभावित प्रश्नों के बारे में, आपकी आलोचनात्मक व विश्लेषाणत्मक शक्ति पर आदि ऐसे अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया.

साथ ही, क्लास टेस्ट के स्थान पर एक कार्य आपको दिया गया जिसे अगले बूधवार 30 नवम्बर 2011 तक http://www.evidya.org पर भेज देना है. याद रहे, यह आपके coursework के अंतर्गत आता है. कविताओं की व्याख्या व विश्लेषण करके आपको अपना कार्य पोस्ट करना है.

The following students are allotted the following poems: –

  1. Lochun – प्यारे भारत
  2. Bundhun – ख़ूनी हस्ताक्षर
  3. Mohesh-Jugoo – आर्य
  4. Etwaru – ताशों में ही बचे रहेंगे
  5. Sobhagee – कर्मवीर
  6. Ojoobah – बढ़े चलो
  7. Kowal – सरफ़रोशी की तमन्ना (गीत)
  8. Lalman – यह दीया बुझे नहीं
  9. Ruttun – अरुण यह मधुमय देश हमारा
  10. Mohabeer – चल मरदाने
  11. Panchoo – ध्वजा वंदना
  12. Gutteea – विप्लव गान

NB:  DO NOT FORGET THE DEADLINE FOR POSTING THIS ASSIGNMENT IS WEDNESDAY 30 NOV 2011

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

2 Responses to Lecture 12 – general

  1. Nundita Ruttun says:

    तब समझूंगा आया बसंत

    प्रसंग : प्रस्तुत कविता सुछीन्द्र जी ने सन 1939 में लिखा है l यहां पर कवि ने वसंत को केंद्र बनाया है l वसंत क्या है ? वह खुशी, आनंद का प्रतीक है l कवि प्रकृति के आधार पर बताना चाहते हैं कि वसंत तभी आएगा जब स्वंय को न्योछावर करेंगे सभी भारत के नवयुवक l कवि स्वतंत्रता रूपी वसंत लाने की चेष्टा करते हैं l

    व्याख्या : भारत में वसंत ऋतु श्रेष्ठ है, सभी ऋतुओं में, बहने वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए चावल लेकर आती है | गीत गाती है | खुशी मनाती है |

    जन सजी वसंती बाने में
    बहनें जौहर गाती होंगी,
    कातिल की तोपें उधर,
    इधर नवयुवकों की छाती होगी,
    तब समझूंगा आया वसंत |

    उर्जा – खुशी होने की भावना का प्रतीक है | उर्जा हम भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोष,दादाभाई नौरोजी, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि स्वतंत्रता सेनानियों में उर्जा देखी जा सकती है | परन्तु गांधी जी में यही उर्जा देखी गयी जो हिंसात्मक रूप में था | उनका यह दृढ़ संकल्प बहुत ही सटीक था |

    छाती ताने….

    जौहर के स्थान में तोपे रखा गया है | वसंतमय वातावरण की जगह पर नवयुवकों की छाती रखा गया है |

    जागो फिर एक बार कविता मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है | इस कविता में भी कवि ने भारत वासियों को जगाने का प्रयास किया है | एक तरफ पतझड़ है तो दूसरी ओर नवयुवकों के प्रयासों से स्वतंत्रता के लिए प्रेम, राष्ट्र भावना है | कवि ने नव विकसित कोपल का प्रयोग नवयुवकों के लिए किया है | बलिदान आत्म न्यौछावर होने का भाव है | जब जब अंग्रेज़ प्रहार करेंगे हम अपना विद्रोह दिखाने जाएंगे | अर्थात अधिक से अधिक लोग बलिदान देने के लिए तैयार है |

    बलिदानों की टोली होगी
    धरती हमारी अपनी है, अपने ही देश में हम पराए हो गये हैं | अर्थात अंग्रेजों ने भारत पर कबज़ा कर लिया है | जिस प्रकार प्रकृति विद्रोह करती है वैसे ही भारत वासियों को विद्रोह करने के लिए जगा रहे हैं | वे कहते हैं :

    युग-युग से पीड़ित मानवता
    सुख की सांसे भरती होगी
    जब अपने होंगे वन-उपवन
    जब अपनी यह धरती होगी
    तब समझूंगा आया वसंत |

    जब प्रकृति को संचालित करने का प्रयास करते है तो वह विद्रोह करती है | जिस प्रकार प्रकृति विद्रोह करती है तो भूकम, बाढ़, सूनामी,global warming cyclone सूखा यह सभी प्राकृतिक प्रकोप तब आता है जब प्रकृति को नष्ट करने का प्रयास किया जाता है | उसी प्रकार अंग्रेजों के दमन नीतियों से उब कर भारत देश की जनता विद्रोह करने के लिए उत्तर आए हैं |

