Lecture 9 & Lecture 10 – अनुवाद की प्रकृति (समाप्त)

Thursday 24 Nov 2011, 09.00 – 11.00, BA Yr 3. 

पिछली बार की बात के साथ आज आगे के विचार प्रस्तुत किए गए. आपको याद होगा Muir, Edwin & Muir, Willa (On Translation) की परिभाषा –

“translation is obviously a difficult art; i use that word, for if translation is not an art, it can hardly be called translation. yet, it is a secondary art and at best, can strive for but never reach a final perfection.”

यद रखिए कि ऐसी कोई भी कला नहीं जो शिल्प की अपेक्षा करती हो, साथ ही ऐसा कोई शिल्प भी नहीं जो बिना कला के परिपूर्ण हो.

यह भी याद करना अनिवार्य है कि अनुवाद  की प्रकृति के निर्धारण से पहले अनुवाद के प्रकार को पहचानना अनिवार्य है.

भोलानाथ तिवारी की परिभाषा है –

“यदि मूल समाग्री केवल सूचनाओं या तथ्यों से युक्त है या विज्ञान आदि की है, जिसमें सूत्रों की प्रधानता है और अभिव्यक्ति का कोई खास महत्व नहीं है, तो उसके अनुवाद के साथ शिल्पी न्याय कर लेगा, किंतु मान लीजिए कविता का अनुवाद करना है जिसमें भाव तथा जिसका बहुत कुछ सौंदर्य अभिव्यक्ति परा आधृत है, तो उसके लिए अनुवाद-कला अनिवार्यत: आवश्यक होगी, केवल अनुवाद-शिल्प से अनुवाद अपेक्षित बात नहीं बनती.”

अब, श्रीपाद रघुनाथ जोशी (अनुवाद पत्रिका,अंक 52, पृष्ठ 70-71) मानते हैं कि शिल्प मूल के भाव को लक्ष्य भाषा में हू-ब-हू रूपांतरित करता है.. उनके अनुसार इसमें कला की कोई आवश्यकता नहीं है. अनुवादक दोनों भाषाओं के शब्द-भंडार/ संपदा से परिचित होकर यह कार्य आसानी से कर सकता है. वे आगे बताते हैं कि अनूदित पुस्तक पढ़ने पर अनुवाद का यदि कोई आभास न हो, तो समझना चाहिए  कि अनुवाद  सफल हुआ, और इसके पीछे शिल्प का ही हाथ होता है. जबकि मूल भाषा की भावनाएँ, उसकी परंपराएँ –  यदि इन सब  को आप अनुवाद की भाषा में लाते हैं तो वह कला है.

  • अनुवाद विशुद्ध कला भी नहीं है:-

सर्जनात्मक कृति की पुन: सर्जना या ‘प्रति सर्जना’ है – कला. अत: अनुवाद इस दृष्टि से “प्रथम श्रेणी की कला नहीं है.”

डॉ. रणजीत साहा (1990, pp 81) {अनुवाद बोध, संपादक: डॉ गार्गी गुप्ता} अपने लेख “अनुवाद एक सर्जनात्मक कला है.” में लिखते हैं:-

“अनुवाद के प्रयोजन-पक्ष को अनुवादक के शिल्प (भाषा प्रयोग, संरचना-बोध और विन्यास संबंधी अनुषंग) और कला – (लालित्य बोध, अंविति और सांस्कृतिक संप्रेषण)- दोनों के ही समानुपातिक तालमेल की आवश्यकता होती है.”शिल्प” भाषा के स्थूल स्तर पर और “कला” उसके सूक्ष्म स्तर (भाव) पर अपने अपने निकाय को स्प्ष्ट और प्रकट करते हैं. वस्तुनिष्ठता और आत्मनिष्ठता का यह  सामंजस्य ‘शरीर और आत्म’ के चिर-परिचित रूपक द्वारा सहज ही समझा  जा सकता है.”

  • क्या अनुवाद विज्ञान है?