    प्रकृति में सभी अपने कार्य स्वतंत्र रूप से निभाते आ रहे हैं, उदाहरण झरना स्वतंत्र रूप से झड़ता है, नदी नाले स्वतंत्र रूप से बहते हैं | सूर्य रोज़ सुबह अपनी किरणों को प्रदान करने के लिस प्रकट हो जाता है | सभी स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र रूप अपने कार्य कर रहे हैं |

    उदाहरण – जिस प्रकार शरीर का हर एक अंग प्रकृति की तरह भी कार्यरत है जैसे हाथ से हम काम करते हैं,आंखों से देखते हैं, पैरों से चलते हैं, नाक से सूंघते हैं आदि- आदि |
    फिर एक शिशु अपने माँ की गर्भ से तीन महीने से जब उसका ह्रदय धरकना शुरू करता है तो अंत समय तक धरकता ही रहता है | और प्रकृति भी लगातार स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती आ रही है | हमारा शरीर का हर एक भाग भी स्वतंत्र रूप से कार्यरत है | उसी प्रकार वसंत भी हर ऋतू की तरह आती है और स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करती है |

    जब अपनी यह धरती होगी |
    यहां पर कवि को दृढ़ विश्वास है कि अपने होंगे और निश्चित रूप से पूर्व चेतना का आभास हो गया है कि हम अपने भारत देश को आज़ाद करके ही रहेंगे |

    जब विश्व प्रेम-मतवालों के खून से पथ पर लाली होगी |
    विश्व प्रेम की बात – यह वैश्विक क्षमता, वैश्विक तात्कालीनता का प्रतीक है | यहां पर कवि ने विश्व प्रेम की बात कही है | सिर्फ भारत में नहीं वे पूरे विश्व में शांत लाना चाहते हैं |

    तीन प्रकार की सेनाएं हैं – जल, थल , हवा ( sea Army , land Army , Pilot )
    मेरा कर्म कहता है मुझे अपनों के लिए बलिदान होना | अपने हाथ में भाग्य को आगे लेकर बढ़ रहा है |

    उदाहरण :- फेंक चुका कब का गंगाजल
    यहाँ आध्यात्मिकता का प्रतीक है |

    जब सब बंधन कट जाएंगे परवशता की होली होगी |
    यहां पर कवि ने होली की बात कही है |
    होली- बुराई पर अच्छाई का विजय का प्रतीक है | होलिका दहन इसलिए मनाते हैं ताकि बुराई का नाश हो |
    उदाहरण:- अस्तो माँ सद गमय |

    दूसरे दिन खुशी-खुशी होली मनाई जाती है |

    माँ बहनों की होली होगी,
    तब समझूंगा आया वसंत |
    दो बार होली शब्द का प्रयोग हुआ है – एक प्रेम का प्रतीक है और दूसरा आंचल का |

    झोली खाली है का अर्थ है आंचल खाली है | माँ का आंचल बच्चे के लिए होता है | अर्थात यहां पर कवि ने भारत माता को माँ कहा है, भारत माँ की प्राप्ति में अर्थात उसको आज़ाद करने के लिस उसके सभी संतान न्योछावर होंगे |
    फिर दूसरा अर्थ भारत माँ की झोली भर गयी स्वतंत्रता पाके |

    विशेष :-
    इस कविता में उस समय के कवियों की सोच, उनके शशक विश्वासों, दृढ़ संकल्प को इस कविता में दर्शाया गया है |
    काव्यगत विशेषता – साम्य रूपक अलंकार
    इस कविता में पाँच बिम्ब है :-
    १. वसंत- तोप
    २. पतझड़- नए
    ३.युग-युग मानवता
    ४.माँ बहन होली
    यह कविता छन्दों में बंधी है |
    वसंत प्रतीकात्मक है |

  2. nundita ruttun says:

    प्रस्तुत कविता महाकवि जयशंकर प्रसाद जी के मेरा भारत में से अरुण यह मधुमय देश हमारा से लिया गया है | इस कविता छायावाद तथा प्रगतिवाद का सुन्दर चित्रण किया गया है| कवि जी प्रकृति का उदाहरण लेकर भारत वासियों को जगाना चाहते हैं| उनको भारत देश को आज़ाद कराने के लिए पुकार रहे हैं |

    जय शंकर प्रसाद जी प्रकृति के माध्यम से कहते हैं ‘हे मेरे देश के वासियों उठो, जागो तुम लोग सोओ मत | हमें भारत देश को आज़ाद कराना है | जागो राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लो | अंग्रेजों के चाल को पहचानों उनका कार्य ही है,
    ‘फूट डालो और राज करो’

    रात होने पर सो मत जाना , हमारा भारत देश बहुत सुन्दर है, और यहां के रहने वाले सभी मीठा बोलते है, अर्थात उनकी वाणी मधु के सामान मधूर है | इसीलिए अंग्रेजों इसका लाभ उठा रहे है और भारत देश को लुट रहे हैं | जिस प्रकार धरती और आसमान को क्षितिज की ओर देखते है तो लगता है कि उनका मिलाप हो रहा है परन्तु यह हमारा ब्रहम है, उसी प्रकार अंग्रेज़ कभी भी भारतीयों को नहीं पहचान सकते हैं | या फिर कवि जी क्षितिज का उदाहरण लेकर लोगों को एकता का सन्देश देना चाहते हैं , तुम सभी लोग एक होकर भारत देश को आज़ाद कराओ |

    हमारा भारत इतना सुन्दर है, यहां पर अंग्रेज़ अपना राज्य स्थापित करके हमारे देश की सुन्दरता को नष्ट भ्रष्ट कर रहे हैं | भारत देश को अंग्रेजों के चुंगल से छुराने पर ही हरियाली का सुख अनुभव कर सकेंगे | रोज अंग्रेज़ हमारे देश को लुट रहे है, उसको खोकला बनाते जा रहे हैं | और तुम लोग रात्रि के आने से सो रहे हो |

    तिलक ने केसरी में लिखा है-
    ‘हमारा राष्ट्र एक वृक्ष की तरह है जिसका मूल ताना स्वराज्य है स्वदेशी तथा बहिष्कार उसकी शाखाएं हैं |’

    अर्थात हमारा देश वृक्ष की तरह एक राष्ट्र है और उसकी पहचान बनाने के लिए स्वराज्य को प्राप्त करना हमारा जन्म सिद्द अधिकार और विदेश वस्त्रों का बहिष्कार करने स्वदेशी वस्त्रों को धारण करना हमारा धर्म है |

    कवि जी प्रकृति का उदाहरण लेकर आगे कहते हैं,’जिस प्रकार इन्द्रनाथ आसमान में पंख पसारे खड़ा है और पहरा दे रहा है, हवा स्वतंत्र रूप से अपना काम कर रही है, पक्षी आकाश में उड़ रहे हैं अर्थात सभी प्रकृति का नियम निभाते हुए स्वतंत्र रूप से अपना अपना काम कर रहे है, वस्तुत: तुम लोग भी जागो प्रकृति से सीखो, कर्मयोगी बनो और स्वराज्य प्राप्त करने के लिए एकता के सूत्र में बंध जाओ |

    अब भारत देश ने बहुत आंसू बहा लिया है, उस से अंग्रेजों का अत्याचार अब और सहा नहीं जाता है | कवि जी लहरें का उदाहरण लेकर कहते हैं, ;जिस प्रकार लहरें टकराती हुई किनारे तक आती है और सब कुछ बहाकर लेकर चली जाती है उसी प्रकार तुम लोग भी लहरें का रूप धारण करो, अर्थात जितना कुछ तुम लोगों ने अपने अन्दर समेटा हुआ उसका विद्रोह करने का समय आ गया है | तुम लोग भी लहरों की तरह विद्रोह करो और भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लो |

    आगे कवि जी कहते हैं, तुम लोग भी हिमालय पर्वत के समान उंचा बनो अर्थात अपने विचारों को उंचा बनाओ, भारत देश को आज़ाद कराने के लिए सोचो |

    विशेष : कवि जी इस कविता में लोगों को यह सन्देश देना चाहते हैं कि उठो, जागो भारत देश को आज़ाद करो, चुटकी भर अंग्रेजों से डरने से कोइ लाभ नहीं होगा, उनके इशारे पर नाचने के बदले आवाज़ उठाओ, देश प्रेमी बनो, राष्ट्रीयता का संचार करो, स्वतंत्रता संग्राम के बारे में सोचो उठो जागो ,सोओ मत भारत देश को आज़ाद कराओ |

    कविता में अन्त्यानुप्रास अलंकार है जैसे कि बादल, जल
    प्रकृति का सुन्दर चित्रण हुआ है |
    छेकानुप्रास अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है जैसे जग रजनी भर तारा
    छायावाद काल की कविता है |

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