इससे पहले विज्ञान के अर्थ को समझना ज़रूरी है. इसमें तर्क, प्रमाण, निश्चितता आदि आ जाते हैं. चूँकि अनुवाद प्रायोगिक या अनुप्रयुक्त भाषा-विज्ञान से ही सीधा संबंध रखता है, इसलिए यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

“अनुवाद भाषिक-प्रक्रिया का परिणाम या उसकी परिणति है. यह तो ठीक है कि उसकी प्रक्रिया बहुस्तरीय है, जटिल है, वह विज्ञान है, शिल्प और कला तीनों है, लेकिन उसका परिणाम किस पकृति का है?”

अनुवाद कला है:- यह इस रूप में देखा जा सकता है-स्रोत भाषा में निहित बिम्बों, प्रतीकों, और अभिप्रायों को अपनी भाषा में लालित्यपूर्ण ढंग स लाने की चेष्टा करना. इसे पुन: सर्जन अथवा प्रति सर्जन (trans-creation) कहा जाता है. यहाँ अनुवादक  व्याख्या करता है.

यदि व्यापक रूप से देखा जाए  तो अनुवाद स्वयं में मौलिक अभिव्यक्ति भी है…

अज्ञेय लिखते हैं –

“समस्त अभिव्यक्ति अनुवाद है, क्योंकि वह अव्यक्त (या अदृश्य आदि) को भाषा (रेखा या रंग) में प्रस्तुत करती है. ”

इसके विरोध में Humbolt बताते है कि अनुवाद मौलिक अभिव्यक्ति भी नहीं है क्योंकि –

“सारा अनुवाद-कार्य बस एक असमाधेय समस्या का समाधान खोजने के  लिए किया गया प्रयास मात्र है.” हम वस्तुओं और प्राणियों को देखकर उनके नाम रखते हैं या उनके चित्र बनाते हैं, वह भी अनुवाद है; हमारा नाम हमारा अनुवाद है!

परंतु ऐसे तर्कों से “अनुवाद की प्रकृति” की समस्या का हल नहीं हो सकता है.

 

अनुवाद विज्ञान है , इस तर्क पर दो प्रक्रियाएँ चलती हैं- विकोडीकरण और कोडीकरण, इस कक्षा में विस्तार से समझाया गया.

साथ में कुछ परिभाषाएँ-

“Translation  is far more  than a science. It is also a skill (कौशल) and in the ultimate analysis, fully satisfactory translation is always an art.”

“Interpreting is not everybody’s art.”

“translators are traitors”

अंतिम प्रश्न:

अनुवाद कलात्मक विज्ञान है या वैज्ञानिक कला है???? इस पर मनन करें …

अनुवाद को इस रूप में “कलात्मक रुचि” + “सृजनात्मक क्षमता” चाहिए. काव्यानुवाद vs तथ्यपरक अनुवाद …

 

 

 

 

About Vinaye Goodary
senior lecturer in Hindi at the Mahatma Gandhi Institute, moka, mauritius. innovative in teaching using ICT, blogs and multimedia resources. interest in arts, culture, history and literature. शेष तो मैं ही मैं हूँ... स्वागत है.

One Response to Lecture 9 & Lecture 10 – अनुवाद की प्रकृति (समाप्त)

  1. ghoora taruna says:

    अनुवाद एक व्यवस्थित प्रक्रिया, जिसके आधार पर ही मूल भाषा के पाठ को लक्ष्य भाषा में हू-ब-हू रूपांतरित किया जाता है| अनुवादक जब शिल्प का प्रयोग करके अनुवाद करता है, तब पाठक को यह नहीं लगता कि यह अनुदित पाठ है| लेकिन अनुवाद प्रथम श्रेणी की कला नहीं है, वरन् एक गौण कला है| प्रायः भाषा विज्ञान के अंतर्गत जितनी सारी प्रतिक्रियाएं हैं, अनुवाद उनके अनुसार ही किया जाता है| अनुवादक अपनी अज्ञानता के कारण इन प्रतिक्रियाओं के कारण गलत अनुवाद कर देते हैं| यह माना जाता है कि भाषा अध्ययन के सिद्धांत सभी भाषाओं में समान है और व्याकरणिक अंश सभी भाषाओं में उपस्थित है| वास्तव में अनुवाद करते समय अनुवादक को अपनी ओर से कुछ जोड़ने या घटाने की अनुमति नहीं होती|

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